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Vishnu Prabhakar ki Kahaniyan: अगम अथाह और अधूरी कहानी

अगम अथाह : विष्णु प्रभाकर

           विष्णु प्रभाकर कृत ‘अगम अथाह’ विभाजन कालीन हिंसा के कारण पारिवारिक विघटन की घटना को आधार बनाकर लिखी गयी कहानी है। कथा के केंद्र में एक वृद्ध दंपत्ति का परिवार है। दिल्ली के दंगों के दौरान उसका एक मात्र युवा पुत्र मर जाता है। वह इस बात को जानता है, इसके बावजूद वह पुत्र वापस आ जाने की झूठी आशा के संबल पर दर-दर भटकता पत्नी और स्वयं को सांत्वना देता रहता है। बजाहिर वह हिम्मत और सहनशीलता का परिचय देता है, परंतु मानवीय संवेदना की नैसर्गिक प्रवृत्ति के परिप्रेक्ष्य में उसकी यह स्थिति पीड़ा के उत्कर्ष का बयान है। दरअसल किसी वृद्ध के जीवन की इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि, युवा और इकलौते पुत्र की मौत की हकीकत जानने के बावजूद उसे स्वीकार न करने के लिए विवश हो। उल्लेखनीय यह कि सांप्रदायिक उन्माद के समय उसी धर्म की अनदेखी हो रही थी, जिस धर्म की आड़ लेकर इतना बड़ा षड्यंत्र रचा गया। निजी स्वार्थी की भावना भी विभीषिका को बढ़ाने में कार्यकारी भूमिका निभा रही थी। फासद में राजनीतिज्ञों की अवसरवादी भूमिका भी कहानी के माध्यम से उद्घाटित हुई है। विभाजन के कारण पारिवारिक बिखराव की पीड़ा हिन्दू समाज की अपेक्षा मुस्लिम समाज को अधिक अभिशप्त किये हुए थी। चलती फिरती लाश के रूप में प्रस्तुत मुस्लिम समाज का मार्मिक चित्रण कहानी को विशिष्टता प्रदान करती है।

अधूरी कहानी : विष्णु प्रभाकर

           विष्णु प्रभाकर की और एक कहानी ‘अधूरी कहानी’ है। एक छोटा-सा बच्चा अहमद, दिलीप और उसकी माँ को उन्हीं की ओर से प्राप्त दूध से बनी ईद की सेवईयां देने, उनके घर जाता है। परंतु जब Dilip के बड़े भाई और माँ की यह बात सुनकर परेशान होता है कि “बच्चे!’ तुम बहुत अच्छे हो। परमात्मा तुम्हें खुश रखे। लेकिन हम हिन्दू लोग तुम्हारे हाथों का छुआ खाना पाप समझते हैं।“ तब अहमद का दिल टूट जाता है। वह न ‘हिन्दू’ को समझता, न ‘मुसलमान’ को। वह इस प्रकार के भेद से परे है। पर दिलीप और उसकी माँ’ ने ‘दूध’ के रूप में उसके दिल में जो मोहब्बत पैदा की थी वह टूट जाती है। हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव की बातों सुनकर धार्मिक पवित्रता, रूढ़ि, पाखण्ड ओर अड़े रहने वाले कभी एक नहीं हो सकते। वे भले ही किसी के प्रति स्नेह रखते हों किन्तु उसे अपना नहीं मान सकते, न ही उसके साथ अपनों जैसा व्यवहार कर सकते हैं।

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     अपने छोटे बेटे और भाई के हिस्से का दूध देकर अहमद और उसकी माँ के मन को जो गहरा संतोष दिलीप और उसके माँ ने दिया था, वह पलभर में ही चकनाचूर हो जाता है। यह कहानी धार्मिक पवित्रता और उसके कारण हिन्दू-मुस्लिम में होनेवाले भेदभाव को हमारे सामने लाती है। पाकिस्तान बन जाने के बाद भी इसका हल नहीं हुआ। दो धर्मियों के बीच पवित्रता को लेकर जो खाई हमेशा रही है, मुहब्बत भी उसे पाट नहीं सकी किंतु उसे पाट लेने का विश्वास, बड़े होने पर, अहमद साहब और एक हिन्दू साहब रखते है।

     कहानी हिन्दू-दलितों के प्रश्न को भी व्यक्त करती है। हिन्दू जिस प्रकार व्यवहार मुसलमानों के साथ करते हैं, ठीक उसी प्रकार का व्यवहार दलितों के साथ भी करते है। मुसलमानों के साथ नौ सौ बरसों से हिन्दू नफरत करते आये हैं तो अछूतों के साथ पाँच हजार वर्षों से। हिन्दू साहब के अनुसार देखो “तो मुसलमानों ने उन पर जुल्म किये।“ परंतु दलितों ने किस प्रकार के जुल्म किये हैं? वे तो सदियों से जुल्म सहते ही आये है...।“ यह सच्चाई भी इस कहानी में व्यक्त हुई है।

     सत्ता हर किसी पर जुल्म करती है। जो शासक होता है, वह जुल्म करता ही है। कुछ अपवाद होंगे पर हिन्दू हमेशा ताकतवर और वर्चस्ववाद रहें है। इसलिए वे जब-जब चाहेंगे कि समाज, राजनीति, अर्थतंत्र, धर्मसत्ता पर उन्हीं का अधिकार होना चाहिए तब-तब हिन्दू-दलितों के बीच टकराहट, संघर्ष और हिंसा अनिवार्य होगी। शासक होना उदार होना अलग-अलग बात है। क्षमाभाव रखना अलग बात है। मुहब्बत दुनिया से नफरत को मिटाती है। कभी-कभार गलतफहमियों से “उस पर परदा पड़ जाता है।“ तो उसे दूर करने का विश्वास भी लेखक रखता है।

     यह कहानी प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ के हमीद को याद दिलाती है। उसकी मासूमियत की याद दिलाती है। बच्चे धार्मिक भेद-भाव से परे होते हैं। इसी सच्चाई को कहानी व्यक्त करती है।

संदर्भ;

विष्णु प्रभाकर- धरती अब भी घूम रही है

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