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लोकतंत्र के पतन को परिभाषित करनेवाला विभूति नारायण राय का उपन्यास - शहर में कर्फ्यू


‘शहर में कर्फ्यू’ – विभूति नारायण राय
(Shahar Mein Curfew - Vibhuti Narain Rai)

         ‘शहर में कर्फ्यू’ विभूति नारायण राय द्वारा लिखा गया उपन्यास है। “शहर में कर्फ्यू” (1986) सांप्रदायिकता को केंद्र में रख लोकतंत्र के पतन को परिभाषित करनेवाला राय का रिपोतार्ज शैली में लिखा गया उपन्यास है। उपन्यासकार बहुत ही मार्मिक ढंग से बाहुसंख्याक समुदाय के बीच अल्पसंख्याक समुदाय के भय का विवरण किया है। शहर में संप्रदाय के आधार पर आबादी की बंटना लोकतंत्र की छाती फटने जैसा है। छुरा व्यक्ति की ही नहीं, पूरे समाज की पसली में समा जाता है। सांप्रदायिक माहौल का जहर वृत्तान्त के द्वारा पूरी रचना में फैल जाता है। यह वर्णन काल कि सिफत है।

     1980 के दशक से हिंदू बुनियादपरस्ती के उत्कर्ष से अल्पसंख्याक और भी अधिक रक्षात्मक मुद्रा में आ गए। यह उपन्यास इलाहाबाद में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगे की पृष्ठभूमि में रचा गया है। इस उपन्यास का वर्ग-आधार ठीक-ठाक बुना गया है। हिंदू हो या मुसलमान दोनों संप्रदायों में निम्न मध्यवर्ग ही तबाह होता है। यह उपन्यास सबाल्टन की कहानी है- सबाल्टन के कमजोर आर्थिक आधार की कहानी। अल्पसंख्यक समुदाय के कमजोर की आर्थिक आधार को उपन्यासकार ने ठीक से उन्मोचित किया है। लोकतंत्र में मुसलमानों के जीवन की तंगी कर्फ्यू में और अधिक बदहाली का कारण बनती है। हाड़तोड़ मेहनत कर मुसलमान मुश्किल से दो जून खाना जुटा पाते हैं। उसमें कर्फ्यू से उत्पन्न कठिनाई जीवन को और नरक बना देती है। निम्न मध्यवर्ग के अल्पसंख्यक की कथा बुनने में स्थान संकोच के कारण सईदा के दांपत्य की कठिनाई का विवरण बहुत ही बेधक और मार्मिक बन पड़ा है। इस दुख के साथ ही दूसरा बड़ा दुख संडास का है। यह दोनों कठिनाइयां उस घर के बासिंदों का जीवन नरक-सा बना देती है। गाँव के फैलाव में यह अभाव नहीं रहता है। कर्फ्यू के समय संडास की समस्या को लाना एक कलात्मक सूझ है।

      गरीब के लिए कफन-दफन भी मुश्किल है। सईदा की बच्ची के अंतिम संस्कार के इर्द-गिर्द उपन्यास का सबसे मार्मिक प्रसंग रचा गया है। सईदा के परिवार का जीविका के लिए जद्दोजहद तथा अंतिम संस्कार की मानसिक यातना ने कथा को काफी मार्मिक बना दिया है।

     लोकतांत्रिक मूल्यों का ग्राफ ऐसे नीचे गिरा है कि वैमनस्य ही इन दोनों संप्रदायों को परिभाषित करने का व्यावर्तक लक्षण बन गया। बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब सांप्रदायिकता उभार पर आने लगी तब मुसलमानों की असुरक्षा भावना को देखा जाता है।

     विभूति नारायण राय ने अल्पसंख्याक मुसलमान संप्रदाय के दर्द का अध्ययन ‘शहर में कर्फ्यू’ में प्रस्तुत किया है। संघ परिवार वालों का ताना सुनकर वे और भी शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन हिलाने लगे। युवा मुसलमान धर्म में शरण ढूंढने लगे। गरीबी और उत्पीड़न से राहत वे इस्लाम में ढूंढने लगे।

     असल में अच्छा रचनाकार न हिंदू होता है न मुसलमान होता है। यदि वह मनुष्य नहीं है तो वह रचनाकार नहीं है। ईमानदारी रचनाकार की एक बड़ी विशेषता होती है। विभूति नारायण राय की यह ईमानदारी एक बहुत बड़ी ताकत है। कथाकार हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के बीच तटस्थ है। वह एक तटस्थ पर्यवेक्षक की तरह अमानुषिक कृत्य विवरण प्रस्तुत कर रहा है। इस रिपोतार्ज शैली ने ही कदाचित उसे प्रामाणिकता दी है।

     चूंकि मुसलमान अपेक्षया या कम संख्या में है और आर्थिक रूप से हिंदूओं की अपेक्षा काफी गरीब है, इस कारण झगड़ों-फसादों में मुसलमान ही अधिक हानि उठाते हैं। अधिकांश दंगों में हिंदूओं की अपेक्षा मुसलमान अधिक मरते हैं और हिंदूओं की तुलना में मुसलमानों के अधिक घर जलाए जाते हैं। बुनियादपरस्त हिंदू बार-बार पाकिस्तानी कहकर उन्हें ताना देते हैं। सांप्रदायिकता लोकतंत्र की छाती में एक दरार है। असल में धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र की आधारशिला है। जो लोकतंत्र धर्मनिरपेक्ष नहीं वह फांसी तंत्र बन जाता है। एक बहुलतावादी राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष हुए बिना न देश रह जाता है न राष्ट्र। सांप्रदायिकता से राष्ट्र की छाती फट जाती है। राय ने इस उपन्यास में हिंदू सांप्रदायिकता के संदर्भ में मुसलमानों की नियति का विवरण देते हुए दिखा है- “मसलन शहर का एक हिस्सा पाकिस्तान बन गया है और उसमें रहनेवाले पाकिस्तानी।“ ‘शहर में कर्फ्यू’ का निहितार्थ यही है।
डॉ. मुल्ला आदम अली

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