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मेरी कविताएं: निधि मानसिंह

निधि "मानसिंह"
एम. ए. हिन्दी
कैथल हरियाणा
खुले गगन के पंछी
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हम पंछी खुले गगन के
पिंजरे में न रह पायेंगे।
यूं पिंजरे से टकराकर,
सुन्दर पंख टूट जायेगें।

हम नदियां जल पीने वाले
भूखे प्यासे मर जायेंगे।
यूं पिंजरे से टकराकर
सुन्दर पंख टूट जायेगें ।

कितने थें अरमान हमारे?
नील गगन में उड़ते जाये
कैद हमें तुम कर लोगे तो,
कैसे दाना चुग पायेंगे?

यूं पिंजरे से टकराकर
सुन्दर पंख टूट जायेगें ।

घोंसला न दो चाहे टहनी का
घरौंदा तोड़ डालों ।
पंख दिये है तो, उडने दो
इसमें बांधा ना डालों।

पंख पाकर भी, हम उड ना पाये
तो हम मर जायेंगे।
हम पंछी खुले गगन के
पिंजरे में न रह पायेंगे।

खुद की तलाश
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मै! खुद को तलाशती हूँ
और फिर छोड़ देती हूँ।
हर रोज अपनी जिंदगी का
एक पन्ना मोड़ देती हूँ ।
जिंदगी के सभी ख्वाब
अधूरे हैं मेरे,
ख्वाबों का घरौंदा बनाती हूँ
और फिर तोड़ देती हूँ।
सफर लंबा है मजिंल दूर है
अनजानी राहों पर मै,
चलना छोड़ देती हूँ।
ये मेरा दिल अकेला
ही निकल पड़ा तलाशने
खुद को
नहीं मिलता जब कुछ,
तो खुद को ही
झिंझोड देती हूँ ।
मै! खुद को तलाशती हूँ।
और फिर छोड़ देती हूँ ।

                                         ©® निधि "मानसिंह"