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वेल इन टाइम से वेलेन्टाइन तक: बी. एल. आच्छा

नई दुनिया में प्रकाशित रचना

वेल इन टाइम से वेलेन्टाइन तक
बी. एल. आच्छा
 
        पीढ़ियाँ कुनमुनाती हैं। नयों को देखकर पुराने। जेनेरेशन गैप में पुरानों से टोकियाते जाते नये लोग। और पुरानेपन को चमड़ी पर से खुरांट की तरह निकालते नये परिंदे। वेल इन टाइम से माता-पिता द्वारा परोसे गये प्रेम वाली पुरानी पीढ़ी। और चढ़ती उमरिया के साथ पाये गये प्रेम की वासंती पीढ़ी ।वे तिथि या डेट से बंधे थे, ये डेटिंग के इन्तजार में | सारी फ्रेम ही बदल गयी प्रेम की। नयी बहू के लिए पहले गांव-कस्बे ही जिंदगी भर के घूँघट बन जाते थे। तब जोड़ियां ऊपर से बनकर आती थी, अब लव-जोड़ियाँ लव-बर्ड बनती हुई अपनी धरती अपना आकाश रचाती हैं।
          भीतर की कुनमुनाहट की फोटोग्राफिक इसीजी की जा सके तो प्रेम के समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में रंगी पुरानी पीढ़ी की मचलाहट भी असल रंग बिखराएगी। अजीब है न! कभी नवगजी - पांचगजी साड़ियां गीतों की तर्ज बन जाती थी "तेरी चुनरी लहराई बरसात हो गयी"। मगर उसी की उत्तर- पीढ़ी जब सलवार सूट में सुरम्य वादियों में गाती है- "ये कहाँ आ गये हम, यूँ ही साथ (Chalte-Chalte) चलते-चलते"! पुराने मन भी इस उन्मुक्त रागिनी में डोलेवाली पालकी के मरहब्बा से निकलकर हवाओं में तैरने लगते हैं। नवागत लवजोड़ियाँ भले ही "अस्सी कली का घाघरा" के साथ तालमेल न बिठा पाये, पर शादियों में तो 'बेस पसन्द है' में ही फोटोग्राफी शॉट मारती है। पिछली पीढ़ी में बनजारा तन, मगर नयी पीढ़ी में बनजारा मन। और यह बनजारा मन तो भांगड़ा या यो-यो राग-रंगों की बॉडी लैंग्वेज में ही बॉलीवुड का किरदार बन जाता है।
कजरारे- कजरारे के साथ। लोग कहते हैं कि वृद्ध अतीतजीवी होते हैं और युवा भविष्यजीवी ! मगर जब से बॉलीवुड हर आम में उतर आया है, तो वृद्ध भी भीतर में डान्सिंग और युवा जिस्म-जां में पिघलते हुए। आँखों में फेंटेसी तैरती रहती है। चांद तक पुराना लगता है। उपमान भी मैले। उनके अर्थ- देवता भी कूच कर जाते हैं।
         कितनी घूमती है दुनिया। कब एटलांटिक लहरें हिन्द महासागर में खो जाती हैं और कब प्रशान्त-हिंद महासागर की लहरें अमेरिका में रास रचाती हैं। हीर-राँझा भी "अराउण्ड द वर्ल्ड" या "लव इन टोकियो" में 'सायोनारा'गाने लगते हैं। विदेशी लव जोड़ियां भारत के 'बेस-परिधान' में पुष्कर में सात फेरों का रास रचाती हैं। फिर गंगा आरती में दांपत्य के स्थायित्व की मंगलकामना।यह रस्मों की फोटोग्राफिक मुग्धता है या स्थायी प्रेम रोग का भारतीय रसायन? पता नहीं।पर जन्म-जन्मांतर वाली भूमि पर जितने प्रेम के गीत बजे हैं,उसमें तलाक भी चुप नहीं बैठा है- 'अब तक तो जो भी दोस्त मिले, बेवफ़ा मिले।' एटलांटिक लहरें स्थायित्व की तलाश में भारतीय किनारों को छूती हुई। मगर अटलांटिक लहरें हिंदमहासागर को तलाक का पाठ पढ़ाती हुईं।
         अपनी प्रायवेसी के लिए बुजुर्गों को वृद्धाश्रम का रास्ता दिखाती 'लव जोड़ियां' खूब गाती हैं- "ये मौसम की बारिश, ये मौसम का पानी, ये पानी की बूँदे, तुझे ही तो ढूंढे।" नये इलु-इलु में रास रचाती हैं- रोज डे, प्रोपोज डे
सब डे ही डे। और प्रोपोज की भी मुद्राएँ- घुटने को धरती पर लगाकर हाथ में गुलाब। क्या बात है? ऐसा नहीं कि भारत में ऐसा न हुआ हो। पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रेम का जन्म-जन्मान्तर रचने वाले शिव कहते हैं- "क्रीतोस्मिदास:! मैं तुम्हारा खरीदा हुआ गुलाम हूँ?" तो सारा नारी-विमर्श ही भौंचक्का रह जाता है।मगर बजता रहता है पूरब का डमरू पश्चिम में और पश्चिम का डमरू पूरब में।

बी. एल. आच्छा
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