बाल साहित्य की श्रेष्ठ कहानी: पुरस्कृत पुस्तक

Dr. Mulla Adam Ali
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This story highlights the true value of books—not in their appearance, but in how they are used. It teaches children that sincere effort, regular study, and meaningful learning are more important than outward show.

The True Value of Books

छात्रों के लिए प्रेरणादायक कहानी पुरस्कृत पुस्तक

यह कहानी बच्चों को यह समझाने का सुंदर प्रयास है कि किताबों का महत्व उनके बाहरी रूप में नहीं, बल्कि उनके सही उपयोग में छिपा होता है। सादगी, नियमित अध्ययन और मेहनत ही वास्तविक सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है—यही इस कहानी का मूल संदेश है।

छात्रों के लिए प्रेरणादायक कहानी

पुरस्कृत पुस्तक

स्कूल का नया सत्र शुरू होने पर प्रधानाचार्य ने सब बच्चों से कहा था कि छः महीने के बाद सबके बस्तों की जाँच की जाएगी। किताबों, कॉपियों को देखा जायेगा। किताबें, कॉपियाँ रखने का जिसका ढंग सबसे अच्छा होगा, उसे पुरस्कार दिया जायेगा।

पाँच महीने बीत गये। अब सभी सतर्क हो गये थे कि किसी भी समय उनका बस्ता देखा जा सकता है। बच्चों ने अपनी किताबों और कॉपियों पर अच्छे और सुन्दर कागजों से कवर चढ़ाने शुरू कर दिये थे। कुछ ने तो अपनी कॉपियों की जिल्द पर रंग-बिरंगे फूल बनाकर अच्छी साज-सज्जा की थी। जगत ने अपनी किताबों पर महँगे प्लास्टिक कवर चढ़ा लिये थे। उसे पूरी उम्मीद थी कि कक्षा में ही नहीं, बल्कि पूरे स्कूल में उसकी किताबें प्रथम स्थान प्राप्त करेंगी।

स्कूल की सभी कक्षाओं के छात्र-छात्राओं की किताबें और कॉपियों की जाँच शुरू हो गई। अपनी कक्षा में योगी की किताबों ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। उसी कक्षा में पढ़ रहे जगत की किताबों को कोई स्थान नहीं मिला। अगले दिन पूरे स्कूल में प्रथम आनेवाली किताबों की घोषणा होनी थी और उसी दिन बाल-सभा में पुरस्कार भी दिया जाना था।

अपनी-अपनी कक्षा में प्रथम आनेवाले छात्र-छात्राओं में, सभी को उम्मीद थी कि वह स्कूल में भी प्रथम आयेगा। बाल-सभा में जब प्रधानाचार्य ने योगी के नाम की घोषणा की तो सभी ने खूब तालियाँ बजाई। पर योगी की कक्षा के अन्य छात्रों को बड़ा आश्चर्य हुआ। जगत को न केवल आश्चर्य हुआ बल्कि वह परेशान भी हो गया। प्रधानाचार्य जी योगी को पुरस्कृत करें इससे पहले ही वह खड़ा हो गया। बोला "सर, मेरी किताबों का कोई मुकाबला नहीं है। सब पर महँगी प्लास्टिक की जिल्द है। पुस्तकों के भीतर भी कहीं स्याही या किसी और चीज के दाग-धब्बे नहीं है। जबकि योगी की किताबों में आपको जगह-जगह निशान मिल जायेंगे। उसकी कॉपियों पर छपा विजयस्तम्भ दिख रहा है, जबकि मैंने कितना सुन्दर कवर चढ़ा रखा है। उसके मुकाबले मेरा रख-रखाव अच्छा है। मुझे इनाम क्यों नहीं दिया जा रहा?"

प्रधानाचार्य जी ने कहा-जगत, तुम ठीक कह रहे हो। दिल करता है तुम्हारी किताबें, कॉपियाँ लेकर मैं अपने कार्यालय के शो-केस में सजा लूँ। पर किताबें, कॉपियाँ इसके लिये नहीं होती है। वे तो पढ़ने-लिखने के लिये होती है। तुम्हारी किताबें देखने से ऐसा लगता है कि तुम्हारा सारा ध्यान इनके रख-रखाव पर ही लगा रहता है। तुम इन्हें पढ़ते कम हो, सँवारते ज्यादा हो। योगी की किताबों में कहीं स्याही का निशान है तो कहीं लंबे समय तक हाथ टिकाये रखने से मैल का निशान बन गया है। किताबों की जिल्द बँधी है और उस पर साधारण खाकी कागज चढ़ा हुआ है। कॉपियाँ ऊपर से ज्यादा सुन्दर नहीं है, पर भीतर का हस्तलेख सुन्दर है, काम भी पूरा है, अध्यापकों ने भी अच्छी टिप्पणियाँ दे रखी हैं। अब तुम समझ गये होंगे कि योगी को प्रथम पुरस्कार क्यों मिला है?

"समझ गया सर", जगत ने धीरे से कहा।

"समझ गये हो तो समझने का सबूत भी देना। इस बार तीन महीने बाद फिर सबका बस्ता देखा जायेगा, फिर पुरस्कार दिया जायेगा।" प्रधानाचार्य ने कहा।

प्रधानाचार्य ने योगी को पुरस्कार दिया तो सबसे ज्यादा तालियाँ जगत ने बजाई।

- गोविंद शर्मा

निष्कर्ष; यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा पुरस्कार दिखावे से नहीं, बल्कि ईमानदार परिश्रम और अध्ययन से मिलता है। ज्ञान का मूल्य बाहरी सजावट में नहीं, उसके सही उपयोग और समझ में निहित होता है।

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