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Badiuzzaman ki Kahani Pardesi: बदीउज़्ज़माँ की कहानी परदेसी

परदेसी : बदीउज़्ज़माँ

          बदीउज़्ज़माँ की कहानी ‘परदेसी’ अपनी जमीन के अलगाव से उत्पन्न बिखराव और सांस्कृतिक बिखराव से उपजी करुणा की अभिव्यक्ति से संपृक्त कहानी है। बदिउज्जमाँ की दूसरी कहानी ‘अंतिम इच्छा’ का संबंध पारिवारिक अलगाव की पीड़ा की पृष्ठभूमि पर आधारित है। हिन्दुओं की अपेक्षा पारिवारिक बिछोह की पीड़ा का प्रभाव मुस्लिम परिवारों पर अधिक हुआ। इस तथ्य की अभिव्यक्ति कई एक कहानियों में हुई है। कमाल विभाजन के समय परिवार की इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान चला जाता है। निश्चित रूप से सुनहरे भविष्य की कल्पना ने ही उसे वहाँ जाने के लिए प्रेरित किया। वहाँ जाकर रहते हुए उसे एहसास होता है कि उसका निर्णय गलत था। अपने भाई से कहता भी है, “जानते हो ख्वाजा पाकिस्तान जाकर मैंने सख्त गलत की। अब्बा कहना मां लेता तो अच्छा रहता। मेरी हालत धोबी के गधे की हो गयी है। न घर का न घाट का। सोचता हूँ मुल्क का बँटवारा न होता तो अच्छा था।“ पर वह तड़पने और पीड़ा सहने के अतिरिक्त कुछ कर भी नहीं सकता है। तड़पते हुए पीड़ा के बीच उसकी मृत्यु हो जाती है। वह चाहता था कि उसको उसके वतन की मिट्टी में ही दफन किया जाय, लेकिन उसकी अंतिम क्रिया में उसके परिवारीजन सम्मिलित तो हो नहीं पाते है, ऐसे में भला उसकी अंतिम इच्छा कैसे पूरी करते? विभाजन के बाद दोनों तरफ के हजारों लोग इसी तरह की अंतिम इच्छा लिए जीने और मरने को विवश थे।

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