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Makar Sankranti 2022: अलौकिक - आध्यात्मिक अनुदानों का महापर्व - मकर संक्रांति

आलौकिक - आध्यात्मिक अनुदानों का महापर्व

🪁 मकर संक्रांति 🪁

      हिंदू धर्म में मकर संक्रांति ग्रहों के राजा सूर्य के राशि परिवर्तन का तथा उपासना का पर्व है। यश और कीर्ति के प्रतीक सूर्यदेव पौष मास में इसी दिन धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं अर्थात दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। अतः इस पर्व को उत्तरायणी भी कहा जाता है। यह परिवर्तन वर्ष में एक बार 14 जनवरी को होता है।

   शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को अंधकार और नकारात्मकता का तथा उत्तरायण को प्रकाश और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इस दिन जप, तप, दान, स्नान, तर्पण आदि धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुणा बढ़ कर पुनः प्राप्त होता है।।  

      वसंत ऋतु का आगमन भी इसी दिन से माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं और शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। इस दिन की महत्ता इस बात से भी दृष्टिगत होती है कि इसी दिन गंगाजी भगीरथ के पीछे चलकर उनके पूर्वज महाराज सगर के पुत्रों को मुक्ति प्रदान करती हुईं कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं इसीलिए मकर संक्रांति पर बंगाल में गंगासागर में कपिल मुनि के आश्रम पर एक विशाल मेले का आयोजन होता है।

         यह भी कहा जाता है कि इस विशेष दिन पर प्राण त्यागने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि भीष्म पितामह जिन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था उन्होंने महाभारत के युद्ध में बाण- शैया पर लेटे-लेटे सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपने प्राण त्यागे। माँ यशोदा ने भी श्री कृष्ण को प्राप्त करने के लिए इस दिन व्रत रखा था।

         वास्तव में मकर संक्रांति प्रकृति को धन्यवाद देने का पर्व है। किसान अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान को धन्यवाद देकर सदैव अनुकंपा बनाए रखने का आशीर्वाद माँगते हैं। पंजाब और हरियाणा में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी, असम में बिहू और आंध्र में उगादि, तमिलनाडु में पोंगल आदि इसी मान्यता को चिन्हित करते हैं। शुभ कार्यों का प्रारंभ इसी पर्व से होता है।

         इस पर्व पर तिल का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि इस दिन से दिन तिल भर बड़ा होता है। आयुर्वेद के अनुसार तिल शरद ऋतु के अनुकूल और मानव स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। हमारे तमाम धार्मिक तथा मांगलिक कार्यों में तिल की उपस्थिति अनिवार्य मानी गई है। तिल में एक साथ कड़वा, मधुर एवं कसैला रस पाया जाता है।

         उत्तर भारत में इस दिन चूरमा बनाने की परंपरा है। चावल और छिलके वाली मूंग की दाल को सूखा ही मिलाकर घर के सदस्यों की संख्या अनुसार कुढी बनाई जाती है, हरेक कुढी पर तिल, गुड़,घी और पैसे रखकर सदस्यों द्वारा स्नान उपरांत अलग-अलग छवाकर दान किया जाता है। सूर्य को अर्घ्य देने के पश्चात चूरमा ग्रहण किया जाता है। खिचड़ी, गुड, तिल के लड्डुओं का दान किया जाता है। समय परिवर्तन के अनुसार अब दान की जाने वाली वस्तुओं का स्वरूप भी बदल गया है। लोग आवश्यकतानुसार चीजें खरीद कर दान देते हैं।

         गुजरात और राजस्थान में इस पर्व विशेष पर पतंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है। आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से तथा पूरा वातावरण 'बो काटे' की ध्वनि से गुंजित हो उठता है। संभवतः सर्दियों में आलस्य से जकड़े शरीर की जड़ता को समाप्त करने के लिए भी इस अवसर पर पतंग उड़ाने की परंपरा हमारी संस्कृति से जुड़ गई है क्योंकि पतंगबाजी प्रतीक है सक्रियता का और संक्रांति का शाब्दिक अर्थ है संचार या गति। इस दिन सूर्य की किरणें सीधी हम पर पड़ती हैं जिसका सकारात्मक औषधीय प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। परंतु पतंगबाजी पर अनेक शहरों में अब प्रतिबंध लगा दिया गया है क्योंकि मांजे की गिरफ्त में आने से बहुत से लोग दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं।

         खगोल शास्त्र के अनुसार इस दिन पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। भौगोलिक दृष्टि की बात करें तो संक्रांति से दिन बड़े और रातें छोटी होनी प्रारंभ हो जाती हैं। आधुनिक युग में तार्किक कसौटी पर कसकर ही कोई बात अंगीकार की जाती है और यह पर्व धार्मिक, खगोलीय, भौगोलिक, आध्यात्मिक, प्राकृतिक सभी दृष्टियों से सटीक सिद्ध होता है इसीलिए पूरे भारतवर्ष में उत्साह और आस्था के साथ मनाया जाता है।

         संक्षेप में कहें तो मकर संक्रांति साधना का सिद्धिकाल है और प्रकाश, प्रेरणा तथा आलौकिक- आध्यात्मिक अनुदानों का महापर्व है।

©® डॉ. मंजु रुस्तगी

डॉ. मंजु रुस्तगी,
हिंदी विभागाध्यक्ष(सेवानिवृत्त)
वलियाम्मल कॉलेज फॉर वीमेन 
अन्नानगर ईस्ट, चेन्नई
9840695994

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