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Namita Singh ki Kahani Mushak: आतंकवाद के सच को व्यक्त करती कहानी मूषक

मूषक : नमिता सिंह

         नमिता सिंह द्वारा लिखी गयी कहानी ‘मूषक’ है। सांप्रदायिकता और आतंकवाद अब गाँव-शहर-देश की समस्या नहीं, सारे विश्व की समस्या बन चुकी है। धरती से लेकर पाताल तक मनुष्य जीवन सुरक्षित नहीं है। प्रस्तुत कहानी इसी बात को व्यक्त करती है। दंगे और दंगाइयों से अपने आप को बचाने की कोशिश में पंडित जी पहले घर बदलते हैं। बाद में शहर और उसके बाद देश, किंतु सब जगह उन्हें वही परेशानी होती है। सब जगह उन्हें हिंसा, अपहरण, आगजनी, एके-47, बम-विस्फोट करते आतंकवादी, सांप्रदायिकता दिखाई देती है। कहीं दंगाई, कहीं आतंकवादी! धरती के इस कोने से लेकर उस कोने तक, ऊपर से नीचे तक सभी जगह असुरक्षा बनी हुई है। जिंदा रहने के लिए व्यक्ति जगहे बदलता है किंतु आखिर में वह ‘चूहा’ हो जाता है और अपने ही बिल में सुरक्षा ढूंढने लगता है। पंडित जी का एक गली से दूसरे गली, शहर से गाँव, गाँव से सीधा विदेश चले जाते हैं। दंगाइयों से परेशान होकर। वहां पर भी उन्हें यही माहौल दिखाई देता है और अंत में वे कहते हैं “मरना ही है तो फिर अपने लोगों के हाथों ही मरना.. अपनी जमीन पर क्या बुरा है?” पंडित जी तन, मन, धन से बर्बाद हो जाते हैं। सुरक्षा उन्हें कहीं नहीं मिलती। नमिता सिंह (Namita Singh) वैश्विक होते दंगे, बम-विस्फोट, आतंकवाद के सच को कहानी में व्यक्त किया है। मानव जीवन हर जगह आतंकित होता जा रहा है।

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