मानवीय मूल्यों के प्रणेता : मुंशी प्रेमचंद

Dr. Mulla Adam Ali
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Munshi Premchand : Promoter Of Human Values

Premchand : Promoter Of Human Values

मानवीय मूल्यों के संस्थापक प्रेमचंद : आधुनिक हिंदी कथा साहित्य के पितामह माने जाने वाले मुंशी प्रेमचंद जयंती आज 31 जुलाई को मनाया जाता है। उनका जन्म 1880 जुलाई 31 को लमही गांव में हुआ था, धनपत राय श्रीवास्तव उनका बचपन का नाम है। कलम के सिपाई और कथा सम्राट, उपन्यास सम्राट मानेजाने वाले प्रेमचंद अपनी रचनाओं में यथार्थ जीवन का चित्रण किया है, दैनिक जीवन में घटित घटनाओं को अपने कहानियों, उपन्यासों के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया है। तो चलिए और भी उनके बारे में जाने इस आर्टिकल के माध्यम से।

प्रेमचंद : मानवीय मूल्यों के प्रणेता

हिन्दी साहित्य में कथा साहित्य के पुरोधा उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द ने जीवनादर्शों, मानवीय मूल्यों एवं मानवीय संवेदनाओं के उपन्यास और कहानी के सजीव पात्रों के माध्यम से स्थापित करने का स्तुत्य कार्य किया है। पीड़ितों, प्रताड़ितों, शोषितों एवं दलितों के प्रत्ति सहानुभूति से उत्पन्न संवेदनाओं को उन्होंने मानवीय संबंधों के धरातल पर अनुभूतिक अभिव्यंजना को वाणी देने का सार्थक एवं सकारात्मक प्रयास किया है। उनके उपन्यास एवं कहानियाँ कारुणिक स्वर ध्वनित करने में सर्वदा सफल रहे हैं। करुणा, सहानुभूति, ममता, मोह, दया, परोपकार, सेवाभाव आदि की संवेदनशीलता ने उन्हें मानवीय मूल्यों के प्रणेता तथा जीवनादर्शों के संस्थापक सिद्ध कर दिया है। कृषक जीवन का कारुणिक, मर्मस्पर्शी एवं द्रवीभूत चित्रण उन्होंने अनेक कहानियों तथा कर्मभूमि, वरदान, प्रेमाश्रम, कायाकल्प आदि उपन्यासों में प्रस्तुत किया है। 'गोदान' का होरी सम्पूर्ण भारतीय कृषक का प्रतीक है जो अपनी सहज कमजोरियों, दुर्बलताओं, कष्टों, मार्मिक पीड़ाओं एवं सतत वेदनाओं के कारण पाठकों की गहन संवेदना का कृपा पात्र बनता है। समाज प्रदत्त आपत्ति-विपत्ति, आन्तरिक दुर्बलताओं एवं विषम सामाजिक परिस्थितियों के दुश्चक्र में पड़कर होरी जीविका तथा मानसिक शांति ही नहीं खोता अपितु मान-मर्यादा, आत्म-सम्मान एवं धर्म से भी वंचित हो जाता है।

पुरुष-प्रधान समाज में अर्द्धांगिनी-वामांगिनी होने के कारण पुरुष की पाशविक वृत्ति का दुष्फल नारी युगों-युगों से भोगती आ रही है जिसकी साक्ष्य है 'प्रतिज्ञा' की पूर्णा, 'सेवासदन' की सुमन, 'निर्मला' की स्वयं निर्मला, 'गबन' की रतन, 'कर्मभूमि' की मुन्नी- नैना तथा 'गोदान' की झुनिया, सिलिया एवं गोविन्दी। बाल विवाह, विधवा विवाह, अनमेल विवाह, गन्धर्व विवाह, प्रेम विवाह आदि की शिकार नारी दहेज, गरीबी, जातिप्रथा, सामाजिक रीतियों-कुरीतियों आदि से शोषित-पीड़ित होकर दयनीय, शोचनीय एवं अपमानित जीवन- जीने को बाध्य रही है। यही कारण है कि 'निर्मला' में प्रेमचन्द ने करुणा की सरिता प्रवाहित करके मानवीय मूल्यों की रक्षा की है।

भाग्य ही चरित्र है तथा नियतिवाद में विश्वास करने वाले भाग्यवादी प्रेमचन्द ने निराशा, हताशा, दुराशा आदि को विडंबना और नियति के रूप में स्वीकारा है। यही कारण है कि उनके पात्र मृत्यु का आलिंगन करके पाठकों की सहानुभूति और श्रद्धांजलि ग्रहण करते हैं। कायाकल्प, रंगभूमि और निर्मला में नियतिवाद जीवन लीला समाप्त कर देता है। करुणा के साथ-साथ सहानुभूति की भाव संपदा प्रेमचन्द के साहित्य में सर्वत्र परिव्याप्त है। करुणा में प्रगाढ़ता है, परोपकार की भावना है। सहानुभूति में सहयोग का भाव तथा पर दुःख का परिज्ञान-हमदर्दी। 'प्रेमाश्रम' का ज्ञान शंकर स्वार्थी, अत्याचारी महात्वाकांक्षी, विद्वेषी, ईर्ष्यालु है फिर भी अन्ततोगत्वा वह प्रायश्चित्त करता है, विडम्बना की बात करता है और पाठकों की सहानुभूति प्राप्त करता है जब वह अफसोस करके कहता है, है वैभव लालसा । तेरी बलिवेदी पर मैंने क्या नहीं चढ़ाया मनुष्य कितना दीन, कितना परवश । भावी कितनी प्रबल, कितनी कठोर ।' यही नहीं 'गबन' में वकील का पश्वात्ताप हमें सहानुभूति प्रदर्शित करने को बाध्य करता है जब वह कहता है, 'जीवन एक दीर्घ पश्चात्ताप के सिवा और क्या है?' 'गोदान' में प्रेमचन्द ने इस नियतिनटी के दुश्चक्र को इन शब्दों में कहा है 'जीवन की ट्रेजेडी और इसके सिवा क्या है कि आपकी आत्मा जो काम करना नहीं चाहती, वही आपको करना पड़े।'

जीवन मूल्यों के प्रति प्रेमचन्द सजग हैं, सतर्क हैं, जागरुक हैं। 'गृहदाह' कहानी का यह वाक्य कारुणिक भाव की प्रस्तुति है 'मातृ विहीन बालक संसार का सबसे करुणाजनक प्राणी है।' 'बूढ़ी काकी' में करुणा एवं सहानुभूति की पात्रा स्वयं बूढ़ी काकी है जब वे जूठी पत्तलों को भूख के कारण चाटती हैं। गृहणी रूपा की करुणा जागृत हो उठती है और वह कह उठती है, 'परमात्मा, मेरे बच्चों पर दया करो। इस अधर्म का दण्ड मुझे मत दो नहीं तो हमारा सत्यानाश हो जाएगा।' 'कर्मभूमि' में अमरकान्त भी इस विडम्बनापूर्ण स्थिति नियतिबाद तथा सहानुभूति का पात्र बनता है। प्रेमचन्द ने अपने सभी उपन्यासों एवं कहानियों के माध्यम से समाज में एक आदर्श की स्थापना करने का प्रयास किया है। सामन्ती और साम्राज्यवादी प्रथा का उन्होंने डटकर विरोध किया है। गरीबों, दलितों एवं पतितों के प्रति सहानुभूति की भावना उनके हृदय में बराबर बनी रही।

वैश्विक स्तर पर प्रेम भावना को प्रसारित करने वाले कथाकार प्रेमचन्द ने प्रेम में प्रगाढ़ता, पावनता, आत्मीयता एवं विश्वसनीयता को निरखा-परखा है। प्रेम में विशालता, व्यापकता एवं उदारता तथा सहिष्णुता की भावना अपेक्षित है, अनिवार्य है। 'कायाकल्प' में स्पष्ट उल्लेख है कि 'प्रेम हृदय के समस्त सद्भावों का शांत, स्थिर, उद्‌गारहीन समावेश है। उनमें दया और क्षमा, श्रद्धा और वात्सल्य, सहानुभूति और सम्मान, अनुराग और विराग, अनुग्रह और उपकार सभी मिले होते हैं। प्रेम से प्रेमिका मिलता है और श्रद्धा-सेवा से ईश्वर। प्रेम मानव में उदात्त तत्त्व जागत करता है तथा देवत्व का सामिप्य करता है। सर्वस्व समर्पण एवं स्व के अर्पण का भाव होता है। आत्मा विर्सजन की स्थिति ही प्रेमार्जन की स्थिति होती है। इच्छा और प्रेम को पारिभाषित करते हुए मानवीय मूल्यों के संस्थापक प्रेमचन्द 'प्रेमाश्रम' में स्पष्ट लिखते हैं: 'इच्छा और प्रेम में बड़ा भेद है। इच्छा अपनी ओर खींचती ह, प्रेम स्वयं खिंच जाता है। इच्छा में ममत्व है, प्रेम में आत्म-समर्पण।'

प्रेमचन्द के साहित्य में प्राणी मात्र का प्रेम है सिर्फ मानवीय या पशु पक्षीय ही नहीं। 'पूस की रात' कहानी में झबरा हलकू मालिक के साथ प्रेम पूर्वक सोता है। 'दो बैलों की कथा' में बैल भी स्वामी के प्रेमपाश में बँधकर बिक्री के बाद भी वापिस आ जाते हैं। 'कामनातरु' प्रेमी-प्रेयसी का प्रेम अमरत्व प्रदान करता है। 'महातीर्थ' में अबोध बालक माँ को त्याग कर धाम के प्रेम में महातीर्थ का उत्तराधिकारी होता है। 'गोदान' में दुर्बल दीनहीन माँ झुनियाँ के दूध न होने के कारण नवजात शिशु को बिलखता देखकर प्रौढ़ा स्त्री चुहिया के स्तनों में दूध का आना वात्सल्य और प्रेम का द्योतक है इसे अलौकिक कहें या मनोवैज्ञानिक। 'कजाकी' में बालक की स्नेहमय चपरासी के प्रति ममता-मोह, 'प्रेरणा' में शिक्षक का प्रेम पाकर शरारती लड़के में सुधार आना आदि तथ्य प्रेम भावना की शक्ति के प्रतीक हैं। मानवीय मूल्यों में प्रेम सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वोच्च तत्व है जो प्राणीमात्र के जीवन में सुख, शांति, सद्भाव, मैत्री आदि गुणों को समाहित करता है।

प्रेमचन्द से पूर्व एवं प्रेमचन्द से बाद भी गुण एवं परिणाम में सामाजिक यथार्थवादी भावभूमि पर इतना विपुल साहित्य वर्ग संघर्ष एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद के घरातल पर नव्य वैचारिक क्रांति की अवधारणा से सम्पृक्त नहीं लिखा गया जितना मुंशी प्रेमचन्द ने लिखा है। यह हिन्दी साहित्य को उनकी सबसे बड़ी देन कही जाएगी। वैचारिक प्रतिबद्धता, मूल्य मीमांसा, सांस्कृतिक चेतना, जीवनादर्श स्थापन, मानवीय मूल्यों की संवेदनशीलता आदि ने प्रेमचन्द को लोकप्रिय बना दिया है। वस्तुतः आर्थिक विपन्नता ही सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करती है जिससे वर्ग संघर्ष होता है और समाज में नाना प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। प्रेमचन्द ने सामाजिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन लाने के लिए वैचारिक क्रांति की शुरूआत उपन्यासों और कहानियों के पात्रों के माध्यम से करके सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का बीजारोपण किया था जिसकी चरम एवं परम परिणति अद्यतन परिवेश में समाजवाद में परिलक्षित होती है। उनका चिंतन सर्वदा तर्क युक्त, न्यायसंगत एवं समाजोपयोगी रहा है जिसके मूल में मानवीय मूल्यों के स्थापन का भाव निहित है।

- डॉ. पशुपति नाथ उपाध्याय

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