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शरद जोशी के व्यंग्य नाटक : पूनम सिंह

शरद जोशी के व्यंग्य नाटक

पूनम सिंह

हिन्दी व्यंग्य को प्रतिष्ठा दिलाने वाले व्यंग्यकारों मे शरद जोशी का स्थान अग्रणी है। शरद जोशी अपने समय की एक अनूठे व्यंग्य रचनाकार थे।अपने समय कीसामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विसंगतियों को उन्होंने अत्यंत पैनी दृष्टि से देखा है।और अपनी अपनी कलम से बड़ी साफगोई के साथ उन्हें नाटकों, निबंधों, कविताओं आदि के माध्यम से सटीक शब्दों में व्यक्त किया है। शरद जोशी जो भारत के पहले व्यंग्यकार थे, जिन्होंनेपहली बार मुंबई में 'चकल्लस' के मंच पर 1968 ईस्वी में गद्य पड़ा और किसी कवि से अधिक लोकप्रिय हुए। शरद जोशी श्रेष्ठ होने के साथ ही वह अद्वितीय नाटककार हैं। जोशी जी ने समसामयिक, सारगर्भित एवं व्यंग्यपूर्ण निबंधों एवं कहानियों के साथ नाटकों के लेखन का भी कार्य किया है ।शरद जोशी ने समाज में व्याप्त विसंगति, विषमता और विडंबना का अत्यंत सहज एवम् प्रभावी रूप से नाटकों में वर्णन किया है।इन्होंने ज्यादातर राजनीतिक और प्रशासन में व्याप्त विसंगतियों को व्यंग नाटकों के माध्यम से उजागर किया है। शरद जोशी ने सामाजिक वैषम्य से लड़ने हेतु जो व्यंग्य कारी हथियार इस्तेमाल किए व अन्य हथियारों से कहीं ज्यादा प्रभावी सिद्ध हुआ है। इनके व्यंग विषमता पर प्रहार करते हुए आत्म -सुधार तथा समाज- सुधार की भावना मुखर करते हैं। व्यक्तित्व की मानसिकता को बदलने तथा उसका समाजोपयोगी ढंग से विकास करने का पूरी सच्चाई और आत्मीयता के साथ सतत प्रयास किया है।

     शरद जोशी के साहित्य के अंतिम पड़ाव में दो व्यंग्य नाटक हैं। यह दोनों नाटक एक ही पुस्तक में संग्रहित हैं। उनके उल्लेखनीय व्यंग्य नाटक "एक था गधा उर्फ अलादाद खां" एवम् दूसरा "अंधों का हाथी "है।दोनों ही नाटक समकालीन राजनीतिक परिदृश्य प्रस्तुत करने के साथ-साथ राजनीति की अविच्छिन्न अंतर्धारा और वृत्तियों से हमारा गहरा परिचय कराते हैं। एक तरफ जनसामान्य और दूसरी तरफ जन विशेष। सामान्य को मूर्ख बनाए रखने और इसका इस्तेमाल करते रहने का एक अंतहीन दुष्चक्र जो राजनीति का स्वभाव,शौक, जरूरत कहे कि उसका मौलिक अधिकार है, विडंबना यह है यह कि वह भी कर्तव्यों की शक्ल में। राजनीति के तहत सतत घट रही इस मूल्यहीनता त्रासदी की गहरी पकड़ इन नाटकों में दिखाई पड़ता है। शरद जोशी ने इन दो व्यंग नाटकों के माध्यम से सामान्य व्यक्ति की और जन विशेष की मानसिकता का और वृत्ति का बखूबी चित्रण किया है।इन दोनों नाटकों में नेता वर्ग और उनसे संबंधित हर एक समस्या को शरद जोशी ने उजागर करने का प्रयत्न पूरी ईमानदारी से किया है, जोकि अत्यंत सराहनीय कार्य है।

    शरद जोशी ने अपने दो व्यंग्य नाटकों के बारे में अपनी बात में स्वयं ही यह स्वीकार किया है कि, वर्षों से कहानियां और व्यंग्य लिखता रहा हूं, नाटक का शौक बाद में बना, मगर जब बना तो मन करता है कि बाकी का सारा जीवन नाटकों के लिए खफा दिया जाए। बहुत साल पहले कोलकाता में आयोजित एक कथाकार सम्मेलन में अनामिका के श्री विमललाठ ने मुझे पहली बार नाटक लिखने के लिए अपने कच्चे-पक्के तरकीबों द्वारा उसकाया मगर मैं बहुत अडियल रहा ।कुछ साल बाद मैंने नाटक पढ़ने शुरु किए। नाटक लिखने के उपरांत शरद जोशी ने विमललाठ से प्रेरणा पाकर उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।शरद जोशी को नाटक पढ़ने और देखने का बहुत शौक था।सर्वप्रथम उन्होंने इंदौर भोपाल में मंचित लंबे नाटक को देखें और बाद में नाटक देखने के लिए वे दिल्ली और मुंबई गए जहां उन्होंने हिंदी, मराठी, गुजराती, फारसी आदि भाषाओं में के नाटक देखने के बाद स्वयं नाटक में प्रशिक्षित हो गए। इसी दौरान इनका परिचय ओम शिवपुरी, सुधा, सत्यदेव दुबे, बजाज, रैना, प्रतिभा शाह श्रेष्ठ रंगकर्मी एवं निर्देशों से हुआ।उसके बाद जोशी जी ने अपने नाटकों की रचना की यह दोनों व्यंग्य नाटक रंगमंच पर सफलता के साथ खेले गए और सहपाठियों, दर्शकों के बीच सराहे भी गए इस प्रकार शरद जोशी ने नाटकों की रचना प्रारंभ की।

   एक था गधा उर्फ अलादाद खां शरद जोशी का लोकनाट्य शैली मे लिखा गया बहुमंचित, बहुलोकप्रिय, बहुचर्चित व्यंग्य नाटक है। इस नाटक में वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था पर करारा व्यंग किया गया है। यह नाटक आम आदमी के जीवन को खिलौना समझने वाले, उनके जीवन की कोई कीमत न समझने वाले नवाब जैसे भ्रष्ट नेताओं पर करारा व्यंग करता है। इस नाटक में चित्रित नवाब भारतीय नेता वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। नवाब के माध्यम से जोशी जी ने इस भ्रष्ट नेताओं की प्रवृत्ति एवम् मानसिकता को भी उजागर किया है। नवाब जन सामान्य की समस्या का निराकरण किस प्रकार किया जाए, राज्य में सुधार किस प्रकार हो, राज्य में रोजगार के लिए क्या उपाय किए जाए, राज्य का विकास कैसे करना चाहिए इन सभी बातों पर वह ध्यान नहीं देता है ,उसे उसे तो बस प्रसिद्धि कैसे प्राप्त हो यही सोचता है। जनता के नजर में सबसे अच्छा वह सबसे बड़ा व्यक्ति साबित करने के लिए वह नए-नए तरकीब खोजता है और प्रसिद्धि पाने के लिए घटिया से भी घटिया कार्य करने को तैयार हो जाता है। नवाब कहता है कि-"भीड़ को हटा नहीं कोई करिश्मा कर,जिससे हमारी मशहूरी हो। अब हम जनता मे लोकप्रिय मशहूर होना चाहते हैं।यहीं इसी वक्त। "नवाब लोकप्रिय होने के लिए गरीबों के बच्चों को गोद लेने के लिए, भिखारी को पैसा भी देने के लिए तैयार है यानी वह प्रसिद्धि पाने के लिए कुछ भी कर सकता है। नवाब खुद कहता है कि प्रसिद्धि पाना मेरा मकसद है और वह जिसकी भी मदद करते हैं या जवान के स्मारक को माला पहनाते हैं वह सब प्रसिद्धि के लिए। आज का नेता वर्ग भी सामाजिक और सार्वजनिक कार्यों में अधिक सम्मिलित होते हैं। महापुरुषों या शहीद जवानों के स्मारक पर फूल माला चढ़ा कर प्रसिद्धि पाना उनका मकसद बन गया है। लोग उनकी जय जयकार करे। नेता के सामने जनता, व्यक्ति, उनकी समस्या इससे कोई लेना-देना नहीं है वह केवल प्रसिद्धि पाने के भूखे हैं।

       एक था गधा उर्फ अलादाद खां नाटक में चापलूसी पर भी व्यंग किया गया है। और सभी लोग जन विशेष की चापलूसी करके अपना काम बना लेते हैं। आज हर सरकारी विभागों में कर्मचारी, कार्यकर्ता अपने से बड़े अधिकारी की चापलूसी करके अपना लाभ उठाते हैं। इस चापलूसी के कारण आज कोई भी सरकारी कार्य ठीक से नहीं हो पा रहा है ।यह चापलूसी लालफीताशाही और भ्रष्टाचार को जन्म देती है। सभी कर्मचारी जी हुजूरी को प्रधानता देते हैं। जिस कारण वे अपने कर्तव्य से विमुख होते जा रहे हैं। नवाब कोतवाल के कहने पर सूत्रधार को धन देता है और थिएटर बनाने का आश्वासन देता है तब उपस्थित नागरिक सुधार को कहता है- नागरिक -3 बधाई जनाब, इसे कहते हैं खुदा जब देता है थियेटर फाड़ कर देता है।टूटने दीजिये थियेटर, मगर खुदा की नियामत पर नजर रखिये।नागरिक -2 क्यों नहीं, अरे भाई, अगर आगे बढ़ना है जिंदगी मे प्रगति करनी है तो अफसरों से चिपककर रहो,कामयाबी कहीं नहीं जाती। बधाई प्यारे ।।।

जिस प्रकार मक्खन लगाकर सूत्रधार ने अपना काम करवाया ठीक उसी प्रकार आज भी लोग भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों की चापलूसी करते हैं, उनके आगे पीछे चक्कर लगाते हैं, उनकी झूठी प्रशंसा करते हैं। आज जो लोग विभिन्न ऊंचे ऊंचे पदों पर बैठे हैं उसमें से ना जाने कितने लोग ऐसे हैं जिनमें ना कोई गुणवत्ता है और ना ही कोई योग्यता और ना ही कोई औकात। बस चापलूसी के कारण यहां पर स्थित हैं और चापलूसी के कारण ही आज समाज का पतन हो रहा है। ऐसे लोगों में ना कोई निर्णय लेने की क्षमता होती है और ना ही कोई समस्या समझाने की। हमारे देश में चापलूसी आज एक बीमारी के रूप में फैल गई है जिसका निदान करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

           एक था गधा उर्फ अलादाद खां नाटक में नाटक में नेता द्वारा जनता को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति भी दिखाई गई है जो कि वर्तमान परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है ।आज के अधिकतर नेता केवल जनता के पास वोट मांगने के लिए जाते हैं तब उनकी समस्या क्या है? यह जानने की कोशिश करते हैं और उस समस्या का निराकरण करने का आश्वासन देते हैं परंतु जब नेता लोग चुन कर आते हैं तो वह 5 सालों तक न जनता के पास जाते हैं और ना ही उनकी समस्याओं को हल करने की कोशिश करते हैं। जनता जिए या मरे उससे नेताओं को कोई मतलब नहीं है। अपना स्वार्थ साधने को ही वह अपनी महानता समझते हैं। प्रस्तुत नाटक में भी नवाब और अधिकारी जनता की समस्या को प्रधानता नहीं देते हैं और उनको नजरअंदाज करते हैं। कोतवाल जनता को लूटता है सारे काम मुफ्त में करवाता है पान खाना, मदिरापान करना, कपड़े सिलवाना, कपड़े धुलवाने आदि कार्य ऊपर से गरीब लोगों को डराना धमकाना भी है। सब लोग कोतवाल से परेशान हो जाते हैं मगर किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते क्योंकि नवाब जनता की सुनता कहां है। इस संदर्भ में नागरिकों के कुछ कथन दृष्टव्य हैं-

नागरिक 1 -मगर शिकायत कीजियेगा किससे? है कोई सुनने वाला?

नागरिक 4- यह सवाल भी अपने जगह मायने रखता है।

नागरिक 2- शिकायतें आये दिन से चली आ रही हैं,सुनने वाला कब रहता है। वही किस्सा हुआ कि सांप काटे की शिकायत सांप से किजिये।

नागरिक4- गरीब कहाँ शिकायत करने जायेगा? गुलशनपुर के पास उस रात झोपड़ों मे आग लगी, तीस घर फूंके गए। बड़ा शोर था मदद मिलेगी, मिली मदद?

आम जनता के ऊपर कितनी भी आफत आ जाए उन्हें मदद नहीं मिलती आज का भ्रष्ट नेता संवेदनशील हो चुका है। उसकी आत्मा मर चुकी है। उनसे किसी से कोई लेना देना नहीं बस अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता का सिद्धांत याद कर रख करते हैं।

  इसी तरह शरद जोशी का लोकप्रिय लघु नाटक 'अंधों का हाथी' मुख्यतः राजनीति का पर्दाफाश करने वाला व्यंग्य नाटक है। यह पांच अंधों व एक हाथी को लेकर लिखा गया नाटक है।यह नाटक वर्तमान की अंधी व्यवस्था के क्रूर यथार्थ को उजागर करता है। यह एक प्रतीकात्मक नाटक है। जिसमें शीर्षक को पशु प्रतीक के रूप में प्रयोग किया गया है ।मानव मानव है लेकिन कभी-कभी वह पशु का भी इस्तेमाल अपने कार्य की पूर्ति के लिए करता है। इस नाटक में हाथी को एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है ।विगत कई वर्षों से नेताओं के द्वारा समस्याओं को दूर करने के लिए मात्र नारेबाजी की जाती है। एक समय तो ऐसा लगा जैसे समस्या का निदान हो गया हो परंतु दूसरे ही पल पता चलता है कि वह समस्या वैसी की वैसी ही मुंह बाए खड़ी है ।क्योंकि जनता को मूर्ख बनाने की कला नेताओं के पास है। सारी की सारी व्यवस्था ही अंधी है। इसलिए शरद जोशी ने एक गीत के माध्यम से इन्हीं अंधी व्यवस्था पर करारा व्यंग करते हुए लिखा है कि-

"देख रही है सारी दुनिया, बाबू, बीवी, मुन्ना, मुनिया

हल्दी, मिर्ची, जीरा,धनिया, नेता, अफसर, बामन,

बनिया, ऊपर से सब चिकने चुपड़े अंदर काले

   धन्दे-अंधे हम हैं अंधे ।।' समूचे नाटक में वर्तमान व्यवस्था की विभीषिका का भीषण चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस अंधी व्यवस्था को देखने वाले सभी मौजूद हैं पर उस सवाल पर कोई नहीं कर सकता आप लोग पत्थर खाते नहीं क्योंकि इस देश का नेता भ्रष्ट है और जनता अंधी हो चुकी है नेता झूठे वादे करने में माहिर है तो जनता तालियां बजाने में माहिर है। राजनीति, प्रशासन व्यवस्था के तहत सतत घट रही इस मूल्यहीन त्रासदी का चित्रण शरद जोशी के इस नाटक में अभिव्यक्ति हुआ है। 

  वर्तमान समय मे लोग यथार्थ के धरातल से हटकर मनोरंजन में डूब गए हैं। समाज और उसी में व्याप्त समस्या से कोई सरोकार नहीं रह गया है। भौतिक सुख शांति एवं मनोरंजन को प्राथमिकता दी जा रही है। और इसी मानसिकता का कुछ स्वार्थी लोग फायदा उठा रहे हैं। शासक वर्ग भी चाहता है कि जनता मनोरंजन में डूबी रहे जिससे समाज में व्याप्त समस्या नहीं उठाएंगे। लोग अगर इसी तरह मनोरंजन में डूबे रहेंगे तो विद्रोह और विरोध नहीं करेंगे ।इस पर एक कथन प्रस्तुत है- "प्रजा का दिल बहलता है और इसमे सल्तनत का क्यों कर नुकसान होगा ।अगर इंसान का दिमाग उलझा रहे इन बातों मे, मसलन नाटक या गाने -बजाने की महफिलें या साहित्य तो हर्ज क्या है।" सरकार तो यही चाहती है कि आम जनता समाज की समस्या को भूलकर मनोरंजन में व्यस्त रहे। ताकि भ्रष्ट नेता अपना स्वार्थ सिद्ध कर लें ।आज भारत के लोग अपने स्वार्थ में अंधे हो गए हैं। लोग मरते हैं तो मरने दो अपना स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए यह प्रबल मानसिकता बन गई है। समाज में व्याप्त समस्या, लोगों के सुख-दुख से कोई मतलब नहीं रह गया है। आज मानव स्वार्थ में पशु के समान हो गया है।"

अंधे हम हैं अंधे

तलाश रहें हैं अपना हाथी

एक स्वार्थ के हम सब साथी ।।"

स्वार्थ मे लिप्त समाज कभी प्रगति नहीं कर सकता है।लोग लोग अपने स्वार्थ में इतने दिन हो गए हैं कि राष्ट्रीय समस्या और राष्ट्रहित उनके लिए कोई मायने नहीं रखता ।लोगों की हालत उस कुम्भकर्ण की तरह हो गई है जो किसी भी प्रकार से टस से मस नहीं करता। जनता को कितना भी आग्रह किया जाए, उन्हें जागृत किया जाए, फिर भी लोग इतने निर्लज्ज हैं कि किसी भी प्रकार का कोई असर नहीं होता। इसी नीरसता के कारण आज देश कोई प्रगति नहीं कर रहा है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति उस राष्ट्र के लोगों का जागरूकता पर निर्भर करती है।"अरे राष्ट्र के अंधों ,उठो तुम जो भी हो मंत्री, सचिव ,संचालक ,बाबू या चपरासी जो भी हो नेता, पुलिस, पत्रकार, प्रोफेसर या पान वाले जो भी हो ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, बनिया या आदिवासी जो भी वह पात्र, दर्शक, आलोचक, टिकट बेचने वाले या पर्दा खींचने वाले उठो और बहुत देर से चल रहे इस नाटक को खत्म करो ।इसके पहले कि यह हाथी तुम्हें कुचलने, लगे तुम । इसे अपने वश में करो। कोई सुन रहा है मेरी बात।" इस नाटक के माध्यम से भारत के उन तमाम अंधे स्वार्थी एवं आलसी लोगों को जागृत करने का प्रयास किया गया है। यह नाटक आलसियों एवं नीरज लोगों के लिए करारा व्यंग है।

   शरद जोशी ने अपने नाटक 'अंधों का हाथी' मे शिक्षा व्यवस्था पर भी बखूबी व्यंग्य किया है। जो कि आज के समय मे प्रासंगिक है।आज की शिक्षा शिक्षा नहीं बल्कि वह बिजनेस बन गई है। हमारे देश की विडंबना है कि यहां छद्म और ढोंग का समावेश अधिक है। संविधान में 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा का नियम है पर यह नियम कागजों तक ही सिमट कर रह गया है। आज शिक्षा की स्थिति यह हो गई है कि किताबें फुटपाथ पर बेची जा रही है और जूते माल मे यह है हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली। आज सभी को केवल डिग्री की जरूरत है ज्ञान से कोई सरोकार नहीं है। शिक्षा क्षेत्र में फैली विसंगतियों पर भी शरद जोशी ने व्यंग किया है ।विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा का केंद्र बिंदु माना जाता है किंतु आज उसकी साख नीचे गिर रही है। उस का स्तर गिरता ही जा रहा है उसके नीचे गिरने का प्रमुख कारण यह है कि कुछ अभद्र, अज्ञानी, अयोग्य अपात्रों को पीएच.डी.की डिग्री दे दी जाती है। सिफारिश के रूप में रखा जा रहा है ।आज विश्व विद्यालयों, महाविद्यालयों में स्वार्थपरता, चाटुकारिता, कर्तव्यहीनता के चलते गुटबाजी, परिवारवाद, धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, राजनितिवाद को अधिक महत्व दिया जा रहा है ।राजनीति की भांति शिक्षा क्षेत्र में भी विकृतियों का अड्डा बना हुआ है। शरद जोशी ने अंधों का हाथी नाटक में शिक्षा व्यवस्था पर प्रहार किया है-

अंधा 2 -निकल गई चीज हाथ से, नहीं सब मानते मेरी खोज को ।जो भी हो मैं इस वर्ष हाथी पर अपना शोध ग्रंथ प्रस्तुत कर पीएच.डी. ले रहा हूं। मेरा निष्कर्ष यही है कि हाथी सुख के समान है।

अंधा 4- एक विश्वविद्यालय से इसी विषय पर मैं भी पीएचडी ले सकता हूं, वहां का हेड ऑफ द डिपार्टमेंट मेरी जाति का है, बड़े दिनों से कह रहा है,यार कुछ भी लिख कर ला और ले जा पीएच.डी.। मुझे भी फुर्सत नहीं थी। भाड़ में जाए हाथी और हाथी की समस्या। अपनी तो पीएचडी। पक्की इस तरह पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने वालों पर शरद जोशी ने कटु व्यंग्य किया है। शोध में ज्ञान व अध्ययन की आवश्यकता नहीं बल बल्कि जातीयता ही आवश्यक बन गई है आज के संदर्भ में यह बिल्कुल सटीक है।

 निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि शरद जोशी भी अपने समय के कबीर थे। उन्होंने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर कटाक्ष किया है। जोशी जी के लेखन में वह हर बात है जो ,जीवन और आम आदमी से जुड़ी हुई है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, धार्मिक आदि के यथार्थ को उजागर करते हुए समाज के दलित, पीड़ित एवं शोषित वर्ग के प्रति भी अपनी सहानुभूति दिखाइ है। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार, अत्याचार, लूट-खसोट, अन्याय, कालाबाजारी, रिश्वतखोरी, चापलूसी, दलाली, गुटबंदी, स्वार्थवृत्ति, कर्तव् विमुखता, अंधेरगर्दी, घोटालेबाजी धांधली आदि पर व्यंग्य किया है। और सामाजिक, धार्मिक, साहित्यक, आर्थिक, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में व्याप्त विषमताओं पर भी तीखा व्यंग्य किया है। जो आज के समय में प्रासंगिक है। देश और समाज में जो अनीति, अन्याय, गुनाहगारी, कुरीतियां, पाखंड, आडंबर, शोषण एवं विकृतियां है उसके खिलाफ भी व्यंग है। जोशी जी ने अंधों का हाथी एवम् एक था गधा उर्फ अलादाद खां नाटक के माध्यम से पूरी राजनीति के सिस्टम को उजागर करते हैं। जोशी जी ने व्यंग्य के माध्यम से गागर में सागर भरने कीउक्ति को चरितार्थ किया है।

सन्दर्भ ग्रन्थ;

दो व्यंग्य नाटक -शरद जोशी

1. एक था गधा उर्फ अलादाद खां

2. अंधों का हाथी

पूनम सिंह

असिस्टेंट प्रोफेसर
हिंदी विभाग, हिन्दू कन्या महाविद्यालय,
सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

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