“Budha Gudda” is a delightful Hindi children’s poem by Suryakumar Pandey. With gentle humor, playful imagination, and a charming portrayal of an old toy, the poem brings a smile to young readers. It was published in Dharmayug on 29 August 1976.
Budha Gudda Hindi Children’s Poem by Suryakumar Pandey | Old Doll Poem
सूर्यकुमार पांडेय की यह बाल कविता ‘बूढ़ा गुड्डा’ बच्चों के खेल-खिलौनों की दुनिया में हास्य और कल्पना का सुंदर रंग भरती है। गुड्डे के बुढ़ापे का चुटीला चित्रण बच्चों को सहज ही गुदगुदाता है और कविता को रोचक बनाता है। प्रस्तुत है यह मनोरंजक बाल कविता।
सूर्यकुमार पांडेय की प्रसिद्ध बाल कविता
बूढ़ा गुड्डा
था पहले यह कितना छोटा,
हट्टा-कट्टा, मोटा-मोटा।
मगर हो गया है अब बुड्ढा,
मेरी इस गुड़िया का गुड्डा।
दांत गिर गए मुंह से सारे,
कांप रहा सर्दी के मारे।
सनई जैसे बाल हो गए,
पिचके- पिचके गाल हो गए।
यह हरदम बैठा रहता है,
मेरी गुड़िया से कहता है—
आज चटपटी चीज बनाओ
सुंदर-सा पकवान खिलाओ।
काम न करता इक्का-दुक्का
गुड़-गुड़ करता रहता हुक्का।
- सूर्यकुमार पांडेय
निष्कर्ष : ‘बूढ़ा गुड्डा’ अपनी सहज भाषा, हास्यपूर्ण चित्रण और बालमन की कल्पनाशीलता के कारण आज भी आकर्षक लगती है। गुड्डे के बुढ़ापे का मजेदार वर्णन बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने के साथ कविता को जीवंत बना देता है। सूर्यकुमार पांडेय की यह बाल कविता ‘धर्मयुग’ में 29 अगस्त 1976 को, पृष्ठ 52 पर प्रकाशित हुई थी। इतने पुराने समय में प्रकाशित होने के बावजूद कविता की बालसुलभता और मनोरंजन आज भी बरकरार है।
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