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राही मासूम रज़ा के उपन्यास 'आधा गाँव' में विभाजन की त्रासदी


‘आधा गाँव’ – राही मासूम रज़ा

         सन् 1966 में राही मासूम रज़ा का उपन्यास ‘आधा गाँव’ प्रकाशित हुआ। ‘आधा गाँव’ उत्तर प्रदेश के एक गाँव गंगौली के वातावरण पर आधारित है। राही मासूम रजा ने गंगौली नामक अंचल विशेष की पूरी समस्याओं का चित्रण अपने उपन्यास में किया है और यह समस्याएँ है पाकिस्तान बनने की घोषणा से बदलती हुई मानसिक स्थिति, लोगों की बदलती हुई सोच और सांप्रदायिकता का जहर गंगौली के भोले-भोले मासूम लोगों के मन में फैलती सांप्रदायिक ताकतें।

      राही मासूम रजा ने अपने उपन्यास की भूमिका में लिखा है- “यह कहानी न कुछ लोगों की है, न कुछ परिवारों की। यह उस गाँव की कहानी भी नहीं है जिसमें इस कहानी के बुरे-भले पात्र अपने-आपको पूर्ण बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह कहानी न धार्मिक है, न राजनीतिक क्योंकि समय न धार्मिक होता है, न राजनीतिक.. और यह कहानी है समय ही है। यह गंगौली में गुजरने वाले समय की कहानी है।“ (1)

     जिस काल को इस उपन्यास में स्वीकार किया गया है उसमें विभाजन के कारण और विभाजन के बाद की मानसिकता और उनके सोचने की पद्धति को इसमें शब्द बद्ध किया गया है। संपूर्ण उपन्यास गंगौली के आधे गाँव मुस्लिम बस्ती (दक्षिण पट्टी और उत्तर पट्टी) से संबद्ध होने के कारण आधे गाँव की कथा है। इसी कारण इसमें मुस्लिम मानसिकता का ही चित्रण मिलता है। पर इसके साथ-साथ इन मुस्लिमों से संबंधित कुछ हिंदूओं की मानसिक स्थिति का भी पता चलता है। लेकिन जैसा कि रजा ने स्वीकार है स्वीकारा है कि यह समय की कहानी है और समय तो मानव मात्र का होता है, वह न तो हिंदू होता है न मुसलमान वह तो सबका सांझा होता है। साँझेपन की यह भावना जिस एकता की परिचायक है उस एकता की गहरी जड़े आधा गाँव में पाई जाती है। उपन्यास के असंख्य उद्धरण इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं- “वास्तव में गंगौली इतिहास से बेखबर है। इसे इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि कभी बरगद की ठंडी छांव में लेट कर अपने इतिहास के विषय में सोचें जो रामायण के आगे तक फैला हुआ है।“(2)

     गंगौली गाँव में मुसलमानों की अधिक संख्या है। यह गाँव दोनों तरफ सय्यदों के मकान है, बीच में जुलाहों के तथा अलग-अलग मोहल्लों में चमार, भर तथा अहिरों की आबादी है। गंगौली में रहने वाले मुसलमानों तथा हिंदूओं में सांप्रदायिक विद्वेष की भावना नहीं थी। वे परस्पर प्रेम भाव से रहते थे। एक-दूसरे के त्यौहारों में रुचि रखते थे। जहीर मियां ने मठ के लिए पाँच बीघे जमीन की माफी दे रखी थी। फुन्नन मियां ने मंदिर के लिए जमीन दी थी। हिंदू भी ताजिए में भाग लेते थे। हिंदू औरतें ताजिए के नीचे से अपने बच्चे को निकाल कर उनके स्वास्थ्य के प्रति निश्चित हो जाती थी। दोनों ही सांप्रदाय एक-दूसरे के दुःख-सुख में सहारा बनते थे। फुन्नन मियां की लड़की ‘रजिया’ के देहांत के बाद उसके ताबूत को कंधा फुन्नन मियां, ठाकुर पृथ्वीपाल सिंह, झिंगुरिया तथा अनवारूल हसन ने दिया था। ठाकुर कुमार पाल सिंह का पूरा परिवार उस जनाजे में शामिल था। लाश को कब्र में उतारने के लिए पृथ्वीपाल यह कह कर गड्ढे में उतरते हैं- “हम उतारे क्या अपनी बहन को।“(3)  क्या यह सांप्रदायिक सद्भाव का जीता-जागता उदाहरण नहीं है। वास्तव में वहां किसी अलग संप्रदाय की परिभाषा ही न थी। सब एक थे। दो ही वर्ग थे जमींदार और रियाया।

     कुछ दिनों से विभाजन की चर्चा होने लगी थी, ‘पाकिस्तान’ नाम उभर कर सामने आने लगा था। लेकिन गंगौली वालों को इस बारे में कुछ पता नहीं था। पाकिस्तान क्या चीज है, उसका स्वरूप क्या है, इस बारे में अनभिज्ञ थे। पाकिस्तान का नाम गंगौली वासियों ने जरूर सुन रखा था। उसकी रूपरेखा अस्पष्ट होने के कारण उनकी उसमें कोई रुचि नहीं थी। कुछ समय पश्चात राजनीतिक गतिविधियां तेज होने के कारण ‘गंगौली’ पर भी इसका प्रभाव लक्षित होने लगा।

     लेखक स्पष्ट संकेत देता है- “इधर कुछ दिनों से गंगौली में गंगौलीवालों की संख्या कम होती जा रही है और सुन्नियों, शिओं और हिन्दुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। शायद इसलिए नूरुद्दीन शहीद की समाधि पर अब उतना बड़ा मजमा नहीं लगता और गंगौली का वातावरण ‘बेल महमदी या हुसैन’ की आवाज से उस तरह नहीं गूँजता, जिस तरह कभी गूँज उठा करता था।“(4)  अप्रत्यक्ष रूप से ही सही ‘गंगौलीवासी’ समाज में फैले विद्वेष से प्रभावित हो रहे थे। यह उद्धरण न केवल गंगौली की आम मानस की कथा का भी परिचायक है, लेकिन इसके बावजूद देश में भयानक दंगे हुए जिनका चित्रण इस उपन्यास में भी हुआ है।

     वस्तुतः यह दंगों के पीछे अलगाववादी प्रवृत्तियाँ कार्य कर रही थी; जिन्होंने लोगों के दिलों में विभाजन पैदा करके मुल्क को भी विभाजित कर दिया। एक ओर जहाँ गंगौली में एकता के सूत्र विद्यमान थे, वही दूसरी ओर अलगाव फैलाने का कार्य दोनों ओर की प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ कर रही थीं। इस छोटे से गाँव के कुछ लड़के पढ़-लिखकर उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ जाने लगे। अलीगढ़ उन दिनों उत्तरप्रदेश के अमीर मुस्लिमों और लीग के प्रचार का प्रमुख था। यही से अलगाव की प्रवृत्तियाँ फैलने लगी। इसकी गवाही उस समय का इतिहास देता है। इन गतिविधियों से धीरे-धीरे गंगौली का वातावरण भी प्रभावित होने लगा था। इतिहास से बेखबर इस देहात में धीरे-धीरे उस समय की राजनीतिक हलचलों की लहरें उठने लगी थी। इस गाँव का युवक अब्बास अलीगढ़ पढ़ने गया और वहाँ से ढ़ेर सारी कहानियाँ गाँव लाने लगा। छुट्टियों में गाँव आने पर वह अपनी किस्से कहता,राजनीति समझाता। यहीं से अलगाव और विभाजन के कीटाणु फैलने लगी। मध्यवर्गीय मुस्लिम अपने फायदे के लिए आम मुस्लिमों को बड़े ही भावुक और अंधश्रद्धा से भरे हुए तर्क देता था।

     “हिंदुस्तान(India) के दस करोड़ मुसलमान कायदे-आजम के पसीने पर अपना खून बहा देंगे... ये बातें न गफूरन की समझ में आती न सितारों की। अशिक्षित आम-मुस्लिम पुरूष और स्त्रियाँ बस इतनी ही कहती; अब मियाँ आप पढ़े-लिखे हैं ठीक ही कहते होंगे।“(5)

     गंगौली के लोगों के समझ में नहीं आ रहा था कि मुसलमानों को अलग वतन की जरूरत क्यों आन पड़ी है। पाकिस्तान का निर्माण तथा ‘मुस्लिम लीग’ उनके समझ के बाहर की चीज थी। ‘पाकिस्तान’ चले जाने से उनका विकास किस तरह से होने लगेगा.? यह उनके लिए अबूझ पहेली थी। फुन्नन मियां पाकिस्तान का पुरजोर विरोध करते हुए कहता है- “कही इस्लामु है कि हुकूमत बन जैयहें! ऐ भाई, बाप-दादा की क़बूर हियाँ है, चौक इमामबाड़ा हियाँ है, खेत-बाड़ी हियाँ है। हम कोनो बुरबक है कि तोरे पाकिस्तान जिंदाबाद में फँस जायँ।“(6)

     देश भर में दंगे हो रहे थे। कलकत्ता तथा बिहार दंगों की बातें ‘गंगौली’ में फैली जाती हैं। धर्म के नाम पर सब जगह सांप्रदायिक उन्माद फैल चुके थे, यहाँ मुसलमानों को भी भड़काया जा रहा था, फुन्नन मियां की समझ में नहीं आ रहा था कि सैकड़ों वर्षों पहले मुसलमान शासकों द्वारा किए गए अत्याचार का बदला अब क्यों लिया जा रहा है। कलकत्ता के मुसलमानों का बदला बारिखपुर के मुसलमानों से क्यों लिया जा रहा है! इन परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ हिन्दू तथा मुसलमान मिलकर बारिखपुर के मुसलमानों की रक्षा का बीड़ा उठाते है।

     संप्रदायिकवादियों के भड़काने पर भी ‘छिकुरिया’ पर किसी बातों का कोई असर नहीं होता है। वह कहता है कि किसी औरंगजेब को नहीं जानता, जरूर कोई बदमाश होगा। वह जहीर मियां, कबीर मियाँ फुस्सु मियां और अनवारुल हसन को जानता है। ‘छिकुरिया’ मानता है कि जिसके पास जमींदारी होती है, वही जुर्म करता है। गंगौलिवासियों का मानना है कि जिनके साथ उन्होंने सुख-दुःख देखे है, आज उन्हीं का घर वो कैसे जला सकते हैं और घर जलाने का कोई कारण भी नहीं है। सांप्रदायिक ताकतें तमाम कोशिशों के बाद भी ‘गंगौली’ में पूर्णतः विभाजक रेखा नहीं खींच पाते। पाकिस्तान निर्माण किसी दुःस्वप्न से कम नहीं था। तन्नू अपने मनोभावों को व्यक्त करता है- “नफरत और ख़ौफ की बुनियाद पर बनने वाली कोई चीज मुबारक नहीं हो सकती। पाकिस्तान बन जाने पर भी गंगौली यहीं हिंदुस्तान में रहेगा और गंगौली फिर गंगौली है।“(7)

     पाकिस्तान निर्माण के पक्ष में गंगौली के मुसलमान भले ही नहीं थे लेकिन पाकिस्तान बनने के पश्चात इसका असर ‘गंगौली’ पर भी पड़ा। कुछ लोगों को न चाहते हुए भी ‘पाकिस्तान’ जाना पड़ा। जमींदारों की जमींदारी खत्म होने के पश्चात उन्हें ‘हिंदुस्तान’ और ‘पाकिस्तान’ में कोई अंतर नहीं लगा। जीविकोपार्जन के लिए उन्हें मेहनत करनी ही थी फिर वह चाहें ‘गंगौली’ हो या ‘कराची’। विस्थापन ने कई तरह की ग्रंथियों को जन्म दिया।
     ‘लीग’ के दुष्प्रचार से ‘गंगौली’ के लोगों को जिस गुनाह की सजा मिली वह तो उन लोगों ने किया ही नहीं था। लीगियों ने सामान्य मुसलमानों के साथ धोखा किया। लीगियों ने पूरी तरह से वोट की राजनीति अपनायी, धर्म को ट्रम्प कार्ड की तरह प्रयोग किया। पीड़ित मुसलमानों का गुस्सा इन शब्दों में फूटकर बाहर आया- “इनके जिन्ना साहब तो हाथ झाड़ के चले गए कि हियां के मुसलमान जाएं, खुदा न करें जहन्नुम में। ई अच्छी रही। पाकिस्तान बने के वास्ते वोट दें हियां के मुसलमान अऊर जब पाकिस्तान बने त जिन्नावा कहे कि हियां के मुसलमान जायं चूल्हे भाड़ में।“(8)

     राही का उपन्यास ‘आधा गाँव’ वास्तव में उनके लिए एक ऐसा सफर था, जहाँ पर उन्होंने विभाजन के फलस्वरूप उत्पन्न मानव के अकेलापन, गरीबी, मजबूरी तथा उससे उत्पन्न गुस्से को देखा तथा शब्द चित्रों के माध्यम से पाठकों के सामने प्रस्तुत किया। ‘गंगौली’ के ‘आधा गाँव’ में पूरे हिंदुस्तान का सच बनाया करता है।

     यह उपन्यास अन्य उपन्यासों से भिन्न है तो कारणों से भी की जहाँ अन्य विवेच्य उपन्यास हिंदू-पात्रों की कथा कहते, हिंदू बहुल स्थानों की कहानी कहते हुए विभाजन के प्रति उनका दृष्टिकोण, उनकी मानसिकता को प्रस्तुत करते है, वहीं यह उपन्यास मुस्लिम पात्रों को केंद्र में रखकर उनकी मानसिकता, जीवन शैली और विभाजन के प्रति उनका दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

     यह उपन्यास विभाजन के बाद भारत के हिन्दुओं या शरणार्थियों की कहानी नहीं कहता। यह विभाजन के दर्द को महसूस करते भारत में रह गए मुसलमानों की कथा कहता है। विभाजन ने सिर्फ देश को नहीं बाँटा उनके परिवारों को बीच में से बाँट दिया। इस घरेलू विभाजन के संत्रास को भोगते लोगों की कथा भी इस उपन्यास में वर्णित हुई है। फिर भी अगर कुछ पढ़े-लिखे लोग ‘आधा गाँव’ पर आरोप लगाते हैं कि यह उपन्यास हिन्दू-दुश्मन और पाकिस्तानी है। पूर्णतः यह गलत है क्योंकि यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव का चित्रण करता है, झगड़े का नहीं। इस उपन्यास के पात्र सच्चे अर्थों में भारतीय है और उनका भारत है ‘गंगौली’,तभी वे अपनी गंगौली को छोड़कर पाकिस्तान नहीं जाते क्योंकि उन्हें प्रेम है तो सिर्फ गंगौली और गंगौलिवासियों से। काश! उस समय अधिकांश लोग ऐसे ही होते तो भारत को विभाजन की त्रासदी नहीं झेलनी पड़ती।
डॉ. मुल्ला आदम अली

संदर्भ;
  1. राही मासूम राज़- आधा गाँव- पृ-3
  2. राही मासूम राज़- आधा गाँव- पृ-3
  3. राही मासूम राज़- आधा गाँव- पृ-176
  4. राही मासूम राज़- आधा गाँव- पृ-13
  5. राही मासूम रज़ा- आधा गाँव- पृ- 60
  6. राही मासूम राज़- आधा गाँव- पृ-155
  7. राही मासूम राज़- आधा गाँव- पृ-251
  8. राही मासूम राज़- आधा गाँव- पृ-284
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