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विभाजन कालीन दंगों की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी अज्ञेय की कहानी ‘शरणदाता’

'शरणदाता’ - अज्ञेय

   ‘शरणदाता’ अज्ञेय द्वारा लिखित कहानी है, यह कहानी विभाजन कालीन दंगों की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी है। इस कहानी के दो खंड है, पहले खंड में व्यक्ति की विवशता को दर्शाया गया है तथा दूसरे खंड में व्यक्ति की बर्बरता का चित्रण, किस प्रकार इंसान, इंसान न रहकर एक समूह में विभक्त हो जाता है तथा अमानवीय कृत्य करने लगता है। विभाजन के समय लाहौर सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा था, वर्षों से साथ रह रहे पड़ोसियों का भी विश्वास एक दूसरे से उठ गया था, हिंदू तथा मुसलमान दो खेमों में बंट गए थे, लाहौर में अल्पसंख्याक हिंदू देवीन्दरलाल जी अपना घर तथा मुहल्ला छोड़कर चले जाना चाहते थे लेकिन उनके मित्र रफीकुद्दीन उन्हें नहीं जाने देना चाहते, वह माइनारटीज की रक्षा का विश्वास दिलाते हुए रफीकुद्दीन उन्हें नहीं जाने देना चाहते। देवीन्दरलाल को रोक लेते हैं। नगर में दंगे शुरू होते ही कीमती सामानों के साथ देवीन्दरलाल अपनी पत्नी तथा बच्चों को पहले ही जालंधर भेज देते हैं। देवीन्दरलाल जी परिस्थितियों को भांपते हुए स्वयं भी चले जाना चाहते हैं, लेकिन रफीकुद्दीन के यह शब्द उन्हें रोक लेते हैं-

   “नहीं साहब, हमारी नाक कट जाएगी। कोई बात है भला की आप घर बार छोड़कर अपने ही शहर में पनाहगर्जि ही जायं? हम तो आपको जान न देंगे- बल्कि जबरदस्ती रोक लेंगे। मैं तो इसे मैजोरिटी का फर्ज मानता हूँ कि वह माइनारिटी की हिफाजत करें और उन्हें घर छोड़-छोड़कर भागने न दे। हम पड़ोसी की हिफाजत न कर सके तो मुल्क की हिफाजत क्या खाक करेंगे।“ रफीकुद्दीन की बातों से पता चलता है कि वह अपने हिन्दू मित्र की रक्षा निःस्वार्थ भाव से करना चाहते है, सांप्रदायिक विद्वेष चारों तरफ फैलने के बावजूद भी व्यक्ति में मानवता का सर्वथा लोप नहीं हुआ था। उसी दिन शाम को देवीन्दरलाल का घर जला दिया जाता है और रफीकुद्दीन पराजित नेत्रों से देखते रह जाते है। एक-एक कर मुहल्ले के सारे हिन्दू घर छोड़कर चले गए जब कभी साक्षात होते तो देवीन्दरलाल जी इन हिन्दुओं से पूछते की क्या सलाह बनायी है तो वो बड़े रोब से बोलते जी सलाह क्या बनाती यहीं रहेंगे, देखी जाएगी।‘ लेकिन सुबह होने से पहले जरूरी सामान के साथ भाग गए थे। उस मुहल्ले में देवीन्दर लाल को छोड़कर सभी हिन्दू लाहौर छोड़कर जा चुके थे।

     शहर का माहौल खराब हो गया था, देवीन्दरलाल ने कुछ दिनों पश्चात ध्यान दिया कि रफीकुद्दीन की बातों में चिंता तथा पीड़ा का स्वर दिखायी पड़ रहा था, पूरा शहर वीरान हो चुका था, जहां-जहां लाशों सड़ने लगी थी, घरों को लूटकर जला दिया गया था, मनुष्य के अंदर संवेदना तथा विवेक का स्थान उन्माद ने ले लिया था, इससे अधिक घृणा का रूप और कहां देखने को मिलेगा कि मुस्लिम मरीज को देखने के लिए हिंदू डॉक्टर को मरीज के ही एक रिश्तेदार ने छुरा मार दिया- “वह दो मुसलमान नेताओं के साथ निकले। दो-तीन मोहल्ले घूमकर मुसलमानों की बस्ती में एक मरीज के ही एक रिश्तेदार ने पीठ में छुरा भोंक दिया ..।“

      रफीकुद्दीन उनके घर में देवीन्दरलाल की रहना मुसलमानों को बर्दाश्त नहीं था, दोपहर में छः सात आदमी रफीकुद्दीन से मिलने आए, रफीकुद्दीन उन्हें अपनी बैठक में ले गए और उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया, धीरे-धीरे बातें होने के कारण देवीन्दरलाल को कुछ भी स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ा लेकिन उन्हें आभास हो गया कि बातें उनके बारे में ही हो रही है, उन लोगों के अनुसार रफीकुद्दीन एक हिंदू को अपने पास सुरक्षा देकर ‘इस्लाम’ के साथ गद्दारी कर रहा है। देवीन्दरलाल को समझ में आ गया कि उनके कारण उनके मित्र को जलील होना पड़ रहा है, देवीन्दरलाल नहीं चाहते थे कि रफीकुद्दीन को कोई खतरा उठाना पड़े, वह स्वयं जाने के लिए तैयार हो गए। देवीन्दरलाल को रफीकुद्दीन अपने साथ रखना चाहते हैं लेकिन समूह के आगे अकेले इंसान को झुकना ही पड़ता है।

     रफीकुद्दीन इसी डर के कारण देवीन्दरलाल को अपने मित्र शेख अताउल्लाह के यहां पहुंचा देते हैं। वहां देवीन्दरलाल जेल से बद्तर स्थिति में रहने को मजबूर हो जाते हैं। शेख के घर के अहाते के पीछे गैरेज और एक बंद कोठरी में रहने का प्रबंध कर दिया गया था, वहां पर देवीन्दरलाल ने एक बिलार से दोस्ती कर ली थी। शेख के घर की कुछ आवाजें सुनाई पड़ती थी जैसे ‘नी जैबू’ कहने पर उत्तर में एक युवा महिला की आवाजें सुनाई पड़ती थी, देवीन्दरलाल को उस आवाज से आत्मीयता हो गई थी, खाना परोसने का कार्य शेख की बेटी ‘जैबू’ ही करती थी। एक दिन खाने में मुसलमानी रोटी की जगह छोटे-छोटे हिंदू फुलके देख कर देवीन्दरलाल को जीवन की एकरसता में थोड़ा सा परिवर्तन हुआ, लेकिन उन्हें उन फुलकों के बीच एक पुड़िया दिखाई पड़ी जिस पर चेतावनी दी गई थी कि खाना कुत्ते को खिला कर खाइएगा। अपने एकांत के साथी बिलार को वह खाना उन्होंने खिलाया और उसकी मृत्यु हो गई, देवीन्दरलाल सन्न रह गए, आश्रयदाता के यहां ही उन्हें खाने में जहर दिया गया। शेख आसानी से समाज का मुकाबला कर देवीन्दरलाल को सुरक्षित रख सकते थे लेकिन जब व्यक्ति संप्रदाय में परिवर्तन हो जाता है तो वह बर्बर तथा विवेकहीन हो जाता है। एक ही परिवार में एक सदस्य द्वारा ‘जहर’ दिया जा रहा है और दूसरे द्वारा ‘जहर’ की सूचना।

     देवीन्दरलाल के माध्यम से अज्ञेय (Agyeya) एक दार्शनिक (philosopher) की भाँते सोंचते हैं- “दुनिया में खतरा बुरे की ताकत के कारण नहीं, अच्छे की दुर्बलता के कारण है। भलाई की साहस हीनता ही बड़ी बड़ी बुराई है। घने बादल से रात नहीं होती। सूरज के निस्तेज हो जाने से होती है।“

     देवीन्दरलाल वहां से भागकर वह किसी तरह से दिल्ली पहुंचे, और अपने परिवार का पता लगवाने रेडियो से अपील करवा रहे थे, तभी उन्हें पाकिस्तान का मुहर वाला एक लिफाफा मिला उस पर लिखा था-

     “अब्बा ने जो किया या करना चाहा उसके लिए मैं माफी मांगती हूं और यह भी याद दिलाती हूं कि उसकी काट मैं ने ही कर दी थी। अहसास नहीं जताती- मेरा कोई अहसास आप पर नहीं है। सिर्फ यह इल्तिजा करती हूं कि आपके मुल्क में कोई अल्पसंख्याक मजलूम हो तो याद कर लीजिएगा।“ ‘जैबू’ के चरित्र के माध्यम से ‘अज्ञेय’ ने विषम परिस्थितियों में भी एक आदर्श मानवीय चरित्र की स्थापना की है। दूसरी तरफ ‘अज्ञेय’ यह भी संकेत कर रहे हैं कि वर्ग तो स्वार्थ में डूब चुका था लेकिन व्यक्ति में अभी भी मानवीय चेतना बाकी थी।

    इस कहानी में मानवीय मूल्यों के परिवर्तन तथा मानवीय संबंधों में दरार को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। विभाजन कालीन दंगों में सांप्रदायिक शक्तियों ने मनुष्यता को दरकिनार कर पाशविकता को बढ़ावा दिया। देवीन्दरलाल द्वारा जैबू की चिट्ठी को फेंकना स्पष्ट करता है कि मानवीय मूल्यों का उनके अंदर ह्रास हो चुका था क्योंकि वह स्वयं अमानवीय कृत्यों के शिकार हो चुके थे और ‘जैबू’ की चिट्ठी उनके लिए अर्थहीन हो चुकी थी।

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