“Sawal Ka Bawal” is a light-hearted children’s story that highlights the innocence of simple minds and the humor created by misunderstanding. Through a village setting and everyday situations, the story gently teaches that incomplete knowledge can often lead to amusing but incorrect conclusions.
Humorous Children’s Story
बचपन की मासूम सोच और बड़ों की दुनिया की गलतफहमियाँ जब आपस में टकराती हैं, तो कई बार हँसी से भरे रोचक प्रसंग जन्म लेते हैं। “सवाल का बवाल” ऐसी ही एक हास्यपूर्ण बाल कहानी है, जो सरल भाषा में यह बताती है कि ज्ञान और अनुभव के अभाव में सुनी-सुनी बातों का अर्थ कैसे बदल जाता है। यह कहानी बच्चों को हँसाते हुए समझ और विवेक की छोटी-सी सीख भी देती है।
हास्य, शिक्षा और समझ की सुंदर बाल कथा
सवाल का बवाल
पुरानी बात है। उस समय हम अपने गाँव के स्कूल में पढ़ते थे। उन दिनों छोटी कक्षाओं में दो ही विषय पढ़ाये जाते थे हिन्दी और गणित। हमारा स्कूल एक छोटे-से घर में था। घर के साथ ही एक दुकान थी। दुकानदार भोलाभाला था। वह गाँव से बाहर किसी बड़े शहर में कभी नहीं गया था, न किसी स्कूल में पढ़ा था। घर पर ही अपने पिताजी से दुकान का हिसाब-किताब सीख गया था।
एक दिन गाँव में पंचायत की बैठक थी। बाहर से तहसीलदार बैठक में आये थे। उस दुकानदार को भी बुलाया गया था। गाँव में स्कूल के लिए अलग भवन बनाने की बात चल रही थी। उसके लिए चंदा इकट्ठा करना था। तहसीलदार चाहते थे कि सबसे पहले बड़ी धनराशि ली जाये। गाँव में जिसके पास ज्यादा धन है, उसका पता लगाया जावे और पहला दान उससे लिया जावे।
तहसीलदार ने पूछा "गाँव में सबसे ज्यादा रुपये किसके पास हैं?"
एक बोला-"हमारे सरपंच के पास हैं। इस सौल उनकी फसल बहुत अच्छी हुई है।"
दूसरा बोला "नहीं, हरिराम के पास है। उसका लड़का फौज में है। वह खूब रुपये भेजता है।"
तीसरे ने कहा "रुपया रिसीराम के पास है। उसका भाई दिसावर से रुपये भेजता है।"
कोई किसी के लिये कह रहा था तो कोई किसी के लिये। दुकानदार कुछ कहना चाहता था पर झिझक रहा था। तहसीलदार की निगाह उस पर पड़ी।
हैं?" तहसीलदार ने पूछा "हाँ भाई, तुम बताओ, गाँव में सबसे ज्यादा रुपये किसके पास
दुकानदार हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। बोला "हुजूर, गुरुजी नाराज तो नहीं होंगे?"
"कौन गुरुजी? जो मंदिर में पूजापाठ करते हैं, वे?"
"नहीं साहब, गुरुजी, जो मेरी दुकान के पास स्कूल में पढ़ाते हैं।"
हमारे मास्टरजी वहीं बैठे थे। वे ही तो हमें हिन्दी, गणित आदि सब कुछ पढ़ाते थे। बोले, "नहीं, नहीं मैं क्यों नाराज होऊँगा? तुम बताओ, गाँव में सबसे ज्यादा रुपये किसके पास हैं?"
दुकानदार ने कहा- "हमारे गाँव में सबसे ज्यादा रुपये इन्हीं गुरुजी के पास हैं।"
उसकी बात सुनकर तहसीलदार, मास्टरजी और गाँव वाले हैरान रह गये। कुछ को तो हँसी आ गई।
"तुम यह कैसे कह सकते हो कि गुरुजी के पास सबसे ज्यादा रुपया है?" तहसीलदार ने पूछा।
"साहब, मेरी दुकान इनके स्कूल के पास है। आप स्कूल में जो भी बात करते हैं, मुझे साफ सुनाई देती है। मैं रोज सुनता हूँ कि आज गुरुजी के पास इतने रुपये आ गये तो कल कितने आये थे। मेरी दुकान में भी जिस दिन ज्यादा बिक्री होती है, हिसाब लगाने में मैं अपने पिताजी की मदद लेता हूँ। गुरुजी भी अपनी कमाई का हिसाब स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों से करवाते हैं।"
उन्हें बताते हैं "आज मेरे पास दो हजार रुपये थे। मेरे पास पाँच सौ रुपये और आ गये। बताओ, अब मेरे पास कुल कितने रुपये हैं। इस तरह रोज-रोज रुपये इनके पास आ रहे हैं।"
उसकी बात सुनते ही मास्टरजी समझ गये कि माजरा क्या है? उन्हें जोर से हँसी आ गई। बोले, "मुझे तो बहुत कम तनख्वाह मिलती है। मेरे पास रुपये कहाँ हैं? यह तो मैं बच्चों को जोड़ करना सिखाने के लिये सवाल बोलता हूँ। इस भाई ने समझ लिया कि मेरी इतनी कमाई हो रही है।"
अब तो दुकानदार के अलावा सब हँस रहे थे।
अगले दिन स्कूल में एक नया तमाशा हो गया। कहीं से एक साँप निकल आया। मास्टरजी समेत कई बच्चे साँप साँप का शोर करने लगे। दुकान पर आये कई ग्राहक स्कूल में जाने लगे तो दुकानदार ने रोक दिया। बोला, "घबराने की बात नहीं है। लगता है आज गुरुजी रुपये-पैसों का सवाल छोड़कर साँप का सवाल बच्चों को सिखा रहे हैं।"
- गोविंद शर्मा
निष्कर्ष; “सवाल का बवाल” यह सिखाती है कि बिना पूरी बात समझे निष्कर्ष निकालना भ्रम पैदा कर सकता है। मासूम सोच और अधूरी समझ कई बार हास्य का कारण बन जाती है, लेकिन सही ज्ञान और विवेक से ही सच को समझा जा सकता है। यही इस रोचक बाल कहानी का सुंदर संदेश है।
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