बालसाहित्य के आईने में मंथन : विचार, विमर्श और निर्भीक पड़ताल

Dr. Mulla Adam Ali
0

This book offers a candid and thought-provoking exploration of Hindi children's literature, its achievements, challenges, contradictions, and possibilities. Through 45 insightful episodes, Dr. Surendra Vikram raises important questions and encourages critical reflection on the growth and direction of children's literature. The work is not merely a collection of opinions but an invitation to think, debate, and contribute to a healthier literary environment.

Hindi Children’s Literature: Critical Reflections, Challenges and Perspectives

बाल साहित्य का सच एक यह भी है पुस्तक समीक्षा

बालसाहित्य केवल बच्चों के मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि उनके संवेदनात्मक, बौद्धिक और नैतिक विकास की महत्वपूर्ण आधारभूमि है। प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. सुरेन्द्र विक्रम ने बालसाहित्य की उपलब्धियों, विसंगतियों, चुनौतियों और संभावनाओं पर बेबाक एवं विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ की हैं। फेसबुक पर प्रकाशित 45 एपिसोड का यह संकलन बालसाहित्य की दशा-दिशा पर गंभीर मंथन के साथ-साथ आत्मावलोकन का अवसर भी प्रदान करता है। यह पुस्तक प्रश्न उठाती है, बहस को जन्म देती है और बालसाहित्य के स्वस्थ विकास के लिए निष्पक्ष आलोचना की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

हिंदी बाल साहित्य

अनेकानेक प्रश्न.. विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ… मंथन और मनन

फेसबुक, ट्विट्टर, ब्लॉग आदि पर अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का सार्थक उपयोग विश्व के सभी महान और दायित्वशील चिंतक- बुद्धिजीवी करते रहे हैं। जहाँ सोशल मीडिया के दुरुपयोग से दुनिया की अधिकांश आबादी परेशान है, वहीं फेसबुक को साहित्याभिव्यक्ति का मज़बूत पटल मानकर डॉ.सुरेन्द्र विक्रम जैसे प्रवीण आलोचक असीमित पाठकों, विद्वानों, साहित्यानुरागियों तक पहुँच जाते हैं। फेसबुक को साहित्यिक विचार-विमर्श का खुला मंच मानने के कारण आप निरंतर अपने साहित्यिक लेखन के साथ वर्षों से सक्रिय रहे हैं। उनकी इस सक्रियता में अटूट निरंतरता, अनवरत चिंतनशीलता एवं अथक उद्यम का आवेग है। यह हर्ष की बात है कि पिछले दिनों फेसबुक पर आप लगातार 45 एपिसोड तक बालसाहित्य के नाना पक्षों पर बेबाकी से अपने विचार रखते रहे हैं।   

बालसाहित्य विधा के अति गंभीर मुद्दों को फेसबुक के ज़रिए देश-दुनिया के कोने-कोने में स्थित पाठकों, आलोचकों, विचारकों तक पहुँचाने में आपका यह प्रयास सराहनीय ही नहीं बल्कि अमूल्य भी माना जाएगा। इसका कारण यह है कि अक्सर फेसबुक पर चलताऊ, सस्ती और अगंभीर रचनाओं को अपलोड करके कवि, लेखक, गज़लकार होने का श्रेय लेने वालों की कतार बदनाम है। वहीं हिन्दी का यह समीक्षक गंभीर चिंतन, गहन आकलन तथा वैचारिक ऊष्मा के बल पर फेसबुक पर बालसाहित्य के इतिहास, विकास, उतार-चढ़ाव, गति-प्रगति, अवनति के कारणों, प्रक्रियाओं व परिणामों को खँगालने और विश्लेषण करने का श्रेय पा रहा है। 

डॉ. विक्रम ने इन पूरे 45 एपिसोड को पाठकों, प्रशंसकों, शुभचिंतकों व समालोचकों की माँग से स्वीकार करते हुए पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित कर इसके उचित व स्थायी दस्तावेजीकरण का निर्णय लिया है। पुस्तक के रूप में यह सामग्री अपनी बेबाकी और बेलौसपन में अद्वितीय है, क्योंकि आपने फेसबुक पर जिस खुले अंदाज़ व साहित्यिक मिजाज़ में बालसाहित्य के बाधक तत्त्वों को आड़े हाथों लिया, वह निर्भीक अभिव्यक्ति और बतकही का रस इस पुस्तक में भी दृष्टिगोचर होता है। यह ग्रंथ बालसाहित्य के बाधक और साधक तत्त्वों को एक-एक कर परखता है। उनकी तह तक जाकर डॉ. विक्रम उन कारणों, स्थितियों का परीक्षण करते हैं, जो बालसाहित्य के पिछड़ने या उसकी उन्नति के लिए जिम्मेदार रहीं। आपने अपनी टिप्पणियों को मज़बूत धरातल देने के लिए डाॅ. मस्तराम कपूर, डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे, डाॅ. इंद्रसेन शर्मा, निरंकारदेव सेवक जैसे विलक्षण विचारकों व बालसाहित्यकारों के मतों का आश्रय लिया है। 

डॉ. विक्रम ने उन चुनौतियों का खुले मन से स्वागत किया, जिन्होंने बालसाहित्यकारों को प्रतिष्ठित होने में चरम बाधा उत्पन्न की। जैसे इधर-उधर से सामग्री बटोरकर बिना वैज्ञानिक ज्ञान के विज्ञान बाललेखक बनने का दंभ पालने वाले साहित्यकार या फिर संपादक द्वारा बाल रचना न छापकर लौटा देने पर उसमें व्याप्त त्रुटियों पर साधना न कर उल्टे उस संपादक के नाम फूहड़ बातें लिखना या फिर किसी संस्था द्वारा सम्मान समारोह में नामित न होने पर किसी बालसाहित्यकार द्वारा उस संस्था के पदाधिकारियों को शाप देना आदि आदि।

डॉ. विक्रम ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, एनसीईआरटी, चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा बालसाहित्य के प्रकाशन और प्रसार के लिए किए गए महत्वपूर्ण कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। आप मानते हैं कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने नेहरू बालपुस्तकालय योजना के अंतर्गत विपुल मात्रा में बालसाहित्य प्रकाशित किया है। इस योजना में हर वर्ग के बालसाहित्य को शामिल किया गया है। बच्चों के लिए मनमोहक अनेक चित्रकथाओं को भी आकर्षक साज-सज्जा के साथ प्रकाशित किया गया है। हिन्दी भाषा में प्रकाशित पुस्तकों का अनेक भाषाओं में अनुवाद भी समय-समय पर लगातार होते रहते हैं। हाल ही में अनेक राज्यों की सरकारी खरीद में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित पुस्तकों ने रिकॉर्ड भी बनाया है।

डाॅ. विक्रम जानते हैं कि बालसाहित्यकारों की उपलब्धियों व उनकी कमियों पर खुलेआम बात करना चुनौतीपूर्ण व खतरों से भरा रहा है। इसलिए गहन शोध, तलस्पर्शी विश्लेषण, लगातार कई वर्षों के सतत अध्ययन के आधार पर आप इस प्रकार की टिप्पणियाँ व मंतव्य इतने आत्मविश्वास के साथ कर पाते हैं। आप कहते हैं कि महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकांश बालसाहित्यकार खुद आलोचना से न केवल दूरी बनाकर रखते हैं बल्कि खरी-खरी लिखने वालों से दुश्मनी भी ठान लेते हैं। इसका कारण यह है कि उनकी रुचि केवल प्रशस्तिवाचन में ही होती है। ऐसे लोग कहीं से भी और किसी से भी अपनी प्रशंसा और पुस्तक की प्रशंसात्मक समीक्षा लिखवाकर फेसबुक पर लगाने को ही इतिश्री मान लेते हैं। ऐसे लोगों को अपने अतिरिक्त कोई दूसरा दिखता भी तो नहीं है। यह बात बिल्कुल सही है कि हिन्दी बालसाहित्य में आलोचना की न तो कोई स्वस्थ परंपरा है और न ही इसका व्यवस्थित स्वरूप। जब बालसाहित्य में आलोचना की यह हालत है तो कई वर्षों से इसके इतिहास लेखन को लेकर दंभपूर्वक गर्वोक्तियाँ करना कहाँ तक उचित है? यही नहीं पहले तो यह गर्वोक्ति केवल एक पुस्तक तक ही सीमित थी अब उसे बढ़ाकर एक, दो, तीन नहीं कुल चार पुस्तकों में आना बताया जा रहा है।

सुरेन्द्र विक्रम की नई किताब बाल साहित्य का एक सच यह भी है

दशकों पहले आप साहित्यकारों द्वारा पोस्टकार्ड पर नवोदित रचनाकारों, मित्र साहित्यकारों और विचारकों को अपने विचार व शुभकामनाएँ भेजने की परंपरा को याद करते हुए गद्गद होते हैं। अपनी छात्रावस्था में नारायणलाल परमार, धमतरी द्वारा भेजे गए पोस्टकार्ड द्वारा मिली शुभकामनाओं का स्मरण करते हुए आप भावुक हो जाते हैं। पर बालसाहित्य के नाम पर कमाने-खाने वालों की स्वार्थपरता पर निशाना साधते हुए आपका स्वर काफी तीखा हो जाता है। जैसे–

‘मुझे यह कहने में कोई नहीं है कि बालसाहित्य के नाम पर जगह-जगह घूमकर कमाने-खाने वाले कुछ लोगों ने अपने लाभ के लिए इसका बहुत नुकसान किया है। केवल मैं ही सब जगह दिखाई दूँ। सरकारी स्तर पर मेरी ही पुस्तकें छपे, सभा-संगोष्ठियों में हमारी ही जय-जयकार हो, भरे-पूरे मंच पर अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, संचालक और वक्ता एक ही व्यक्ति हो… है ना मज़ेदार बात! संभवतः पढ़ने में भले ही अटपटा लगे लेकिन यह नई दिल्ली में कई बार हो चुका है अर्थात मैं ही मैं हूँ… तो ही बाल साहित्य का अस्तित्व है। इसके लिए चाहे जितना और जहाँ तक जुगाड़ लगाना पड़े, कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। हमारे देश में तो लगातार पूजने से देवता भी पिघल जाते हैं, फिर मनुष्य की क्या औकात है।’

डॉ. विक्रम ने बाल साहित्य लेखन के संदर्भ में मेरिट पर मिलने वाले सम्मान, पुरस्कार, संगोष्ठियों व कार्यशालाओं के लिए आमंत्रण, पाठ्यक्रम में रचना शामिल होने को चुनौती के बावजूद सुखद और हर्षदायक घोषित करते हैं। आप स्पष्ट करते हैं कि बालसाहित्य लेखन, सृजन, संपादन के साथ-साथ यदि समीक्षा व आलोचना का संबंध विच्छेद हो जाए तो स्थिति चिंताजनक हो जाएगी। इसका कारण यह है कि इसके दुष्परिणामों के रूप में ऐसे लोगों की भीड़ लग जाएगी जो अत्यंत हल्का साहित्य लिखकर पुरस्कार झटक ले जाते हैं और धीरे-धीरे मेरिट के आधार पर दिए जाने वाले पुरस्कारों का बेड़ा गर्क कर देते हैं। आप एनसीईआरटी द्वारा हिन्दी साहित्य सहित अन्य भारतीय भाषाओं के बालसाहित्य पर दिए जाने वाले पुरस्कार तथा भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों को इन जोड़-तोड़ में माहिर तथाकथित बालसाहित्यकारों के कारण बंद करने की दुखद स्थिति की घोर निन्दा की है। आप कड़े शब्दों में ऐसे बालसाहित्यकारों की धज्जियां उड़ाते हैं, जिनके कारण गंभीर बालसाहित्य लिखने के लिए अथक श्रम करने वाले लेखकों को वंचना का शिकार होना पड़ता है।

कुछ दशकों पूर्व की उस कटु स्थिति से आप पर्दा उठाते हैं जब बालसाहित्यकार का ठप्पा लगने के भय से कई साहित्यकार बालसाहित्य के नाम से बिदकते थे। महाविद्यालय व विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में बालसाहित्य को जोड़ने के नाम पर नाक- भौं सिकोड़ने वाले प्रोफेसरों को डॉ.विक्रम की हठधर्मिता के समक्ष एक न एक दिन झुकना ही पड़ा। आपकी ज़िद और संकल्पशक्ति के फलस्वरुप बालसाहित्य को बहुत ऊँचे स्तर पर देखने की अवधारणा बनी। आपने उस मुश्किल दौर पर आई प्रत्येक अड़चन और उस सहयोग को ईमानदारी से उक्त पुस्तक में दर्ज किया है, जिन्होंने एक ओर आपके लिए चुनौतियों को कठिन से कठिनतर बनाया तो दूसरी ओर आपको प्रोत्साहन, सहयोग व स्वीकृति दी। 

आप कहते हैं कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बालसाहित्य की दिशा में काम तो लगातार वर्षों से हो ही रहा था, लेकिन उसकी मुकम्मल पहचान नहीं बन पा रही थी। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि कुछ लोग बालसाहित्य को बिना पढ़े, उसके इतिहास को जाने बिना फतवे जारी कर देते थे। अकादमिक स्तर पर तो बालसाहित्यकार को ऐसा दुरदुराया जाता था कि जैसे बालसाहित्य का नाम लेना ही गुनाह है। आज से 40-45 वर्षों पूर्व मैं स्वयं इसका साक्षी रहा हूँ। मज़ेदार बात यह है कि बालसाहित्य को दुत्कारने वाले यह भूल जाते थे कि वे भी कभी बच्चे थे और उन्होंने बालसाहित्य पढ़कर ही अपने जीवन की यात्रा शुरू की थी।

आपने बालसाहित्य पर आधारित अपनी किताबों का निरंतर परिमार्जन, परिवर्धन करते हुए उनमें अद्यतन सामग्री व जानकारी जोड़कर उनके पुनर्प्रकाशन की कथा-यात्रा भी पाठकों से साझा की है। आपने ज़िद्दी व अज्ञानी पंडितों के सवालों, आपत्तियों और मिथ्यारोपों का प्रामाणिक तथ्यों के साथ बिना लाग लपेट के निर्भीकतापूर्वक जवाब दिया है। जैसे आपने अपनी शोधपरक जानकारी के आधार पर आरंभिक सीरीज में लिखा था कि स्नातकोत्तर स्तर पर सबसे पहले बालसाहित्य और बालपत्रकारिता को पाठ्यक्रम के रूप में मान्यता कोटा मुक्त विश्वविद्यालय, राजस्थान से ही प्राप्त हुई, परंतु इस पर मात्र प्रतिभा प्रदर्शन के मोहग्रस्त होकर किसी तथाकथित ज्ञानी ने आपत्ति उठाई थी। आपने अपने अगले सीरीज में पूरी प्रामाणिकता के साथ उनके दावे को खारिज करते हुए अपनी जानकारी को सही और ठीक-ठाक ठहराया। आप दुख जाहिर करते हुए लिखते हैं कि हिन्दी ही नहीं दुनिया के किसी भी भाषा साहित्य की आलोचना में बालसाहित्य को गंभीरतापूर्वक नोटिस नहीं लिया गया। इसका एक अप्रिय कारण यह भी है कि बालसाहित्यकार स्वयं अपनी आलोचना से बिदकते हुए दूरी बना लेता है। हिन्दी बालसाहित्य आलोचना में इतिहास लेखन की किसी व्यवस्थित परंपरा के अभाव, खालीपन को सटीक तथ्यपूर्ण सामग्री से भरने में आपका अनवरत श्रम, नाना विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों और साहित्य प्रेमियों के साथ निरंतर गंभीर विचार-विमर्श के फलस्वरूप दिए गए योगदान का खाका आपके इन आलेखो में प्रतिबिंबित हुआ है। 

'बाल साहित्य की बहुमंज़ली इमारत' के अंतर्गत आपने मंजि़ल-दर-मंज़िल… कदम-दर-कदम बालसाहित्य पर रचित आलोचना लेखन के इतिहास को खँगालते हुए उन पत्रिकाओं का ज़िक्र किया जिनमें आहिस्ते-आहिस्ते बालसाहित्य पर समीक्षाएँ व आलोचनाएँ प्रकाशित होने लगीं। आप मानते हैं कि बालसाहित्य पर रचित आलोचना ने बालसाहित्यकारों को प्रोत्साहित करते हुए उनकी कमियों पर प्रश्न जोड़े हैं। अपने साहित्यकार मित्रों से समय-समय पर हुई बातचीत का ज़िक्र करते हुए आपने लिखा है कि बालसाहित्य की रचना में धैर्य ज़रूरी है क्योंकि बालसाहित्य सृजन व समर्पण पहले है, रॉयल्टी तो उसके बाद आती है। बाल अधिकार संरक्षण आयोग, नई दिल्ली तथा विदेश मंत्रालय द्वारा बालसाहित्य पर दिए गए प्रोजेक्ट का बालसाहित्य लेखन तथा बालसाहित्य के इतिहास लेखन पर पड़ने वाले नानाविध प्रभावों का आपने विस्तारपूर्वक ज़िक्र किया है।

आपने प्रकाशक और बालसाहित्यकार के बीच के संबंधों की खटास-मिठास तथा नि:शुल्क प्रतियाँ लेखक को देने से लेकर रॉयल्टी जैसे मुद्दों पर भी बेबाकी से लिखा है। खास बात यह है कि आपके ये विचार सुने-सुनाए प्रसंगों की नींव पर निर्मित नहीं हुए बल्कि पिछले चार दशकों से बालसाहित्य के रचना-संसार में अत्यंत सक्रिय, जागरुक और सकारात्मक रवैये के साथ रहने के फलस्वरुप आपने अपने संज्ञान में आई घटनाओं, मामलों, उतार-चढ़ावों को समझ-परखकर इन लेखों को लिखा है। इसलिए आप बालसाहित्य को उसकी खूबियों के साथ इन लेखों में उभारते हैं जो इसे अन्य साहित्यिक विधाओं व क्षेत्रों से विशेष बना देता है। बालसाहित्य में मठाधीशी, तकनीकी समझौता, परिवारवाद, पाठ्यपुस्तकों की अराजकता, प्रशस्तिवाचन, घातक प्रवृत्तियाँ, तालमेल का अभाव, खिलवाड़ की दुष्प्रवृत्ति, घालमेल जैसे संवेदनशील विषयों पर आपने खुलकर लिखा है। आपकी भाषा की साफगोई आपके आत्मविश्वास से ऊर्जा ग्रहण करती है। आपका आत्मविश्वास बालसाहित्य आलोचना, इतिहास व लेखन के क्षेत्र में आपकी गहरी पकड़ के बल पर निर्मित हुआ है। अतः इन मुद्दों पर आपने जानबूझकर लिखा ताकि फेसबुक के खुले पटल पर साहित्यकारों व बालसाहित्य प्रेमियों, जानकारों के बीच विचारों का आदान-प्रदान सक्रिय हो सके। आप बालसाहित्य के विकास के लिए अभिव्यक्ति के इस पुल को गढ़ना अत्यावश्यक मानते हैं, जिससे बालसाहित्य से जुड़े नानाविध अपवाद व अप्रासंगिक मिथ्या धारणाओं की खाई को पाटा जा सके। 

डॉ. विक्रम की यह पुस्तक आम आलोचनात्मक ग्रंथों से बिलकुल भिन्न है, क्योंकि यह कभी डायरी का आकार लेती है तो कभी संस्मरण का, कभी निबंध का स्वरूप ग्रहण करती है तो कभी इतिहास का, कभी विशेषांकों का जायज़ा लेती है तो कभी खंडन-मंडन के तार जोड़ती है। आपने अपनी माटी, मधुमती, कथा, चाणक्य वार्ता, प्रेरणा अंशु, साक्षात्कार तथा साहित्य अमृत जैसी पत्रिकाओं के बालसाहित्य विशेषांकों का तलस्पर्शी आकलन करते हुए बालसाहित्य में इनकी महती भूमिका प्रतिपादित की है। आपने हिन्दी बालसाहित्य के प्रथम शोधकर्ता और विशिष्ट बालसाहित्यकार डॉ.हरिकृष्ण देवसरे के महत्वपूर्ण योगदान, अथक श्रम, अनवरत चेष्टाओं के द्वारा हिन्दी बालसाहित्य को मुख्यधारा में लाने के प्रयासों का भी विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. विक्रम की जितनी भी पुस्तकें देखी जा सकती हैं, उन्होंने सभी में डॉ.हरिकृष्ण देवसरे के बालसाहित्यकार के रूप में अमूल्य रचनाधर्मिता का बहुत निष्ठापूर्वक आकलन किया गया है। कदाचित डॉ.हरिकृष्ण देवसरे आपके प्रिय बाल साहित्यकारों में से एक हैं। पुस्तक के अंत में आशा पांडेय ओझा को दिया गया आपका लंबा साक्षात्कार बालसाहित्य व हिन्दी साहित्य के नाना पक्षों से आपके दीर्घ चार दशकों के सक्रिय जुड़ाव, सिहांवलोकन तथा अनुभव का निचोड़ प्रस्तुत करता है। 

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि यह पुस्तक आज की तारीख में बालसाहित्य की दीर्घ यात्रा के अलग-अलग पड़ावों, उपलब्धियों और खामियों और इसके प्रति समर्पित तथा निष्ठावान बाल साहित्यकारों की अक्लांत लगन को देखने का एक सशक्त जरिया बनी है। यह पुस्तक डॉ.विक्रम की अन्य पुस्तकों से थोड़ी अलग इसलिए भी कही जा सकती है क्योंकि इसमें वह निरंतरता नहीं है जो एक साधारण पुस्तक में अध्याय-दर-अध्याय मिलती है। वास्तव में फेसबुक पर प्रत्येक एपिसोड के पश्चात आपके पाठकों, जानकारों, मित्रों ने जिस प्रकार के प्रश्न एवं टिप्पणियाँ उस एपिसोड विशेष के विषय में की, आपका अगला एपिसोड कहीं न कहीं उससे प्रभावित रहा और अपनी तरफ से आपने उन प्रश्नों, शंकाओं, आपत्तियों एवं टिप्पणियों का उत्तर देने का भरसक प्रयास किया। 

अब ये 45 एपिसोड पुस्तकाकार रूप में पाठकों के हाथों में आने पर उसमें सम्मिलित लेखों में कई बार कुछ नए विषय सामने मिलते हैं, तो कई बार एक लेख का दूसरे लेख से संबंध विच्छेद हो जाता है। साहित्य प्रयोग का क्षेत्र है। इसमें नित्य नवीन प्रयोग होते रहते हैं। अतः डॉ.विक्रम की फेसबुक पर लिखी गई अपनी विचार-श्रृंखला को पुस्तक के रूप में पाठकों के हाथों में सौंपना भी निश्चित रूप से एक सफल-सार्थक प्रयोग के रूप में ही देखा जाएगा। इस पुस्तक के प्रति मैं अपनी अनंत शुभकामनाएँ देती हुई बालसाहित्य के क्षेत्र में आपके सक्रिय योगदान और तत्परता के प्रति अशेष अभिनंदन करती हूँ।

- डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी
 सह-प्राध्यापक, गोखले मेमोरियल गर्ल्स कॉलेज,
कोलकाता, मोबाइल 9433 675 671

निष्कर्ष; कुल मिलाकर, यह पुस्तक बालसाहित्य की उपलब्धियों के साथ-साथ उसकी विसंगतियों, चुनौतियों और अंतर्विरोधों को सामने लाने वाला एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज है। डॉ. सुरेन्द्र विक्रम की निर्भीक टिप्पणियाँ पाठक को केवल सहमत होने के लिए नहीं, बल्कि सोचने, प्रश्न करने और आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करती हैं। बालसाहित्य को स्वस्थ, समृद्ध और अधिक सार्थक बनाने की दिशा में यह पुस्तक निश्चित रूप से विचार-विमर्श को नई ऊर्जा प्रदान करती है।

ये भी पढ़ें; 'हिंदी बालसाहित्य : समीक्षा के निकष पर' – प्रो. सुरेंद्र विक्रम की पुस्तक का समीक्षात्मक आकलन

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top