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Unmad Upanyas by Bhagwan Singh : भगवान सिंह का उपन्यास उन्माद

Unmad by Bhagwan Singh: फासीवाद के मनोविज्ञान विश्लेषण का सफल उपन्यास भगवान सिंह का उन्माद

         भगवान सिंह का जन्म 1 जुलाई,1931 को गगहा गाँव, गोरखपुर जिले के एक किसान परिवार में हुआ। एम.ए. हिंदी, गोरखपुर में शिक्षा प्राप्त किया। इनकी कृतियाँ : ‘काले उजले पीले’ 1964 (उपन्यास), ‘अपने समानांतर’ 1970 (कविता संग्रह), ‘महाभिषग्न’ 1973 (उपन्यास), ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ 1973 (भाषा-शास्त्र), ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’ 1987 (इतिहास), ‘अपने-अपने राम’ 1992 (उपन्यास) ’उपनिषदों की कहानियां’ 1993, ‘पंचतंत्र की कहानियां’ 1995 (पुनर्लेखन), ‘परमगति’ 1997 (उपन्यास),’उन्माद’ 1999 (उपन्यास), ‘शुभ्रा’ 2000 (उपन्यास), ‘द वेदिक हडप्पान्स’ 1995 (इतिहास), ‘इंद्रधनुष के रंग’ 1996 (आलोचना), ‘भारत : तब से अब तक’ 1996 (इतिहास), ‘भारतीय परंपरा’ 2011, ‘प्राचीन भारत के इतिहासकार’ 2011, ‘कोसंबी : कल्पना से यथार्थ तक’ 2012 आदि।

      अध्ययन लेखन और मौलिक चिंतन में भगवान सिंह का नाम विशिष्ट रूप से जाना जाता है। ‘हिंदी अकादमी का पहला पुरस्कार 1986-87 में ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य पर मिला है। दूसरा पुरस्कार 1999-2000 ‘उन्माद’ उपन्यास पर दिया गया है।

‘उन्माद’ (Unmad Upanyas by Bhagwan Singh)

     भगवान सिंह जी का यह उपन्यास ‘उन्माद’ शीर्षक मानव मन की अनेक पर्ति को खोलता है। ‘उन्माद’ उपन्यास में फ़्रायड के मनोविश्लेषण का असर दिखाई देता है। यह उपन्यास मानव मन के भीतरी दबावों-तनावों को सामने लाने में सक्षम है। भगवान सिंह का कहना है कि –“सांप्रदायिक उन्माद को उन्माद के ही एक किस्म के रूप में पकड़ने के कोशिशों हिंदी में बहुत कम हुई है- उंगलियों के पोरों के पर भी नहीं, सिर्फ उंगलियों पर गिनने लायक। भगवान सिंह का यह उपन्यास शायद पहली बार इतने सारे मानवीय ब्यौरों में जाकर यह काम करता रहा है। एक सहज, प्यारी-सी प्रेम कथा हमारे असहज समाज में इतने सारे टकरावों का केंद्र बन जाती है और यह अकेली गुत्थी सुलझाने के क्रम में इतने सारी उलझी गुत्थियां रफ्रता-रफ्रता सुलझती जाती है की ताज्जुब होता है।“

    ‘उन्माद’ उपन्यास में जब्बार अली मुस्लिम मोहल्ले में अपने आदमियों के जरिए लोगों को डरा धमकाकर मुस्लिम लोगों पर राज करते थे। दहशत तथा गुंडागर्दी के जरिए जब्बार अली ने मुस्लिम मोहल्ले में लोगों पर अपना अच्छा प्रभाव डाला था जिसके फलस्वरूप जब्बार अली पिछले सात साल चुनाव लगातार जीत चुके थे। जब्बार अली को आठवें चुनाव में उसी मुहल्ले के जैराज राज गुप्ता ने हरा दिया था। जब्बार अली ने चुनावों में पराजय होने के कारण अपने आदमियों को कह कर शहर में दंगा करवा दिया। जब्बार अली के आदमियों ने शहर में जो दंगा किया उसकी भयावहता को स्पष्ट करते हुए लेखक लिखते हैं –“उस बार जो दंगा हुआ था, उसमें कोई दुकानों और मकान जलाए गए थे। इलाके में पाँच दिन कर्फ्यू लगा था।“

   स्पष्ट है कि दंगाइयों ने दुकानों जलाकर आर्थिक हानि तो की और बहुत से लोगों की रोटी छीन ली तथा बहुत सारे लोगों को बेघर बना दिया।

डॉ. मुल्ला आदम अली

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