Vishwas is a heartwarming children's story by Dr. Shakuntala Kalra that beautifully highlights the values of honesty, trust, and good character. Through a simple yet meaningful incident, the story inspires young readers to choose truth and kindness in everyday life.
Vishwas Story by Dr. Shakuntala Kalra
बालमन की सहज संवेदनाओं, ईमानदारी, विश्वास और अच्छे संस्कारों को अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती डॉ. शकुंतला कालरा की यह प्रेरक बाल कहानी "विश्वास" बच्चों को सिखाती है कि सच्चाई और नैतिकता का मार्ग अंततः सुख और संतोष ही देता है। आइए, पढ़ते हैं यह सुंदर और शिक्षाप्रद कहानी।
बच्चों की प्रेरक कहानी हिन्दी में
विश्वास
पंकज तीसरी कक्षा में पढ़ता था। बहुत ही समझदार और शांत बच्चा था। स्कूल से आकर पहले अपना होमवर्क करता और फिर खेलने जाता।
रोज की तरह होमवर्क करने के लिए उसने अपना बैग उठाया। किताब-कॉपी निकालने के बाद अपना पेंसिल-बाक्स खोला। उसमें सिक्के वाली पेंसिल नहीं थी। वह उदास हो गया। कल ही वह प्यारी पेंसिल माँ ने दिलाई थी। कैमलिन की लाल रंग की पेंसिल पूरे चालीस रुपये की थी। क्लास में उसने सारा काम उसी से किया था। लंच के बाद भी उसके पास थी, पर अचानक कहाँ चली गई।
पंकज सोचने लगा, कल पी.टी. के पीरियड में बाहर पूरी क्लास ग्राउंड में खेलने गई थी। शायद उसी वक्त...। या कहीं इससे पहले वाले हिन्दी के पीरियड में क्लास वर्क करने के बाद वहीं छूट गई होगी। वह तरह-तरह की शंकाओं में घिर गया। उसका होमवर्क में मन नहीं लगा।
वह किताब खोलकर बैठा रहा और सोचता रहा। थोड़ी देर बाद माँ कमरे में आईं तो पंकज को इस तरह बैठे देखकर कहा, ”क्या बात है, आज तुम्हारा मन पढ़ने में नहीं लग रहा। तबीयत तो ठीक है न?...।“
अरे, कुछ बोलता क्यों नहीं? माँ ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया और प्यार से उसके गालों पर हाथ फेरकर उदासी का कारण पूछा, ”क्या होमवर्क में कुछ मुश्किल हो रही है? लाओ, मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूं।“ पंकज होमवर्क में कई बार माँ की मदद लेता था। कोई भी विषय कहीं से भी मुश्किल लगता, माँ उसे आसान कर देती।
माँ ने उसके माथे पर हाथ रखते हुए फिर पूछा, ”क्या बात है तबीयत तो ठीक है न? बुखार तो नहीं लगता। क्या सिरदर्द या पेट दर्द है?“
पंकज माँ का स्पर्श और सहानुभूति पाकर रो पड़ा। उसने सुबकते हुए बताया, ”माँ मेरी नई पेंसिल खो गई।“
”कहां खो गई? ध्यान से देखो, बैग में ही होगी।! क्या आज स्कूल ले गए थे? शायद घर में ही भूल गए हो।“
”नहीं मां, मैं उसे स्कूल ले गया था, क्लास वर्क भी उसी से किया था।“ यह कहते ही उसने बैग का सारा सामान उलट दिया। पेंसिल कहीं नहीं थी।
माँ ने उसे प्यार से समझाया, ”चलने से पहले अपना सामान जरूर संभाल लेना चाहिए। चलो, कोई बात नहीं। कल स्कूल जाने पर मिल जाएगी। तुमने वहीं डैस्क पर छोड़ दी होगी।“
पंकज की थोड़ी आस बँधी। उस दिन न होमवर्क ठीक से कर पाया और न ही रात को ढंग से कुछ खा पाया। रात भर सपने में भी उसे वही प्यारी लाल रंग की सुंदर-सुंदर पेंसिल दिखती रही।
दूसरे दिन वह जल्दी ही उठ गया। झटपट तैयार हो गया। उसे स्कूल जाने की आज बहुत जल्दी थी। स्कूल बस में भी उदास बैठा हुआ खिड़की की तरफ देखता रहा। आज उसने बस में कोई शरारत नहीं की।
पहला पीरियड क्लास टीचर का ही था। सबकी हाजिरी के बाद मैडम ने क्लास-वर्क के लिए कॉपी खोलने को कहा तो पंकज ने मैडम से अपनी पेंसिल खो जाने की बात कही। मैडम ने पूरी क्लास को अपने-अपने पेंसिल-बाक्स चैक करने को कहा। पेंसिल नही मिली। पंकज और ज्यादा उदास हो गया।
दो दिन बाद पंकज होमवर्क करने बैठा तो माँ ने देखा, पंकज के पास लाल रंग की वही पेंसिल थी। उसने पूछा, ”अरे नटखट! पेंसिल खोने पर इतना शोर मचाया, पेंसिल मिल जाने पर बताया भी नहीं।“ पंकज उदास बना रहा।
”तुम पेंसिल मिलने पर खुश क्यों नहीं हो।“ माँ किसी आशंका से घबरा गई।
पंकज फिर रोने लगा। ”अरे-अरे इसमें रोने की क्या बात है?“ माँ ने पुचकारते हुए पूछा। पंकज ने सब कुछ सच-सच बता दिया,”यह पेंसिल लाल रंग की कैमलिन की जरूर है, पर यह मेरी पेंसिल नहीं है। यह लंच टाइम में क्लास में गिरी हुई मिली है। पहले तो बहुत खुश हुआ, पर जब देखा तो पाया, यह मेरी नहीं है। अब मैं इसे किसी को नहीं दूंगा।“
माँ सारी बात समझ गई। उन्होंने उसे डांटा नहीं। बड़े प्यार से समझाया, ”देखो पंकज जिस बच्चे की पेंसिल खोई होगी, वह भी तुम्हारी ही तरह परेशान होगा। उसका मन पढ़ने में नहीं लग रहा होगा। हो सकता है उसे घर से खूब डांट भी पड़ रही होगी अपनी लापरवाही के कारण।“
”पर माँ मुझे उससे क्या? मैं भी तो परेशान हूँ। और फिर मैंने किसी की चुराई नहीं है। मुझे वहीं गिरी हुई मिली है।“ पंकज ने अपनी सफाई में दलील पेश की, तो माँ ने उसे फिर समझाया, ”देखो बेटा, यह ठीक है कि यह पेंसिल तुम्हें गिरी हुई मिली है, लेकिन क्लास रूम में। जरूर यह तुम्हारी ही क्लास के किसी बच्चे की है। तुम्हें इसे अपनी टीचर को दे देना चाहिए था। वह पूरी क्लास से पूछती और जिसकी होती, उसे मिल जाती।
”पर मेरी तो किसी ने वापस नहीं की। मैं भी नहीं दूंगा।“ पंकज ने तर्क दिया।
”नहीं बेटा तुम ऐसा नहीं करोगे। अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते। मैं तुम्हें आज वैसी ही नई पेंसिल दिला दूंगी। तुम कल जाते ही अपनी क्लास टीचर को यह पेंसिल सौंप दोगे।“ माँ ने आदेश के स्वर में कहा।
पंकज फिर सोच में पड़ गया और बोला, ”मां, मेरी पेंसिल?“
”वह भी मिल जाएगी अगर हर बच्चा इसी ईमानदारी के साथ दूसरे की चीज वापस कर दे तो कोई दुखी नहीं होगा और उसे अपनी चीज वापस मिल जाएगी।“ माँ चिंतित हो उठी क्योंकि बचपन की ये आदतें ही स्वभाव बन जाती हैं। बचपन के अच्छे संस्कार ही उसे अच्छा आदमी बनाते हैं। उसे अपने पंकज पर विश्वास था।
पंकज ने दूसरे दिन पहले ही पीरियड में पेंसिल अपनी क्लास-टीचर को दे दी। टीचर ने पूछा, ”यह पेंसिल किसकी है?“
तरुण खड़ा हो गया, ”मैडम, यह मेरी पेंसिल है।“
मैडम ने उसे पेंसिल दे दी। तरुण बहुत खुश हुआ।
उसे खुश देखकर पंकज को लगा, जैसे उसकी पेंसिल मिल गई हो। उसे आज अच्छा महसूस हुआ।
लंच-टाइम में तरुण ने पंकज को धन्यवाद दिया और बताया, ”मैं कल घर पर सारा दिन रोता रहा। डैडी ने खूब डांटा। न कहीं खेलने गया और न रात को कुछ खाया। यह पेंसिल मेरी दीदी ने जन्मदिन पर बड़े प्यार से भेंट की थी। मैं इस पेंसिल को बहुत लक्की मानता हूँ।
”धन्यवाद पंकज, बहुत-बहुत धन्यवाद।“ कहते-कहते तरुण ने पंकज का हाथ चूम लिया।
पंकज आज बहुत खुश था। वह बड़ा हल्का महसूस कर रहा था। अब वह अपनी पेंसिल का दुख भी भूल गया।
घर आकर उसने क्लास की सारी बात माँ को बता दी। माँ बहुत खुश हुई।
दो दिन बाद पंकज क्लास-वर्क कर रहा था, तो उसका रबड़ डैस्क से नीचे गिर गया। यह क्या? जैसे ही रबड़ ढूंढ़ने के लिए उसने अपना डेस्क पीछे किया, उसे अपनी वही प्यारी-प्यारी लाल पेंसिल डैस्क में से नीचे गिरती दिखाई दी। उसने झटपट उसे उठा लिया और चूम लिया। उसने जोर से कहा, ”मिल गई, मिल गई, मेरी पेंसिल मिल गई।“
मैडम ने देखा पंकज बहुत खुश था। मैडम ने पूरी क्लास को समझाया, ”देखो, ईश्वर अच्छा काम करने वाले का सदा भला करता है।“ आज का पाठ भी यही था कि दूसरे की वस्तु को मिट्टी के ढेले की तरह समझो चाहे वह कितनी ही कीमती क्यों न हो।
घर आते ही पंकज चपलता के साथ माँ से लिपट गया। आज वह बहुत खुश था। हाथ में पेंसिल छिपाये-छिपाये उसने माँ से कहा, ”माँ बताओ मेरे हाथ में क्या है?“
”पेंसिल।“
”अरे आपको कैसे पता चला?“
”तुम्हारी खुशी देखकर।“
”हाँ मा,ँ मेरी पेंसिल मिल गई। वहीं, क्लास में अपने ही डैस्क में छिपी हुई थी। माँ, तुमने अच्छी बात बताई थी। तुम बड़ी अच्छी हो।“ कहते-कहते पंकज फिर माँ से लिपट गया।
”तुम बड़े अच्छे हो पंकज, जो तुमने मेरी बात मान ली।“
”तुम अच्छी हो।“
”नहीं, तुम अच्छे हो।“
”नहीं तुम।“ पंकज खुशी से चिल्ला रहा था।
इतने में डैडी ने कहा, ”तुम दोनों ही बहुत अच्छे हो।“
और सब खिलखिला कर हंस पड़े।
- डॉ. शकुंतला कालरा
निष्कर्ष; "विश्वास" केवल एक पेंसिल की कहानी नहीं, बल्कि ईमानदारी, संवेदनशीलता और अच्छे संस्कारों का सुंदर संदेश है। यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि सच्चाई और नेक व्यवहार का फल अंततः अवश्य मिलता है।
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