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Communalism in India : सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि और भारत में सांप्रदायिकता

सांप्रदायिकता : पृष्ठभूमि

          सांप्रदायिकता का प्रचार करने वाली शक्तियां इतिहास का सहारा लेकर यह सिद्ध करने का प्रयास करती है कि सांप्रदायिकता का संबंध हमारे इतिहास से है। जो कुछ अतीत में घटा था आज वही हरकतें फिर से दोहरानी चाहिए। आधुनिक सांप्रदायिकता ऐतिहासिक अतीत का सहारा लेकर बौद्धिक स्तर पर अपना औचित्य सिद्ध करने का प्रयास करती है। हिंदू संप्रदायवादी प्राचीन काल के आदर्श हिंदू समाज का चित्र पेश करके उसे आज की परिस्थितियों के समानांतर रखते हुए उनके दुर्गुणों का सारा दोष मुसलमानों के आगमन को देते हैं। इसी प्रकार मुस्लिम संप्रदायवादी यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हिंदू और मुसलमानों के बीच अलगाव की प्रक्रिया मध्य काल के आरंभ अर्थात 11वीं या 13वीं शताब्दी से ही आरंभ हो गई थी और कालांतर में यह भयंकर विस्फोट के रूप में फूट पड़ी।

     सांप्रदायिक ताकतें इतिहास को विकृत करके पेश करती है ताकि वे अपना औचित्य सिद्ध कर सके। वे यह दलील पेश करती है, अतीत में मुसलमान ताकतों ने हिंदू मंदिर तोड़े थे अतः आज हमें अतीत में हुई उन गतिविधियों का बदला लेना चाहिए। वे शिवाजी और औरंगजेब मध्य हुए युद्ध सत्ता प्राप्ति का युद्ध न मानकर उसे धार्मिक युद्ध के रूप में चित्रित करके हिंदू जनता को बरगलाने का प्रयास करती है। शिवाजी एक राजनीतिक शासक के रूप में न आकर हिंदू धर्म के संरक्षक के रूप में आते हैं और औरंगजेब एक सत्तानवीस मात्र न रह कर एक कट्टर मुसलमान बन जाता है जिसका एकमात्र उद्देश्य हिंदूओं को दुःख देना और उन पर जजिया लगाकर उन्हें प्रताड़ित करना मात्र रह जाता है।

     यह ताकतें एक सोची-समझी साजिश के तरह इतिहास के खास चरित्रों को चुनती है तथा उन्हें हिंदू धर्म के संरक्षक के रूप में पेश करती है। राणाप्रताप, शिवाजी जो सभी हिंदू दायरे के अंतर्गत शामिल किए जा सकते हैं उन्हें मुसलमानों के खिलाफ लड़ने वाले के रूप में प्रचारित किया जाता है और इनके राजनीतिक संघर्ष को धार्मिक संघर्ष का जामा पहना दिया जाता है। इस तथ्य को भुला दिया जाता है कि मोहम्मद गोरी ने धन के लालच में सोमनाथ पर आक्रमण किया था। याद रखी जाती है तो सिर्फ एक बात की वह एक मुसलमान था। लोग यह भूल जाते हैं कि पृथ्वीराज के साथ आखरी युद्ध में अगर वह जीता तो उसका कारण भारतीयों की आपसी फूट थी। हम इतिहास से सबक न लेकर की आपसी फूट का परिणाम कितना बुरा होता है आज उन मुसलमानों पर कहर ढाने से, उनकी धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने से जरा भी नहीं हिचकते जिन्होंने भारतीयता को पूर्णतया स्वीकार कर लिया है। वे भी अपना परिचय भारतीय कहकर देते हैं। उनकी राष्ट्रीयता भी भारतीय ही है। उन्हें पराया मानकर एक अर्थ में हम अपनी राष्ट्रीयता का ही अपमान करते हैं। सांप्रदायिक ताकतों की बहकावे में आकर जब हम मुसलमानों को नुकसान पहुंचाने की सोचते हैं या पहुंचाते हैं तब वस्तुतः हम अपने ही एक हिस्से पर आघात करके उसे विकलांग बनाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं।

    सांप्रदायिकता फैलाने में उन इतिहास लेखकों की मुख्य भूमिका रही है जो धर्म को आधार बनाकर काल-विभाजन करते हैं और ऐतिहासिक तथ्यों को धर्म-विशेष के पक्ष या विपक्ष में तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। जेम्स मिल नामक सुप्रसिद्ध इतिहासकार ने ब्रिटिश भारत का इतिहास (हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया) के माध्यम से भारतीय इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या की शुरुआत की और द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान की। उसने भारतीय इतिहास को तीन कालों में विभाजित कर उन्हें धार्मिक आधार पर बांटा दिया-

(१)हिंदू सभ्यता (२)मुस्लिम सभ्यता (३) ब्रिटिश सभ्यता

    यही काल-विभाजन बाद में द्वीराष्ट्र सिद्धांत का प्रेरक बना और धर्म के आधार पर भारत को दो भागों में बांट दिया गया। राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने भी ‘मिल’ की इस गलती को नहीं सुधारा जिसका खामियाजा भारत को आज तक भुगतना पड़ रहा है।

     कुछ ऐसा भी इतिहास लेखक हुई है जो मुसलमान शासकों के चरित्र को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं। इतिहास कई बार सत्ता में बने व्यक्ति के धर्म से भी प्रभावित होता है। सत्ता में अगर हिंदू शासक होता है तो उस समय के इतिहास में उसकी विरुदावली सुनाई पड़ती है और प्रशंसा में इतिहास के पृष्ठ भरे मिलते हैं। समकालीन इतिहासकार बहुत कम ही निष्पक्ष भाव से इतिहास लेखन करते हैं और उनकी गलतियों का लाभ उठाती है सांप्रदायिक ताकतें। सत्ता में आई सरकार अगर सांप्रदायिक है तो वह भी इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश करती है।

भारत में सांप्रदायिकता (Communalism in India)

          सांप्रदायिकता में हिंदू और मुसलमानों के मध्य होनेवाले धार्मिक वैमनस्य और फसादात की बात ही ऊपर कर आती है।

        जब हम भारत के इतिहास पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि भारतवर्ष पर विभिन्न जातियां आक्रमण करती गई और उसकी संस्कृति में स्वयं को विभिन्न करती गई। भारत में ही बौद्ध, जैन और हिंदू धर्मों के बीच अस्तित्व रक्षा के लिए संघर्ष हुआ करते थे। विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच होने वाले झगड़ों को सांप्रदायिक नहीं कहा जाता, वे या तो धर्म युद्ध कहे जाते थे या जातीय संघर्ष। उनका सारा संघर्ष राजनीतिक अथवा जातीय संघर्ष की संज्ञा से अभिहित किया जाता है।

     कुछ इतिहासकार सांप्रदायिकता की वकालत और उसके औचित्य की व्याख्या करने के उद्देश्य से यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि सांप्रदायिकता का जन्म मध्यकाल में मुसलमानों के आगमन और उनके भारत में राज्य करने की प्रक्रिया के साथ ही हो गया था।

    यह वास्तविकता है कि मुसलमानों ने भारत पर शासन किया और उनकी कुछ ऐसी विशेषताएं थी जिनके कारण वे भारतीय संस्कृति में उस प्रकार घुल-मिल न सके जिस प्रकार भारत में आई अन्य जातियां घुल-मिल गई।

    प्रो. हरबंस मुखिया के अनुसार –“भारतीय संस्कृति प्रारंभ से ही सहिष्णु और उदार सी है और हर नए तत्व को उसने शत्रुता दिखाने के स्थान पर अपने भीतर समेटने की उदारता दिखाई है। अतीत में जितने भी विदेशी तत्वों भारत आए जैसे यूनानी, हूण, शक आदि उन सबने कालचक्र में अपने अस्तित्व को भारत की मुख्य धारा में विलीन कर दिया और भारत ने भी बाहें फैलाकर उनका स्वागत किया। लेकिन मुसलमान पहले विदेशी तत्व थे जिन्होंने बड़े आक्रमणात्माक ढंग से अपना पृथक अस्तित्व कायम रखा और भारत की मुख्य धारा में विलीन होने से विमुख रहे। बल्कि उन्होंने स्वयं उस मुख्यधारा को ही राजनैतिक सैनिक शक्ति का प्रयोग कर अपने रंग में रंगाने की कोशिश की या फिर अधीन रखने की चेष्टा में लगे रहे। यही से सांप्रदायिकता का प्रादुर्भाव होता है जिसकी जीती-जागती तस्वीर हम आज भी रोजमर्रा जीवन में देखते हैं।“1

     प्रो. हरबंस मुखिया लिखते है –“वास्तविकता तो यह है कि भारतीय और मुस्लिम जीवन धाराओं में परस्पर इतना विरोध है कि लगभग एक हजार साल तक एक साथ रहकर भी उनमें सामंजस्य की भावना नहीं उभरी।“2

    प्रो. मुखिया की बात से पता चलता है कि मुसलमानों और हिंदूओं के बीच कुछ ऐसी दीवारें थी जैसे मुसलमानों का गौ-मांस-भक्षण और मूर्ति पूजा हेय दृष्टि से देखना जो उन्हें समन्वित होने से रोकती रही लेकिन यह बात उस समय इस हद तक गंभीर भी नहीं थी। इतिहास का बारीकी से अध्ययन करने पर यह बात सिद्ध हो जाती है कि उस समय मुस्लिम शासक और हिंदू जनता का संबंध शासक और शासित का था, हिंदू और मुसलमान का नहीं। मध्यकाल में जब मुस्लिम शासक थे तब हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता का कोई अस्तित्व नहीं था। वस्तुतः जब हम ऐतिहासिक तथ्यों को संप्रदायवादी दृष्टिकोण से देखने लगते हैं तो तभी हम यह बात कह सकते हैं कि मध्यकाल में सांप्रदायिकता का अस्तित्व था।

    वस्तुतः सांप्रदायिकता बिल्कुल आधुनिक घटना है। इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद और उनकी ‘फूट डालो राज्य करो’ की नीति के तहत ही भारत में सांप्रदायिकता का जन्म और विकास हुआ, सांप्रदायिकता ही देश विभाजन का कारण बनी और उसके बाद भी विकराल रूप धारण कर भारतवासियों को त्रस्त करती रही और आज तक कर रही।

    भारत में सांप्रदायिकता इस अर्थ में आधुनिक घटना है कि यहां ब्रिटिश शासन के उदय के साथ सामाजिक, आर्थिक संरचना और फलस्वरूप विभिन्न समुदायों के बीच और खासतौर पर हिंदूओं और मुसलमानों के मध्य राजनीतिक संबंधों में बदलाव आने लगा। जब सामंती जनतांत्रिक आए तो अचानक सांप्रदायिकता भी सामने आई। आजादी के बाद भी यह हमारी मुख्य समस्या बनी रही और ज्यों-ज्यों उन्नति करते जा रहे हैं उतनी ही यह समस्या बढ़ती जा रही है।

    भारत के इतिहास पर दृष्टि डालने पर पाते हैं कि सांप्रदायिकता का जन्म अंग्रेजों के हाथों से हुआ। ब्रिटिश कालीन भारत के लगभग 200 वर्ष के इतिहास का गंभीरता से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनका सुदीर्घ और सफल शासनकाल तलवार के स्थान पर एक ऐसा सुदृढ़ स्तंभ पर टिका हुआ था, जिसके प्रमुख आधार कूटनीति और विभाजन नीति थे।

    उन्होंने हमारे देश में जो भी सामाजिक, शैक्षणिक और औद्योगिक सुधार योजनाएं बनाई और लागू की उसमें उनका मुख्य उद्देश्य था अंग्रेजी शासन को दृढ़ता प्रदान करना तथा उसका विस्तार। लेकिन इसके साथ ही वे इस तथ्य को अच्छी तरह जानते थे कि विभाजन की नीति अपनाए बिना मिट्टी भर अंग्रेजों के बलबूते पूरे भारतवर्ष पर शासन कर पाने में सफल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने यह अनुभव कर लिया था कि सारा भारतवर्ष अनेक धर्मावलंबियों का घर होते हुए भी सांस्कृतिक एकता का घोतक है। सारे भारतवासी धर्म, भाषा व जातिगत पार्थक्य होते हुए भी विदेशी सत्ता के विरुद्ध एक सूत्र में बांधकर विद्रोह कर सकते हैं। उदाहरण के लिए भारत में मुसलमान, ईसाई और पारसी तथा अन्य लोगों का धार्मिक और सामाजिक विषयों में अलग-अलग समुदाय है जिसके फलस्वरूप एक दूसरे से विभिन्न मसलों पर उनके टकराव हुए हैं और प्रतिशोध के लिए उन्होंने तलवारें भी उठाई है लेकिन इन छिटपुट झगड़ों के बावजूद भी कई वर्षों से इस पवित्र भूमि पर न केवल साथ रहे हैं बल्कि बाहरी आक्रमणकारियों का एकजुट होकर मुकाबला भी करते रहे हैं।

    भारतवर्ष के इन सारी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश राज्य सरकार ने यह आवश्यक समझा कि विभिन्न समुदाय वाले देश भारतवर्ष में जिसमें हिंदू और मुस्लिम दो प्रमुख संप्रदाय हैं उन के मध्य एक ऐसी सांप्रदायिक चिंगारी सुलगा दी जाए जिससे इस देश में नफरत की आग फैल जाय, गृह-कलह व्यापार हो जाए और उनका शासन सुदृढ़ बना रहे।

   अपनी भेद नीति के तहत अंग्रेजों ने प्रमुख मुस्लिम नेताओं जिन्ना, सर सैयद अहमद खां आदि को अपने प्रभाव में लाना शुरू किया। फलस्वरूप मुसलमान कांग्रेस से कटने लगे। वे उस हिंदूओं की जमात कह कर स्वतंत्रता के युद्ध में हिंदूओं से अलग हो गए। जिन हिंदू मुसलमानों ने मिलकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था, वे ही अंग्रेजों के बहकावे में आकर भूल गए कि वह भारतवासी है और जो द्वीराष्ट्रवादी सिद्धांत के आधार पर अपने लिए एक अलग देश की मांग करने लगे।

   मुस्लिम लीग की स्थापना तथा मुस्लिम सांप्रदायिकता को जिस प्रकार बढ़ावा अंग्रेजों द्वारा दिया गया, उससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन से दूर करना ब्रिटिश अधिकारियों की कूटनीतिक कुचक्र परिणाम था। वस्तुतः मुसलमानों को ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रेरित किया और इन्हीं अधिकारियों ने शिमला और लंदन में कुचक्र द्वारा मुसलमानों के प्रति विशेष कृपा दर्शा कर हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों में विरोध का बीज बो दिया।

    इस प्रकार मुस्लिम लीग के माध्यम से अंग्रेजों ने भारतीय मुसलमानों को देश के हिंदूओं से अलग करने का और देश में फूट डालो राजनीति का जो कुचक्र चलाया उसने देश को खंडित करके ही दम लिया और इसी कुचक्र या देश के विभाजन ने सांप्रदायिकता फैलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। मुस्लिम सांप्रदायिकता को अगर अंग्रेजों ने हवा दी तो हिंदू सांप्रदायिकता को भड़काने में हिंदू नेताओं का भी हाथ था जो निजी स्वार्थी के कारण समूह में बंटने में ही देश की भलाई समझ रहे थे। इन सारे कार्यकलापों के चलते हिंदू- मुसलमानों के बीच अलगाव की खाई निरंतर बढ़ती रही और मुसलमानों के मन में अलग राज्य बनने की भावना प्रबल होती गई।

    अंततः 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बना और 15 अगस्त 1947 में भारत दो टुकड़ों होकर आजाद हो गया। चूंकि विभाजन का आधार धर्म था अतः तय हुआ कि सारे मुसलमान पाकिस्तान जाएंगे और हिंदू भारत में रहेंगे। फलस्वरूप हजारों लाखों लोगों को अपने वतन से उजड़ना पड़ा किसी के हिस्से में उनका वतन आया तो किसी के देश। लाखों लोग शरणार्थी हुए और धर्म के आधार पर हुए विभाजन के कारण सांप्रदायिकता भड़की।

    भारत स्वतंत्र तो हुआ पर उसकी स्वतंत्रता का पहला दिन ही सांप्रदायिकता की घृणा और विषैली भावना से भरा हुआ था। संभवतः विश्व में आज तक शायद ही किसी ने इतने विचित्र ढंग से अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया हो। इस प्रकार स्वाधीनता के बाद सारे देश में सांप्रदायिकता के शोले भड़क उठे।

   इन तथ्यों की रोशनी में यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय सांप्रदायिकता को जन्म देने में साम्राज्यवादी शक्ति (ब्रिटिश राज्य) की अहम भूमिका थी। धर्म के आधार पर हुए देश विभाजन ने सांप्रदायिकता को और भी हवा दी। माहौल यह हो गया कि हिंदू मुसलमान एक दूसरे के संबंध में अपनी राय उसके धर्म के आधार पर कायम करते थे। ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में प्रसिद्ध इतिहासकार स्मिथ के इस तथ्य का हवाला दिया ह -“जब बशीर अहमद को ठगता है, तब अहमद सोचता है बशीर ठग है। किंतु जब मोतीलाल अहमद को धोखा देता है तब अहमद समझने लगता है कि हिंदू धोखेबाज है।“3

 भारत के एक लंबे अरसे तक सांप्रदायिकता के शोले भटकते रहे। वस्तुतः आज भी सांप्रदायिकता एक विषम समस्या है। भारत ने यह समस्या आज भी बहुत अधिक गंभीर हो गई है। पाकिस्तान बन जाने के बाद भी कश्मीर का विवाद आज तक बना हुआ है और धरती का स्वर्ग नरक में तब्दील हो चुका है। इस बात का संभवतः भी नहीं कि आने वाली पीढ़ियां कभी उस स्वर्ग विहार का आनंद भी उठा पाएंगे।

संदर्भ;

1. मुखिया हरबंस- सांप्रदायिकता के आधार : एक विश्लेषण, राम जन्मभूमि बाबरी; में संकलित- पृ-43
2. वही
3. रामधारी सिंह "दिनकर"- संस्कृति के चार अध्याय- पृ-110

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