नाचू के रंग: गोविन्द शर्मा के बाल उपन्यास में कला, पर्यावरण और बालमन की उड़ान

Dr. Mulla Adam Ali
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“Nachu Ke Rang” is a vibrant children’s novel by Govind Sharma that celebrates creativity, nature, and moral strength. With the magic of colors and brush, Nachu inspires young minds to serve society through art and environmental awareness. A delightful and meaningful read for all ages. Nachu Ke Rang Children's Novel review by Dr. Surendra Vikram.

Nachu Ke Rang: Art, Nature & a Child’s World

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हिंदी बाल उपन्यास की समीक्षा

बाल साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कार, संवेदना और सृजनशीलता का संगम होता है। वरिष्ठ बालसाहित्यकार गोविन्द शर्मा का बाल उपन्यास ‘नाचू के रंग’ न सिर्फ एक रचनात्मक यात्रा है, बल्कि बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा, पर्यावरण चेतना और कला के माध्यम से सामाजिक बदलाव की सुंदर अभिव्यक्ति भी है। यह समीक्षा इस उपन्यास के कथ्य, भाषा और सन्देश को उजागर करती है। पढ़िए बाल उपन्यास नाचू के रंग की सुंदर समीक्षा डॉ. सुरेन्द्र विक्रम जी द्वारा लिखी गई।

नाचू के रंग : गोविन्द शर्मा

     हिन्दी साहित्य में पिछले दो दशकों में बहुत बदलाव आया है, इसे समकालीन प्रकाशित पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में आसानी से देखा जा सकता है। बहुत पहले साधारण ढंग से श्वेत-श्याम चित्रों सहित मात्र 24-32 पृष्ठों में छपने वाली पुस्तकें अब आकर्षक साज- सजा, शानदार ले-आउट और रंगीन चित्रों सहित प्रकाशित हो रही हैं। सोशल मीडिया ने इस पहल को आगे बढ़ाने का रास्ता भी खोल दिया है। कुछ बालसाहित्यकारों की रचनावलियाँ, ग्रंथावलियाँ और समग्र भी छपकर बालसाहित्य को मुख्य धारा में लाने का काम कर रही हैं। यही नहीं बड़ों के लिए प्रकाशित होने वाली रचनावलियों/ग्रंथावलियों में भी लेखकों के बालसाहित्य को प्रमुखता से स्थान दिया जा रहा है। 

     बालसाहित्य की लगभग 50 से अधिक पुस्तकें लिखकर उल्लेखनीय लेखकों में अपनी लगातार उपस्थिति बनाए रखने वाले गोविन्द शर्मा का सृजन कभी हमें चौंकाता है, तो कभी उन पर गर्व करने का अवसर प्रदान करता है। विशेष रूप से बालकहानियों में उनकी धमक नए-नए आयाम स्थापित करती है। एनबीटी से प्रकाशित उनकी पुस्तक सूरज का बिल, डोबू और राजकुमार तथा मटकू बोलता है पढ़ते हुए जितना आनंद बच्चों को आता है, उतने ही आनंद की अनुभूति बड़ों को भी होती है। उनकी पुस्तक पेड़ और बादल में प्रकृति का साहचार्य, पर्यावरण संरक्षण, पेड़ों की सुरक्षा पर केन्द्रित कहानियाँ जागरुकता का भी जीता- जागता उदाहरण हैं।

      महत्त्वपूर्ण विषयों को छोटी-छोटी कहानियों में ढालकर बच्चों को परोसने की कला में गोविन्द शर्मा जी माहिर हैं। अपनी पुस्तक दादाजी की अंतरिक्ष यात्रा में वे विज्ञान और अंतरिक्ष की बात करते हुए कहते हैं कि—” पुस्तक में अंतरिक्ष में स्थित अनेक ग्रह- उपग्रहों के बारे में परिचय कथात्मक शैली में देने का प्रयास किया गया है। नि:संदेह मेरे लिए यह नया विषय है, लेकिन विभिन्न रचनाकारों द्वारा सृजित अनेक पुस्तकों और पत्र- पत्रिकाओं में मनचाहा ज्ञान भरा पड़ा है। मैं कभी नासा, इसरो या अंतरिक्ष में नहीं गया, जो भी सीखा पुस्तकों को पढ़ने से ही सीखा। यह रचना अंतरिक्ष यान के द्वार पर दस्तक मात्र है, क्योंकि अंतरिक्ष ज्ञान अंतरिक्ष की तरह ही अनंत है असीम है।” 

     इस पुस्तक की विशेषता है कि इसमें रोचक शैली में दी गई जानकारी पाठकों को पूरी तरह बाँधकर रखती है। कहानियों के साथ-साथ उनकी एक और पुस्तक बड़ी महत्वपूर्ण है— ‘यह कालीबंगा है’। उत्खनन का उत्कृष्ट नमूना कालीबंगा, जो विकसित हड़प्पा कालीन संस्कृति को उजागर करती है, के बारे में दुर्लभ चित्रों सहित दी गई जानकारी में शर्मा जी की भाषा का कौशल भी देखा जा सकता है।

     मेरा यह विवरण देने का प्रमुख कारण यह है कि विगत 50 वर्षों में उनकी निरंतरता और सक्रियता दोनों बराबर बनी हुई हैं। यह कहना कठिन है कि निरंतरता को सौ बटे सौ दिया जाए या सक्रियता को उत्कर्ष पर रखकर उसे सम्मानित किया जाए। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि दोनों को साधकर स्वर्णिम पारी खेलना भी अपने आपमें चमत्कार जैसा ही लगता है।

      गोविंद शर्मा के महत्त्वपूर्ण बालसाहित्य सृजन के आलोक में उन्हें 1989 में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग का प्रतिष्ठित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार उनकी पांडुलिपि कालू कव्वा एवं अन्य कहानियाँ पर मिला था। इसके अतिरिक्त बालकथा संग्रह सबका देश एक है पर राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर का शंभूदयाल सक्सेना बालसाहित्य पुरस्कार तथा काचू की टोपी पर साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का बालसाहित्य पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। इन प्रतिष्ठित पुरस्कारों के अतिरिक्त भी अनेक पुरस्कार उनके महत्त्वपूर्ण सृजन के गवाह हैं।

     इसमें कोई दो राय नहीं है कि अन्य विधाओं की अपेक्षा बच्चों के लिए उपन्यास लिखना अधिक श्रमसाध्य कार्य है, फिर भी कुछ रचनाकार अपनी प्रतिभा, मेधा और परिश्रम के बल पर इस क्षेत्र में न केवल महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, बल्कि वर्तमान के साथ -साथ आगामी पीढ़ियों के लिए भी उल्लेखनीय लेखन कर रहे हैं। गोविन्द शर्मा ऐसे ही रचनाकार हैं। उनके उल्लेखनीय बालसाहित्य सृजन का एक हिस्सा यहाँ एक बालउपन्यास के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें बच्चों में छिपी प्रतिभा को बड़े करीने से उजागर करने का प्रयास किया गया है। कला कलाकार को हमेशा जीवंत बनाए रखती है।

      नाचू के रंग गोविन्द शर्मा का बड़ा ही रोचक और मनोरंजन सेभरपूर उपन्यास है। इसकी कथावस्तु में नाचू एक ऐसा बालक है जो पहले अपने ब्रश और रंगों से खेलते हुए लोगों का मनोरंजन करता था, लेकिन बड़ा होने पर वह प्रेरक व्यक्तित्त्व के रूप में सामने आया। एक ओर सफाई और दूसरी ओर पर्यावरण की सुरक्षा उसके मुख्य उद्देश्य हो गए। वह खाली जमीन पर वृक्षारोपण करवाने के साथ -साथ खुद इस कार्य में ऐसा रमा कि रिकॉर्ड बन गया। बकौल उपन्यासकार —--” इसके लिए पौधारोपण के आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया। आंदोलन का मतलब यह नहीं की सड़क पर जुलूस निकलने लगा, बल्कि खाली जमीन पर स्वयं पौधारोपण करवाने और करने में लग गया। इस काम के लिए एक पूरी टीम बन गई उसके दोस्तों की।” (पृष्ठ V!!)

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नाचू के रंग : हिंदी बाल उपन्यास
  उपन्यासकार ने नाचू की जो तस्वीर आरंभ में खींची है, वह इतनी मनमोहक है कि दिल में उतरती चली जाती है —’जब वह (नाचू) मुस्कुराता है तो इसका मतलब है, अभी उसने कुछ नया नहीं किया है, किसी भी समय कर सकता है। हँसी का मतलब है कि वह कुछ कर चुका और उसे किसी की परवाह नहीं।’ (पृष्ठ 1) ऐसे अनूठे बालक के रंग और ब्रश दो ऐसे औजार हैं, जिनसे वह अद्भुत कारनामें करके लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता है। ऐसे ही मज़ेदार किस्सों से सुसज्जित यह उपन्यास पाठकों को पूरी तरह बाँधकर रखता है।

    यह उपन्यासकार की कहन शैली का प्रभाव है कि वह नाचू से रंग और ब्रश के सहारे नैतिक मूल्यों को ऐसे जोड़कर प्रस्तुत करता है कि कहीं पर भी बनावटीपन नजर नहीं आता है। इस उपन्यास से नाचू समवयस्क बच्चों में जमीनी हक़ीक़त को भी ऐसे उजागर करता है, मानो सब कुछ आँखों के सामने ही सामान्य रूप से घट रहा है । कहीं पर भी बनावटीपन नहीं है। दूसरों की सहायता बिना ढोल बजाए की जाए, तो उसका आनंद ही कुछ और है। जब परंपराओं के साथ आधुनिकताबोध दूध और पानी की तरह मिल जाते हैं तो नाचू के रंग जैसा उपन्यास लिखा जाता है जो समाज की धरोहर बन जाता है।

      उपन्यास की शुरुआत में नाचू की मुस्कुराहट और हँसी को कितने स्वाभाविक ढंग से बताया गया है—-"जब वह मुस्कुराता है तो इसका मतलब है- अभी उसने कुछ नया नहीं किया है, किसी भी समय कर सकता है। हँसी का मतलब है कि वह कुछ कर चुका और उसे किसी की परवाह नहीं।” (पृष्ठ 1)

       नाचू कोई पेशेवर पेंटर नहीं है, इसके बावजूद रंग और ब्रश पर उसका हाथ इतना सधा है कि उसकी पेंटिंग से मूर्तियाँ जीवंत हो उठती हैं। उसने एक दिन अपने ब्रश और रंग से चाय के विज्ञापन के लिए बने फिल्म अभिनेता के एक नीचे गिरे हुए कट आउट को बिलकुल चौकीदार जैसा बना दिया। इधर चौकीदार बना, उधर एक चोर चोरी करके घर से बाहर निकला ही था कि उसके पाँव ही ठिठक गए। उसने देखा कि बाहर चौकीदार खड़ा है। कहते हैं न कि चोर की दाढ़ी में तिनका। उसने चौकीदार की शक्ल में बने हुए कटआउट को असली चौकीदार समझ लिया। वह इंतजार करता रहा कि चौकीदार आगे जाए तो मैं भागने का रास्ता बनाऊँ।

      अब चौकीदार तो असली था नहीं। कटआउट तो कटआउट ठहरा, एक ही जगह पर टिका हुआ। इंतजार करते -करते चोर को नींद आ गई। जब उसकी आँख खुली तो वह लोगों की गिरफ़्त में था। बाद में पता चला कि यह नाचू की कारस्तानी थी, जिसने अपने ब्रश और रंग से नकली चौकीदार बनाकर चोर को भ्रम में डाल दिया था। नाचू अब कहीं भी जाता उसके साथ उसका ब्रश और रंग जरुर होते। नाचू ने पत्थर को डबलरोटी, मामा के गले पर ज़ंजीर की हू-ब-हू तस्वीरें बनाकर सभी को हैरत में डाल दिया।

      नाचू को ब्रश और रंग का ऐसा जुनून सवार हुआ कि उसे—” जहाँ भी जगह मिलती वह अपने रंग और ब्रश का कमाल दिखा देता। उसने तो कई बार दोस्तों की पैंट और कमीज पर भी अपना ब्रश चलाया है। इस सबके लिए उसे कई बार डाँट खानी पड़ती तो कई बार उसकी सलाहना भी होती। दोनों हालत में वह मुस्कुराता रहता।” (पृष्ठ 9-10)

       अब नाचू का ब्रश और रंग का शौक धीरे-धीरे शरारतों में बदलने लगा था। उसने पहले कालू कलंदर के भालू से दोस्ती की फिर उसे अपने ब्रश और रंग से टाइगर बना दिया। नाचू अपने दोस्तों के साथ जंगल के रास्ते से लौट रहा था कि अचानक घोड़ों पर सवार डरावने आदमियों को देखकर सब डर गए। बच्चों को यह समझने में देर नहीं लगी कि वे डाकू हैं। डाकू एक पत्थर की ओट में जाकर थोड़ी देर बाद लौटकर वापस चले गए। नाचू और उसके दोस्तों को शक हुआ और उन्होंने पत्थर की ओट में छिपे बक्से को मशक्कत से खोज लिया जिसमें सोना भरा हुआ था।

      आपस में साँठगाँठ करके बच्चे लोहे का बॉक्स लेकर अपने गाँव की ओर लौट रहे थे कि उन्हें रास्ते में फिर डाकू मिल गए। यह तो अच्छा हुआ था कि नाचू ने अपने ब्रश और रंग से बक्से की ऐसी शक्ल बना दी थी कि डाकू उसे पहचान नहीं पाए। बाद में पुलिस की सहायता से डाकू पकड़ में आ जाते हैं। नाचू अपने ब्रश और रंग से रोज़ -रोज़ न‌ए-न‌ए कारनामे करके सभी का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर रहा था।

     नाचू अपनी कलाकारी में तो अव्वल था ही, पढ़ाई में भी हमेशा उसकी अच्छी पोजीशन आती थी। अब उसे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए गाँव से शहर के स्कूल में प्रवेश लेना था। प्रवेश के समय प्राचार्य और नाचू का संवाद उसकी कला के एक नमूने के रूप में सामने आता है - 

       “जी, जब मैं दो-तीन वर्ष का था, तब नाचा करता था। तब घर के लोगों ने मेरा नाम नाचू रख दिया। वैसे मैं अच्छा नर्तक नहीं हूँ। गाना, घर के लोग कहते हैं जब मैं छोटा था और रोता था तो ऐसा लगता था कि गीत गा रहे हो। इससे ज्यादा नाचना गाना मुझे नहीं आया।”

“इसका मतलब है तुम्हारे पास कोई कला नहीं है। तुम्हें कलाकार नहीं कहा जा सकता।”

नाचू मुस्कुराते हुए बोला- “सर आप थोड़ी देर मेरे पिताजी से बात करिए मैं अपनी कला का नमूना आपको दिखा सकता हूँ।” (पृष्ठ 29)

   और थोड़ी देर में ही उसने बगल की दीवार पर प्राचार्य जी का हू-ब-हू चित्र बना दिया।

   नाचू की कला ने न केवल उसे प्रवेश दिलाया बल्कि छात्रावास का आबंटन भी आसानी से करा दिया। धीरे-धीरे वह अपनी कला के बल पर सभी का चहेता बन जाता है। यही नहीं वह अपनी कला का इस्तेमाल साफ-सफाई के लिए भी करने लगा। पर्यावरण, वन संरक्षण में भी उसकी प्रमुख भूमिका से एक क्रांतिकारी परिवर्तन होने लगा। स्कूल के पौधारोपण में भी उसने बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया। देखते -देखते स्कूल का परिसर इतना भव्य लगने लगा कि उसे देखने के लिए लोग आने लगे।

     नाचू ने स्कूल के अतिरिक्त सार्वजनिक जगहों पर भी अपनी चित्रकारी का नमूना दिखाकर लोगों को हैरत में डाल दिया। उसने झोपड़ी को भी अपने ब्रश और रंग से ऐसा चमका दिया कि आने वाले लोग झोपड़ी की दीवारों पर बने नाचू के ब्रश और रंग का कमाल अवश्य देखते। धीरे-धीरे नाचू की कलाकारी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलने लगा। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि नाचू की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उसे प्रलोभन देने वाले लोग भी थे, लेकिन वह ग़लत काम करने से इनकार कर देता था। 

    उपन्यास का समापन बड़ा सुखद है। नाचू अपनी मुस्कुराहट के साथ ही बड़ा हो रहा है। उसकी हँसी, मस्ती, दूसरों की मदद करने की आदत, सच्चाई और अपनी पढ़ाई के प्रति सजग और सचेत रहने के कारण ही वह समाज में अपनी उपस्थिति बनाए हुए है। सच्चाई तो यह भी है कि कलाकार की असली पहचान उसकी कला ही होती है, लेकिन वह अपने समर्पण के बल पर उसे और निखारकर समाज के सामने एक आदर्श उपस्थित कर सकता है।

      उपन्यासकार ने एक-एक घटना को जोड़ते हुए उसमें नाचू की कलाकारी जिस ढंग से पिरोकर उपन्यास का विकास किया है, उससे पठनीयता और प्रवाह दोनों एक दूसरे में गुँथे हुए हैं। उपन्यास में मनोरंजन तो है ही, प्रकृति और पर्यावरण को स्वच्छ रखने का अप्रत्यक्ष संदेश भी दिया गया है। यह बात भी बड़े करीने से निकलकर सामने आती है कि शिक्षा और कला का अद्भुत संगम विकास में हमेशा साधक की भूमिका निभाता है।

नाचू के रंग (बाल उपन्यास) : गोविन्द शर्मा: प्रथम संस्करण -2024 : प्रकाशक-पंचशील प्रकाशन, फ़िल्म कॉलोनी, चौड़ा रास्ता, जयपुर-302003

- डॉ. सुरेन्द्र विक्रम

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