सूरज बन गया डॉक्टर : मेहनत और शिक्षा की प्रेरक बाल कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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“Suraj Became a Doctor” by Lal Devendra Kumar Srivastava is an inspiring story of hard work, determination, and the power of education. It shows how a poor boy, despite many struggles, fulfills his dream of becoming a doctor through dedication and courage.

The Inspiring Journey of Suraj from Poverty to Doctor

the inspirational journey of suraj became a doctor

संघर्ष, मेहनत और सपनों की उड़ान को खूबसूरती से प्रस्तुत करती लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की बाल कहानी “सूरज बन गया डॉक्टर” एक प्रेरणादायक रचना है। यह कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियाँ भी उस बच्चे के रास्ते को नहीं रोक सकतीं, जिसके भीतर कुछ बनने का दृढ़ संकल्प हो। कबाड़ बीनने वाला छोटा सा सूरज अपनी लगन, परिश्रम और शिक्षा के प्रति जुनून के बल पर डॉक्टर बनकर समाज के लिए मिसाल बन जाता है। यह कहानी बच्चों को सपने देखने, मेहनत करने और कभी हार न मानने की सीख देती है।

बच्चों के लिए प्रेरणादायक हिंदी कहानी

सूरज बन गया डॉक्टर

सूरज की मम्मी आज जब सुबह काम पर जाने लगीं तो रोज की तरह सूरज को जगाने लगीं, “सूरज उठो देखो सात बजने को है, काम पर नहीं जाओगे? रोटी बना कर रख दी है, तुम और मुनिया मुँह धोकर रोटी खा लेना और जाते समय दरवाजा अच्छे से बंद कर देना।“

 “मम्मी आज काम पर जाने का मन नहीं हो रहा है, मेरा पेट दर्द कर रहा है।“ सूरज अपनी मम्मी से बोला।

“ठीक है अगर पेट दर्द कर रहा है तो मत जाओ।“ अभी कुछ देर में ठीक हो जाएगा। वैसे अभी जब मैं आऊँगी, तो पेट दर्द की दवा दुकान से ले आऊँगी। यदि तब तक नहीं ठीक होगा तब दवा खा लेना।“ उसकी मम्मी सूरज से कहकर चली गई।

सूरज दस वर्ष का था और उसकी छोटी बहन मुनिया लगभग छह वर्ष की थी। सूरज के माता-पिता कई वर्षों से शहर के ‘सलिल सोसाइटी’ के बगल बस्ती में काम करने वाले अन्य परिवारों की तरह ही झोपड़ी बना कर रहते थे और जीवन गुजर-बसर कर रहे थे। सूरज के पिता शहर के दूर इलाकों में जहाँ कहीं नई बिल्डिंग बनती थी, वहीं मजदूरी करते थे। वे कई दिनों तक वहीं पर रुक जाते थे। सूरज की मम्मी बगल सोसाइटी में कुछ घरों में चौका-बर्तन, झाड़ू-पोछा आदि काम करती थीं। सूरज भी नित सुबह ही उठकर कुछ खा-पीकर कबाड़ बीनने निकल जाता था। मुनिया घर पर रहती थी। यही इनकी दिनचर्या थी। सूरज को कबाड़ बीनना अच्छा नहीं लगता था और वह पढ़ना चाहता था, कई बार उसने मम्मी-पापा से स्कूल में नाम लिखाने के लिए कहा भी पर वे हर बार उसे डाँट देते थे।

 सूरज उठा और हाथ-मुँह धोकर बहन मुनिया को बुलाकर रोटी खाने की कोशिश की पर खा नहीं सका। उसका पेट दर्द और बढ़ गया। वह बिना खाए हुए फिर से बिस्तर पर लेट गया। दस बजे उसकी मम्मी आ गईं और दर्द के बारे में पूछ कर दवा खाने को दी लेकिन उसका पेट दर्द कम नहीं हुआ, बल्कि पेट दर्द और बढ़ गया। अंत में उसकी मम्मी दोपहर में उसे लेकर शहर के सरकारी अस्पताल दवा कराने ले गईं। डॉक्टर ने सूरज को देखा और अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कर लिया। दूसरे दिन शाम को तबियत सही होने पर अस्पताल से डिस्चार्ज होकर सूरज घर आ गया।

घर आते ही सूरज ने मम्मी से पूछा, “मम्मी ये डॉक्टर कैसे बनते हैं। मुझको इतना दर्द हो रहा था पर डॉक्टर साहब ने मुझे दवा देकर और इंजेक्शन लगाकर ठीक कर दिया।“

बेटा! डॉक्टर बनने के लिए पढ़ाई में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। बहुत अधिक पढ़ना पड़ता है।“ उसकी मम्मी ने कहा।

“मम्मी क्या मैं डॉक्टर नहीं बन सकता? मैं भी कल मेरा इलाज करने वाले डॉक्टर साहब की तरह बनना चाहता हूँ।“ सूरज ने अपनी मम्मी से कहा।

“बेटा, हम गरीब लोग हैं, हमारे भाग्य में पढ़ना-लिखना नहीं होता है। बस! किसी तरह हम लोग मेहनत-मजदूरी कर गुजर-बसर करते हैं। अच्छा अब तुम आराम करो। मुझे भी काम पर जाना है।“ उसकी मम्मी ने कहा।

सूरज खिचड़ी खाकर सो गया। पर दूसरे दिन सुबह ही उसने मम्मी से कहा, “मम्मी मैं भी पढ़कर डॉक्टर बनना चाहता हूँ।“

उसकी मम्मी ने डाँट दिया और कहा कि मैं काम पर जा रही हूँ, तुम्हारी तबियत यदि ठीक हो तो कुछ खा लो और काम पर जाओ।

सूरज कबाड़ बीनने चला गया, पर उस पर तो पढ़ने और डॉक्टर बनने की जैसे धुन सवार हो गई थी। उसकी तबियत की बात सुनकर उसके पापा भी शाम को आ गए थे। उनसे भी सूरज ने डॉक्टर बनने की बात कही। उसके पापा हँसने लगे और बोले, “बेटा कुछ काम-धंधा सीखो, उसी में भलाई है।“

सूरज ने तो जिद पकड़ ली और मम्मी से बोला, “मम्मी मैं पढूँगा और सुबह-शाम कबाड़ भी इकट्ठा करूँगा।“ कई दिन तक वह वही बात कहता रहा और उसने खाना भी छोड़ दिया। उसने कह दिया जब तक उसका नाम नहीं लिखा जाएगा वह खाना नहीं खाएगा।

अंत में हारकर उसकी मम्मी ने वहाँ से थोड़ी दूर पर सरकारी स्कूल में उसका नाम लिखा दीं। सूरज बहुत खुश था, वह मेहनत से पढ़ता और सुबह-शाम कबाड़ भी एकत्रित करता। पढ़ने में उसकी खूब रुचि थी और हर कक्षा में वह प्रथम स्थान प्राप्त करता गया। स्कूल के शिक्षक भी उससे बहुत प्रभावित और खुश रहते थे। उसने छोटी बहन मुनिया का नाम भी वहीं लिखवा दिया। वह भी स्कूल जाने लगी। सूरज इंटर की परीक्षा पास कर ली। इंटर की परीक्षा में वह अपने जिले में प्रथम आया था।

सूरज ने डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा के लिए जी-तोड़ परिश्रम किया, शिक्षक और मित्रों से भी उसे मदद मिली और जब परिणाम आया तो उसमें उसका भी नाम था। आज वह बहुत खुश था, उसकी मम्मी-पापा भी बहुत खुश हुए। पर जब मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए नाम लिखाने की बारी आई तो एक बड़ी समस्या आ गई। भले ही उसे सरकारी स्कूल मिल गया था पर नाम लिखाने में और हॉस्टल का खर्चा एक वर्ष का लगभग चालीस हजार रुपया लग रहा था।

सूरज की मम्मी भी चाह रही थी कि उसका नाम डॉक्टरी में लिखा जाए, उन्हें भी विश्वास हो गया था कि सूरज डॉक्टर बन सकता है।

सूरज की मम्मी-पापा ने बहुत प्रयास किया पर पैसे का इंतजाम नहीं हो पा रहा था। सूरज की मम्मी जहाँ-जहाँ काम करती थी वहाँ भी उसने प्रयास किया कि उधार पैसे मिल जाए पर नहीं मिल सका। अंत में सक्सेना जी के घर, जहाँ वह काम करती थी, उसने अपनी समस्या उन्हें बताई तो दो दिनों में पैसे देने के लिए उन्होंने, हाँ कर दी। दो दिन बाद सूरज का एडमिशन सरकारी मेडिकल कॉलेज में हो गया।

पाँच साल मन लगाकर वह डॉक्टरी की पढ़ाई करता रहा। मेडिकल कॉलेज के वार्षिक समारोह में उसे डॉक्टरी की डिग्री मिल गई। और सच में आज वह सूरज से डॉक्टर सूरज बन गया। उसके माता-पिता, बहन और उस मोहल्ले के लोग बहुत खुश थे। पूरे मोहल्ले में सूरज की मम्मी ने मिठाई बाँटी।

अगले दिन शहर के समाचार पत्रों में कबाड़ बीनने वाले सूरज के डॉक्टर बनने की संघर्ष गाथा छपी थी। सोशल मीडिया में भी उसके कड़ी परिश्रम और जुनून की चर्चा थी।

- लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

निष्कर्ष; “सूरज बन गया डॉक्टर” कहानी हमें यह संदेश देती है कि मेहनत, लगन और शिक्षा के बल पर कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को पूरा कर सकता है। गरीबी और कठिनाइयाँ सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बनतीं, यदि मन में दृढ़ संकल्प हो।

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