होलू का दिमाग चलता है | दिविक रमेश की प्रेरक हिंदी बाल कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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Holu Ka Dimaag Chalta Hai is a delightful children's story by Divik Ramesh. Through Holu's imaginative questions and creative thinking, the story encourages curiosity, kindness, and the habit of looking at the world from a fresh perspective.

Holu Ka Dimaag Chalta Hai: A Creative Hindi Children's Story

holu ka dimaag chalta hai creative hindi children's story

बच्चों की कल्पनाशक्ति की कोई सीमा नहीं होती। वे साधारण-सी बातों में भी नए प्रश्न खोज लेते हैं और दुनिया को एक अलग नजरिए से देखते हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार दिविक रमेश की बाल कहानी "होलू का दिमाग चलता है" ऐसे ही एक जिज्ञासु और संवेदनशील बालक की कहानी है, जो अपने अनोखे सवालों और कल्पनाशील सोच से पाठकों को मुस्कुराने के साथ-साथ नए ढंग से सोचने की प्रेरणा देती है। यह कहानी बच्चों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर संदेश देती है।

बच्चों की कल्पनाशक्ति पर सुंदर हिंदी बाल कहानी

होलू का दिमाग चलता है

लू लू को तो सब जानते हैं। वही अजीबोगरीब और प्यारी हरकतें करने वाला। थोड़ा नटखट, थोड़ा स्मार्ट, लेकिन बहुत ही प्यारा। कुछ गलती हो जाए तो झट मानने वाला। सबका अच्छा चाहने वाला। उसी के साथ ने होलू को भी काफी नटखट और स्मार्ट बना दिया था। जब देखो तब होलू का दिमाग भी चलने लगता था। अब होलू भी क्या करे। दिमाग चलते ही कल्पना के घोड़े, न जाने कहाँ से आकर, सरपट दौड़ने लगते। बहुत बार तो ऐसी बातें करता कि उसकी माँ हैरान रह जाती। दाँतों तले उंगली ही दबा लेती। परेशान भी हो जाती और डर भी जाती। सोचने लगती पता ही क्या हो गया है उसके होलू को। किसी ने जादू-टोना तो नहीं कर दिया। वह बेचारी इतनी पढ़ी-लिखी और समझदार तो थी नहीं। जानती ही नहीं थी कि जादू-टोना कुछ नहीं होता। शहर से सटे एक कस्बानुमा गाँव में था उसका घर। उसी में अकेली अपने बेटे होलू के साथ रहती थी। बहुत पैसे वाली तो नहीं थी। मेहनत-मजदूरी कर के कमाती थी। पर चाहती थी कि होलू पढ़-लिख ले। सो होलू को शहर के एक स्कूल में डाल दिया था। स्कूल की ओर से गरीब बच्चों के लिए भी बिना फीस के पढ़ने की सुविधा थी। उसी स्कूल में लू लू भी पढ़ता था। लू लू शहर में रहता था। पैसे वाले घर से था, पर होलू का बहुत अच्छा दोस्त बन गया था। दोनों की बहुत पटती थी आपस में।

उस दिन की बात बता ही दूँ। होलू कहीं से कूदता-फाँदता घर आया। देखा माँ गेहूँ से कंकड़ चुन कर निकाल रही थी। होलू ने बहुत कोशिश की। सामान्य रहने की। पर क्या करता। उसका तो दिमाग चलने लगा। माँ की पीछे से कौली (दोनों बाहों में लपेट लेना) भर ली। बहुत ही प्यार से। माँ ने कहा- “क्या है होलू? काम करने दे न मुझे! कुछ चाहिए क्या? जा रसोई से गाजर का हलवा लेकर खा ले।” होलू कहाँ सुनने वाला था। उसका दिमाग तो न जाने किन-किन रास्तों पर चल निकला था। गम्भीर होकर बोला-“ माँ अगर मेरी चोंच होती तो मैं तेरे ये दाने खा जाता न?”

होलू के प्रश्न पर माँ को चौंकना ही था। सो चौंकी। बोली- “होलू तू यह कैसी बे सिर पैर की बात कर रहा है? तू आदमी बच्चा है। तेरी चोंच कैसे हो सकती है!

होलू ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा – “माँ मेरी ही नहीं, आपकी भी चोंच होती तो?”

“तो क्या? – माँ ने पूछा।

“तो आप अपनी चोंच से गेहूँ का दाना मेरी चोंच में डालती। हैं न ?” – होलू ने आँखें मटकाते हुए कहा। थोड़े शरारती अंदाज में।

माँ ने हाथ को थोड़ा पटकते हुए कहा- “होलू तू क्या पगला गया है। बताया न। हम मनुष्य हैं। मनुष्य की चोंच नहीं होती।“

होलू ने माँ की ओर ऐसे देखा जैसे माँ को कुछ नहीं आता जाता। बोला – “आप समझती क्यों नहीं माँ। मैने कब कहा कि मनुष्यों की चोंच होती है। मैं तो बस यही सोच रहा था। आप और मैं यदि पक्षी होते तो हमारी भी चोंच होती। है न? और कहीं गेहूँ के दाने दिख जाते तो आप अपनी चोंच से मेरी चोंच में दाने डालती न?”

होलू की माँ ने होलू की बात सुनी तो मन ही मन खुश हो गई। सोचा कि उसके होलू का दिमाग कितना अच्छा चलता है। कितना सूझ-बूझ वाला है होलू! बोली- “होलू यह बात तो तुम्हारी सही है। हम पक्षी होते तो ऐसा ही होता।“

“माँ मैं पक्षी होता तो जब भी कोई पक्षी भूखा दिखता तो अपनी चोंच से अपने दानों में से कुछ उसे भी चुगा देता। कितना अच्छा होता न माँ?“

माँ की आँखें गीली हो आईं। सोचा कितना भला है न उसका होलू। दूसरों के बारे में कितना अच्छा सोचता है। बोली –“होलू कितनी अच्छी बात कही है तूने। सुन कर बहुत अच्छा लग रहा है मुझको। तू बहुत अच्छा मनुष्य है। तभी तो पक्षी बनकर भी इतना अच्छा होने की सोच रहा है। मुझे नहीं पता पक्षियों में ऐसा होता भी है कि नहीं।“

माँ ने होलू को अपनी ओर खींच कर उसका सिर चूम लिया था। होलू को बहुत अच्छा लगा था। माँ शांत दिख रही थी। पर होलू का दिमाग तो अभी थमा ही नहीं था। वह तो चलता ही जा रहा था। फिर कहीं से एक बात टपक पड़ी। सीधे होलू के दिमाग में। अब उसे निकालना तो पड़ेगा ही। होलू ने शांत दिख रही माँ से अचानक पूछा, नदी की लहरों की तरह हाथ हिलाते हुए – “अच्छा माँ, बताओ तो नदी कहाँ से आती है?”

“प्राय: पहाड़ों से।“ – माँ ने कहा। इस बार वह उतना नहीं चौंकी थी।

“और नदी जाती कहाँ है?” -होलू ने अगला प्रश्न दागा। दागा इसलिए कि उसने अपना प्रश्न गर्दन हिलाते हुए ऐसे पूछा था जैसे उसकी माँ को जवाब नहीं आता।

“प्राय: समुद्र में।“ -माँ ने सहजता से जवाब दे दिया।

होलू को थोड़ी निराशा हुई। माँ का इतना सहज और शांत होना उसे बिलकुल अच्छा नहीं लग रह था। उसे तो उसकी बातों पर चौंकती हुई माँ ही अधिक अच्छी लगती है। और शायद उसके चलते हुए दिमाग को भी। होलू को लग गया था कि उसका चलता हुआ दिमाग भी थोड़ा परेशान है। तभी चलते हुए दिमाग को कुछ सूझा। उसने होलू को तोड़ा झकझोरा और एक नया ‘आइडिया’ दिया। होलू ने चलते हुए दिमाग की ओर आँख मरते हुए झट उसे प्रश्न बनाया और माँ से पूछा – “अच्छा माँ सोचो, नदी समुद्र से निकलती और पहाड़ की ओर जाती तो?”

इस बार माँ पहले ही की तरह चौंक गयी। होलू और उसके चलते दिमाग को मजा आना ही था। सो आया। माँ की ओर होलू ने ऐसे देखा जैसे कोई बहुत बड़ा विजेता हो। सोच रहा था कि इस बार माँ को अच्छी पटकनी दी।

“यह कैसा सवाल है होलू?” -माँ ने थोड़ा झुंझला कर पूछा और आगे कहा – “नदी पहाड़ से उतर कर समुद्र की ओर जाती है। तू तो उलटी गंगा बहा रहा है। जरा सोच तो। चीजें ऊपर से नीचे की ओर आती हैं या नीचे से ऊपर की ओर जाती हैं? नीचे के समुद्र से भला नदी ऊपर पहाड़ पर कैसे जा सकती है?”

यह क्या! माँ की बात सुनकर न होलू को कुछ हुआ था और न ही उसके चलते दिमाग को। लगा जैसे वे अपने पूछे गए सवाल पर ही अड़े थे।

होलू ने हाथ हिला-हिला कर और बात को खींचते हुए अंदाज में कहा –“ माँ, आप भी कितनी भोली हैं।“

माँ ने अचम्भेवाली परेशानी से होलू की ओर देखा। होलू के मन में क्या है, यह सोचने की कौशिश की।

थोड़ा गम्भीर होकर होलू बोला-“ अच्छा बताओ माँ, जब मैं छत पर होता हूँ तो नीचे कैसे आता हूँ?”

“जीने से उतर कर!” - माँ का तुरंत जवाब था।

“और छत पर जाना चाहूँ तो? -होलू का अगला प्रश्न था।

“तो जीने से चढ़कर।“- माँ ने जवाब दिया।

“तो सोचो न माँ। नदी पहाड़ से उतर कर समुद्र तक आ सकत हैतो समुद्र से चढ़ कर पहाड़ तक भी तो जा सकती है। अगर उसे जीना मिल जाए।“– होलू ने किसी वैज्ञानिक की मुद्रा बनाते हुए कहा। इस समय होलू खुद को बहुत समझदार समझ रहा था। उसे लग रहा था कि चलता हुआ दिमाग भी उसकी पीठ थपाथपा रहा था।

तभी माँ ने मुँह को थोड़ा लम्बा करते हुए कहा –“ यह तू क्या ऊटपटांग सोचा करता है होलू। ऐसा नहीं होता।“

होलू उठा और अंदर से एक कागज, लोहे की पिन और चुम्बक लेकर आया। माँ को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। होलू ने कागज को ऊपर से नीचे की ओर पकड़ा। माँ से कहा कि एक हाथ कागज पर सुई को लगा कर दूसरी ओर से उसे चुम्बक से छुआ दे। फिर चुम्बक को ऊपर नीचे करने को कहा। चुम्बक ऊपर जाता था तो पिन ऊपर जाती और चुम्बक नीचे लाया जाता तो चिपकी हुई पिन भी नीचे आ जाती।

माँ ने पूछा –“ होलू तू ऐसा दिखाकर बताना क्या चाहता है।“

“यही माँ कि चुम्बक की तरह हमें कोई तरीका मिल जाए तो हम नदी को भी सागर से पहाड़ की ओर बहाया जा सकता है।“ ‌होलू ने किसी बड़े-बूढ़े की तरह कहा।

“अरे बुद्धू, नदी को ले जाने वाला चुम्बक भला होता कहाँ है! तेरा दिमाग कैसी अनहोनी बात सोच रहा है!” माँ ने थोड़ा परेशान होकर लेकिन समझाने की मुद्रा में कहा।

“तो मैंने कब कहाँ माँ कि नदी को ले जाने वाला चुम्बक होता है। और फिर मैंने कब कहा कि नदी समुद्र से निकल कर पहाड़ तक पहुँच ही जाएगी।“ – होलू ने अपनी बात रखी।

माँ चुप रही तो होलू ने आगे कहा –“मैंने तो बस इतना कहा कि सोचो अगर नदी समुद्र से निकल कर पहाड़ की ओर जाए तो?” थोड़ा रुककर फिर बोला –“माँ, सोच तो सकते हैं न हम! सोच तो यह भी सकते हैं कि उलटा जाते समय नदी किस-किस राह से जा सकती है। पुरानी जगहों से या एकदम नई जगहों से।“ होलू थोड़ा रुका और फिर कहा –“माँ अच्छी बात यह है नदी इधर से उधर जाए या उधर से इधर, रहेगी नदी ही। सबकी अपनी, सबका भला करने वाली।“

माँ ने प्यार से होलू की ओर देखा। उसके सिर पर हाथ रखा। कहा-“ मेरे होलू तू जल्दी से बड़ा हो जा। फिर सोच-सोच कर मजेदार कहानियाँ लिखना। कितनी अच्छी सोच है न तेरी! सब तेरी मजेदार कहानियों को पढ़ेंगे। सोच, तब तुझे कितना मजा आएगा। जने कैसा-कैसा लगेगा।“

“कैसा लगेगा माँ?” – होलू ने अपने मासूम से चेहरे से पूछा।

“मुझे क्या पता! मैं तो कहानी लिखती नहीं। तू ही सोच। कुछ पता चले तो मुझे भी बताना।“ – माँ ने कहा।

होलू का चेहरा देख कर लगा कि जैसे वह कुछ सोचने लग था। वह उठा और चल पड़ा। जरूर वह कुछ न कुछ सोचेगा जरूर। यह नहीं तो वह। दिमाग चलते ही वह फिर कोई नया किस्सा लेकर चला आएगा।

माँ ने जरूर राहत की साँस ली। गेहूँ के दानों से अभी उसे कुछ और कंकड़ चुनने थे। मन ही मन खुश थी। होलू के सोचने के गुण पर। सच तो यह भी है कि वह होलू की अगली सोच के पंख लगाए किस्से को सुनने के लिए अभी से उत्सुक थी। उत्सुक तो यूँ आप भी नजर आ रहे हैं। पर अभी थोड़ा सब्र करना होगा।

- दिविक रमेश

निष्कर्ष; "होलू का दिमाग चलता है" केवल एक मनोरंजक बाल कहानी नहीं, बल्कि बच्चों की कल्पनाशीलता, जिज्ञासा और सकारात्मक सोच का सुंदर चित्रण है। यह कहानी संदेश देती है कि नए प्रश्न पूछना, अलग ढंग से सोचना और दूसरों के प्रति संवेदनशील होना ही सच्ची सीख है।

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