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आखिरी कलाम : भारतीय राजनीति का सच


 
डॉ. मुल्ला आदम अली

         ‘आखिरी कलाम’ उपन्यास दूधनाथ सिंह द्वारा लिखा गया है। हिंदी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का फासीवादी चेहरा बेनकाब करने में दूधनाथ सिंह कोताही नहीं बरतते किंतु ‘समानांतर युद्ध’ कहकर आशंका के लिए जगह मात्र छोड़ जाते है। ‘आखिरी कलाम’ वर्तमान समय में एकाएक ही महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक नहीं हुआ है, बल्कि वह काल की परिधि से निकलकर कालातीत हुआ है। शायद यही कारण है कि कुछ आलोचकों को आचार्य तत्सत पाण्डे में कबीर दिखाई देता है। भारतीय धर्म और दर्शन का स्वरूप, राजनीतिक कारसेवकों के अखाड़ों का वैशिष्ट्य कट्टर फासीवादी हिंदुत्व की शिनाख्त, हिन्दू एवं हिन्दुत्व के अंतर्विरोध जिसका उत्तर उदाहरण तत्सत पाण्डे हैं। ‘किताबें शक पैदा करती है’ का सच, इतिहास के गलत तरीके से, गलत उद्देश्य से लिखे जाने को रेखांकित करने वाला विषय लेकर देश में सांप्रदायिकता का जहर उगलाने वाले नव हिन्दुत्ववादी संगठन, मार्क्सवाद क्रिमिक विघटन और पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले विश्वविद्यालय की सड़ाँधता आदि मार्मिक एवं कड़वी सच्चाई से पाठक रु-ब-रु होता है। यह उपन्यास कई आलोचकों की आलोचना का शिकार भी हुआ है, तो प्रशंसा का कृपापात्र भी हुआ है। उपन्यास के ढाँचे को लेकर या संरचना की लेकर, अवान्तर वर्णनात्मकता को लेकर किंतु इसके महत्व को कम करके आँका नहीं गया। ‘आखिरी कलाम’ में नाटकीय कौशल एवं शातिर ढंग से लेखक तत्सत पाण्डे के साथ कारसेवकों की गुंडागर्दी, मठाधीश महन्त अचेतानन्द की अपराध वृत्ति और भीड़ के उन्मादी चरित्र के बीच मियाँ जमील जैसे उत्पीड़ित पाँच मुसलमानों की कथा को मार्मिक स्पर्श देकर प्रस्तुत करता है, वह पाठक को बिना छुए दो अन्य चरित्रों की याद दिलाता है।

     एक तमाम लेखकीय पक्षधरता एवं प्रयास के बावजूद तत्सम पाण्डे की उभरती धूर्त, आत्मरतिग्रस्त, अहंवादी छवि जहाँ के निखुट अंधेरों में अपने से इतर हर दूसरे का प्रवेश निषिद्ध है। दूसरे वामपन्थियों की नेकनीयती और परिवर्तनकारी सोच की धज्जियाँ उड़ाती मिसिरजी की निहायत बेशर्म उपस्थिति, जो एक ओर महन्त की मानसिकता का विस्तार बनाती है तो दूसरी ओर तत्सत पाण्डे के पाखंड को समझने का उपयोगी उपकरण! जहीर है, तब मर्मान्तक पीड़ा भाजपा की भावना नीतियों की वजह से नहीं होती, सेकुलर और क्रांति के अग्रदूत कहलाए जानेवाले वामपंथी दल क्रमिक चारित्रिक विघटन के कारण होती है। जिसकी मूल्यहीन जड़-जर्जर पार्टी लाइन ने आशा एवं नेतृत्व सकारात्मक संभावना को विनष्ट कर दिया है।“(1) अग्रवाल मनुष्य की आशा को सबसे बड़ा हथियार और जिसके लचीलेपन के गुण को स्वीकारती हुई बड़े सार्थक रुप में आग्रह करती है कि “मनुष्य की वैयक्तिक आस्था के रूप में धर्म वरेण्य है किंतु धार्मिक राष्ट्र के रूप में किसी देश की पहचान अपने साथ अनेक समस्याएँ और खतरे ले आती है। हिंदी उपन्यासकारों एवं समाजशास्त्रियों ने भारतीय संदर्भ में ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ की सत्ता के साथ उभरने वाली चुनौतियों के रूप में हिन्दू वर्णाश्रम... के बढ़ते प्रभाव को देखा है जो विषमता और दमन के सहारे अपनी सत्ता कायम रखता है।“(2) एक कोण से उपन्यास ‘फासीवाद’ को व्यापक परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित करने का प्रयास भी करता है। फासीवाद का सामान्य अर्थ है सर्वशक्तिमान (अधि) नायक, राज्य नियंत्रण एवं धर्म प्रजाति की श्रेष्ठता के दम्भ पर आधारित एक ऐसी राज्य व्यवस्था जिसकी जीवनीशक्ति विरोध का दमन करने में निहित है। स्वतंत्रता, समाज और बंधुत्व के लोकतांत्रिक स्वरूप को ध्वस्त कर यह एक ऐसी कठमुल्ला वैचारिकी को प्रचारित करना चाहता है जहां तमाम दुर्बलताएँ एवं विविधताएँ अपनी-अपनी निजात का परित्याग करके एक रंग, एक झंडे, एक नारे तले एकीकृत हो जाएँ। जाहिर है, प्रतिपक्ष होगा ही नहीं या हुआ भी तो अंततः घुटने टेकने को मजबूर हो जाएगा। धर्मनिरपेक्ष भारत में हिंदू राष्ट्रवादी शक्तियों का उभरा उभार फासीवाद के खतरे का प्रत्यक्ष संकेतन है, जो बी.जे.पी. समर्थित विश्व हिंदू परिषद की भगवा नीतियों और जोशी, आडवाणी, उमा भारती के तिकड़ी नेतृत्व में अयोध्या जीतकर ‘राजसूय यज्ञ’ कर लेना चाहता है।“(3) और 6 दिसम्बर,1992 को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर, उन्होंने किया भी। दूधनाथ सिंह इसी घटना की जांच पड़ताल करते हैं। आचार्य तत्सत पांडे और पूरे उपन्यास के माध्यम से दूधनाथ सिंह अपने उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ में धर्म का जो विखंडन करते हैं, वह हिंदी के वैचारिक संसार में नई पहलकदमी है। नरम हिंदुत्व के इस दौर में जब कट्टर ‘हिंदुत्व’ की शक्तियों के मुकाबले ‘अच्छा हिंदू’ कहलाने व ‘हिंदू माइंड’ को समझने की होड़ लगी है, तब उपन्यास के केंद्रीय पात्र आचार्य प्रोफेसर तत्सत पांडे का यह कथन की “धर्म ही एक षड्यंत्र है एक गहरी पड़ताल की मांग करता है। सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता जैसे जटिल मुद्दों को समझने का यह एक नया परिप्रेक्ष्य भी है।“(4)

     यह उपन्यास, “धर्म, संस्कृति और राजनीति के अंतर छल का उद्घाटित सूक्त है।“(5) “सही समय पर एक सही सर्जनात्मक हस्तक्षेप है।“(6) संघ परिवार के कुकर्म का आख्यान है, उसकी पुनस्मृति भी। यह पुनस्मृति इसलिए जरूरी है कि संघ परिवार न तो अपने किये पर शर्मिंदा है, न ही उसके हौसले पस्त हुए हैं... 6 दिसंबर,1992 की पुनस्मृति इसलिए भी जरूरी है कि कारसेवक प्रकरण की वजह से ही गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का प्रचंड तांडव हुआ। गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ जो हुआ और हो रहा है, वह 6 दिसंबर,1992 की ही अगली कड़ियाँ हैं।...’आखिरी कलाम’- इस बात को समझाने में हमारी मदद करता है कि अयोध्या में ग्यारह साल पहले जो हुआ उसके पीछे सोच की कैसी विकृति थी, परंपरा की कैसी असंवेदनशील समझ थी और धर्म की कैसी अमानवीय व्याख्या थी?”(7) कुल मिलाकर हिंदू सत्ता का वर्चस्व, हिंदू राष्ट्र निर्माण का उद्देश्य लेकर हिंदुत्ववादी ताकतों की कारगुजारियाँ कैसी रही उसे व्यक्त किया है दूधनाथ सिंह ने इस उपन्यास में। ‘आखिरी कलाम’ को अपने नायक की जिद की आंतरिक रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत किया तो गहरी आश्वस्ति हुई कि अपनी उम्र, अनुभव और बौद्धिकता के निचोड़ से वे उन सब अलक्षित ताकतों को चीह्न लोगों जो सत्ता को हिंसा, व्यक्ति को लिप्सा, तंत्र को अराजकता और स्वप्न को गाली में तब्दील करने की क्षमता रखती है।“(8) फलस्वरूप इन सभी की परिकल्पना कर लेखक ‘युग पुरूष’ आ. तत्सम पाण्डे को 3 दिसंबर को ही फैजाबाद-अयोध्या की ‘वारी’ पर भजते हैं ताकि तथ्यों की खोजबीन, प्रामाणिकता और विश्लेषण किया जा सके। लेखक काल, चेतना और तर्क की हदबंदियों से बाहर होकर भ्रम, विस्मृति और विसंगतियों के बीच अपनी तलाश जारी रखता है। इस प्रक्रिया में हर आंधी-पानी से बाहर आये हुए एक बहसबाजी आदमी के रूप में... तिरासी साल का लम्बा, दुबला, हड़ियाल, पीठ से थोड़ा झुका खूबसूरत बूढ़ा ‘तत्सत पांडे’ लेखक का प्रवक्ता बनकर उभरता है... ‘मरखश बैल’ की तरह हर जगह सींग रोपे बिना स्थापनाओं को उलटा नहीं जा सकता और न ही ‘परम स्वतंत्र’ तथा ‘अराजक होने’ की घोषणा किये बिना सत्ता से टकराने के सामर्थ्य पाया जा सकता है। ‘डंक मारने की कला’ में तत्सत पांडे को लेखक ने दिव्य-दृष्टि”(9) और ‘कुछ ज्यादा देखने की आचार्य जी की वर्तमान की बेचैनी, उन्हें सक्रिय बनाती है। उनकी दिव्य-दृष्टि, ‘महाभारतकालीन संजय या देवताओं की नहीं, विश्लेषण एवं गवेषणा से उत्पन्न तार्किकता है। वे बुढ़भस में अयोध्या को ‘सामुदायिक शौचालय’ की संज्ञा देकर 1992 के गदर के साक्षी पर नहीं रहते वरना प्रलाप-संलाप, एकालाप के बीच टुकड़ों-टुकड़ों में उन सब कारक तत्वों पर उँगली रखने लगते हैं जो धर्मशास्त्र एवं दर्शन के अव्यारव्योश रूप, मृत्यु के भय से टकराती जीवन की एषणा बेचारगी को ‘मनुष्य’ का पर्याय बना देने की अंतनिर्हित इनसानी सुसम्बद्ध सुगठित ढंग आए कथा में नहीं पिरोता, ‘बौद्धिक वमन’ रुप से यहाँ-वहाँ उगलता रहता है, इस उद्घोषणा के साथ कि ‘यहाँ’ औपन्यासिक गदर के भीतर’ एक स्वतंत्रता आंदोलन है।“(10) आचार्य तत्सत पांडे एक तरह प्रतिबद्ध, मुखर एवं विद्वान मार्क्सवादी है तो दूसरी तरफ पुरोहित, ब्राह्मण, विक्षिप्त, भुलक्कड़, सन्यासी व्यक्तित्व है। अपनी निजता और गिद्द के साथ रहने वाला। उपन्यास में दूसरा महत्वपूर्ण पात्र सर्वात्मन है जो मार्क्सवादी पांडे का शिष्य है, कम्युनिस्ट पार्टी का प्रांतीय स्तर पर स्तर का नेता है और आचार्य जी के प्रति समर्पित व्यक्तित्व है। बिल्लेश्वर उनका पालित पौत्र है, आचार्य जी ने परिवार के दमघोंटू वातावरण में भी उसे पोते का स्नेह दिया है। वह कम पढ़ा-लिखा किंतु विवेकवान है। मुँहफट और आचार्य जी का मुँहलगा अपरिहार्य सम्बल है। गायत्री जो कट्टर हिन्दू सनातन स्त्री आचार्य जी के बेटे की पत्नी है; उनकी बहू है। बेटा माधवानंद अमेरिका में श्रेष्ठ ब्राह्मण वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत है, ‘गायत्री सिंड्रोम’ से बचा हुआ। गायत्री और स्वामी अचेतानन्द जैसे पात्र की कीमत अन्य पात्र झुकाते हैं। जमील मियाँ जैसा शरीफ पात्र है, ‘जो हिंदुत्ववादी दहशत के दबाव में टूटता’ है अतः अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। अयोध्या के कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकर्ता मिसिरजी है, पार्टी सिद्धांत उनके लिए कोई मायने नहीं रखता किंतु सामाजिक-राजनीतिक आचरण से उस ‘स्फटिक’ फाँक की समझ बनती है जो कम्युनिस्ट पार्टी के सिद्धांत और व्यवहार के बीच व्याप्त है। साथ ही आचार्य जी की पत्नी, माताजी, पोता रविकांत और उसकी पत्नी सुहासिनी, अयोध्या में शहीद बिजलानी भाइयों की अंधभक्त ‘थुलथुल’, माँ लँहकर बाबा, गफ्फार मियाँ जो जमील मियाँ के पिता है, जो अपनी छाप उपन्यास में छोड़ गए हैं छोड़ पाए हैं।

     उपन्यास चार खंडों में विभाजित है। गृहजंजाल, प्रस्थान पर्व, देव शमशान और पुनश्च। प्रथम तीन के नायक “स्वयं आचार्यजी है, हम कह सकते हैं कि उनके जीवन के वे तीन निर्णायक संघर्षशील चरण है जिने सर्वात्म समानांतर युद्ध”(11) कहता है। अंतिम खंड ‘पुनश्च’ 6 दिसंबर,1992 की घटना के दस वर्ष बाद सर्वात्मन के अयोध्या में पुनभ्रमण पर केंद्रित है “अयोध्या अब वह शहर नहीं है जो दस वर्ष पहले था।“(12) “वह लहलहाते गेहूँ और आलू के खेत अब नहीं हैं... दोनों ओर के खेतों में नये-नये साधुओं का डेरा है।“(13) अयोध्या देव शमशान बन चुका है। अब वह ‘उजड्ड’ बन चुका है। विक्षिप्त जमील मियाँ ‘बेहतर स्मृति लिए’ उन्हीं खाँडहरों में घूम रहे है। कह रहे हैं –“-“मेरे कमरे में सियासत हो रही है.. बड़ा शोर है? सोने नहीं देते। अल्लामा इकबाल आए थे। उन्होंने दाड़ी रख ली है।“(14) यह परिवर्तन अयोध्या और इकबाल में काबिले गौर है। वस्तुतः, “जमील मियाँ के पास न अहंकार था, न महत्वाकांक्षा ही। वह तो धर्मान्धों की ‘उजड्ड’, अहंकारी, राजनीतिक, धार्मिक महत्वाकांक्षा के शिकार हुए है।“(15) राजनीतिक अथवा धार्मिक उन्माद नहीं जनता की भले एवं संवेदनशील लोगों और क्या गुजरती है और ये कैसे-कैसे, कितनी कीमत चुकाते हैं और सत्ता-समर्थित उन्माद की विनाशलीला का क्या कहना।“(16)

     आचार्यजी अनीश्वरवादी और जाँत-पाँत विरोधी, सांप्रदायिकता विरोधी तथा “भारतीय सांस्कृतिक अतीत के प्रति रेडिकल सोच के कायल है।“(17) जो ‘पूरब का ‘ऑक्सफोर्ड’ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जाँत-पाँतवाली, सांप्रदायिक एवं अवसरवादी माहौल में बने रहने के लिए अभिशप्त हैं। अपने बेटे माधवानंद की शादी गायत्री से की थी जो अपने पिता के दुराचारी आचरण से ग्रंथिग्रस्त यह बहू, हर पुरूष को ‘दुराचारी और गलीज’ समझती थी, यहाँ तक कि अपने पति और ससुर को भी। उसने यांत्रिक कर्मकांडों की अपनी एक दुनिया बनायी थी। उसके आने से आचार्यजी का ‘सत्यधाम’ पूर्णतः ‘कर्मकांड धाम में बदल गया था।“(18) कुल मिलाकर उनके परिवार में एक प्रकार का तनाव रहता था। ‘गायत्री के मानसिक उन्माद से परेशान आचार्यजी का इकलौता बेटा माधवानंद, अपने इकलौते बेटे रविकांत को छोड़ अमरीका वासी हो जाता है।“(19) “आचार्यजी को लगा, अनजाने में ही उनसे अपने बेटे का वध हो गया है।“(20) उपन्यास में एक तरफ पारिवारिक विभीषिका को व्यक्त किया गया है तो दूसरी तरफ सामाजिक, राजनीतिक जीवनांगों में फैली सांप्रदायिक अराजकता को।

     आचार्यजी को सर्वोत्मन, जिसे आचार्यजी ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ कहकर बुलाते हैं, वह 4 दिसम्बर को ‘सचल ग्रामीण पुस्तकालय का उद्घाटन करने और किताबें शक पैदा करती है’ विषय पर व्याख्यान देने आमंत्रित करते हैं। पत्नी के पूछे जाने पर उसे अयोध्या यात्रा का अर्थ समझाते हुए कहते – “उसी सविनय अवज्ञा आंदोलन के उद्घाटन का। पिछड़े इलाके में वहां गदर है और मेरी तरफ से प्रोटेस्ट।“(21) “मान्यता स्पष्ट है, अयोध्या में कारसेवक नहीं, गदर है। गदर इसलिए कि वह पिछड़ा (इलाका) है और पिछड़ा इसलिए है कि वहां पुस्तकें नहीं है, विचार नहीं है। अतः अयोध्या उनके लिए ‘मसान’ अर्थात देव शमशान’ है इसलिए उनकी अयोध्या यात्रा एक ‘प्रोटेस्ट’ है, महात्मा गाँधी के डाँडी मार्च की तरह। बिना ‘प्रोटेस्ट’ के विकल्पों की तलाश संभव नहीं है। वैकल्पिक राजनीति की पहली सीढ़ी ही ‘प्रोटेस्ट’ है लेकिन वहां के जुलूस को ‘स्कूलिंग’ कहा था, प्रत्येक जुलूस प्रोटेस्ट-मार्च हुआ करता है। इस प्रकार आचार्यजी की अयोध्या यात्रा.. निजाम की राजनीतिक समालोचना है। अंतर इतना भर है, गाँधी के समय पूरा देश उद्वेलित हो उठा था, आचार्यजी अकेले हैं। सर्वात्मन और बिल्लेश्वर निर्विकल्प है, इसलिए साथ है। आचार्य जी को यह भी आभास है कि यह उनकी अंतिम यात्रा है। अतः अपने मकान को परित्यक्त बहू के नाम करते हैं। जिसके पास “जीवित वैधव्य’ के सिवा कुछ नहीं बचा है। बेटा माधवानंद को फ़ोन के लिए कहते है। ‘गदर’ में नियति का पूर्वाभास उन्हें है, फिर भी वह जाएंगे और अपना ‘प्रोटेस्ट’ दर्ज करेंगे। यही उनका ‘आखिरी कलाम’ है।“(22) “अफसरी गरिमा और भारत सरकार का उपक्रम होने के आत्मविश्वास से लकदम सविनय का यह आयोजन कारसेवकों के लिए नहीं, जनता के लिए है।“(23) आ. तत्सत पाण्डे ‘किताबें शक पैदा करती है; विषय पर भाषण देने के लिए अयोध्या पहुंचते हैं तब वहां पर तनाव, विद्वेष और आशंका का माहौल उन्हें दिखाई देता है। इस समय आचार्यजी सचल पुस्तकालय के उद्घाटन के अवसर पर भाषण से धर्म के दुरुपयोग और किताब द्वारा (रामचरितमानस) समाज में फैलते विद्वेष को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, “यह दुःस्वप्न के भीतर एक स्वप्न है, किताबों और जनता के बीच आखिर कौन खड़ा है? धर्मग्रंथ और तुलसीदास तभी मैंने कहा यह दुःस्वप्न के भीतर एक स्वप्न... इसे हटा दो। दुःस्वप्नों से मुक्त हो, तब-तब किताबें शक पैदा करेगी... एक किताब तुम्हारे भीतर सदियों की जमी हुई काई को साफ करती है, वह तुम्हारे भीतर की हिंसा को पी लेती है तो किताब तुम्हारी सारी ताकत को निचोड़ लेती है, तुम्हें नया जन्म देती है, तुम जो बंधे हुए हो, तब मुक्त होते हो। तुम जो कौलाहल से घिरे हुए हो, एक किताब तुम्हें सन्नाटे में ले जाती है, एक किताब तुम्हारे शत्रु पैदा करती है, एक किताब तुम्हारे प्रेम और तुम्हारी मैत्री को क्षार-क्षार करती है। यह किताब तुम्हारे जानने को निरर्थ कर देती है, एक किताब तुम्हें चुप करती है, एक मौत के दरवाजे पर छोड़ आती है, एक किताब तुम्हें शताब्दियों तक अंधा बनाती है। किताब यह सब करती है अतः किताबें शक पैदा करती है किताबें हमारी अन्तर्मेधा के समक्ष शक्ति प्रदर्शन हैं, युद्धभ्यास हैं वो अक्सर हमला बोल देती है। जो किताब तुम्हें जेहाद के लिए, धर्म युद्ध के लिए उकसाया वह तुम्हारी दुश्मन है। जो किताब अपने को ज्ञान की अंतिम सीढ़ी कहे, परमसत्य की ओर इशारा करें वह किताब एक चूका हुआ विचार है... जो किताब तुम्हारी जिज्ञासा का वध करें वह एक दुःस्वप्न है, जीवित मृत्यु है... अतः तैयार रहो एक वृद्ध और बंजर और अपाहिज और दैत्याकार किताब से लड़ने के लिए सदा तैयार रहो... अपनी जीवन मृत्यु से बचो। अपनी अन्तर्मेधा को साधो।“(24) का आह्वान लेखक करता है। तुलसीदास के बड़प्पन को स्वीकार करते हुए भी आचार्यजी कहते हैं... “उसी अन्धी आस्था का कमाल है यह उसी वैचारिक तानाशाही का कमाल। जो अब जाकर उभरा है जो कथा 1575ईं. में रची गई, उसका असर चार सौ वर्ष बाद उजागर हो रहा है। यह है गोस्वामीजी का घटाटोप, एक ऐसा उत्कृष्ट कवि-कर्म, जो विचारों की इजारेदारी में बदल गया।... कोई भी कवि-कर्म अगर हिंसक धर्मग्रंथ में परिणत हो जाए तो उसे आप क्या कहेंगे?”(25) आचार्यजी तुलसीदास को महान मानते हुए भी अप्रासंगिक मानते हैं और हिंदू जनमानस पर उसके प्रभाव को खतरनाक बनाते हैं।“(26) अखबारों के माध्यम से आचार्यजी के संबंध में अनेक भ्रांतियां फैलाई जाती है। उन्हें राम विरोधी एवं तुलसी विरोधी करार दिया जाता है और आचार्यजी को कठमुल्ला घोषित किया जाता है। भीड़ आचार्यजी पर पिल पड़ती है। किसी तरह सर्वात्मन और बिल्लेश्वर उन्हें बचाते हैं, वहां के निवासी जमील मियां के घर में आश्रय पाते हैं। फिर एक बार आचार्यजी विवादास्पद स्थान पर जाते हैं तो कारसेवक उन्हें पहचानते हैं और उन पर हमला बोल दिया जाता है। वह घायल हो जाते हैं, उसी में उनकी मृत्यु हो जाती है उनकी लाश भी उसी ट्रेन से लाई जाती है। जिसमें कारसेवक लौटते हैं।

     ‘कारसेवक एक्सप्रेस’ का जो वर्णन किया गया है मानो बाबरी ‘विध्वंस’ की पूर्णाहुति है, ट्रेन में उन्मत्त और अनियंत्रित ‘कारसेवक’ का उन्मादी आचरण प्रकारांतर से इस जघन्य घटना का पूर्वाभास है जो वर्षों बाद ‘गोधरा’ में घटित हुई थी। कारसेवकों की भीड़ रास्ते भर बगीचों और खेतों को उजाड़ती, स्टेशनों में तोड़फोड़ करती तथा कस्बों तथा दुकानों को लुटती हुई जिस तरह से लौट रही है उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया वही हो सकती थी, जो गोधरा में हुई होगी और उपन्यास में एक दूसरे रूप में होती है। रेलवे लाइन के आसपास बसे हुए लोगों का एक जत्था पीड़ित तथा त्रस्त होकर ट्रेन पर टूट पड़ता है, कारसेवकों पर पत्थरों की बौछार होती है, उन्हें लहूलुहान कर दिया जाता है और रेल पटरियां उखाड़ दी जाती है, उसी ट्रेन के ‘ब्रेक वैन’ में आचार्य तत्सत पांडे का शव रखा हुआ है और रात के अंधेरे में ट्रेन का गार्ड अपनी लाल बत्ती हिलाता हुआ चिल्ला रहा है, ट्रेन न आगे जा सकती न पीछे, दोनों तरफ की पटरियां उखाड़ दी गई है।“(27) यहां पर “यह कहना ज्यादा उचित होगा कि रामचरितमानस एक धर्मग्रंथ पहले बन गया और साहित्यकृति बाद में। इसी कारण तुलसीदास और रामचरितमानस को पढ़ना समस्याजनक भी है। हिंदी में जितने बड़े समस्याजनक कवि तुलसीदास है उतना कोई और नहीं... उस तरह लेखक तुलसीदास संबंधी सर्वसम्मति को तोड़ता है। निश्चय ही यह दूधनाथ सिंह का साहित्यिक कार्य है। दरअसल तुलसीदास का यह प्रसंग एक वैश्विक परिघटना की ओर भी संकेत करता है जिसके तरह कालक्रम में कोई किताबें आध्यात्मिक अनुभव के रूप में लिखित या संग्रहित हुई, पर आगे चलकर अंधभक्ति और सांप्रदायिक हो गई।“(28)

     राम जन्मभूमि आंदोलन के पीछे एक कारक तत्व मुसलमानों के प्रति घृणा और विद्वेष भी है। मियाँ जमील के माध्यम से ही लेखक यह बताता है कि फैजाबाद में हिंदूओं और मुसलमानों की जो साँझी संस्कृति विकसित हुई थी, उसे किस तरह नष्ट कर दिया है। इलाके में मुसलमान किस तरह असुरक्षित हो गए हैं एक मंदिर बनाने के लिए एक पूरी तहजीब को क्षत-विकसित कर दिया गया है। ‘किताबें शक पैदा करती है’ विषय पर व्याख्यान देते समय लेखक अनायास ही एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित करते हैं कि इस पिछड़े क्षेत्र का पहला पड़ाव है फैजाबाद यानी ‘राम’ और अंतिम पड़ाव है कुशीनगर यानी ‘बुद्ध’। तो... लेखक यह प्रतिपादित करना चाहता है कि ‘राम’ से होकर ही ‘बुद्ध’ को पाया जा सकता है? सारे कर्मकांड, सांप्रदायिकता, वीभत्सता तथा और पतनशील से गुजरकर ही आत्मबोध के रूप में ‘बुद्ध’ को अर्जित किया जा सकता है? लेकिन आगजनी और भगदड़ के बाद शेष उपन्यास में सविनय को अदृश्य कर लेखक ने बुद्ध तक पहुँचने की संघर्ष भरी आत्मपड़तालपूर्व राह जिस तरह मिटा दिया है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। हिंसा, घृणा और विध्वंस का नग्न जुर्म और उसमें सलीके से टाँगी गयी कुछ करुण थिंगलियाँ-सविनय के बेवक्त सपनों के विलोम में रचा कुत्सित यथार्थ इतना सपाटा भी नहीं होता कि संभावनाओं को अपने गर्भ में पनाह ही ना दे।“(29)

     रोहिणी अग्रवाल इन दोनों पात्रों का मूल्यांकन करते हुए सही कहती है कि –“सविनय लेखक का युटोपिया है तो आचार्य तत्सत पांडे अपने ही अंतर्विरोधों और दुर्बलताओं से ग्रस्त यथार्थ का बेलौस प्रतिरूप।“(30)

     माधवानंद पिता की तरह से परजीवी और अवसरवादी है... अनास्थावादी, आत्मरतिग्रस्त बौद्धिक अवसरवादिता कि संतान है, वही गायत्री कर्मकांडी ब्राह्मणवाद की विकृति।“(31) यह वही ब्राह्मणवाद है जिसका विरोध दूधनाथ सिंह, कमलेश्वर, शिव मूर्ति, भगवान सिंह अपनी-अपनी कृतियों में करते दिखाई देते हैं। वस्तुतः “ब्राह्मणवाद ही इस देश की प्रगति में बाधक है। यह एक अलग तरह का उपनिवेशवाद है जिससे जनता को लड़ना पड़ेगा। कोई भी आजादी मुकम्मल नहीं होगी जब तक ब्राह्मणवादी उपनिवेश (आचार्यजी इसे समानांतर साम्राज्यवाद कहते थे) का खत्म नहीं होगा... वे सांस्कृतिक जालसाज, ढोंगी, कायर, धोखाधड़ी करके सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने में माहिर, यथास्थिति के कारक तत्व और लंपट और छुपे अधिनायक।“(32) है। वे उन्हीं के कारण अनेक संस्कृतियों नष्ट होने के प्रमाण ‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर दे चुके हैं। जातिवाद, वर्णवाद को, सत्ता की वर्चस्ववादिता को कायम रखने के लिए वे अपना आदमी रखना चाहते हैं, “विश्वविद्यालय की जातिवादी राजनीति में अपना आदमी को फिर वह छछूँदर क्यों न हो।“(33) “ब्राह्मण व्यभिचारी हो, चोर हो, उचक्के हो, ढोंगी हो, गधे हो इस यूनिवर्सिटी में वही रहने चाहिए।“(34) ऐसी मनोवृति देश के लिए, समाज के लिए घातक सिद्ध हो रही है, लेखक इसी बात के प्रति आगाह करता है।

     भारतीय धर्म और दर्शन की प्रणालियों पर भी लंबी बहस लेखक ने की है। गीता, कृष्ण, गाँधी, मार्क्स, जयप्रकाश आदि के दर्शन की खामियाँ लेखक ने गिनाई है।

    उपन्यास के अन्य महत्वपूर्ण पात्रों के संबंध में यह मत सही है कि “रविकांत और बिल्लेश्वर व्यक्ति न रह कर दो परस्पर विरोधी मानसिकताओं के प्रतीक बन जाते हैं। रविकांत अपने प्रतिनिधि रूप में स्वामी अचेतानन्द और सामुदायिक रूप में कारसेवकों का जत्था है तो बिल्लेश्वर अपनी तमाम असहमतियाँ बेलाग ढंग से दर्ज कराने की निर्भीकता के बावजूद सर्वात्मन, मिसिरजी और शशांक की व्यवहारिक जड़ता है।“(35)

     स्वामी अचेतानन्द एवं उनका विशाल आश्रम भारतीय न्याय व्यवस्था पर करारा व्यंग है। स्वामीजी अपने ही श्रीमद् गुरुदेव की हत्या कर उनके विलुप्त होने की एक तिलस्मी रहस्यमई ‘आलोप कथा’ गाढ़ते हैं और आश्रम पर कब्जा कर लेते हैं। जिसका जिक्र बड़े गर्व के साथ आचार्य जी के सामने करते हैं-
       “लेकिन मैंने बध किया, जरूर किया”, अचेतानन्द ने कड़ककर कहा।“
                        “अपने गुरुदेव का?”.....
     “नहीं उसका जिसने मुझे आरोपित किया। जमानत पर निकलते ही किया और दौड़कर किया- सरे आम लक्ष्मण घाट पर। हजारों श्रद्धालुओं के सामने।“ अचेतानन्द अपनी छाती ठोकी।
                     “तब आप फिर जेहल खटे होंगे?”
                     हाँ, खटा, लेकिन बेदाग छुटा।“
     “निष्कलंक।“ आचार्यजी ने व्यंग किया। “चंद्रमा में भी दाग है आचार्यजी, लेकिन मुझमें नहीं। और फिर अपने प्रातःप्रणम्य गुरुदेव का वध! और वह भी दिशा-फरागत के वक्त... छि. छि.।“(36)

     तो यह था विद्यानंद उसे स्वामी अचेतानन्द बनने का सफर जो अयोध्या की धर्म-संस्कृति को तो उजागर करता ही है किंतु हमारी न्याय व्यवस्था पर भी तीखा प्रहार करता है। “कहना न होगा कि स्वामी अचेतानन्द की आखाड़ संस्कृति का विस्तार लंपट हिंदुत्ववादियों तक नहीं, “देश के सर्वोच्च बुद्धिजीवियों से पोषित ‘देश के सर्वोच्च विश्वविद्यालयों तक भी हो गया है। ठीक उसी तरह जैसे गीतांजलि के उपन्यास ‘हमारा शहर उस बरस’ में मठ और विश्वविद्यालय प्रारंभिक मुठभेड़ के उपरांत बाद में एक काम एक हो जाते हैं।“(37)

     बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के बाद लेखक भारतीय राजनीति-सांस्कृतिक चिंतन की विकृतियों को भी स्पष्ट करता है। नेहरू, गांधी, लोहिया, जयप्रकाश, सावरकर के देश संबंधी विचार एवं दृष्टि को व्यक्त करता है, साथ ही भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टी के दो मुंहपन को भी रेखांकित करता है। आचार्य जी के अनुसार लोहिया की दो नाडियाँ हिंदुत्व की ओर जाती दिखाई देती है- उनकी सारे सोच में रामकृष्ण, शिव तथा पौराणिक चिंतन का जो कचरा भरा है, वह उन्हें सावरकर के अधिक निकट ले जाता है, नेहरू की ओर कम।“(38) और आगे वे स्पष्टतः कहते हैं- “लोहिया के अधिकांश अनुयाई एक न एक दिन धर्म तत्ववादियों के साथ चले जाएंगे, अंततः हिंदू हो जाएंगे। उनकी मानसिक संगति जो बैठती है।“(39) गांधी जी का भी यही हाल है क्योंकि वह भी धार्मिक बनावटी मेलजोल करना चाहते है। आचार्य जी कहते हैं, गांधीजी ने बड़ा काम करना चाहा, लेकिन धर्मों को मिलाने से थोड़े होगा। धर्मों को धीरे-धीरे खत्म करने से होगा। खत्म करना संभव नहीं। यह गांधी अच्छी तरह जानते थे, तो बीच का रास्ता वही है, जो गांधीजी चाहते थे। ...वे इतिहास को पलट देना चाहते थे।“(40) किंतु व्यक्ति के मन में ‘गांठे’ होती है, ‘बुनियादी तौर’ पर वह घबराता है.. या दुरुपयोग तो कराती ही है, और गाँधीजी में दुरुपयोग की बहुत संभावनाएँ हैं। वे द्रष्टा जरूर थे, लेकिन ईश्वर के सामने जाने पर आँख मूँद लेते थे। इसके सिवा वे कुछ कर भी नहीं सकते थे।“(41) गाँधीजी भी भारतीय धर्म के रूप में हिन्दू धर्मावलंबी ही थे। ऐसा विचार भी उनके कई समकालीनों ने ही व्यक्त किया है। लेखक आचार्यजी के द्वारा उनकी सीमाओं को भी व्यक्त करता है।

     ‘आखिरी कलाम’ की एक और विशेषता यह है कि वह वामपंथ को भी हर जगह, यथासंभव फटकारता है। उसके पाखंडी चरित्र को भी उजागर करता है। जिसके संबंध में रोहिणी अग्रवाल का मत है- “विहिप और वामपंथी दोनों के पाखंडी कर्मकांडी चरित्र पर चोट करते हुए दूधनाथ सिंह वामपंथ को लेकर जरूरत से ज्यादा निर्मम हो गया है। उनकी वजह भी वह बताई है- बेहद मानवीय और स्वाभाविक की जिससे घनी और सकारात्मक अपेक्षाएं हों, मोहभंग की सूरत में शिकायतें भी उसी से होगी। उपन्यास के ताने-बाने को मर्जी से तोड़ते-गांठते पात्रों–घटनाओं-संस्थाओं का गहरी संवेदना के साथ मखौल बनाते हुए दूधनाथ सिंह ने पूरी मस्ती के साथ कथा को के साथ मखौल बनाते हुए दूधनाथ सिंह ने पूरी मस्ती के साथ कथा को बिंदु रेखा और व्रत में बांधा है। यही वजह है कि वक्त जरूरत पड़ने पर माथे पर भगवा पट्टा बांधने को तैयार मिसिरजी और टैक्सी के आगे-पीछे ‘मनसुखता अखाड़ा’ के बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाकर अयोध्या की ओर प्रयाण करते शशांक जी ही वामपंथी अवसरवादी का प्रतिलोम बन कर उभरती है। ‘आदाब’ को ‘जै श्रीराम’ में प्रतिस्थापित करती मियाँ जमील और पुलिस द्वारा हड़का दिए जाने पर सामान सहित कूच करने को तैयार पांच बूढ़े मुसलमानों की त्रासदी। यही वजह से है कि दस साल बाद अयोध्या में आकर सेकुलर सर्वात्मन अपने गुरु के अंतिम दिनों की गन्ध समेटे स्थल की ‘परिक्रमा’ करना सांप्रदायिक हिंदुत्व का विकृति विस्तार बन जाता है जिसे छिपाने की शातिर कोशिश में लेखक वह एक ‘समानांतर युद्ध’ था जैसा बेईमान शब्दों का सहारा लेने को मजबूर होता है।“(42)

     आचार्यजी का चरित्र भी दोहरापन का है। अतः आपत्तिजनक भी है तो प्रशंसनीय भी। अर्थात, ‘कलाम की दोनों अर्थों ध्वनियों बातचीत और आपत्ति-समग्रता और तटस्थता के साथ नए-नए कोणों से आनी शेष है फिलहाल यह तो एक बेहतर शुरुआत का आवाहन है।“(43)
     सांप्रदायिक ताकतों की उभार की शिनाख्त करते हुए एक बेहतर और संभाव्य भविष्य बनाने के लिए सेकुलरता की जांच पड़ताल आवश्यक रूप में लेखक ने की है। ताकि भविष्य में 1992 और 2002 का गोधरा फिर दोहरा जाए। इसके लिए ही उपन्यास सचेत करता है।
संदर्भ ग्रंथ सूची :
1. प्रगतिशील ‘वसुधा’- अंक-64- पृ-224
2. वही- अंक-64- पृ-224
3. पल-प्रतिपल,2005- पृ-221
4. हंस-अक्तूबर,2003- पृ-83
5. पल-प्रतिपल,2005- पृ-221
6. आलोचना,2003- पृ-98
7. हंस- अक्तूबर,2003- पृ-89
8. पल प्रतिपल,2005- पृ-221
9. पल प्रतिपल,2005- पृ- पृ-221
10. वही- पृ-221
11. दूधनाथ सिंह- आखिरी कलाम- पृ-304
12. वही- पृ-403
13. वही- पृ-431
14. वही- पृ-433
15. आलोचना,2003- पृ-99
16. वही- पृ-99
17. वही- पृ-100
18. आलोचना,2003- पृ-100
19. आलोचना,2003- पृ-100
20. दूधनाथ सिंह- आखिरी कलाम- पृ-63
21. वही- पृ-16
22. आलोचना,2003- पृ-103
23. पल-प्रतिपल,2005- पृ-224
24. दूधनाथ सिंह- आखिरी कलाम- पृ-175
25. वही- पृ-314
26. आलोचना,2003- पृ-105
27. हंस’,अक्तूबर,2003- पृ-82
28. वही- पृ-82
29. पल-प्रतिपल,2005- -224
30. वही- पृ-224
31. वही- पृ-22
32. दूधनाथ सिंह- आखिरी कलाम- पृ-69
33. वही- पृ-387
34. पल प्रतिपल,2005- पृ-227
35. दूधनाथ सिंह- आखिरी कलाम- पृ-215
36. वही- पृ-195
37. वही- पृ-195
38. दूधनाथ सिंह- आखिरी कलाम- पृ-195
39. वही- पृ-303
40. वही-पृ-303
41. पल प्रतिपल,2005- पृ-228
42. पल प्रतिपल,2005- पृ-231
43. वही- पृ-231

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