धर्मवीर भारती के साहित्य में जीवन मूल्य : एक विश्लेषण

Dr. Mulla Adam Ali
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Dr. Dharmveer Bharti is one of the most distinguished figures in modern Hindi literature. His literary works reflect a deep concern for human values such as love, faith, morality, social responsibility, and cultural consciousness. Through his poetry, novels, stories, and plays, he explored the challenges of modern society and emphasized the importance of preserving human dignity and ethical ideals. This paper analyzes the life values embodied in Bharti's literature and highlights their relevance in contemporary society.

Life Values in the Literature of Dharmveer Bharti: A Critical Analysis

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हिन्दी साहित्य के प्रमुख रचनाकार डॉ. धर्मवीर भारती ने अपने साहित्य के माध्यम से मानव जीवन के विविध मूल्यों को अभिव्यक्ति प्रदान की है। उनकी रचनाओं में प्रेम, आस्था, नैतिकता, मानवता, सामाजिक दायित्व तथा सांस्कृतिक चेतना जैसे जीवन-मूल्यों का सशक्त स्वरूप देखने को मिलता है। उन्होंने बदलते समय और समाज में मूल्यों के संकट को पहचानते हुए मानव जीवन को सार्थक बनाने वाले आदर्शों की स्थापना का प्रयास किया। प्रस्तुत लेख में धर्मवीर भारती के साहित्य में निहित जीवन-मूल्यों का विश्लेषण करते हुए उनके मानवीय दृष्टिकोण और मूल्य-चेतना का अध्ययन किया गया है।

धर्मवीर भारती के साहित्य में जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति : एक समालोचनात्मक अध्ययन

धर्मवीर भारती हिन्दी साहित्य के अग्रगण्य साहित्यकारो में अद्वितीय हैं। ये जीवन मूल्यों के सर्वश्रेष्ठ चिन्तक रहे हैं। इनकी लगभग सभी रचनाओं में जीवन मूल्यबोध दृष्टिगोचर हुआ है। जीवन मूल्य की दृष्टि से धर्मवीर भारती का साहित्य विशिष्ट है। ये सहज कवि होने के साथ एक उपन्यासकार, गीतिनाट्यकार, कहानीकार, निबन्धकार एवं सर्जक कलाकार हैं।जो उनकी सर्जना और चिन्तन से साथ परिलक्षित होता है।धर्मवीर भारती का जीवन मूल्य रोमानी भावबोध से विकसित होकर यथार्थवाद तथा आदर्शवाद की ओर उन्मुख हुआ है।भारती जी ने परम्परागत लेखन के ध्वंसावशेष पर नये भाव- बोध, नए मानव मूल्यों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। मानव जीवन का अस्तित्व मूल्यबोध की सम्पूर्ण प्रक्रिया पर आधारित होता है। धर्मवीर भारती ने समस्त जीवन मूल्यों का स्रोत मानव-विवेक को ही माना है।

 मनुष्य की प्रज्ञादृष्टि मूल्य चेतना को जन्म देती है। मूल्यबोध की सम्पूर्ण प्रक्रिया अस्तित्वशील मनस्तत्व पर निर्भर है। जीवन मूल्यों के स्थापना के संदर्भ में प्रकाश डालते हुए डॉ. रमेश देशमुख लिखते हैं कि - "मानवी जीवन को मूल्यवान बनाने की क्षमता रखने वाले गुणो को जीवन मूल्य कहा जाता है। मूल्य शाश्वत व्यवहार है। इनका निर्माण मानव के साथ-साथ हुआ है। यदि इनका अन्त होगा तो सभ्यता के साथ-साथ मानवता भी समाप्त हो जाएगी।"¹

जीवन मूल्य का तात्पर्य जीवन के मानदण्डों से ही होता है। जीवन मूल्य मानव समाज की सभ्यता एवं संस्कृति के परिचायक तत्व हैं। किसी भी सभ्य समाज की उन्नति मानवीय मूल्यों पर ही आधारित होती है। जीवन मूल्य समाज में मानवीय व्यवहार के मानक स्वीकार किये गये हैं। प्रो० मैकेंजी ने जीवन मूल्य के सन्दर्भ मे लिखा है कि "मूल्य या जीवन मूल्य से हमारा आशय उस विचार से है, जो एक विचारशील प्राणी के चिन्तन का परिणाम है।"² वस्तुतः कह सकते हैं कि जन्म से मृत्यु पर्यन्त होने वाले जिन संस्कारों के माध्यम से हम सत्य तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करते हैं वे ही संस्कार जीवन मूल्य कहे जाते हैं। यदि साहित्यिक दृष्टि से कहें तो रचना के भीतर विद्यमान रहने वाला ऐसा उद्देश्य जो उसे किसी सामाजिक आदर्श, नैतिक आदर्श, व्यक्तिगत उच्चता आदि से सम्पृक्त करता हो उसे जीवन मूल्य कहते हैं।

डॉ० धर्मवीर भारती जीवन मूल्यों के कवि हैं। इनकी लेखनी अनेक विधाओं पर चली है जिसमें जीवन मूल्यों पर अधिक बल दिया गया है।भारती जी ने जीवन मूल्यों पर आधारित आधुनिक सन्दर्भों की विस्तृत चर्चा की है। धर्मवीर भारती दूसरा सप्तक के कवि हैं इनकी कृतियों मे एक साथ परम्परा, जीवन मूल्यों एवं युग- सापेक्ष दृष्टि का सम्यक विवेचन हुआ है।धर्मवीर भारती गीतिकाव्य के भी सफल लेखक रहे हैं। उनका गीतिकाव्य जीवन मूल्यों पर आश्रित है।भारती जी का अधिकांश गीतिकाव्य शाश्वत एवं समकालीन जीवन मूल्य बोधों पर आधारित है। इनके गीति काव्यों में जो मूल्य चेतना प्राप्त होती उसमे मुख्यतः प्रणय सम्बन्धी मूल्य, भारतीय संस्कृति सम्बन्धी मूल्य, वैयक्तिक चेतना सम्बन्धी मूल्य, परोपकार तथा आदर्श आदि से सम्बन्धित मूल्य दृष्टि प्राप्त होती है।

धर्मवीर भारती के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने गीतों में जहाँ परम्परागत जीवन मूल्यों को स्थान दिया है, तो वहीं दूसरी ओर समकालीन परिदृश्य में मूल्यों की अचेतनता का विरोध किया है और वे युगानुरूप मूल्यों की सापेक्षता पर सचेत रहे हैं। वे गुनाहों को स्वीकार भी करते हैं तथा वैयक्तिकता चेतना सम्बंधी मूल्यों का सम्यक निरूपण करते हैं। वे लिखते हैं कि-

गुनाहों से कभी मैली पड़ी बेदाग तरुनाई

सितारों की जलन से बादलों पर आंच कब आई ?

न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोर कजराई

बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पन भी

हमेशा आदमी

मजबूर होकर लौट आता है

जहाँ हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद

 मेरी जिन्दगी बरबाद।"³

धर्मवीर भारती के गीतों की रचना भूमि बिल्कुल नए कलेवर की है। भारती जी ने कामवासना को सामाजिक मर्यादा के अन्तर्गत रखा है। इन्होंने कभी भी अपनी मूल चेतना एवं संस्कृति को नहीं भूलते। भारती जी ने 'बोवाई का गीत' को सामाजिक मर्यादा की श्रेणी में रखा है। इसमें लोकगीत के साथ लोक व्यवहार के सूत्र दृष्टिगोचर होते हैं।

हम बोयेंगी हरी चुनरियाँ, कजरी- मेहंदी

राखी के कुछ सूत और सावन की पहली तीज

बदरा पानी दे।"⁴

धर्मवीर भारती ने गीतों में परमपरागत उपमानों के साथ नए उपमान भी प्रयोग किए हैं। इनके गीतों में परोपकार एवं आदर्श की भावना भी कूट-कूटकर भरी है। भारती जी के गीतों की एक विशेषता यह भी है कि वह लोक संस्कृति के प्रति अत्यधिक आकर्षित दिखाई देते हैं-

भोर फूटे, भाभियाँ, जब गोद भर आशीष दे दें

ले बिदा अमराइयों से

चल पड़े डोला हुमचकर

है कसम तुमको, तुम्हारे कोपलों से नैन में आँसू न आये

राह में पाकड़ तले

सुनसान पाकर।"⁵ इस प्रकार भारती के गीतों में सांस्कृतिक मूल्यों के दर्शन होते हैं। ये सांस्कृतिक मूल्य ही हमारे जीवन को संस्कारी, परिष्कृत, उदार और संघर्षशील बनाते हैं।

धर्मवीर भारती ने मानव मूल्यों की चर्चा में मानव की आस्था पर अधिक बल दिया है। उनकी कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि मूल्यों के संकट के बीच आस्था की खोज है। धर्मवीर भारती ने अपने काव्यों में व्यक्ति स्वातंत्र्य, विवेक और दायित्व जैसे मानव मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास किया है। जो कि 'कौन चरण' कविता में देखने को मिलता है-

"पर तुम तो केवल पथ हो

चलना तो हमको ही होगा

हिम की ठण्डी चट्टानों पर

.. गलना तो हमको ही होगा

तुम तो केवल निष्क्रिय पथ हो

आखिर होगे वे यही चरण

जिसमे इस लक्ष्य भ्रष्ट मन को

मिल पायेगी अन्त में शरण।"⁶ भारती जी की कविताओं मे संघर्ष और तनाव के दौर में भी मानव आस्था में विश्वास बना रहता है।

सबसे अधिक मानव मूल्यों का कारण धर्मवीर भारती की रचना गीतिनाट्य 'अंधा युग' मे देखने को मिलता है। अंधायुग अपनी मूल्य चेतना मे समकालीन परिवेश का दर्पण दिखाती है। यह कृति महाभारत पर आधारित है। इसमे पौराणिक कथानकों को आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य मे दर्शाया गया है। यह 'अंधायुग' आज के विश्वयुद्धों से विघटित मानव मूल्यों को अभिव्यक्त करता है। यह वस्तुत: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उत्पन्न हुए मानवीय संकट की कथा कहता है -

युद्धोपरांत

यह अन्धायुग अवतरित हुआ

जिसमे स्थितियाँ, मनोवृतियाँ, आत्माएँ सब विकृत है।"⁷

एक तरह से महाभारत अन्धों का ही युद्ध है। जिसमे कौरव और पांडव दोनों ने अपने स्वार्थ के लिए मानव जीवन मूल्यों के साथ ही मर्यादा का भी अतिक्रमण किया है। अन्धायुग के सन्दर्भ मे डॉ० रामदरश मिश्र मे लिखा है कि - "भारती ने महाभारत के ख्यात कथानक का उसकी ऐतिहासिक चेतना को अक्षुण्ण रखते हुए, ऐसा विकास किया है कि वह आज के युगबोध को, युद्ध से उत्पन्न मूल्य संकट को झंकृत कर सके इसीलिए महाभारत का युद्ध अपने अंधेपन की स्थिति का परिचायक मात्र न रहकर एक प्रतीक भी बन गया - आधुनिक युग के अंधेपन का प्रतीक।"⁸

अंधायुग से मर्यादा, प्रेम, सत्य, आदर्श, दया, न्याय, देश प्रेम आदि सामाजिक मूल्यों की स्थापना की गयी है। इस कृति का मुख्य उद्देश्य वर्तमान जीवन में युद्ध से उत्पन्न मानवीय मूल्यों का विघटन दिखाना है। युद्ध के कारण टूटे हुए मानव मूल्यों की अभिव्यक्ति विभिन्न पात्रों के माध्यम से दर्शायी गयी है। डॉ०हरिवंश पाण्डेय 'अंधायुग' के संबंध मे अपना वक्तव्य जाहिर करते हैं- "अंधायुग मे भारती का लक्ष्य राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर अपनाई गई युद्ध नीति से अमर्यादित आचरण से उत्पन्न मानवीय मूल्यों का विघटन दिखाना तो है ही किन्तु उनका लक्ष्य यह भी स्थापित करता है कि जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति का आधार मनुष्य द्वारा किया गया अमर्यादित आचरण है जिसे विवेकपूर्ण और दायित्वपूर्ण होना चाहिए।"⁹

धर्मवीर भारती की कहानियाँ जीवन मूल्यों से अनुप्राणित है। उनकी कहानियों में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा अनुराग है, तो दूसरी ओर वहीं सड़ी गली परम्पराओं के प्रति आकोश भी है। भारती जी सामाजिक समरसता एवं सामाजिक स्वास्थ्य के सम्बर्द्धन में विश्वास रखते हैं। इनकी कहानियों में मानव जीवन की संवेदना, मानवतावाद, मूल्य बोध अधिकतम मात्रा में मिलते हैं। धर्मवीर भारती की अधिकांश कहानियों मे मानवीय मूल्यों की तलाश का संघर्ष निरन्तर जारी रहता है। इस संबंध में डॉ चन्द्रकान्ता बंसल जी लिखते हैं कि "प्रत्येक मूल्य मानव की चिन्तन प्रक्रिया और संवेदनाओं से होकर गुजरता है। अत: मानव मूल्यों से अधिक महत्वपूर्ण है। प्रायः मूल्य बोध का आधार वैयक्तिक प्रतीति है। किसी वस्तु से व्यक्ति के मन मे परितोष, प्रसाद, आपूर्ति, प्रेरणा एवं सार्थकता की अनुभूति जाग्रत हो वही मूल्यवान लगने लगती है। अतः मूल्य वह वैचारिक इकाई है, जिसके आधार पर मानव जीवन जीता है और उसे आत्मोप्लब्धि होती है। इस जीवन-दर्शन में विभिन्न संस्कार, घटना- प्रवाह, सामाजिक दायित्व आदि विचार अनुष्यूत रहते हैं और इनके आधार पर मानतीय संबंध निर्मित होते हैं, अर्थात् मानवीय संबन्धों के अन्त: स्थल से निःसृत कोई आदर्श परिकल्पना जब समाज में हो मान्य हो जाती है तब वही मूल्य बन जाते हैं।"¹⁰

व्यक्ति और समाज का अन्योन्यारित संबंध है इसके बिना व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं कर सकता है। इसीलिए व्यक्ति, समाजोन्मुखी होता है। भारतीय काव्य परम्परा सामाजिक धरा से ही जन्मी है। सामाजिक जीवन मे आदर्शों को प्रतिष्ठित करने के लिए जीवन मूल्यों का ही योगदान होता है। यही सामाजिक मूल्य संस्कृति एवं समाज को अर्थ तथा महत्ता प्रदान करते हैं।सामाजिक मूल्यों का केन्द्र मानव जीवन होता है। इन्हीं मूल्यों के अन्तर्गत व्यक्ति आदर्श का निर्माण करता है क्योंकि ये हमारी संस्कृति के शाश्वत मूल्य है। डॉ. धर्मवीर भारती जी ने स्वीकार किया है कि- "सामाजिकता आन्तरिक है, केवल बाह्य नही। वह दूसरों की पीड़ा पहचानने का व्रत लेकर चलती है, क्योंकि व्यक्ति के रूप में उसने खुद पीड़ा भोगी है। आन्तरिक सामाजिकता पर आग्रह उस मानवीय विघटन को चुनौती देता है जो आज व्यक्ति के विनाश और समाज के खोखलेपन में प्रतिबिम्बित हो रहा है।"¹¹ सामान्य जन के प्रति सामाजिक मूल्य चेतना में भारती जी की दृष्टि विशेष रही है। इसीलिए इन्होंने विवेक और दायित्व जैसे जीवन मूल्यों की स्थापना की है।

धर्मवीर भारती सांस्कृतिक मूल्य चेतना के साहित्यकार है। संस्कृति एक सामाजिक विरासत है तथा वह संचय से पल्लवित होती है। किसी भी देश की संस्कृति उसका गौरव व अमूल्य धरोहर होती है। गौरवशाली, सौदर्यमयी संस्कृति एक स्वस्थ्य एवं सुन्दर समाज का निर्माण करती है। धर्मवीर भारती अपने सम्पूर्ण साहित्य मे भारतीय संस्कृति के प्रति उदार दिखाई देते हैं। इसीलिए वे वैयक्तिक स्वतंत्रता को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि-" यह उसी सांस्कृतिक व्यवस्था में सम्भव है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है और अपने दायित्व को खोजकर उससे अपनत्व अनुभव कर उसे अपना स्वधर्म मानकर उसी में अपने अस्तित्व की सार्थकता मानता है।"¹² विकासोन्मुख संस्कृति को सरस सुन्दर और कल्याणमय बनाने के लिए प्रत्येक मनुष्य को अपने दायित्वों को मानना चाहिए जिससे मानव मूल्यों का विकास हो सके।

वर्तमान समय में व्यक्ति के अन्दर मानतीय मूल्यहीनता बढ़ती ही जा रही है। वह एक साथ कई जिन्दगी जी रहा है। पारिवारिक सम्बन्धो में इतना बदलाव आया है कि हमारा नैतिक स्तर दिन पर दिन गिरता ही जा रहा है। हमारी मानवीय संवेदनाएँ शून्य होती जा रही हैं। युवाओं के मन में हताशा, निराशा, कुंठा बैठ गया है। जिसका कारण है नैतिकता, ईमानदारी एवं विश्वास जैसी चीजों का नष्ट होता । सारे संबंध अर्थ की नींव पर खड़े है। जहाँ अर्थ है वही संबंध है जहाँ अर्थ नहीं वहाँ संबंध नहीं। 'सूरज का सातवाँ घोडा' मे जमुना, लीला और सत्ती समाज के बनाए कठोर नियमों, रूढ़ियों, परम्पराओं और आर्थिक विषमता के कारण ही वे अपने आदर्श प्रेम को पाने में असफल रहती हैं। देखा जाए तो आज के युग में धन की महत्ता सर्वोपरि प्रतीत होती है। धर्मवीर भारती ने ठीक ही लिखा है - "वास्तव मे आर्थिक ढाँचा हमारे मन पर इतना अजब सा प्रभाव डालता है कि मन की सारी भावनाएँ उससे स्वाधीन नहीं हो पाती और हम जैसे लोग न उच्चवर्ग के है न निम्नवर्ग के, उनके यहाँ रूढ़ियाँ, परम्पराएँ, मर्यादाएँ भी ऐसी पुरानी और विषाक्त हैं कि कुल मिलाकर हम सबो पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि हम यंत्रमात्र रह जाते हैं। हमारे अन्दर उदार और ऊँचे सपने खत्म हो जाते हैं और एक अजब सी जड़ मूर्च्छना हम पर छा जाती है।"¹³ आज जो मध्यम वर्ग जी रहा है उसमे प्रेम से ज्यादा महत्वपूर्ण आर्थिक संघर्ष, नैतिक विश्रृंखला, रूढ़ियाँ, मर्यादाएँ, कुरीतियाँ, अन्धविश्वास आदि हो गया है। यह हर मध्य वर्गीय परिवार की समस्याएँ हैं।

सामान्यत: यह देखा जाता है यदि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ठीक है तो प्रेम सफल होता है नहीं तो असफल हो जाता है। जिसका कारण अर्थ ही है। आज अर्थ की ही प्रधानता है। अर्थ से ही सारे भौतिक सुख साधन हैं। आज मानवीय संवेदनाएँ भी अर्थ से प्रभावित है। ये हमारे समाज में व्याप्त अर्थ की नींव पूरी तरह खोखली है। इससे अपना जीवन निर्वाह तो कर सकते हैं पर सही अर्थों में जीवन जी नहीं सकते। आज व्यक्ति ने अपने जीवन मे अर्थ को इतना महत्वपूर्ण मान लिया है कि उसकी मात्मा मर गयी है। अर्थ प्राप्ति के लिए वह घिनौना से भी घिनौना कृत्य करने मे तनिक भी संकोच नहीं करता। इंसानियत उससे कोसों दूर है। आज का समाज ही अर्थ प्रधान समाज है। अर्थ की प्रधानता के सन्दर्भ में डॉ० त्रिभुवन लिखते हैं कि- "मानव जीवन के अन्दर अर्थ इतना प्रधान हो गया है कि मानवता उससे दूर हो गया है । स्त्री का व्यापार करने वाले अथवा उसके शरीर साक्ष्य धन पर जीवन निर्वाह करने वाले मनुष्यों की आत्मा इसलिए मर गई है कि मनुष्य के जीवन में 'अर्थ' प्रधान हो उठा है। 'सत्ती' ऐसी कितनी युवतियों का क्रम - विक्रय समाज में आए दिन होता रहता है।"¹⁴

धर्मवीर भारती ने अपने परमपरागत लेखन के ध्वंसावशेष पर नए मानव मूल्यों को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। जीवन मूल्य की सम्पूर्ण प्रक्रिया मानव जीवन के अस्तित्व पर आधारित है यो कहिए समस्त मूल्यों का स्रोत ही मानव जीवन है। भारती जी का संपूर्ण साहित्य मानव जीवन मूल्यों पर आधारित है।इन्होंने वास्तविक जीवन मूल्यों को खोज कर हर परिस्थितियों में उन्हें प्रस्थापित करने की कोशिश की है।भारती जी के साहित्य में मूल्यों की तलाश का संघर्ष निरंतर जारी रहता है।

संदर्भ सूची-

  1. आठवें दशक की हिंदी कहानी में जीवन मूल्य- डॉ० रमेश देशमुख पृष्ठ 09
  2. A manual of ethics - J. S. Mackenzie पृ० 219
  3. ठंडा लोहा- धर्मवीर भारती पृष्ठ -19
  4. वही -(बोवाई का गीत) पृष्ठ 34
  5. वही पृष्ठ- 11
  6. सात गीत वर्ष( कौन चरण)- धर्मवीर भारती पृष्ठ-23-24
  7. अंधायुग -धर्मवीर भारती, पृष्ठ-12
  8. हिंदी कविता:तीन दशक-डॉ०रामदरश मिश्र पृष्ठ-173
  9. धर्मवीर भारती: चिंतन और अभिव्यक्ति -डॉक्टर हरिवंश पांडेय पृष्ठ संख्या 106
  10. सातवें दशक की कहानी में मानवीय संबंध विशेष संदर्भ: मोहन राकेश -डॉ० चंद्रकांता बंसल पृ० संख्या 28
  11. मानव मूल्य और साहित्य-धर्मवीर भारती, पृ०128
  12. वही पृष्ठ-89
  13. सूरज का सातवाँ घोड़ा- धर्मवीर भारती , पृष्ठ-56
  14. हिंदी उपन्यास और यथार्थवाद- डॉ० त्रिभुवन सिंह पृष्ठ -264

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि धर्मवीर भारती का साहित्य मानव जीवन के विविध मूल्यों का सशक्त संवाहक है। उनकी रचनाओं में प्रेम, आस्था, नैतिकता, सामाजिक दायित्व, मानवीय संवेदना तथा सांस्कृतिक चेतना का समन्वित स्वरूप दिखाई देता है। उन्होंने बदलते सामाजिक परिवेश में मूल्यों के संकट को पहचानते हुए मानवता और विवेक की प्रतिष्ठा का प्रयास किया। इसलिए उनका साहित्य आज भी जीवन-मूल्यों की स्थापना और मानवीय चेतना के संवर्धन की दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक एवं प्रेरणादायी है।

- पूनम सिंह,
सहायक आचार्य, हिंदी विभाग
हिन्दू कन्या महाविद्यालय सीतापुर 
सम्बद्ध- लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

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