Sondhi Mahek Now Available on Flipkart : ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित नवीन काव्य संग्रह - सोंधी महक

ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित, नवीन काव्य संग्रह "सोंधी महक"

Book : Sondhi Mahek
Author : Ashok Srivastava "Kumud"
Binding : paperbak
Publishing Date : 2022
Publisher : GUFTGU PUBLICATION 123A/1, HARWARA, DHOOMANGAJ, PRAYAGRAJ-211011
Edition : First
Number of Pages : 128
Language : Hindi

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आपदा-राहत

(अशोक श्रीवास्तव 'कुमुद' काव्य संग्रह "सोंधी महक" से)


बदल आपदा अवसर में अब,

मौका सबहिं भुनाने में।

सरकारी आदेश हुआ बा,

राहत बँटत जमाने में।।


राहत बाँट रहा है अफसर,

बहुत भीड़ गँउवा वाले।

साफ दिखत बा दूर हवेली, 

लाइन में मड़ई वाले।।


चाटूकार वन्दना करते,

आशा राहत पाने की।

जोड़ हाथ चुप जनता रहती, 

आशा उदर भराने की।।


लील गई बा सबै आपदा,

आटा घर घर गीला बा।

गँउवा वालों की मजबूरी, 

अफसर बहुत रँगीला बा।।


दया दिखाये अफसर ज्यादा,

सुन्दर शोख़ जवानी पे।

दाँत तले सब उँगली दाबें, 

सुनकर शौक कहानी पे।।


देख छरहरी रूप षोडशी,

अफसर मन मन मुस्काये।

पल पल लोलुप कामुक नजरें, 

अंगों पे गड़ती जाए।।


हाथ लिए कागज ना जाँचै,

जाँचत अंग जनाना के।

राहत घटती बढ़ती जाती, 

हाव भाव अरु ताना पे।।


मांस कहाँ पर कम या ज्यादा,

कौन अंग सबसे आला।

ललचाई नजरों से सोचे,

काबू में कइसे बाला।।


बास लगे नारी अंगों की,

मुस्कानें बढ़ती जाए।

भाँति भाँति के विविध बहाने,

बहु विधि निकट सटा आये।।


धनिया मुनिया सभी समझती,

भाषा आँख इशारों की।

भूख कसे लगाम जिह्वा पर,

भाषा ना फटकारों की।।


निर्धन पर बेगैरत नाहीं,

भूख बिकी नहि आनो पे।

बेंच नहीं दी इज्जत अपनी,

राहत के कुछ दानों पे।।


राहत लेय रफू हो जाये,

हाथ नहीं फिर वो आये।

काम वासना पीड़ित अफसर,

हाथ मले अरु बौराये।।


जब जब अंग पकड़ना चाहा,

झटका जोर भरा पाया।

गिरा ज़मीं पे हाथ तुड़ाया,

अफसर सँभल नहीं पाया।।


साम दाम अरु दंड भेद भी,

काम यहाँ नहिं आ पाया।।

देह कामना पूर्ण हुई ना,

बदनामी रुख पे छाया।।


कायर कामी अफसर डरता,

जनबल कहर सुनामी से।

हो मुअत्तल नौकरी जाए,

सरेआम बदनामी से।।


सदा मुक्त रहे धन धान्य से,

आन मान निज मर्यादा।

झूल जाय इज्जत की खातिर,

राजा निर्धन या प्यादा।।

अशोक श्रीवास्तव "कुमुद"

 राजरूपपुर, प्रयागराज

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