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मोहन राकेश की कहानी : मलबे का मालिक

Story Malbe Ka Malik by Mohan Rakesh

मलबे का मालिक – मोहन राकेश 

    यह कहानी ‘मोहन राकेश’ द्वारा लिखी गयी है। इस कहानी का कथानक विभाजन के साढ़े सात साल बाद के कालखंड को दर्शाया है। मोहन राकेश ने विभाजन कालीन घटनाओं का विस्तार से वर्णन नहीं किया बल्कि संकेतों के माध्यम से कथ्य को स्पष्ट किया है। कहानी के अंतर्गत विभाजन के दूरगामी परिणामों को दर्शाया है। विभाजन के फैसले के कारण न चाहते हुए भी मजबूरी में हिंदू तथा मुसलमानों को अपना बसा-बसाया घर-बार छोड़कर जाना पड़ा था, उन्हें अपने देश, घर, गली, मुहल्ले की याद आती थी। उन्हें विश्वास था कि उनके घर उसी तरह आज भी सुरक्षित होंगे, और लोगों में आज भी वही आत्मीयता होगी। प्रस्तुत कहानी इन्हीं संबंधों का ताना-बाना है।

     पाकिस्तान तथा भारत का मैच अमृतसर में होना तय हुआ था दोनों तरफ की सरकार ने नागरिकों को मैच देखने की अनुमति प्रदान कर दी थी, जिससे वह मैच देखने के बहाने अपने आत्मीय जनों से मिल सके। पाकिस्तानी लोगों के लिए मैच की अपेक्षा अमृतसर अधिक आकर्षण का केंद्र था। हर सड़क पर मुसलमानों की कोई न कोई टोली घूमती नजर आ रही थी, प्रत्येक सदस्य में के मन में वही पुराना अमृतसर था, वे वहां की हर चीज को हसरत भरी निगाहों से देखते हैं, तथा अपने जाने के बाद हुए परिवर्तनों को देखकर आश्चर्यचकित है। तंग बाजारों तथा गलियों से गुजरते हुए वे एक-दूसरे को पुरानी चीजों की याद दिला रहे थे- “देख फतहदीना, मिसरी बाजार में अब मिसरी की दुकानें पहले से कितनी कम रह गई। उस नुक्कड़ पर सुक्खी भठियारन की भट्टी थी, जहां अब वह पानवाला बैठा है.. यह नमक मंडी देख लो, खान साहब।“ इसी टोली में वृद्ध गनी मियां भी शामिल थे। जो विभाजन के समय अपने भरे-पूरे परिवार को छोड़कर लाहौर चले गए थे, उनके पीछे उनके बेटे चिराग, पुत्रवधू तथा दो पौत्रियों की हत्या विभाजन के दंगों में कर दी गई थी।

     विभाजन के लंबे अंतराल के पश्चात लोगों के मन से सांप्रदायिकता की मैल कम हो चली थी, अब लोगों को एक दूसरे के बारे में जानने की उत्सुकता थी, विभाजन के समय कुछ हिंदूओं को लाहौर छोड़कर अमृतसर आना पड़ा था। इसी प्रकार मुसलमानों को अमृतसर छोड़कर लाहौर जाना पड़ा था, उनके मन में उस स्थान के प्रति आज भी वही आत्मीयता थी, आने वाली टोलियों से लोग पूछ रहे थे कि अनारकली में आज भी वही रौनक है या नहीं, शाहालमी गेट का बाजार पूरा नया बना है? इन सवालों से पता चलता है कि आज भी उन विस्थापितों का मन उनके अपने जन्म क्षेत्र में बसता है। मनुष्य के अंदर के अपनत्व बोध को सांप्रदायिक ताकतें भी पूरी तरह से मिटाने में असफल रही है। लाहौर से आए लोग पूरे शहर भर के मेहमान थे, लोगों को उनसे मिलकर, बात करके खुशी मिल रही थी।

     इन टोलियों से अलग गनी मियां ‘बाजार बांसा’ की ओर चल पड़े ‘बाजार बांसा’ विभाजन के पूर्व गरीब मुसलमानों की बस्ती थी, जो दंगे की आग में जलकर खाक हो चुकी थी, ‘बाजार बांसा’ के साथ ही साथ कई मुहल्ले आग की चपेट में आ गए थे, एक मुस्लिम घर को जलाने में चार-छः हिंदूओं के घर भी स्वयं ही जल गए, सांप्रदायिकता के उन्माद में मनुष्य स्वयं को भी उतने ही हानि पहुंचाता है जितनी कि दूसरों को। बुड्ढा गनी मियां उस मोहल्ले में पहुंचता है, जगह-जगह नई इमारतों की वजह से उसे वह जगह भूल-भुलैया सी प्रतीत होती है, तभी उसे एक युवक दिखाई पड़ता है, जिसकी पहचान वह ‘मनोरी’ के रूप में करता है। ‘मनोरी’ उसे उसके घर तक का रास्ता दिखाता है जो अब मलबे के रूप में परिवर्तित हो चुका था।

     गनी मलबे को देख अत्यंत दुःखी होता है, अपने परिवारी जनों की हत्या को तो वह परिस्थितिजन्य दुर्घटना समझकर समझौता कर लेता है लेकिन अपने नवनिर्मित घर जो कि विभाजन के छः महीने पूर्व बनवाया था के सुरक्षा को लेकर आश्वस्त था। उसे लगा उसका परिवार तो नहीं रहा, अपने घर को ही देख कर उसे शांति मिल जाएगी, मगर मलबे के ढेर को देखकर गनी अंदर से टूट गया और रोने लगा। एक जला हुआ चौखट अब भी मलबे से आधा बाहर झांका रहा था, गनी उसे पकड़ कर बैठ गया, उसके दबाव से वह चौखट भी भुरभुरा कर गिरने लगा, वह चौखट उसी व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो सांप्रदायिकता का शिकार होने के पश्चात जिंदा तो है लेकिन अपने जड़ से उखड़ने के कारण अंदर से खोखला हो चुका है। गनी से महसूस किया कि सब कुछ तो बदल गया मगर बोली-भाषा अभी तक नहीं बदली, इस बात से सिद्ध होता है कि भौगोलिक रूप से देश का बंटवारा भले ही कर दिया गया हो लेकिन परस्पर रची-बसी संस्कृति को अलग करना आसान कार्य नहीं है।

     मोहल्ले की औरतों गली में एक मुसलमान को देखकर सहम जाती है और अंदर चली जाती है, विभाजन ने जिस अनास्था तथा अविश्वास को पैदा किया था, उसे मिटा पाना आसान नहीं था।

     अपने घर के मलबे के पास से उठकर ‘गनी’ पीपल के नीचे बैठे ‘रक्खे पहलवान’ के पास जाता है, गनी अपनी स्वाभाविक आत्मीयता के कारण दोनों बाहें उठाकर ‘रक्खे’ से मिलना चाहता है, लेकिन रक्खे की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न होने पर वह हाथ नीचे कर लेता, गनी को नहीं पता कि जिस ‘रक्खे पहलवान’ के प्रति उसके मन में इतना प्रेम और विश्वास उमड़ रहा है, वहीं उसके पुत्र तथा उसके परिवार का हत्यारा है। ‘रक्खे’ ने ‘चिराग’ तथा उसके परिवार का कत्ल उस घर को हड़पने के लालच ने ही किया था, आज वह उस मलबे का मालिक स्वयं को ही समझता था। ‘गनी’ को सबसे अधिक विश्वास ‘रक्खे’ पर ही था-

     “तू बता, रक्खे, यह सब हुआ-किस तरह? गनी आँसू रोकता हुआ आग्रह के साथ बोला, तुम लोग उसके पास थे, सबने भाई-भाई की सी मुहब्बत थी, अगर वह चाहता तो वह तुममें से किसी के घर में नहीं छुप सकता था? उसे इतनी भी समझ नहीं आई।“

     गनी के इस विश्वास ने ‘रक्खे’ को निरुत्तर कर दिया था, उसे अपनी नसों में तनाव महसूस होने लगा, उसकी रीढ़ की हड्डियां कमजोर पड़ गई, सहारे ही की आवश्यकता लगने लगी। रक्खे अपराध-बोध से भर गया था। उसके मुँह से निकले यह शब्द-

               “हे प्रभु सच्चिआ, तू ही-है, तू ही है, तू ही है।“

     इस बात का बोध कराते हैं कि सांप्रदायिकता उन्माद तथा लालच में उसने ‘चिराग’ तथा उसके परिवार की हत्या तो कर दी थी मगर अब ‘गनी’ के सामने वह अपराध बोध से ग्रस्त था। ‘गनी’ तथा ‘रक्खे’ दोनों का मोहभंग हो चुका था, रक्खे द्वंद्व में जी रहा था, वह कमजोर पड़ चुका था। गली की जो औरतें कुछ देर पहले ‘गनी’ को देखकर घरों में छिप गई थी। अब ‘गनी’ उनके सहानुभूति का पात्र तथा ‘रक्खे’ घृणा का पात्र बन चुका था।

     ‘रक्खे’ को अब कुकृत्यों की निरर्थकता का आभास हो रहा था, तभी तो उस मलबे का स्वामी ‘रक्खे’ किसी पक्षी को भी उस मलबे पर नहीं बैठने देता था, इंसान तो दूर की बात। मगर आज वह एक कुत्ते से पराजित हो गया था, ‘रक्खे’ जब रात में उस मलबे पर सोने गया तो वह कुत्ता उसकी ओर मुंह करके भौंकने लगा उसने उसे हटाने के लिए भारी आवाज में कहा- “दूर दूर दूर...दूरे।“ मगर कुत्ता और पास आकर भौंकने लगा, और ‘रक्खे’ पराजित भाव से उठा और कुएँ की सिल पर जाकर लेट गया।

     अप्रत्यक्ष रूप से ‘रक्खा पहलवान’ अपने अपराध को स्वीकार कर लेता है। इसी कहानी में रक्खा का ‘द्वंद्व’ तथा मोहभंग उभरकर सामने आता है।

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