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1937 Indian provincial elections: 1937 के आम चुनाव और उसकी प्रतिक्रिया

सन् 1937 के आम चुनाव और उसकी प्रतिक्रिया

        सन् 1937 में प्रतिनिधि चुनाव कानून बना। ‘प्रतिनिधि चुनाव कानून’ के तहत सन् 1937 में भारत में आम चुनाव हुए और इन चुनावों के कारण भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता का एक नया दौर शुरू हुआ।

       चुनाव के पहले मुस्लिम लीग और कांग्रेस में चुनावी समझौता हुआ था। चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली, कांग्रेस ने चुनाव समझौता तोड़ा, यह मुस्लिम लीग के साथ वास्तव में धोखा था। संयुक्त मित्र मंडली बनाने से कांग्रेस ने इनकार किया। सत्य और ईमानदारी के सिद्धांतों का प्रचार करने वाली कांग्रेस का यह निर्णय बेईमानी से प्रेरित था। अगर कांग्रेसी लीग को अपने साथ लेकर सरकार बनाते, तो आम आदमी पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता और मुस्लिमों को यह भरोसा हो जाता कि कांग्रेस उनके साथ काम करने को तैयार है।

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       संयुक्त मित्र मंडली बनाने से इनकार करने से मुसलमानों में यह आम धारणा पक्की हो गई कि कांग्रेस मुसलमानों को सत्ता से दूर रखना चाहता है। यहीं से मुस्लिम लीग ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा लगाया। इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रखर राष्ट्रवादी जिन्ना ने भी अलगाववादी का समर्थन करना शुरू किया। उन्होंने पाकिस्तान की मांग खुले आम करना शुरू किया। इस प्रकार कांग्रेस की गलत नीति के कारण न केवल जिन्ना ही अलगाववादी विचारधारा के समर्थन खड़े हुए बल्कि मुस्लिम लीग ने भी इस घटना के बाद अपनी उग्रता का प्रदर्शन किया और पाकिस्तान की योजना को अपना लिया।

       इसके पश्चात बंबई, मद्रास और संयुक्त प्रांत में कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गई। इस प्रकार योजनाएं लागू करते समय मुसलमानों की भावनाओं का कोई ख्याल नहीं रखा गया। सार्वजनिक स्थानों पर हिंदूओं की नियुक्तियां, उर्दू के स्थान पर हिंदी, गोहत्या पर प्रतिबंध, वंदेमातरम को राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता आदि घटनाएं मुस्लिमों को भड़काने के लिए काफी थे। जिन्ना ने वंदेमातरम को राष्ट्रगीत बनाए जाने का विरोध किया था, क्योंकि इस गीत में मातृभूमि को देवी, दुर्गा के रूप में कल्पना किया गया था।

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