चुनमुन का घोंसला: बच्चों के लिए प्रेरणादायक कहानी जो सिखाए दया और जिम्मेदारी

Dr. Mulla Adam Ali
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In the world of childhood mischief, small actions can lead to big lessons. “Chunmun Ka Ghonsla” by Vinita Rahurikar is a heartwarming tale of a naughty boy who learns kindness, responsibility, and compassion after realizing the impact of his actions on a tiny bird.

Chunmun Ka Ghonsla Story: A Heartwarming Moral Tale for Kids About Kindness and Responsibility

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बच्चों की दुनिया में शरारतें आम हैं, लेकिन जब वही शरारत किसी नन्हे जीव को नुकसान पहुँचा दे, तो सीख भी उतनी ही बड़ी मिलती है। विनीता राहुरीकर की कहानी “चुनमुन का घोंसला” एक शरारती बच्चे की संवेदनशीलता, गलती और सुधार की सुंदर कहानी है, जो हमें दया और जिम्मेदारी का पाठ सिखाती है।

बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा और दया की प्रेरणादायक सीख

चुनमुन का घोंसला

मानू बड़ा प्यारा लेकिन बहुत शरारती लड़का था। वह स्कूल से घर आकर नित नई शरारतें करता। माँ उसकी शरारतों से बहुत तंग आ गई थी। बहुत समझाया लेकिन मानू अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आता। माँ सारा समय उस पर कड़ी नजर रखती लेकिन वो फिर भी कुछ न कुछ कर ही देता।

कभी किसी के यहाँ से फूल तोड़ लाएगा, कभी किसी के दरवाजे की बेल बजाकर भाग आएगा। एक बार तो शर्मा अंकल के बगीचे का दरवाजा खोल आया। गाय, बकरियों ने घुसकर उनका पूरा बगीचा खराब कर दिया। सारे पौधे खा गए। मानू को बहुत डांट पड़ी फिर भी वो नहीं सुधरा।

एक दिन उसने देखा कि उसके खिड़की के ऊपर बने झरोखे में चिड़िया तिनके जमा करके घोंसला बना रही है। नीचे फर्श पर भी तिनके बिखर जाते। वह देखता की माँ को रोज तिनके उठाकर सफाई करनी पड़ती है। उसे चिड़िया पर गुस्सा आया।

‘रोज यह कचरा फैलाकर गंदगी करती है और माँ का काम बढ़ा देती है। आज मैं इसे सबक सिखाता हूँ कि यह कचरा फैलाना बन्द कर देगी’ मानू ने मन ही मन कहा और अंदर से एक स्टूल ले आया। फिर उसने एक डंडा लिया और स्टूल पर चढ़कर चिड़िया के घोंसले को मारने लगा।

“चली जाओ यहाँ से। यहाँ कचरा मत करो। कितनी गंदगी करती हो तुम गन्दी चिड़िया। दूर हो जाओ।“

उसने डंडे से मारकर सारा घोंसला तोड़ कर गिरा दिया। चिड़िया जोर-जोर से चूंचूं करने लगी। मानू और चिड़िया की आवाज सुनकर माँ का माथा ठनका। अब क्या किया मानू ने। वो दौड़ी-दौड़ी बाहर आई लेकिन बाहर का हाल देखते ही सन्न रह गई।

“अरे ये क्या किया मानू। बेचारी इतने दिनों से कितनी मेहनत से अपना घोंसला बना रही थी। तुमने क्यों तोडा उसका घर।“ माँ ने मानू से पूछा।

“अच्छा है न माँ अब बरामदे में कचरा नहीं होगा।“ मानू ने जवाब दिया।

“छोटी सी जान कितनी मेहनत से अपने चूजों के लिए एक घर तैयार करती है मानू। अब बेचारी के बच्चे कहाँ रहेंगे” माँ नाराज हो कर बोली।

“पर माँ वो कितना कचरा भी तो करती थी न...” मानू दबे स्वर में बोला।

“कचरा तो तुम भी करते हो घर में तो क्या मैं तुम्हे घर से निकाल देती हूँ? तुम शरारती हो लेकिन एक असहाय, नन्हे प्राणी का घर उजाड़ना बहुत ही गलत बात है।

वैसे ही तो पेड़ काटने से पक्षियों के लिए घोंसले बनाने की जगह नहीं रही। बेचारे जैसे-तैसे कहीं जगह मिल जाये तो घर बना लेते हैं और तुमने वो भी तोड़ दिया। देखो जरा बेचारी कितना रो रही है दुख में। अगर कोई तुम्हारा घर तोड़कर तुम्हे बेघर कर दे तो तुम्हे कैसा लगेगा।

मानू शरारत करना बुरा नहीं है पर किसी प्राणी को सताना, दुख देना बहुत ही गलत है।“ माँ दुख और गुस्से से बोली और अंदर चली गईं।

मानू माँ से माफी माँगने उनके पीछे गया लेकिन माँ ने उसकी तरफ देखा भी नहीं और कमरे में जाकर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

मानू समझ गया कि आज माँ को बहुत दुख पहुँचा है उसके कारण। वह बरामदे में वापस आया तो देखा चिड़िया अभी भी रो रही थी। अब मानू को भी अपनी गलती का अहसास हुआ कि उसने यह ठीक नहीं किया। वह वहीं बैठकर सोचने लगा कि अब क्या किया जाए। कैसे अपनी गलती को सुधारा जाए। तभी उसे ख्याल आया कि उसने चिड़िया का घर तोड़ा है तो उसे ही उसका घर वापस बनाकर देना चाहिए। शायद चिड़िया का दुख कम हो जाये। वह अंदर जाकर गत्ते का एक छोटा सा डिब्बा ले आया। उसने सारे तिनके इकठ्ठा करके डिब्बे में अच्छे से जमा दिए। फिर वह अपने फर्स्टएड बॉक्स में से रुई ले आया और तिनकों के ऊपर अच्छे से जमा दी ताकि नन्हे चूजों को तिनके न चुभें।

अब तक चिड़िया भी समझ गयी कि मानू उसके लिए घर बना रहा है। वह खुशी से उसके चारों तरफ फुदकने लगी। शायद उसे नया घर पसंद आ गया था।

अब तक माँ का गुस्सा भी कम हो गया था। वे कमरे से बाहर आयीं कि देखूँ मानू अब क्या कर रहा है। कोई नईं शरारत तो नहीं कर रहा।

“क्या कर रहे हो मानू तुम ये...” माँ ने उसके हाथ में डिब्बा देखकर पूछा।

“माँ मैंने चिड़िया का घर तोड़ कर उसे दुख दिया था न तो मैं उसके लिए नया घर बना रहा था ताकि वह दुखी न हो और आराम से रह सके” मानू ने माँ को घर दिखाया।

“अरे वाह मानू ये तो तुमने बहुत अच्छा किया। अब ये आराम से सुरक्षित जगह पर अंडे दे कर अपने चूजों को पाल सकती है। आओ मैं इसे झरोखे के सरिए से बाँध देती हूँ ताकि यह हवा से गिरे नहीं।“ माँ अंदर जाकर एक रस्सी ले आयी और गत्ते के डिब्बे को इस तरह से बाँध दिया कि चिड़िया उसमें आराम से आ-जा सके।

“देखो माँ अब यह कितनी खुश है न। मैं इसे रोज़ दाने भी खिलाऊँगा और इसके लिए रोज पानी भी रखूँगा। इसका नाम चुनमुन रखूँगा” मानू उत्साह से बोला।

“मेरा राजा बेटा। जरूर तुम चुनमुन को रोज दाने खिलाना। यह तो बड़ा अच्छी बात है। फिर यह भी चहककर तुम्हे रोज गीत सुनाया करेगी। अब कभी किसी प्राणी का घर मत तोड़ना।“ माँ ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा।

“कभी नहीं माँ मैं वादा करता हूँ अब कभी ऐसी कोई शरारत नहीं करूंगा जिससे किसी को दुख पहुँचे।“ मानू माँ से लिपटते हुए बोला।

“चलो चुनमुन के लिए दाने और पानी लाते हैं।“

माँ और मानू ने एक सकोरे में पानी रखा और एक में चावल के दाने रख दिये।

चुनमुन अपने नए आरामदायक घोंसले में बैठकर चहकने लगी।

- विनीता राहुरीकर

निष्कर्ष; यह कहानी सिखाती है कि गलती करना गलत नहीं, बल्कि उसे समझकर सुधारना सबसे बड़ी बात है। हमें हमेशा हर जीव के प्रति दया और संवेदनशीलता रखनी चाहिए।

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