गोभी का फूल: दिखावे और सच्चाई पर आधारित प्रेरक हिंदी कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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“Gobi Ka Phool” by Manoj Jain is a thought-provoking satirical story that reflects the realities of society through the symbolic characters of swans and crows. It highlights how appearances can be deceptive and emphasizes the importance of recognizing true values beyond external show.

Gobi Ka Phool Story by Manoj Jain 'Madhur'

satirical story gobi ka phool

मनोज जैन 'मधुर' की यह कहानी हंस और कौओं के माध्यम से समाज की सच्चाई को उजागर करती है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे बाहरी चमक-दमक के पीछे छिपे स्वार्थ और ईर्ष्या को पहचानना जरूरी है। “गोभी का फूल” एक ऐसा व्यंग्य है, जो हमें बदलते मूल्यों और सच्चाई के महत्व पर सोचने के लिए प्रेरित करता है।

ईर्ष्या, स्वार्थ और सच्चाई का अनोखा चित्रण

कहानी- गोभी का फूल

"जल्दी से अपनी बोरियाँ-बिस्तर समेट लो। हमारा दाना-पानी यहाँ से उठ गया है। मानसरोवर तक पहुँचने में कम से कम दो दिन और पूरी एक रात लगेगी।" हंस ने परवाज़ भरते हुए अपने बच्चों से कहा। हंस की बात सुनकर बच्चे मायूस हो गए और अपनी माँ की ओर कातर दृष्टि से देखने लगे। दोनों बच्चों का मन यहाँ की आबोहवा, झील, झरनों, नदियों, पहाड़ों और सरोवरों में रम चुका था। हंसिनी से बच्चों का दुख देखा न गया। वह आसमान में उड़ते बच्चों को देख मन ही मन रो पड़ी, पर हंस की बात न मानने की उसके पास कोई ठोस वजह भी नहीं थी। चारों ने अपनी दिशा कोटर की ओर मोड़ दी, जहाँ उनकी गृहस्थी का बेशकीमती सामान रखा था। दुनिया के सारे माँ-बाप बच्चों की खुशियाँ देखकर प्रसन्न होते हैं और उन्हें थोड़े से कष्ट में देखकर उदासी से भर जाते हैं। बच्चे इस जगह को ही मानसरोवर समझने लगे थे। हंस ने हंसिनी के परों को हौले से सहलाया और धीरे से कहा, "भाग्यवान, थोड़ा जल्दी करो। हमारे पास समय बहुत कम है।" यह सुनते ही हंसिनी ने बच्चों को अपने डैनों में समेट लिया और तेजी से उड़ान भरने लगी। थोड़ी ही देर में पूरा परिवार अपने कोटर में आ पहुँचा। हंसिनी ने छोटे-छोटे थैलों में हीरे-मोती और जवाहरात समेट लिए, कुछ वहीं छोड़ भी दिए। इधर हंस अपने दुखी बच्चों का मन बहलाने के लिए तरह-तरह के जतन करता रहा और उन्हें दुनियादारी की बातें समझाता रहा।

बच्चों ने कहा, "हम सब मानसरोवर पहुँचकर यहाँ की आबोहवा को बहुत मिस करेंगे, है न?" हंस कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, "मानसरोवर में हम सिर्फ दो चीज़ें मिस करेंगे—एक धूर्त लोगों को, और दूसरे, हमारे पीछे पड़े रहने वाले ईर्ष्यालु कौओं को। ये दोनों बेशकीमती चीज़ें हमें वहाँ ढूँढने से भी नहीं मिलेंगी।" हंस के मुँह से कौए का नाम सुनकर दोनों बच्चों के उदास चेहरों पर हल्की-सी मुस्कान तैर गई। बच्चों ने खिलखिलाकर कहा, "पर धूर्त लोगों की पोशाकें तो एकदम झनन-झकास पहनते हैं। ऐसा क्यों?" हंस मुस्कुराकर बोला, "बेटा, सारा लोचा यहीं है। इसे ऐसे समझो—यह जो सफेद रंग है न, धूर्त लोगों ने इसकी छवि हमारे पूर्वजों से ही ली है। स्वार्थी आदमी अपना सारा कपट इसी सफेदी के पीछे छुपा लेता है।" "तस्कर, बिल्डर, माफिया, विज्ञापन के बूते चर्चा में आए साधु, यहाँ तक कि ब्यूरोक्रेट्स और पूरी नेतानगरी—ये सब उसी के उदाहरण हैं। ये लोग हमारी प्रजाति से चुराई सफेदी ओढ़कर आसानी से हंस बनने का ढोंग रचते हैं। सफेदी की चमक के चलते लोग इन्हें ही हंस समझने लगते हैं, समझे?" हंस की बात सुनकर दोनों बच्चों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। दूसरे बच्चे ने फिर पूछा, "और ये ईर्ष्यालु कौए?" हंस ने दो-चार ठंडी साँस लेते हुए कहा, "दरअसल, कौओं की यह फौज हम हंसों को बर्बाद करना चाहती है।" दूसरा बच्चा बीच में बोल पड़ा, "पापा! पर हमने तो इन्हें कभी कोई नुकसान नहीं पहुँचाया!" "वेल सेड, माय सन," हंस ने शांत स्वर में कहा, "हाँ बेटा, यह सच है। हमने इनका कभी कोई नुकसान नहीं किया, लेकिन ये ईर्ष्यालु कौए अकारण ही हमसे ईर्ष्या रखते हैं। वजह तो वही जानें।" "हाँ, तो मैं कह रहा था—स्वार्थ और नकारात्मक प्रवृत्तियाँ मानसरोवर में नहीं मिलेंगी" दोनों बच्चों ने कहा, "अच्छा, तो यह बात है! अब समझ में आया कि ईर्ष्यालु कौए क्यों हमारे पीछे पड़ जाते हैं।"

इसी बीच हंसिनी ने अपनी पैकिंग पूरी कर ली थी। हीरे-मोती के चार-पाँच छोटे थैले कोटर के बाहर लाते हुए वह बोली, "माय स्वीट सन्स, डोंट वरी! इन ईर्ष्यालु कौओं के हाथ हम गोरे हंस कभी नहीं लगेंगे। हमारा यहाँ होना ही इन्हें चिंता में डालने के लिए पर्याप्त है।" "हाँ, जिस दिन ये हमें मारने में सफल हो जाएँगे, उसी दिन ये दुनिया के सामने खुद को हंस सिद्ध कर देंगे। लेकिन ऐसा होना फिलहाल नामुमकिन है। हमारे जाने के बाद इसी कोटर में कोई और जोड़ा आएगा। हंसों और ईर्ष्यालु कौओं की यही नियति है। दोनों की विश्वसनीयता में जमीन-आसमान का अंतर है।" "चलो, अब तुम लोग उड़ान भरने के लिए तैयार हो जाओ। तुम्हारे पापा कब से इंतज़ार कर रहे हैं।" "पर पापा, आपने यह कैसे जाना कि अब हमें यहाँ से फुर्र हो जाना चाहिए?" हंस ने डैनें फड़फड़ाते हुए कहा, "मेरे पिता के पिता—यानी तुम्हारे पितामह—ने मुझे बताया था कि जब सारे सुगंधित पुष्प गोभी के फूल को अपना राजा मान लें और मौलिक कवि ए.आई. से कविताएँ लिखवाने लगें, तब समझ लेना कि तुम्हारा दाना-पानी वहाँ से उठ गया है।" "चलो, अब उड़ान भरते हैं। सफर बहुत लंबा है।" फुर्र... फुर्र... फुर्र... "हमारा दाना-पानी यहाँ से उठ गया है।"

- मनोज जैन 'मधुर'

निष्कर्ष; यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चाई और गुणों की पहचान करना जरूरी है, न कि बाहरी दिखावे से प्रभावित होना। जब समाज में गलत मूल्यों को महत्व मिलने लगे, तो समझदारी इसी में है कि हम सही मार्ग चुनें और अपने आदर्शों को बनाए रखें।

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