गर्मी की छुट्टियां: बाल भवन से आकाशवाणी तक रोमांचक बाल कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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Summer vacations are a time of joy, exploration, and new experiences for children. “Garmi Ki Chhutti” by Rajnikant Shukla beautifully captures the excitement of a group of children visiting Delhi, where they learn, explore, and grow through fun-filled activities. This story highlights the true spirit of holidays—learning with joy and creativity.

Garmi Ki Chhutti: Inspiring Summer Vacation Story for Children

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गर्मी की छुट्टियाँ बच्चों के जीवन का सबसे खुशहाल समय होती हैं—नई जगहें, नए अनुभव और ढेर सारी सीख। रजनीकांत शुक्ल की यह रोचक बाल कहानी “गर्मी की छुट्टी” चार बच्चों की दिल्ली यात्रा के माध्यम से मनोरंजन, ज्ञान और रचनात्मक गतिविधियों की सुंदर झलक प्रस्तुत करती है। यह कहानी न केवल छुट्टियों के आनंद को दर्शाती है, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास का संदेश भी देती है।

बच्चों की प्रेरणादायक और शिक्षाप्रद कहानी

गर्मी की छुट्टी

उदित, नंदू, नंदिनी और सुनयना को गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार था। क्योंकि इस बार उन्हें उनके ताऊजी ने गर्मी की छुट्टियां दिल्ली में आकर बिताने का आमंत्रण दिया था। जैसे ही छुट्टियों की तारीखों का पता चला उदित और नंदू उछल पड़े। मगर घर आकर उन्हें पता चला कि नंदिनी और सुनयना के स्कूलों की छुट्टियां कुछ दिन बाद होंगी तो वे निराश हो गए।

इसी बीच ताऊजी का फोन आया कि क्या तैयारी है ? जब उन्हें नंदिना और सुनयना की छुट्टियों के बारे में पता चला तो वे बोले-‘कोई बात नहीं। मैं तुम सबका ट्रेन से रिजर्वेशन करा देता हूं तुम लोग अपनी मम्मी के साथ एक साथ ही आ जाना उदित, नंदू खुश हो गए। अब उनके पास समय था। उन्होंने इस बीच झटपट स्कूल द्वारा दिए गए छुट्टियों के काम को पूरा कर लिया।

पंद्रह दिन बाद नियत समय पर तैयार होकर वे सब ट्रेन में सवार होकर दिल्ली आ गए। पर दिल्ली में पड़ने वाली भयंकर गर्मी से एक पल निजात नहीं थी। उन्हें गांव के वे हरे-भरे वृक्ष और उनके नीचे की वो शीतल छांव याद आई। शुक्र था कि यहां गांव की तरह बिजली की आंखमिचौली नहीं थी।

ताऊजी के सामने भी समस्या थी कि दिल्ली में दर्शनीय स्थानों की तो भरमार थी मगर इस गर्मी में बच्चों को कौन से स्थान घुमाए जाएं? घर से निकलते ही तेज धूप और बढ़ते पारे की तपिश घूमने का सारा मजा किरकिरा कर देती थी। मगर उन्होंने इसका हल पहले से ही निकाल रखा था। इसीलिए उन्होंने सभी बच्चों से अपने दो फोटो और स्कूल का पहचान पत्र लेकर दिल्ली आने को कहा था। अगले दिन ही उन्होंने कहा कि सभी अपने फोटो और पहचान पत्र साथ ले लें हम सब राष्ट्रीय बाल भवन चल रहे हैं।

उदित ने पूछा-‘ताऊजी ये बाल भवन क्या है?

ताऊजी ने बताया-‘बाल भवन देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा बच्चों को दिया गया उपहार है। इसमें लगभग वह सब कुछ है जो तुम अपने लिए सोच सकते हो।’

सबके मन में उत्सुकता थी। तभी सुनयना ने अपनी प्यारी आवाज में पूछा-‘उसमें है क्या-क्या ताऊजी?

ताऊजी ने मुस्कराते हुए कहा-‘सुनयना, अभी नहीं बताऊँगा। अब जब तुम आ गए हो तो खुद ही चल कर देख लेना। अब ज्यादा बातें न करो सड़कों पर ट्रैफिक हो जाएगा हमें जल्दी निकलना है।’

बाल भवन के गेट में घुसते ही उनका सामना ट्रेन की नन्हीं पटरी से हुआ। जिसके सहारे चलते-चलते वे शीघ्र ही छोटे से रेलवे प्लेटफार्म पर पहुंच गए।

‘ताऊजी, हम भी ट्रेन पर बैठेंगे।’-नंदिनी ने पूछा तो सबके कान उत्तर सुनने को तैयार हो गए।

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हां, हां, क्यों नहीं अभी लो, टिकट तो ले लें जरा’- ताऊजी की बात सुनते ही सबके चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे। टिकट लेकर अब उन्हें ट्रेन के आने की प्रतीक्षा थी। जो थोड़ी देर में बाल भवन के अंदर का चक्कर लगाकर आ गई। वे तेजी से दौड़कर उसमें चढ़े़ और सीट पर बैठ गए। जरा सी देर में ट्रेन ने एक जोरदार सीटी मारी और प्लेटफार्म छोड़़ दिया।

अचानक नंदू ने सुनयना से कहा- ‘इधर देखो दीवार पर कैसे सुंदर चित्र बने हुए हैं।’

सुनयना के साथ अन्य कई बच्चों की नज़र भी उस ओर घूम गई।

उन्होंने देखा कि भारत के विभिन्न राज्यों के दर्शनीय स्थलों और वहां की विशेषताओं के चित्रों से एक तरफ की दीवारें सजी हुई हैं। वे इस ट्रेन के माध्यम से पूरे भारत की सैर कर रहे थे। ट्रेन एक सुरंग और पुल से भी होकर गुजरी। रोमांच में कई बच्चे सीटी और तालियां बजाने लगे। कुल मिलाकर इस नन्हीं ट्रेन का यह सफर बहुत रोमांचक रहा।

ट्रेन से उतरने के बाद वे रजिस्ट्रेशन काउंटर की ओर बढ़े। फार्म भर कर जब उसमें फोटो लगाने की बात आई तो पता चला कि नंदू का एक फोटो तो घर पर ही छूट गया। अब क्या हो?

उदित नंदिनी और सुनयना ने तो अपने मनचाही दो गतिविधियों को चुन लिया। उदित ने क्रिकेट और वाद-विवाद में, नंदिनी ने पेंटिंग और लोकनृत्य में और सुनयना ने शतरंज और फोटोग्राफी में भाग लिया। अपनी मनचाही रूचि की गतिविधियों में भाग लेकर वे बहुत खुश थे। उनके जैसे अनेक लड़के और लड़़कियां वहाँ अपनी-अपनी रुचि की गतिविधियों में भाग ले रहे थे। उदित नंदिनी और सुनयना को बहुत मजा आया।

पर नंदू ने तो उस दिन बाल भवन को घूमकर देखा और पुस्तकालय में किताबें पढीं अगले दिन उसने भी अपनी मनचाही गतिविधि बैडमिंटन और कम्प्यूटर में भाग ले लिया।

इसी बीच लाइब्रेरी वाली नीता मैम ने बताया कि पांच दिन की कहानी सुनाने की कार्यशाला शुरू होने जा रही है। 

कहानी सुनने और सुनाने में तो सभी का मन लगता था सो उन्होंने झट से अपना नाम उसमें लिखवा दिया। उस कार्यशाला में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उदित और नंदिनी को चुन लिया गया। अब उन्हें हजारों बच्चों के बीच आने वाले 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' के अवसर पर बाल भवन में होने वाले कार्यक्रम को संचालित करने की जिम्मेदारी मिली। इतने बड़ा अवसर मिलने पर वे बहुत खुश थे। उन्होंने तैयारी शुरू कर दी। फिर वह समय भी आया और मौके पर सुन्दर प्रस्तुति देकर उन्होंने सबकी वाहवाही लूटी। अब बाल भवन के ग्रीष्मकालीन गतिविधियों का समापन हो चुका था।

एक दिन ताऊजी ने उन्हें कमल मंदिर, इस्कान मंदिर और अक्षरधाम मंदिर के दर्शन कराए। इसी के साथ वे इंडिया गेट के पास चिल्ड्रेन पार्क भी गए। वहां लगे तरह-तरह के मनोरंजक झूलों में झूलकर वे बहुत खुश हुए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन और संसद भवन की इमारतों को भी नजदीक से देखा। उनकी वापसी का समय नजदीक आता जा रहा था कि तभी एक दिन ताऊजी ने उन्हें बताया कि कल हम सब आकाशवाणी दिल्ली के बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेने चलेंगे। सबको कोई न कोई कहानी या कविता सुनानी होगी।

वे सब बहुत खुश हुए। ये उनके लिए एक अनूठा अवसर था। अगले दिन आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र पर पहुंचकर उन्होंने अपनी कविताएं और कहानियां सुनाईं। उन्हें यह देखकर और भी अच्छा लगा कि उसी दिन प्रधानमंत्रीजी का कार्यक्रम ‘मन की बात’ वहीं से प्रसारित हो रहा था। 

आज शाम की ट्रेन से उनका वापसी का रिजर्वेशन था। इस बार उनके पास अपने दोस्तों को सुनाने के लिए बहुत कुछ था।

- रजनीकांत शुक्ल

निष्कर्ष; “गर्मी की छुट्टी” कहानी यह संदेश देती है कि छुट्टियाँ केवल आराम का समय नहीं, बल्कि सीखने, नए अनुभव प्राप्त करने और अपनी प्रतिभा को निखारने का सुनहरा अवसर होती हैं। रजनीकांत शुक्ल ने इस कहानी के माध्यम से बच्चों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और आत्मविश्वास को बढ़ावा देने की प्रेरणा दी है।

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