Gauri Shanker Vaish, A touching story that highlights the harsh reality of child begging and the transformative power of education. “Bhiksha Nahi, Shiksha Chahiye” follows Kanhaiya’s journey from the streets to the classroom, reminding us that every child deserves a chance to learn, grow, and dream beyond circumstances.
Bhiksha Nahi Shiksha Chahiye – Inspiring Short Story on Child Education and Ending Child Begging
यह प्रेरणादायक बाल कहानी एक ऐसे बच्चे की सच्चाई को उजागर करती है, जो मजबूरी में भिक्षा माँगता है, लेकिन शिक्षा के सहारे अपने जीवन की दिशा बदल देता है। “भिक्षा नहीं, शिक्षा चाहिए” हमें यह संदेश देती है कि हर बच्चे को भीख नहीं, बल्कि पढ़ने और आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
शिक्षा से बदलती एक बच्चे की जिंदगी
भिक्षा नहीं, शिक्षा चाहिए
सुबह का उजाला अभी पूरी तरह फैला भी नहीं था। चौराहे पर स्कूल बसों की कतार लगने लगी थी। कहीं साइकिल की घंटी बज रही थी, कहीं बच्चों की हँसी गूँज रही थी। उसी शोरगुल के बीच एक धीमी-सी आवाज बार-बार उभर रही थी—
“मालिक… कुछ दे दो…”
फुटपाथ के किनारे खड़ा वह बालक, फटे कपड़ों में लिपटा, नंगे पाँव, हाथ फैलाए हुए—। उसकी आँखों में भूख थी, पर उससे भी अधिक एक अजीब-सी उदासी, मानो वह अपने भाग्य से ही प्रश्न कर रहा हो।
“हाथ में कटोरा, आँखों में स्वप्न,
यह कैसी विडंबना भारी,
बचपन माँग रहा है उजाला,
दुनिया दे रही है लाचारी।”
कई लोग आगे बढ़ जाते, कुछ सिक्का उछाल देते, और कुछ ऐसे भी थे जो उसे देखकर मुँह फेर लेते। तभी एक साइकिल उसके पास आकर रुकी।
“तुम रोज यहीं खड़े रहते हो! “
यह आवाज थी प्रतीक की, जो पास के स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र था।
बालक ने सिर झुकाकर कहा, “हाँ भैया… पेट की आग बुझाने के लिए।”
“नाम क्या है तुम्हारा?”
“कन्हैया।”
“और स्कूल?”
यह प्रश्न सुनते ही कन्हैया चुप हो गया। फिर हल्की हँसी के साथ बोला, “स्कूल तो हमारे लिए नहीं होता भैया। हम जैसे तो बस भीख माँगते हैं।”
प्रतीक के मन में कुछ चुभ गया।
“किसने कहा तुम्हें ये?”
“सब कहते हैं…मोहल्ले वाले भी…. माँ भी।”
पास ही बैठी एक स्त्री ने यह संवाद सुन लिया। वह कन्हैया की माँ शांताबाई थी। उसके चेहरे पर वर्षों की थकान और मजबूरी की रेखाएँ साफ दिखाई देती थीं।
“बेटा, पढ़ाई से पेट नहीं भरता,” वह बोली, “किताब से चूल्हा नहीं जलता।”
प्रतीक ने नम्र पर दृढ़ स्वर में कहा, “माँ, पर बिना पढ़ाई के जिन्दगीभर यही कटोरा पकड़ना पड़ता है।”
कन्हैया ने माँ की ओर देखा।
“माँ, क्या मैं भी पढ़ सकता हूँ?”
कुछ क्षणों के लिए समय जैसे थम गया। शांताबाई की आँखें भर आईं।पलभर वह जैसे कहीं खो गई –
“माँ की आँखों में पीड़ा झलकी।
भय साथ दिखी, आशा हल्की।
मन पर निर्धनता भारी थी।
पर दूर कहीं उजियारी थी।
उसी दिन प्रतीक कन्हैया को अपने स्कूल ले गया। प्रधानाचार्य वर्मा सर ने ध्यान से उसकी ओर देखा।
“पढ़ना चाहोगे?”
“हाँ सर,” कन्हैया ने तुरंत कहा, “अब मैं भीख नहीं माँगूँगा।”
“मेहनत करोगे?”
“जी सर, पूरे मन से ”
शांताबाई ने हिचकते हुए पूछा, “सर, फीस…?”
वर्मा सर मुस्कराए, “यह विद्यालय ‘भिक्षा नहीं, शिक्षा’ के विचार पर चलता है।कोई फीस नहीं पड़ेगी, बल्कि दोपहर का भोजन भी निःशुल्क मिलेगा। “
शांताबाई बेटे कन्हैया की ओर एकटक देखे जा रही थी। मन में अच्छे विचार उमड़ – घुमड़ रहे थे –
“आज कटोरा हाथ से छूटा
कलम ने थामा साथ,
जीवन ने करवट बदली,
गर्व से चमका माथ ।”
अब कन्हैया स्कूली ड्रेस में स्कूल जाने लगा था। शुरुआती दिन कठिन थे। अक्षर उलझते, पंक्तियाँ समझ में नहीं आतीं। कभी-कभी बच्चे हँस भी देते। एक दिन कन्हैया रोते हुए प्रतीक से बोला, “शायद माँ ठीक कहती थी, मैं नहीं पढ़ पाऊँगा।”
प्रतीक ने उसका कंधा थाम लिया।
“गिरना हार नहीं है कन्हैया, हार है, उठना छोड़ देना।”
मीरा मैम ने स्नेह से समझाया, “गलती करना सीखने का पहला कदम है।”
“जो ठोकर खाकर रुक जाए,
वह मंजिल कैसे पाएगा ,
जो गिरकर उठे, पुनः चल दे ,
वह ही इतिहास बनाएगा ।”
धीरे-धीरे कन्हैया अक्षर पहचानने लगा। जिस दिन उसने तख्ती पर साफ लिखा—‘क’ से कमल—उसकी आँखों में चमक थी। शाम को घर आकर उसने माँ को पढ़कर सुनाया। शांताबाई की आँखों से आँसू बह निकले।
कुछ महीनों बाद वही चौराहा था, पर दृश्य बदल चुका था। अब कन्हैया स्कूल की ड्रेस में खड़ा था। एक छोटा बच्चा उससे बोला, “भैया, आप भीख क्यों नहीं माँगते?”
कन्हैया मुस्कराया, “क्योंकि अब मैं सीख रहा हूँ। भिक्षा से पेट भरता है, शिक्षा से भविष्य बनता है। ”
“भिक्षा क्षणिक सहारा है,
शिक्षा है स्थायी दीप।
एक से मिटती भूख आज की,
दूजी मोती वाली सीप ”
विद्यालय में “भिक्षावृत्ति निवारण सप्ताह” मनाया गया। बच्चे तख्तियाँ लेकर निकले—
“ हाथ में कटोरा नहीं, पुस्तक चाहिए।”
“ सिक्का नहीं, स्वाभिमानी मस्तक चाहिए। “
सभी बच्चों ने मिलकर संकल्प गीत गाया—
“न हम देंगे, न हम लेंगे,
अब भिक्षा का अभिशाप।
कलम, किताब हाथ में थामो,
करो न पश्चाताप।
हम स्कूल में पढ़ने जाएँ
हर चेहरे पर हो मुस्कान,
शिक्षा से ही बदले जीवन ,
बने हमारा देश महान।”
गीत समाप्त होते-होते शांताबाई फूट-फूटकर रो पड़ी। कन्हैया ने उसका हाथ थाम लिया।
वार्षिक समारोह में मंच पर कन्हैया को बुलाया गया। प्रधानाचार्य ने पूछा, “तुम्हें क्या चाहिए?”
कन्हैया ने आत्मविश्वास से कहा—
“मुझे भिक्षा नहीं, शिक्षा चाहिए।
महान बना दे, वह परीक्षा चाहिए। “
तालियों की गड़गड़ाहट में प्रतीक की आँखें नम थीं, मीरा मैम मुस्करा रही थीं, और शांताबाई—वह गर्व से सिर ऊँचा किए खड़ी थी।
बच्चों ने समवेत स्वरों में गीत गाया, जिसके शब्द थे –
“कोई बच्चा न कटोरा थामे ,
अब वह कलम उठाएगा,
यदि समाज ने ठान लिया,
तो अँधियारा मिट जाएगा।”
अम्मा, बापू, चाचा, बाबा
हर बच्चे को भेजें स्कूल।
भिक्षा मँगवाना, बालश्रम कराना,
जीवन की है भारी भूल।।
कन्हैया जैसे अनेक बच्चे आज भी चौराहों पर खड़े हैं। प्रश्न हमसे है—हम उन्हें सिक्का देंगे या किताब?
क्योंकि सच यही है—
भिक्षा नहीं, शिक्षा चाहिए।
कहानी का संदेश :
भिक्षावृत्ति या बालश्रम में लगे बच्चों को स्कूल में शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिससे उनका भविष्य उज्ज्वल हो और देश के ‘सर्व शिक्षा अभियान ‘का संकल्प पूरा हो सके।
- गौरीशंकर वैश्य विनम्र
निष्कर्ष; यह कहानी हमें सिखाती है कि भिक्षा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि शिक्षा ही वह साधन है जो बच्चों का भविष्य संवार सकती है। यदि समाज मिलकर प्रयास करे, तो हर कन्हैया को उज्ज्वल जीवन का अवसर मिल सकता है।
ये भी पढ़ें; भूतू बन्दर बाल कहानी | डर के पीछे छिपी सच्चाई और साहस की सीख


