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Lucknow Pact 1916: लखनऊ समझौता

Lucknow Pact 1916: (लखनऊ समझौता 1916)

      मुस्लिम लीग आगे चलकर प्रखर राजनीतिक संस्था का रूप धारण किया। मुस्लिम लीग और कांग्रेस की आपसी दूर निरंतर बढ़ती जा रही थी। मुस्लिम लीग आजादी की लड़ाई में कांग्रेस से सहयोग करने को तैयार थी लेकिन उसकी शर्त यह थी की मुस्लिम संप्रदाय को एक अलग राजनीतिक इकाई के रूप में मान्यता दे और कांग्रेस सांप्रदायिकता के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र के तत्व को स्वीकार करें। मुस्लिम लीग ने यह मांग 1913 में रखी थी। डॉ.लोकमान्य तिलक राजनीतिक थे, जिन्होंने हिंदू मुस्लिम गतिविधियों को पहचाना तथा इस समस्या को जल्द से जल्द हल करने की कोशिश किया।

     डॉ.लोकमान्य तिलक के प्रयास से 1916 में मुस्लिम लीग का एक संयुक्त अधिवेशन लखनऊ में हुआ। इस अधिवेशन में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व तथा संवैधानिक सुधार की योजना तैयार की गई और इसे स्वीकार किया गया। यह घटना इतिहास में “लखनऊ समझौता” नाम से दर्ज है। भारत के राजनैतिक इतिहास की यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। समझौते के अंतर्गत कहा गया कि –“प्रमुख अल्पसंख्यक संप्रदायों के प्रतिनिधित्व के लिए चुनाव व्यवस्था (election system) में आवश्यक सुविधाएं प्रदान की जाए तथा मुस्लिम (Muslim) विशेष निर्वाचन क्षेत्र से प्रतिनिधित्व करें। समझौते के अनुसार यह विशेष निर्वाचन क्षेत्र प्रत्येक प्रांत की जनसंख्या (population of each province) के अनुसार निश्चित किए जाएंगे।“1

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     लेकिन अंग्रेजों ने कांग्रेस और लीग द्वारा किए गए लखनऊ समझौते के अनुसार हिंदू मुस्लिम समस्या को सुलझाने का कभी प्रयत्न नहीं किया। “वे हिंदू मुस्लिम समस्या को सुलझाने के लिए कभी उत्सुक नहीं थे।“2

      सन् 1874 से 1916 ईस्वी तक की मुस्लिम राजनीति से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुस्लिम आरंभ से ही अलगाव की अपेक्षा संरक्षण के लिए विशेष रूप से भविष्यकालीन स्वतंत्र भारत में मुस्लिमों के अस्तित्व के लिए चिंतित थे। यह मानसिकता बहुत ही स्वाभाविक थी। अल्पसंख्यक होने के नाते उनके मन में असुरक्षा थी। इसके अतिरिक्त हिंदूओं की बढ़ती हुई पुनरुत्थानवादी प्रवृत्ति, हिंदूओं की प्रगति आदि के कारण मुस्लिमों के मन में अलगाव की भावना पैदा हुई।

      अंततः 1916 से 1920 तक की राजनीतिक गतिविधियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि देश में एक ओर हिंदू पुनरुत्थानवादी प्रवृत्तियाँ बढ़ रही थी तो दूसरी ओर मुस्लिम अपना एक स्वतंत्र संगठन मजबूत बनाने में लगे हुए थे।

संदर्भ:

1. गोपाल राम – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास- पृ-208

2. वहीं – पृ-208

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