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गुरु हाथ से ले गयो सत्रह नम्बर: बी. एल. आच्छा

गुरु हाथ से ले गयो सत्रह नम्बर

                      बी. एल. आच्छा 

           गुरुजी कविता पढ़ा रहे थे भाव-विभोर मुद्रा में-' यह विदा वेला, अमर वेला' और शिष्य भी खोपड़ी को बॉलपेन की नोक में अटकाकर फरटि से लिखे जा रहा था। तभी शिष्य की खोपड़ी भी पेन की नोक से निकलकर मुकाम पर जा लगी।" जैसे बेताल विक्रम के कंधे से उचककर फिर डाल पर जा लटका हो। मगर तभी शिष्य को ख्याल आया। उसे लगा कि जैसे रसीदी टिकट के बगैर बड़ा भुगतान नहीं होता। तिलक के बगैर कुँअर साहब को विदाई सीख नहीं मिलती। बगैर फाइल के सेमीनार दिखती नहीं हैं। बगैर घोड़ी के दूल्हे की बारात नहीं निकलती। उसी तरह आजकल कविता में 'वाद' बतलाये बगैर अच्छे नम्बर नहीं मिलते।

          सो खोपड़ी के भीतर से छूटे इस प्रक्षेपास्त्र ने गुरुजी को छेद दिया-"सर, इस कविता में 'वाद' कौनसा है ?' सच पूछा जाए तो इन वादों में मवाद इतना हो गया है कि आत्मा का पता ही नहीं चलता। शिष्य के प्रश्न से गुरुजी अचकचा गए। बोले-"इसमें सैनिकवाद है। मोर्चे की ओर प्रयाण करता सैनिक कह रहा है-"यह विदा वेला अमर वेला।" दरअसल गुरुजी रात दो बजे लौटे थे। कक्षा के लिए किताब उठाई और शुरु हो गए, तो छायावाद में सैनिकवाद घुस गया और तभी शिक्षा के घंटा-निनाद के साथ पीरियड बज गया। घंटी भी शिक्षावाद का प्रतिमान है। यह चरमवेला है, जिसकी प्रतीक्षा बटुक गण बेसब्री से करते हैं। गुरुजी का टेप भी इसी घंटावाद से स्वचालित होता है। यों भी घंटा शिक्षा का चरम लक्षण है। यदि गुरुजी के भीतर बज जाए तो गुरुघण्टाल हो जाते हैं। तब वे घंटी-पार हो जाते हैं और शिष्य जूते घिसकर या पोलीथीन की सरसराहट से गुरुजी की कालातीत मुद्रा को तोड़ते हैं।

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          बटुक भी अब नितांत मौलिक होने लगे हैं। अपने नितांत मौलिक भाष्य देते हैं। चमत्कारी उत्तरों से चौंकाते हैं। प्रश्न-पत्र में कबीर के एक दोहे की व्याख्या पूछी गई थी-

  "पाछे लागा जाई था,

   लोक बेद के साथि।

   पैंडे तें सतगुरु मिल्या, 

    दीपक दीया हाथि॥"

शिष्य ने चौबीस घंटे पहले की तैयारी में इस आई.एम.पी. व्याख्या को पलटा ही था। याद भर रह गया कि यह कबीर का दोहा है। फिर क्या? धड़ल्ले से लिखा-" एक बार लोकजी और वेदजी साथ-साथ जा रहे थे। मैं भी एक पेड़ के नीचे खड़ा था। सद्गुरु जी को नहाने के लिए जाना था। सो मेरे हाथ में दीपक थमा कर आगे चल दिये।" शिष्य ने विशेष टिप्पणी में लिख दिया-'इसमें रहस्यवाद है। जिस समय गुरुजी दीया मेरे हाथ में थमाकर चल दिये तो वे खुद अंधेरे में हो गये। 

          कॉपी जाँचों उद्योग का भी खास सीजन होता है। बहुतेरे दबाव। गुरुजी खटाखट कॉपियाँ सरकाये जा रहे थे। अंधेरा होने पर अनुभव हुआ कि दीपक सद्गुरु के हाथ में नहीं हो तो शिष्य फायदे में ही रहते हैं। जांचते- जांचते गुरुजी को लगा कि नम्बर गलत दे दिए हैं। मगर धड़ाधड़ दौड़ती कॉपी- एक्सप्रेस लालबत्ती तक नहीं देख पाई। नंबर ज्यादा दे दिए। गुरुजी ने सोचा कि आगे किसी अन्य सवाल में नम्बर कम दे देंगे। मगर इतने ऑब्जेक्टिव आ गये कि नंबर काटना मुश्किल हो गया। शिष्य किसी तरह पचास में से सत्रह नम्बर पा गया। निष्कर्ष यह कि मोतियाबिंद की मजबूरी से शिष्य की कमजोरियों जब तक पकड़ में आती हैं, तब तक उसे पास मजबूरी हो जाती है। आखिर ऑब्जेक्टिव में तो गुरुजी सब्जेक्टिव भी कैसे हो सकते थे।

                तब लगता है कि गुरुजी का सैनिकवाद और शिष्य का रहस्यवाद गुरु-शिष्य परम्परा की ही कार्बन-कॉपी है। कबीर भले ही कह लें-'तू कहता कागद लेखी, मैं कहता आँखन देखी।" यहाँ तो कागद की लेखी भी है शिष्यकी। मगर आँखन देखी बावजूद एक नयी पंक्ति बन जाती है— "छात्र के भाग बड़े सजनी, गुरु हाथ तैं ले गयौ सत्रह नम्बर। "यह तो शिष्य दुर्भाग्य था कि फ्लैग स्टेशन पर लेखनी-एक्सप्रेस रुक गई, वरना शिष्य ज्यादा भी पा जाता।

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           बटुक भी जानते हैं। शिक्षा के मैदान को पहचानते हैं।गुरुजी की दृष्टि के आदी हैं। वे तो पूरा ज्ञान उड़ेल देते हैं। इधर-उधर के ज्ञान से मूख्य कॉपी से सप्लीमेन्ट्री कॉपियां ज्यादा वजनदार हो जाती हैं। फिर भी शिष्य का ज्ञान समझ से परे रह जाता है। जाने कितनी ही मौलिक जानकारियों से लबालब रहते हैं उनके उत्तर। तुलसीदास का परिचय पूछा था। चमत्कारिक परिचय दिया-तुलसीदासजी ने पाँच उपन्यास लिखे हैं।दो कहानी-संग्रह। भिखारीदास के बड़े भाई थे, जिनको ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। अज्ञेय पर पूछी गई टिप्पणी में एक नयी शोध लिखी मिली–अज्ञेय कुमार महान् लेखक थे। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं। उनकी ग़ज़लें और गीत खूब गाये जाते हैं।

      सद्गुरु ने तुलसीदास जी के चार पेज पलटाए। दस पाँच नम्बर टिका दिये। यों भी उनकी कुण्डली में शिष्य-हन्ता योग नहीं। इस फील्ड में उनकी तयशुदा रेंज है। बीस से चालीस बीच फायर करते रहते हैं। लेकिन बेरोमीटर सत्रह नीचे आ जाए तो उनका दिल धड़क जाता है।कॉपी की एन्जियोग्राफी के बाद उसे तारण-योग ले आते हैं। और अंक सूची देखकर शिष्य अचरज पड़ जाता है कि जिस पर्चे में वह खुद घने अंधेरे में तीर फेंक रहा था, गुरु-माया सैकण्ड डिविजन दिला गयी।

बी. एल. आच्छा 

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