आत्म विश्वास की शक्ति: फेल छात्र अनवर कैसे बना इंजीनियर | प्रेरणादायक कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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Life often tests us through failure, but true strength lies in rising again with confidence. This inspiring story by Abdul Samad Rahi shows how self-belief can transform setbacks into success. Anwar’s journey from repeated failure to becoming an engineer proves that with guidance, hard work, and aatm vishwas (self-confidence), no dream is out of reach.

Power of Self-Confidence: How a Failed Student Anwar Became an Engineer | Inspirational Story

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यह प्रेरणादायक कहानी हमें सिखाती है कि असफलता अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत होती है। अनवर की कहानी आत्मविश्वास, मेहनत और सही मार्गदर्शन के बल पर सपनों को साकार करने का संदेश देती है।

फेल छात्र अनवर कैसे बना सफल इंजीनियर | प्रेरणादायक कहानी

आत्म विश्वास

अनवर दूसरी बार कक्षा आठवीं में फैल हो गया था। उसने निश्चित कर लिया की अब वह स्कूल कभी नही जायेगा। कोई अच्छा सा काम देखकर सीख लेगा। वह अपनी मम्मी के ताने सुन-सुनकर व पापा की मार खा-खाकर ऊब गया था। उसके भाई-बहन भी उसे खूब चिड़ाते। दोस्तों ने भी उससे धीरे-धीरे किनारा कर लिया था।

स्कूल का रिजल्ट आने के बाद गर्मी की छुट्टीयां भी हो गई थी। अनवर ने काम तलाशना शुरू कर दिया। एक दिन वह जल्दी उठकर फिरोज भाई मैकेनिक की दुकान पर गया। फिरोज भाई मोटर साइकिल रिपेयरिंग के बहुत अच्छे मिस्त्री है। उनका काम अच्छा होने के कारण दुकान पर मोटर साइकिल रिपेयरिंग के लिए ग्राहक भी खूब आते है। समय पर अच्छा । काम कर देने के कारण ग्राहक विश्वास भी खूब करते है और मुंह मांगी रकम भी देकर जाते है।

अनवर ने फिरोज भाई को सलाम अर्ज किया और बोला- “अंकल मुझे काम सिखना है। आप मुझे अपनी दुकान पर रख ले। मैं समय पर आऊँगा और ईमानदारी से अपना काम करूंगा। कभी आपको शिकायत का मौका नही मिलेगा।“ वो बोलता ही जा रहा था। फिरोज भाई ने उसे बैठने को कहा उसका नाम पुछा तो अनवर फिर बोलने लग लगा। “मेरा नाम अनवर है अंकल मैं अकबर खां जी का लड़का हूं। हम आप ही के मोहल्ले में ही तो रहते है। हवेली के पीछे वाला मकान हमारा ही तो है।“

“अरे हा बेटा तुम मेरे दादा के दोस्त के लड़के हो। तुम छह भाई-बहन होना।“

फिरोज ने उसे पहचानते हुए कहा। “हां अंकल मुझसे एक बहन बड़ी है और सभी भाई-बहन छोटे है। मेरा भाई साबिर और इकबाल पांचवीं में और बहन मुनीया तीसरी कक्षा में पढ़ते है। सिकन्दर अभी छोटा है। अब अकेले पापा कमाकर कितना कमायेगे। इतने जीवो का पेट भरना आज के जमाने में बहुत मुश्किल है। वैसे अम्मा, अब्बू की कुछ मदद कर देती है पिजाई और रज्जाई गद्दे भरकर, जिससे घर का गुजारा थोड़ा ठीक हो जाता है।“ अनवर ने कहा।

फिरोज भाई- “अनवर मियां आप स्कूल नही जाते।“

अनवर- “मैं स्कूल जाता था अंकल मगर दो बार आठवीं में फैल हो गया। अब मेरा मन स्कूल जाने को नही करता। मम्मी-पापा भी मुझे बहुत डांटते है। कामचोर और निकम्मा कहते है और कहते है यह जिन्दगी में भी कुछ नही कर सकता।“

अनवर थोड़ा रूककर फिर बोला- “अब मुझे भी आपकी तरह मैकेनिक बनना है अंकल और खूब पैसा व नाम कमाना है। मेरे मम्मी-पापा फिर मुझे निकम्मा और कामचोर नही कहेंगे। मेरी बहन मुनीया भी मुझे नही चिढ़ाएगी।“

फिरोज भाई ने कहा- “वो तो सब ठीक है बेटा, एक बात बताओ तुम इतनी प्यारी बाते करते हो इतनी अच्छी सोच रखते हो, कुछ करने और बनने की भी ललक है। मैं तुमको काम तो जरूर सिखाऊंगा महीने के एक हजार रूपये भी दूंगा। तुम काम सिखने दुकान पर भी आ सकते हो मगर मेरी एक शर्त है।

“वो क्या अंकल ?” अनवर ने पुछा । तुमको इस बार आठवीं में फिर से एडमिशन लेना होगा। मुझे आठवीं पास कर दिखाना होगा। आप तो इतने होनहार लड़के हो तुम कैसे फैल हो सकते हो। तुम में सिर्फ आत्म विश्वास की कमी है। तुमको मन में आत्म विश्वास जगाना है। तुम्हारी मंजिल तुम्हारे सामने खड़ी है। तुम्हें बस मंजिल पर पहुंचने की राह बनानी है। उस मंजिल तक पहुंचने में, मैं आपकी मदद करूंगा।“

अनवर ने फिराज भाई से वादा कर लिया और दुकान पर आने लगा।

स्कूल की छुट्टीयों में फिरोज भाई ने बातों ही बातों में अनवर के दिल में आत्म विश्वास भर दिया था और यहां तक कह दिया था कि तुम मैकेनिक के साथ इंजीनियर भी बन सकते हो। तुम्हें इस बार जी-जान से मेहनत करनी है।

अनवर ने छुट्टियां खुलते ही फिर स्कूल जाना शुरू कर दिया था। स्कूल की छुट्टी के बाद अनवर फिरोज भाई की दुकान भी आता और सुबह जल्दी और देर रात तक पढ़ाई करता। उसके तीन साल के अनुभव, मेहनत और आत्म विश्वास ने इस बार आठवीं बोर्ड में प्रथम स्थान दिला दिया था।

अनवर की दोस्ती फिर से कई होशियार लड़को से हो गई। उसने भी अब आगे पढ़ने का मन बना लिया। सब दोस्त मिलकर कंपीटिशन से पढ़ाई करने लगे। नवमी-दसवीं में भी अनवर का रिजल्ट प्रथम स्थान पर ही रहा। अब तो उसके आत्म विश्वास ने उसे इंजीनियर बनने के ख्वाब दिखाने शुरू कर दिये। अनवर के बारहवीं में अच्छे अंको के आधार पर इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिल गया था। अध्यापकों, फिरोज भाई और घर वालो ने भी खूब सपोट किया।

आज अनवर इंजीनियर बन गया था। वो मिठाई का पैकेट पकड़े फिरोज भाई के सामने खड़ा था और दोनों मुस्कुरा रहे थे।

- अब्दुल समद राही

निष्कर्ष; यह कहानी बताती है कि आत्मविश्वास और मेहनत से असफलता को भी सफलता में बदला जा सकता है। सही मार्गदर्शन और दृढ़ निश्चय हो तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं रहता।

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