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विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया कृष्णा सोबती का उपन्यास - गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान


 गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान : कृष्णा सोबती
(Gujarat Pakistan Se Gujarat Hindustan : Krishna Sobti)

         विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया कृष्णा सोबती का उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ है। भारत के इतिहास में इस सदी की सबसे त्रासद घटना रही इस देश का बँटवारा। आजादी के सत्तर साल बाद में लेखकों के जेहन से इस घटना की आततायी स्मृतियों नहीं हटीं। पाकिस्तान इतिहासकार जलाल ने इस विभाजन को बीसवीं सदी में दक्षिण एशिया में हुई प्रमुख घटना माना है। इस विभाजन से बहुत बड़ी आबादी सरहदों के इस पार से उस पार और उस पार से इस आयी और गयी और इस बड़ी आबादी को ऐसा दुःखों का सामना करना पड़ा जिसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं कि थी। आबादी की अदला बदली के बारे में कोई निश्चित आंकड़ा उपलब्ध तो नहीं है पर यह माना जाता है कि लगभग डेढ़ करोड़ लोग अपनी जडों से उखड़ गए और तकरीबन दस से बीस लाख लोग मारे गए और लाखों लोगों को ऐसी भावात्मक ठेस पहुंची जो कि उनकी आने वाली पीढ़ियों में भी बनी रही। इस विभाजन ने केवल देश की सीमाओं को ही नहीं बांटा बल्कि देश में एक समावेशी संस्कृति को भी छिन्न भिन्न कर दिया।

     यह एक सच्चाई है कि हिंदुस्तान के बंटवारे की स्मृतियां हमारे देश के कथाकारों के मन में इतने गहरे समाई हुई है कि बँटवारे के सत्तर साल बाद भी वे स्मृतियाँ उनका पीछा नहीं छोड़ती, उन्हें बार-बार हांट करती और किसी न किसी रूप में रचनात्मक स्तर पर व्यक्त होती है। दरअसल कोई भी रचनाकार अपने अतीत से, अपनी परंपराओं से, अपनी स्मृतियों से एकदम कटकर राह भी नहीं सकता है। पुरानी स्मृतियों उसके जेहन में लगाकर दस्तक देती रहती है, यही अकारण नहीं है कि बंटवारे के दौरान हिंदी और उर्दू के सभी लेखकों ने चाहे वे भीष्म साहनी हो, अश्क हो, मंटो हो, यशपाल हो या कृष्ण सोबती हो बंटवारे के दंश को महसूस किया और यह दंश अनेक स्तरों पर उनके लेखन में व्यक्त हुआ।

     विभाजन की पृष्ठभूमि पर कृष्णा सोबती का लिखा हुआ उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास में कृष्णा जी के अपने अनुभव दर्ज है। उपन्यास की शुरुआत दो नक्शों से होती है जो विभाजन के पहले और बाद के हिंदुस्तान को दिखाते हैं। वे उपन्यास ने अपने माध्यम से लाखों लोगों की उस पीड़ा को व्यक्त करती है जो एक आजाद देश बनने की खुशी में अपना घर, अपनी विरासत, अपनी जमीन, अपनी जिंदगी, अपना मान, अपना सम्मान खोने पर मिली है। इस उपन्यास की कथा-नायिका एक खुद्दार लड़की है जो अपनी मर्जी से यह सोचकर सिरोही आती है कि यदि सिरोही में मन न लगा, तो वह वापस चली जाएगी। यह कथा-नायिका सिरोही में रहते हुए पाकिस्तान में रह गए अपने अतीत को और बंटवारे के दौरान हुए अनुभवों को बहुत ही शिद्दत के साथ याद करती है।

     अपने बचपन की स्मृतियों को याद करते समय उनकी आंखों में एक विशेष प्रकार की चमक दिखाई देती है। ‘वे रोशनियों के शहर’ कराची को याद करती है। विभाजन के दंश को अपनी स्मृतियों में गहरे समाए यह कथा-नायिका लाहौर और दिल्ली में हुई घटनाओं को अपनी स्मृतियों में संजोए आजाद हिंदुस्तान के गुजरात राज्य के सिरोही रियासत में नौकरी के सिलसिले में पहुंचती है। बँटवारे के बाद लाहौर को छोड़ते हुए कृष्णा सोबती पाकिस्तान में छूट गए लाहौर को याद करते हुए लिखती है “पलटकर एक बार फिर डबडबाई आंखों से अपने कमरे की ओर देखा और मन ही मन दोहराया, बहती हवाओं, याद रखना, हम यहां रह गए हैं।“1  ये स्मृतियाँ ही उपन्यास को हिंदी कथा साहित्य का अत्यंत विशिष्ट उपन्यास बनाती है।

     कृष्णा सोबती कहती है, “आजादी के दिन भी क्या दिन थे! एक ऐसा धुपैला मौसम जो हर नागरिक को नया ताप दे रहा था। विभाजन का जहरीला संताप, हिंसा और एक दूसरे से बिछड़ने का शौक धीरे-धीरे कम हो रहा था। मैं बहुत गहरे भाव से अपनी लेखक बिरादरी की वैचारिक जागरूकता का संवेदना अपने दिल से लगाए हुए हूँ। इस तरह जैसे की वह इस विश्व में इतने लंबे जीवन का सबसे कीमती समय हो। बंटवारे के खून-खराबे के बाद हमारे लेखकों ने जो मानवीय संतुलन प्रस्तुत किया, वह किसी भी देश और किसी भी साहित्य के लिए गर्व का विषय होगा।“2

     उपन्यास की कथा-नायिका के जेहन में विभाजन के दौरान आबादी की हुई अदला-बदली के ढेर सारे दृश्य कौंधते रहते है, जब लोग अपने सामानों की गठरियां, अपने बुजुर्ग-माँ-बाप, अपने बच्चों को कंधे पर लादे रोते-बिलखते सरहदों पार करते है ‘इस बँटवारे से, इस आजादी से, क्या हासिल हुआ?

     सोबती जी लिखती है “अब तो हम तेज किए हुए चाकू हैं। हम आग का पलीता हैं। हम दुश्मनों को चाक कर देने वाली गरम हिंसा है। हम दुल्हनों की बाहें काट देने वाले टोके हैं, हम गँड़ासे है। अब हम नहीं हैं, हथियार है।“3

     कथा-नायिका के मन में विभाजन के दौरान की स्मृतियाँ जीवंत होकर उभरती हैं और वह सोचती है कि हमें अब पुराने नहीं नए मुल्क का पानी पीना है, पुराना वतन छोड़ना होगा। नई सरहदों को पार करना होगा। किंग्सवे कैम्प की स्मृतियाँ उसके जेहन में कौंधती है जहाँ तम्बुओं की कतारें है, अंदर-बाहर लुटे-पिटे घायल बेबसी में भटकते बीमार शरणार्थी है और बँटवारे पर राजी होने वालों को गालियाँ है। वह सवाल उठाती है “बापू गाँधी, तुमने हमारे घर-बाहर, धरती-पानी सब पराए कर दिए, यह कैसी रियासत।“4  उसने जेहन मैं हर वक्त विभाजन के दौरान अपना घर छोड़ने की पीड़ा है और शरणार्थी कैंप के संदर्भ है। किंग्सवे कैंप में वचनों नाम की लड़की के साथ दुष्कर्म होता है तो उसकी मां अत्यंत विक्षोभ भरे स्वर में कहती है, “गाड़ियां कट गई, बेटे बेटियां मर गए, हाय तुम्हें चैन न आए दुश्मन-बेटियों की नस्ल को खत्म कर दो। अपने लड़के पैदा करना कीकारों के कांटेदार पेड़ों से। कमीनों।“5

     कथा-नायिका को सिरोही में शिशुशाला में नौकरी के लिए जाते समय लगता है कि वह शरणार्थी भीड़ का हिस्सा है जो नेहरू जी की कोठी पर जाकर मांग करने लगी थी ही हम सब छोलधारी और पटरियों पर नहीं रहेंगे, हमें रहने को छत चाहिए। पर साथ ही उसे यह भी लगता है कि यह सिरोही नगरी उसे रास नहीं आएगी क्योंकि यहां बहुत महीन साजिशों है और इन साजिशों के तहत ही यहां कहां कुछ और कहा जा रहा है और किया कुछ जा रहा है और हो कुछ और रहा है। उसे यह बताया जाता है कि केवल ज्वाइनिंग रिपोर्ट देने से ही नौकरी पक्की नहीं हो जाती। सब कुछ मुख्यमंत्री पर निर्भर करता है, उलटफेर भी हो सकता है। लेकिन मुख्यमंत्री कथा-नायिका को सभी सुविधाएं देते हैं, जिससे कि वह अपना नाम कुशलता से कर सके।

     अहमदाबाद में उसकी मुलाकात प्रकाश मौसी से होती है। कथा-नायिका और प्रकाश मौसी दोनों मिलकर विभाजन के दौरान के शरणार्थी कैंपों में गुजरे अपने जीवन को याद करते हुए नेहरू, गाँधी और जिन्ना को कोसते हुए कहती है- “अरे खलकत को बचाने के लिए तुम्हारे पास पुलिस-फौज नहीं थी तो क्यों बटवारा माना था। बापू गाँधी तुम चुप क्यों हो जिस नेहरू को तुम अपना पुत्र बनाया, उससे अपना हुक्म क्यों न मनवाया।“6  मुसलमानों के प्रति एक हिकारत का भाव प्रकाश मौसी में झलकता है कथा-नायिका जब गरारा पहनकर उसके पास पहुंचती है तो वह कहती है कि “यह एक हिंदू रियासत है। बंटवारे के बाद हम भी क्यों पहने उनकी पेशाकें।“7

     उपन्यास में अपने जमीन से कटने के अनेक संदर्भ मौजूद है। उपन्यास में विभाजन के दौरान अपने घरों, अपने जमीनों से बेदखल हुए लोगों के गहरे सरोकार है। सिरोही रियासत के दत्तक पुत्र महाराज तेज सिंह हो अपनी शिक्षिका से पूछते हैं कि मैम, बेदखल क्या होता है।“ यह बेदखली की उपन्यास की भूमि केंद्र में है।

     बंटवारे के संदर्भ में कृष्णा सोबती का मानना है कि, “सिर्फ मैं ही नहीं स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन के बीचों-बीच से होकर निकली पीढ़ियों भी जो आज तक दशकों-दशकों लम्बा सफर तय कर चुकी हैं, वह न उस त्रासदी को भूली है और न ही विभाजन से जुड़े देश के स्वाधीनता पर्व को। विभाजन (Partition) को भूलना भी मुश्किल है और उसे याद करते चले जाना भी खतरनाक। लाखों-लाखों लोग जड़ों से कट गए। कुनबों के पुराने छांहदार पेड़ उखड़ कर ठंडे हो गए। इतिहास (History) और भूगोल (Geography) बदल गए। ऐसे में अपने को जीवित पाकर, हर विस्थापित कि इस त्रासदी से उबर कर खड़े हो जाने की कोशिश कम महत्वपूर्ण नहीं थी। व्यक्तिगत आतंक, जख्म, पीड़ा सब चुनौती दे रहे थे हकीकत को। अपने-अपने ढंग से दोनों ओर से समय का आख्यान प्रस्तुत किया गया।“8

     उपन्यास की भाषा, उसकी संवेदना और भावभूमि को गहरे स्तर पर अभिव्यंजित करती है जो उपन्यास की अन्यतम विशेषता है। इस भाषा के माध्यम से वे तत्कालीन समय की संवेदना को अत्यंत मार्मिकता से व्यक्त करती है। भाषा की स्थानीयता पाठकों को रोमांचित और उद्वेलित करती है।

     विभाजन की स्मृतियों के केंद्र में रखकर लिखा गया कृष्णा सोबती जी का उपन्यास हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध करने के साथ बंटवारे के विषाद और पीड़ादायक स्मृतियों को संजोकर रखता है। इस उपन्यास के सहारे विभाजन के उस दौर से गुजरा जा सकता है जो हमसे पहली पीढ़ी ने देखा और महसूस किया है और जिसका दंश आज तक ज़ेहन मौजूद हैं।
डॉ. मुल्ला आदम अली

संदर्भ;
  1. उद्भावना, अंक-132- पृ-100
  2. वही- पृ-100
  3. उद्भावना, अंक-132- पृ-100
  4. वही- पृ-100
  5. वही- पृ-100
  6. उद्भावना, अंक-132- पृ-100
  7. वही- पृ-100
  8. वही- पृ-101
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