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द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत एवं मुस्लिम स्वायत्त प्रांतों की मांग

द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत एवं मुस्लिम स्वायत्त प्रांतों की मांग

         द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत (Two-nation theory) के जन्मदाता मोहम्मद इकबाल थे जो पहले ‘हिंदू है हम वतन है हिंदोस्तां हमारा’ का गायन करते थे लेकिन बाद में इन्होंने ‘मुस्लिम है हम वतन है सारा जहां हमारा’ की तान छेड़ी और कट्टरपंथी मुस्लिमों के अजीज बन गए। वस्तुतः मुस्लिम लीग की राजनीति को दार्शनिक आधार उन्होंने दिया और इनकी विचारधारा का जिन्ना पर भी काफी प्रभाव रहा। मुस्लिम विचारकों में मोहम्मद इकबाल का महत्वपूर्ण स्थान था, ये मूलतः कवि और दार्शनिक थे। सन् 1930 में ‘अखिल भारतीय मुस्लिम लीग’ (All-India Muslim League) के अध्यक्ष बने। सन् 1933 के बाद उनकी राजनीतिक विचारधारा का गहरा प्रभाव मुस्लिम मानस पर हुआ। भारतीय मुसलमानों को इकबाल ने दो प्रमुख विचार दिए- 1.द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत (Two-nation theory) 2.मुस्लिम बहुसंख्यक स्वायत्त प्रांत की परिकल्पना।

        इकबाल के मतानुसार- “इस्लाम किसी एक देश का धर्म नहीं है। वह भौगोलिक सीमाओं में आबद्ध धर्म नहीं है। जिस धर्म के लोग भाईचारे का व्यवहार केवल इस्लाम मानने वालों के साथ ही कर सकते हैं।“1  उनके अनुसार हिंदू और मुस्लिम मूलतः भिन्न राष्ट्र के रूप में रह रहे थे।

       इकबाल ने इस मत की समर्थन के लिए वे तर्क दिया करते थे कि –“हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, परंपराएं, साहित्य, अर्थव्यवस्था, पारंपरिक कानूनी व्यवस्था, उत्तराधिकार के नियम एवं विवाह की पद्धतियां मूलतः हिंदूओं से एकदम भिन्न है। इन्हीं भिन्नताओं के कारण हम उनसे पूर्णता स्वतंत्र है। केवल इतनी ही बातें नहीं हमारे राष्ट्रीय त्योहार, रूढ़ियां, वर्णमाला यहां तक कि हमारी भोजन पद्धतियां एवं वेशभूषा तक में मौलिक अंतर है”2  उनके अनुसार हिंदू और मुसलमान मूलतः भिन्न राष्ट्र के रूप में ही यहां है।

       सन् 1929, जनवरी में मोहम्मद इकबाल (Muhammad Iqbal) ने कहा था कि –“मैं वह दिन देख राह हूं जब पंजाब, उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत, सिंध एवं बलूचिस्तान विलीन होकर एक प्रांत में परिवर्तित हो जाएंगे। एक स्वायत्त प्रांत अंग्रेजों के अधीन अथवा अंग्रेजों कि अधीनता से मुक्त सम्पूर्ण स्वतंत्र प्रांत। इस प्रकार के स्वतंत्र प्रांत का निर्माण मेरी दृष्टि से भारतीय मुस्लिमों की अंतिम नियति है। कम से कम उत्तर, पश्चिमी के भारतीय मुसलमानों की तो यही नियति है। इस प्रकार अपने इस प्रांत में मुस्लिम अपने स्वतंत्र एवं सम्पूर्ण विकास के सभी अवसर पायेंगे और भारतीय राजनीति में उनका स्थान सुदृढ़ हो जायेगा। और वे उत्कृष्ट सीमा रक्षक के रूप में खुद को योग्य साबित कर सकेंगे। तब भारत के लिए विदेशी आक्रमण का भय नहीं रहेगा। वह आक्रमण चाहे विचारों का हो अथवा बंदूकों का।“3  इकबाल के यह विचारों में द्विराष्ट्रवाद की परिकल्पना और पाकिस्तान के बीज मिलते है। परंतु स्वायत्त प्रांत की उनकी कल्पना बाद के पाकिस्तान की कल्पना से एकदम भिन्न हैं। पाकिस्तान के समान एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उनकी स्वायत्त प्रांत की कल्पना नहीं है। उनकी कल्पना बहुसंख्यक स्वायत्त मुस्लिम प्रांत के रूप में है। लेकिन उनकी कल्पना के आधार पर ही भविष्य में अलग पाकिस्तान का निर्माण हुआ।

      सन् 1930 में लीग अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुए इकबाल ने मुसलमानों द्वारा अलग प्रांत की माँग को एकदम उचित ठहराया –“ यदि भारत के मुसलमान मुस्लिम भारत के निर्माण की बात करते हैं तो ऐसी मांग पूर्णतया न्याय संगत है।“4  उनके इन विचारों का स्वभावतः मुस्लिम मानस पर असर हुआ। सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक अलगाव तो पहले से ही मौजूद था। अब यह अलगाव को इकबाल ने दार्शनिक आधार भी प्रदान कर दिया था। इकबाल का यह आधार मुस्लिम जनमानस पर गहरा प्रभाव किया और भयंकर परिणाम विभाजन के रूप में सामने आया। 1930 तक आते-आते जिन्ना ने कांग्रेस से अपने को पूर्णतः अलग कर दिया था। 1930 के अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बंबई अधिवेशन में कांग्रेस तथा गांधीजी की जिन्ना ने कठोर आलोचना करते हुए गांधी जी के साथ किसी भी आंदोलन में शामिल होने से इनकार कर दिया।

      जिन्ना इंग्लैंड से लौटकर भारत आने के बाद से रे पूरी तरह बदले हुए थे, दूसरी ओर इकबाल की विचारधारा ने भी उन पर काफी प्रभाव डाला। इकबाल ने पहले खुद को बदला फिर जिन्ना को पूरी तरह से बदल दिया दोनों की विचारधारा ने एक दूसरे को प्रभावित किया। “इकबाल और जिन्ना कुछ समय तक राष्ट्रवादी धारा से भी जुड़े रहे। उन दिनों इकबाल ने यदि ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ जैसा गान रचा तो जिन्ना ने खिलाफत आंदोलन और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन के अधिकार का विरोध किया। किंतु जब तक उन्होंने यह भाषा बोली वह मुसलमानों की भावना से कट रहे। मुस्लिम समाज ने उन्हें नेता नहीं माना, किंतु जैसे ही इकबाल ‘मुस्लिम है हम सारा जहां हमारा‘ के रास्ते पर आए और जिन्ना ने द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत बोलने शुरू किया, वे रातों-रात मुस्लिम नेता बन गए।“5

संदर्भ;

  1. लियोनार्ड मोस्ले – द लॉस्ट डेज ऑफ ब्रिटिश राज – पृ-68
  2. वहीं – पृ-25
  3. मजूमदार.R.C. – स्ट्रगल फ़ॉर फ्रीडम- पृ-528
  4. दिनेश चतुर्वेदी – भारत का राष्ट्रीय आंदोलन एवं संवैधानिक विकास– पृ-272
  5. देवेंद्र स्वरूप – ‘मुहम्मद बिन कासिम से मुशर्रफ तक’- पाँञ्चजन्य – जनवरी,2002 में प्रकाशित-पृ-10

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