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Trasadi ka Arth aur Swaroop: त्रासदी का अर्थ और स्वरूप

त्रासदी का अर्थ : Meaning of Tragedy

      त्रासदी शब्द ‘त्रास’ से बना है। कैलाशपति ओझा ने त्रास शब्द से सात अर्थ स्पष्ट किए हैं, उनके अनुसार ‘त्रास’ शब्द की आत्मा में कंपन, वेग और गत्यात्मकता के भाव सन्निहित है। त्रास शब्द के सात अर्थ है –“वेग, मणि का दोष, सरकना या फिसलना, पीड़ा या वेदना, भय, कंपन और चकित होना।“

कौशलपति ओझा के अनुसार दिए गए त्रासद अर्थात त्रास शब्द के सात अर्थों को सरल रूप विश्लेषित कर सकते हैं।

(१) वेग- अर्थ गति। यह मानसिक भावनाओं की गति जिसमें विचारों और भावनाओं का द्वंद्व चलता है और दुःख की कोई सीमा नहीं होती।

(२) मणि का दोष- त्रासद कथा के नायक को ‘मणि’ कहा जाता है उसमें सभी नायक के गुण मौजूद है, लेकिन वह भाग के चक्रव्यूह में फंस कर गलती कर बैठता है उसे मणि का दोष कहा जाता है।

(३) सरकना या फिसलना- नायक से गलती होना या अपने पथ से विचलित होना फिसलना कहलाता है।

(४) पीड़ा या वेदना- अपने कार्य के अनुसार उसका पूरा फल ना मिलने पर भाग्य के कारण दुःख भोगना पीड़ा या वेदना कहलाता है।

(५) भय- आने वाला हर समय भय का आभास करवाता है तो दुःखी व्यक्ति भाग्य को बलवान मानकर भयभीत रहता है।

(६) कंपन- भय के परिणाम स्वरूप शरीर का थरथराना कंपन कहलाता है।

(७) चकित होना- नायक अपने भाग्य को परिश्रम से श्रेष्ठ मानता हुआ अंत में चकित हो जाता है।

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   त्रासदी को सामने लाने वाला पहला अरस्तु का काव्यशास्त्र है। अरस्तु की त्रासदी की परिभाषा अनेक समय के और उनसे पहले त्रासदीकारों की विशिष्ट रचनाओं के लक्षणों का पूर्ण योग है।

  त्रासदी कार्य की अनुकृति है। सभी कलाओं के समान त्रासदी भी अनुकरण पर आधारित है। कार्य की गंभीरता एवं भाषा, लय, ताल, गति आदि से भी अलंकृत होती है।

त्रासदी – स्वरूप: Nature of Tragedy

      त्रासदी का स्वरूप दुःखात्मक एवं सुखात्मक दोनों प्रकार का होता है। लेकिन सुखात्मक से अधिक दुःखात्मक अंत को अधिक महत्व दिया गया है जिसमें समाहित करुणा और भय के तत्व आनंद को उत्पन्न करते हैं। दुःखात्मक का अंत से एकाग्रता उत्पन्न प्रदान करता है। इससे स्थाई आनंद की प्राप्ति होती है।

     त्रासदी को करुण रस बताया गया है और इसमें चिंता, दीनता, ग्लानि, रुदन, जड़ता व्याधि और मरण उभर कर सामने आते हैं। विद्वान ने भी सुखात्मक से दुःखात्मक पक्ष में है। त्रासदी साहित्य सिद्धांत और रचनात्मक दोनों स्वरूपों में जैसे-जैसे पल्लवित होने लगा वैसे-वैसे पुरानी मान्यताएं समाप्त प्रायः होने लगी।

    त्रासदी का प्रयोग भीष्म साहनी के ‘तमस’ उपन्यास में हुआ है। इसमें त्रासदी के भिन्न रूपों का प्रयोग हुआ है। इसमें कहीं सामूहिक त्रासदी है तो कहीं व्यक्तिगत, दैवी प्रकोप है तो कहीं राजनीतिक त्रासदी। उनके उपन्यासों में भारत के नगरों और महानगरों में रहने वाला मध्यवर्ग त्रासदीय घटनाओं का केंद्र बना हुआ है। समाज में पाए जाने वाले विवाह पूर्व व विवाहेतर वैयक्तिक त्रासदी के विभिन्न रूपों को जन्म देते हैं। विचार बिंदुओं के कारण अपने भयानक रूप को ग्रहण कर लेती है। पति-पत्नी के संबंधों में कटुता, वर्ग-विषमता, सांप्रदायिकता, आर्थिक अभाव, धार्मिक कट्टरता, बाह्य प्रेम व राजनैतिक दांव-पेंच त्रासदी को उत्पन्न करते हैं। इन्होंने टूटे मानवीय संबंधों को त्रासदी के रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रकार वर्ग विषमता, दुःख ग्लानि, जड़ता, व्याधि आदि के स्वरूप को दर्शाया गया है।

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