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Unmad by Bhagwan Singh: फासीवाद के मनोविज्ञान विश्लेषण का सफल उपन्यास भगवान सिंह का उन्माद

उन्माद : भगवान सिंह

          ‘उन्माद’ उपन्यास भगवान सिंह द्वारा लिखा गया है। उपन्यास के संबंध में डॉ.रोहिणी अग्रवाल कहती है, “भगवान सिंह तो रामविलास शर्मा का हवाला देकर ‘उन्माद उपन्यास को नहीं, बाकायदा इतिहास मानते है। जिसमें सांप्रदायिकता की परिभाषा देने से लेकर उसके उभार हेतु बनाई गई, ‘अनुकूल’ परिस्थितियों का जायजा लिया गया है। अपने खास अंदाज में घटना को लंबा खींचने, बात को घुमाने और कुटिल ढंग से भड़काऊ टिप्पणियाँ करने के कारण हालांकि उपन्यास की आंतरिक बुनावट को वह दुर्बल होने से नहीं बचा सके,लेकिन इतना तय है कि हिन्दू एवं मुसलमान दोनों की आशंकाओं और दुश्चिंताओं को उन्होंने सही परिप्रेक्ष्य दिया है। उनके ख्याल में सांप्रदायिकता ‘इंसोफेलाइट्स नामक एक’ दिमागी बुखार है जिससे रोगी की जान चली जाए तो बेहतर, लेकिन अगर वह बच गया तो उसके वायरस के ‘होस्ट’ है मस्त-मस्त पड़े सुअर और कुत्ते। उल्लेखनीय है कि स्वयं इन पर वायरस का कोई असर नहीं होता लेकिन जब कोई मच्छर उन्हें काट लेता है, तो वायरस उसके शरीर में चले जाते हैं, और फिर वह ‘कैरियर मच्छर’ काट लेता है, जिसे दिमागी बुखार हो जाता है। तो यह जो सांप्रदायिकता है यह भी एक तरह का दिमागी बुखार है। यह जो सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले हैं और ये जो धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले मुल्ले और पंडित होते हैं, ये सभी इस दिमागी बुखार के वायरस को फैलाने की धौंस देकर राजनीतिक सौदेबाजी करते हैं। इनके भीतर पले, वायरस के वाहक हमारे-पढ़े-अधपढ़े छूटभैये मच्छर होते हैं जिसमें तंगदिमाग, बुद्धिजीवी, पत्रकार और अध्यापक भी आते हैं। वे लोग जो अफवाहें फैलाते हैं, झूठी या अधकचरी खबरें उड़ाते हैं।“ वीरेंद्र यादव के अनुसार, “भगवान सिंह सांप्रदायिकता को निश्चित सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण का परिणाम न मानकर इसे मनोविकार व दमित व्यक्तित्व की विकृति परिणतियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं।“ उपन्यास में हिंदुत्ववादी शक्तियां मनुष्य के दिमाग को किस प्रकार बंद कर रही है और उनके दिमाग में सांप्रदायिकता का जहर भरती रही है। कम उम्र से ही यह कार्य संघ-संगठन करते दिखाई देते हैं। उपन्यास में रतन ऐसा ही पात्र है। सातवीं कक्षा से ही रतन के पिता सदानंदजी उसे महान व्यक्तित्व बनाने के लिए संघ की शाखा में भेजते हैं। उनका विचार है कि दुनिया का सारा ज्ञान शाखा में ही है और वहीं से हर आदमी ज्ञानवान बन कर देश की और हिंदू समाज की उन्नति कर सकता है। रतन को रबड़ का थैला समझ कर उसके दिमाग में कई प्रकार की सूचनाएं भरते हैं किंतु रतन को शाखा में जाना अच्छा नहीं लगता। एक दिन पिता से झगड़ा भी करता है और उनसे कहता है कि वहां “मैं तंग हो जाता हूं। अब थोड़ा खुला होना चाहता हूं।“ पिता को यह बात सुनकर धक्का लगता है। वे उसे अपने विचारों में जैसा बना चुके थे वैसा ही बनना चाहते हैं। किंतु रतन स्वतंत्र सोच की शक्ति रखने वाले तर्क के सहारे सभी प्रकार के विचारों को देख-परखकर स्वीकार करने वाला, युवक है। संघ के कार्यों संबंधी उनके कुछ विचार निम्न है। वह बेद अंकल से ही कहता है-

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     “अंकलजी आप लोग एक छोटे-से कोने में तो व्यायाम करते हैं। व्यायाम जरूरी है तो कोना ही क्यों! कोने से बंधे रहने से दिमाग तंग हो जाता है। नजर भी तंग हो जाती है, दुनिया भी तंग हो जाती है।“ संघ की वास्तविकता को रतन यों उजागर करता है “वहां तो कुछ होना ही नहीं था। जो कुछ हो चुका है वही बार-बार दोहराया जाता है। जो खेल पहले दिन खेलने को मिले थे, वही आज भी दोहराए जाते हैं। नया खेल ना सही, पुराने खेल का स्तर तो उठाता। लद्धडपन में कोई कमी तो आती। यहां तो खेल भी वही, खयाल भी वही, दिमाग भी वही, विचार भी वही, लिबास भी वही, मिजाज भी वही।“ इन खेलों, कवायद के पीछे की सोच जानकर रतन बेझिझक पिताजी को कहता है- “सोच है, पिताजी इसलिए तो डर लगता है सोच है, पर समझ को बढ़ाने वाली सोच नहीं है, समझ को कुंद करने वाली सोच है।“ एक ही क्रिया इतनी बार और बिना किसी फेरबदल के कराते रहो कि हम थककर, ऊबकर सोचना बंद करदे। आदमी यंत्रों में बदल जाए। हम यहां सोचना छोड़ दें कि जो कुछ हमसे करने को कहा जा रहा है, और हम चुपचाप करने जा रहे हैं, वह क्यों कहा जा रहा है और हम क्यों करते जा रहे हैं। ठीक सैनिकों की तरह... वहां एक मँजाई होता है, जो उनकी क्रिया को यांत्रिक पूर्णता एक पहुंचा देता है। यह उनकी प्रहार शक्ति को बढ़ाता है।“

     “यदि उसको सांस्कृतिक विरासत मानो तो उसे रेवड़बंदी की विरासत मानना होगा, जिसमें किसी धोखे से आए जानवरों को घेर कर अपनी दौलत बना कर रखा जाता था और जरूरत पड़ने पर जिक्र किया जा सके। हार्डिंग ऑफ ह्यूमन्स। इंसानों की रेवड़बंदी उनकी बात असत्य नहीं लगती।“

     रतन संघ जैसे संगठनों के प्रति यह भावना रखता है कि “आज इस तरह के जितने भी निजी संगठन दुनिया के किसी भी देश में है उनकी एक ही भूमिका है किसी जाति या जन समुदाय को लक्ष्य बनाकर तनाव पैदा करना और समाज को निरंतर अस्थिरता की स्थिति में रखना।“ अंततः रतन की मानसिकता इस कदर हो जाती है कि वह पागल हो जाता है। वह अपने पिता से ही शिकायत भरे भाव से कहता है- “आपने मुझे अपनी महत्वाकांक्षाएँ से कुचल कर रख दिया पिताजी। मुझे आपने अपने सपने की तरह जिंदा रखा और स्वयं उस सपने को बचाने में अपनी जिंदगी भी नहीं जी पाए। मैं भीतर से कितना पिसा हुआ, सौंदा हुआ महसूस करता रहा हूँ, यह न आपने देखा न मैंने कभी चेता।“ “अब मैं, “नींद में भी सपना देखने लगा कि पिताजी हनुमान की तरह मच्छर का रूप धारण करके मेरे कान के मार्ग से मस्तिष्क में प्रवेश कर गए हैं। वहां वह भन्नाते हुए विराट आकर धारण करते चले जा रहे हैं। मेरा मस्तिष्क उनके विशाल होने के साथ ही फैलता चला जा रहा है। वह इतनी तीखी पीड़ा थी कि नींद टूट गई।... अब मुझे पिताजी से सचमुच डर लगने लगा।“ ध्यान रहे, रतन छठी कक्षा से आठवीं कक्षा पहुंचने तक मतलब सिर्फ 13 साल की उम्र तक आते-आते यह विचार रखता है। तनाव से भर जाता है, यही तनाव उसके पागलपन का कारण बनता है। वस्तुतः वह पागल नहीं है, उसे पागल बना कर रखा गया है। रतन के पिताजी सदानंदजी भी अंत में मानसिक रूप से पूरी तरह टूटते हैं। लेखक कहते हैं, “कुछ नहीं रखा है उस बातों में। यदि मेरा अनुमान सही था तो यही एक विकट त्रासदी थी। एक ऐसा आदमी जो हिंदू धर्म पर इतना गर्व करता था, जो धर्मन्तरित हिंदूओं को शुद्ध करके हिंदू बनाने में अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्षों को गंवा चुका था, वह अपने ही पुत्र को धर्मांतरण के कगार पर खड़ा देखकर मुस्करा रहा था कि क्या रखा है, इन सब में।“ लेखक एक प्रकार से शुद्धि कार्यक्रम की विफलता को ही अंकित कर रहा है।

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     सदानंदजी, “वह अपने जीवन को अपनी समझ से उच्चतम आदर्शों और पवित्रतम ध्येय को समर्पित करके जीते रहे। भले कर्म के कारण आदमी को जिन भी कठिनाइयों का सामना करना पड़े, जितना भी विरोध सहना पड़े उसका परिणाम अंततः भला ही होता है। हृदय की सच्चाई पर समाज की नजर भले न जाए, ईश्वर से कुछ छुपा नहीं रहता। इसी विश्वास को लेकर वह जीते रहे थे और पुरस्कार के रूप में मिला पक्षघात, पुत्र का पागलपन, इतनी होनहार पुत्री का वैदव्यवत कौमार्य, पुत्री के आय पर जीवन निर्वाह। इन सभी ने उन्हें भीतर से इस तरह तोड़ दिया था कि वे सभी आदर्श और आग्रह जिन्हें वह उतनी दृढ़ता से पकड़े रहे थे, इन्हीं के साथ टूट गए थे।“

     उपन्यास में रतन एक ऐसा संगठन में जिबह हो रहा है किंतु क्रमशः लेखक ने उसे मार्क्सवाद की ओर झुकता दिखाया है। तर्क के बल पर धीरे-धीरे वह सांप्रदायिक संगठन से दूर होने की सोचता है। पहली बार चिंतमणि का प्रवचन सुनते समय शब्दों की जादूगरी हेराफेरी से निहित अर्थ की प्रभावात्मकता को जानना प्रारंभ करता है। उसे याद है पिताजी के शब्द की “दो शब्दों का अर्थ एक ही नहीं होता। होता तो दो शब्दों की आवश्यकता क्यों होती है।“ रोहिणी अग्रवाल ने सही कहा है कि, “लेखक की मान्यता है कि रतन जैसे मेधावी किंतु अपरिपक्व मस्तिष्क को प्रारंभ से ही धर्मांध शक्तियां अपने हाथ का मोहरा बनाने को कटिबद्ध है।“ वस्तुतः रतन इस बात को जानता है कि “जो केवल दूसरों की बातें सुनकर, उसका सार जाने बिना रह लेता है, वह उस खूंटी के समान है जिस पर का ज्ञान लटक रहा होता है वह स्वयं जहां गड़ा हुआ है, वहीं पड़ा हुआ है।“ लेकिन बाद में वह पूरी तरह सचेत-सतर्क होकर पिताजी उसे जिस ढंग का बनाना चाहते थे, उसका विरोध करता हुआ कहता है-

     “इतना श्रम करके आपने मुझे जिस योग्य बनाया है, अब उस योग्यता का प्रयोग करते हुए स्वयं सोचना और निर्णय करना चाहता हूँ।“ वह बनने की कोशिश में जुड़ जाता है। धीरे-धीरे वह मार्क्सवाद के दर्शन की ओर आकर्षित होता है। किंतु अंत में वह एक सही धर्मनिरपेक्ष छवि में हमें दिखाई देता है। धर्म की दीवारें उससे छूटती है, टूटनी है और वह अबिदा का प्यार पाने के लिए मुसलमान होना भी कबूल करता है और अबिदा भी पागल बने रतन के साथ रहने को इच्छुक है, किंतु मुसलमान बने रतन के साथ नहीं।

     अर्थात यह स्पष्ट है कि आज “सांप्रदायिकता का प्रश्न चूंकि किसी भी जाति अथवा कौम की अपनी पहचान और अस्मिता से गहरा जुड़ा है, इसलिए सबसे पहले लेखक अबिदा के अब्बा से सहमत होते हुए आम आदमी या पाठक को यह समझा देना जरूरी समझता है कि “हिंदू हो या मुसलमान या क्रिस्तान या यहूदी या आदिवासी सभी को अपनी ख्याल, अपने आदर्श, अपने समाज की खराबियों की ओर से मुँह मोड़ कर और सिर्फ उसकी खूबियों पर निगाह गाड़कर और उन्हें दूसरों में न पाकर अपने को दूसरों से ऊंचा साबित करना मजबूरी बन जाती है।“

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     उपन्यास व्यक्ति और तंत्र के संघर्ष की कथा है। व्यक्ति जो तंत्र की रचना करता है, और तंत्र जो व्यक्ति को निगल जाता है, की कहानी प्रस्तुत की है भगवान सिंह ने। रोहिणी अग्रवाल के शब्दों में “सांप्रदायिक ताकतों के संगठन का इतिहास।“ है उन्माद। सांप्रदायिक मानसिकता का पर्दाफाश करता है उपन्यास। सांप्रदायिकता के सभी अंगों पर चर्चा सशक्त रूप में इसी उपन्यास में पाई जाती है। फिर चाहे वह धर्मशास्त्र हो या राजनीति शास्त्र या समाजशास्त्र जो सांप्रदायिकता का पोषण करने में कारगर साबित हो रहे हैं। व्यक्ति, खासकर सांप्रदायिक मनोवृति वाला उन सबका उपयोग बड़ी चालाकी से कर रहा है।

     सांप्रदायिक विरोध ने भी उपन्यास में दर्ज है। अबिदा के अब्बा रतन का अंतिम चरित्र, मनोज आदि पात्र उसके वाहक है। “उन्माद के कट्टरपंथी रतन के जीवनाभावों से सबक लेकर सेकुलर बनने की क्रमिक प्रक्रिया को दर्शाया है (जहां विवेकजनित तार्किकता के कारण उस (रतन) जैसा हर व्यक्ति पागल हो जाने को अभिशप्त है)” धर्मनिरपेक्षता का समर्थक है ‘उन्माद’ लेकिन उनका कहना है कि “तुम धर्मनिरपेक्ष तभी हो सकते हैं हो जब वह धर्मनिरपेक्षता को ही एक धर्म बना दिया जाए।“ रोहिणी अग्रवाल ने ठीक लिखा है- “मतलब की बुनियाद ईश्वर पर नहीं, शक और नफरत पर टिकी है, और जिस तरह व्यक्ति विश्व-नागरिक नहीं हो सकता, उसी तरह धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता। ज्यादा से ज्यादा दूसरे संप्रदाय के कुछ मूल्यों में बाहरी तत्वों से समर्थन मिलने का विश्वास बढ़ेगा, प्रतिक्रियात्मक स्थिति पुनः घातक होगी। इसलिए अबिदा के रूप में चित्रित उदारवादी सोच के साथ जुड़कर वे मानते हैं कि हर इंसान को आदर्श की तलाश अपनी कौम से बाहर करनी चाहिए।“ तभी वह कुछ मूल्यवान हासिल कर पाएगा का विश्वास लेखक व्यक्त करता है।

     उपन्यास मनोविश्लेषणवादी होने के कारण फासीवाद के मनोविज्ञान का विश्लेषण करने में सफल रहा है। वीरेंद्र यादव का कहना समीचीन है कि “फासिज्म को दमित व्यक्तियों की विद्रोही मनोरुग्नता के रूप में ग्रहण करते हुए भगवान सिंह फासिज्म का जो तर्क गढ़ते हैं, उसकी जड़े वृत्ति के अवचेतन मन और समाज के हजारों वर्षों के इतिहास तक विस्तृत है।“ उपन्यास की कथावस्तु में कई अंतर्विरोध है, जिसे वीरेंद्र यादव अपने लेख ‘महज’, ‘उन्माद’ नहीं है फासीवाद में व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार यह विल्हेम राइश की पुस्तक ‘दि मास साइकोलॉजी आफ फासिज्म’ से मेल खाती है जिसकी विस्तृत चर्चा करते हैं।

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