Kundaliya Day, celebrated every year on 19th November, honors the beauty and tradition of the ancient Indian poetic form Kundaliya Chhand. Formed by the unique blend of Doha and Rola, this chhand is known for its musical flow, balanced structure, and the artistic repetition of the opening word at the end. With the initiative of poet Trilok Singh Thakurela, Kundaliya Day has become a literary celebration that inspires poets to preserve and promote this timeless art.
Kundliyan Diwas : History, Significance and Best Kundaliya Poem Collection
कुण्डलिया दिवस
पुरातन भारतीय साहित्य में छंदों का विशेष महत्व रहा है। इन छंदों में कुण्डलिया छंद एक अद्भुत छंद है! दोहा और रोला छंद के मेल से बने इस छंद में 6 चरण होते हैं, जिसमें पहले 2 चरण दोहा और उसके बाद के 4 चरण रोला के होते हैं। कुण्डलिया का आरंभ जिस शब्द या शब्द- समूह से होता है, उसका समापन भी उसी शब्द या शब्द-समूह से होता है।
इस लोकलुभावन छंद को साहित्य जगत में लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से त्रिलोक सिंह ठकुरेला की पहल पर साहित्यकारों द्वारा प्रति वर्ष 19 नवम्बर को कुण्डलिया दिवस मनाया जाता है । पहला कुण्डलिया दिवस 19 नवम्बर 2024 को मनाया गया था।
20 श्रेष्ठ कुण्डलिया छंद संग्रह
देशी प्यारे भाइयो। हे भारत-संतान!
अपनी माता-भूमि का, है कुछ तुमको ध्यान?
है कुछ तुमको ध्यान! दशा है उसकी कैसी?
शोभा देती नहीं, किसी को निद्रा ऐसी॥
वाजिब है हे मित्र! तुम्हें भी दूरंदेशी।
सुन लो चारों ओर, मचा है शोर ‘स्वदेशी’॥
थाली हो जो सामने, भोजन से संपन्न।
बिना हिलाए हाथ के, जाय न मुख में अन्न॥
जाय न मुख में अन्न, बिना पुरुषार्थ न कुछ हो।
बिना तजे कुछ स्वार्थ, सिद्ध परमार्थ न कुछ हो॥
बरसो, गरजो नहीं, धीर की यही प्रणाली।
करो देश का कार्य, छोड़कर परसी थाली॥
- राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’
त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुंडलियाँ
महकी मन की वाटिका, खिले आस के फूल।
हुई संचरित फिर हवा, तन मन के अनुकूल।।
तन मन के अनुकूल, नये फिर सपने जागे।
छायी मृदुल उमंग, फिक्र के सब भय भागे।
'ठकुरेला' कविराय, हुई ऋतु बहकी, बहकी।
जब से खिला वसंत, समूची वसुधा महकी।।
पड़ना मत इस फेर में, कौन बड़ा,लघु कौन।
उपयोगी है खांड यदि, है उपयोगी लोन ।।
है उपयोगी लोन, सभी की गरिमा होती।
मिट्टी वाला काम, नहीं कर सकता मोती।
'ठकुरेला' कविराय, भाव के मोती जड़ना।
रहे सभी का मान, काम सबसे ही पड़ना।।
- त्रिलोक सिंह ठकुरेला
तोताराम 'सरस' की कुंडलियाँ
दुख में जो सुख खोजते, वे ही रहें प्रसन्न।
जीवन में रहते सदा, खुशियों से सम्पन्न।।
खुशियों से सम्पन्न, शान्ति निज मन में पाते।
स्वाभिमान के साथ, जिन्दगी 'सरस' बनाते।
मन पर कसें लगाम, जियें बस वे ही सुख में।
जिन्हें नहीं संतोष, जिन्दगी उनकी दुख में ।।
हॅंसते रहना ही सदा, जीवन में उपयुक्त।
हॅंसते हॅंसते जिन्दगी, हो तनाव से मुक्त।।
हो तनाव से मुक्त, सुगम हों पथ जीवन के।
विहॅंसें बारहमास, सुमन निज मन उपवन के।
सौ बातों की बात, 'सरस' यह मानो कहना।
जीवन में अनिवार्य, हमेशा हॅंसते रहना।।
- तोताराम 'सरस'
शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन' की कुंडलियाँ
परिवर्तन से ही खिले, जग में मधुरिम-फूल।
मान सको तो मान लो, जीवन का यह मूल।
जीवन का यह मूल, जिन्दगी महका देता।
तूफानों के बीच, तभी मंजिल पा लेता।
चले समय के साथ, विपद का करता मर्दन।
शकुन वहीं हो नित्य, देहरी पर परिवर्तन।
बहके कदमों से कभी, पार न लगती नाव।
अटके है मझधार में, जिस मन में भटकाव।।
जिस मन में भटकाव, वही खाता है ठोकर।
निशि-दिन खाता ताव, बुद्धि अपनी वो खोकर।
रिसने लगते घाव, मार काँटों की सहके।
होता नहीं भराव, 'शकुन'तन-मन भी बहके।।
- शकुन्तला अग्रवाल 'शकुन'
बाबा बैद्यनाथ झा की कुंडलियाँ
रखता निंदक सर्वदा, मैं भी अपने पास।
कर देता मेरा वही, सर्वांगीण विकास।।
सर्वांगीण विकास, अन्य को त्रुटि बतलाकर।
करे सतत उपकार, गंदगी साफ कराकर।।
उसके कारण आज, सुधरकर मेवा चखता।
देकर मैं सम्मान, निकट निंदक को रखता।।
कैसे पानी के बिना, बुझ पाएगी प्यास?
जलसंकट से जूझती, धरती आज उदास।।
धरती आज उदास, दुःख की बदली छायी।
मरते लाखों जीव, हमें पर लाज न आयी।।
जल-संरक्षण हेतु, त्याग दें अब मनमानी।
सोचें ठोस उपाय, मिलेगा कैसे पानी ।।
- बाबा बैद्यनाथ झा
राजपाल सिंह गुलिया की कुंडलियाँ
अपना भारत देश ये, बने जगत सिरमौर ।
इतनी सी है कामना, चाह नहीं कुछ और ।।
चाह नहीं कुछ और, किसी पर करें चढ़ाई ।
बढ़े विश्व में प्यार, सुनो बहन और भाई ।
कह गुलिया कविराय, यही हो सबका सपना ।
बने विश्व सरदार, देश ये भारत अपना ।।
पानी पीकर देश का, बनना पानीदार ।
यही समय की मांग है, ये ही लोकाचार ।।
ये ही लोकाचार, बड़ा आदर को मानो ।
बहुत कीमती नीर, मोल इसका भी जानो ।
कह गुलिया कविराय, करो मत ये नादानी ।
बड़ा-बड़ों का मान, फेर ना देना पानी ।।
- राजपाल सिंह गुलिया
वैशाली चतुर्वेदी की कुंडलियाँ
सर्कस जैसी जिंदगी, भिन्न भिन्न हैं पात्र।
सब ही अपनी भूमिका, निभा रहे हैं मात्र।।
निभा रहे हैं मात्र, खेल ये देखो भाई।
दो रोटी की आस, खींच इनको ले आयी।
हॅंसा रहा जो खूब, लगे वो जोकर बेबस।
जुदा नही ये पात्र, जिंदगी भी है सर्कस।।
आता है हर साल ही, रंगों का त्यौहार।
साथ लिये संदेश ये, प्रेम चुनो इस बार।
प्रेम चुनो इस बार, भुला कर नफरत सारी।
हाथ अबीर गुलाल, रंग की हो पिचकारी।
नव उमंग उत्साह, हर्ष ये घर घर लाता।
मधुर मधुर पकवान, लिये ये उत्सव आता।
- वैशाली चतुर्वेदी
डाॅ. सरला सिंह 'स्निग्धा' की कुंडलियाँ
मानव अब तो चेत जा, क्यों बनता नादान।
जीवन यह बहुमूल्य है, ले तू इसको जान ।
ले तू इसको जान, दानवी वृत्ति तोड़ दे ।
कर सबका उपकार, नफरतें सभी छोड़ के।
मानवता को थाम, नहीं बनना तू दानव ।
सदा सत्य को जान, यार तू तो है मानव ।।
धरती दुल्हन सी सजी, धानी चूनर धार ।
फागुन फागुन मन हुआ, सजा गले में हार।
सजा गले में हार, रंगीली सी वो लगती ।
सुंदर रूप अपार, प्रीत मन में है जगती ।
कोयल गाती गीत, शगुन मानों वह करती।
झांक रहा आकाश, देख सुन्दर सी धरती।।
- डाॅ. सरला सिंह 'स्निग्धा'
डाॅ. निर्मला शर्मा की कुंडलियाँ
पुरवाई बहती चले, लाये मृदु सन्देश।
खुशी मिले सबको सदा, मनहर हो परिवेश।
मनहर हो परिवेश, रहें हिल मिल कर सारे।
जनहित में अविराम, काम हों उत्तम न्यारे।।।
सभी लगाओ पेड़, चलो अब मिलकर भाई।
धरती हो समृद्ध, बहे शीतल पुरवाई।
बरगद पीपल आम की, छूट गई है छाँव।
गांँव छोड़ कर चल दिए, लम्बे डग भर पांँव ।
लम्बे डग भर पांँव, नापते शहर की गलियाँ।
मुरझाए सब फूल, धरा पर बिखरी कलियांँ।
यादों का सैलाब, उमड़ता मन की सरहद।
भीगी अखियन कोर, पुकारे पीपल बरगद।
- डाॅ. निर्मला शर्मा
रमाकांत सिंह 'शेष' की कुंडलियाँ
सुंदर छवि मधु-रस भरी, चितवन में मधु-हास ।
मादकता गति में भरी, मन में नव-उल्लास ।
मन में नव-उल्लास, सुभगता रति-सी न्यारी ।
भव्य केश-विन्यास, सरलता मुख पर प्यारी ।
रहता सदा अशांत, ताप से यथा समुंदर ।
उद्वेलित कर चित्त, लुभाती है छवि सुंदर ।।
छिपा बीज के गर्भ में, है तरुवर का रूप ।
उचित समय पर अंकुरण, घटना दिव्य अनूप ।
घटना दिव्य अनूप, प्रकृति की अद्भुत माया ।
किसलय, कोमल-पत्र, फूल-फल, शीतल छाया ।
मंगल-सूचक पुष्प, पत्र-नव हरित तीज के ।
शाखाओं का जाल, गर्भ में छिपा बीज के ।।
- रमाकांत सिंह 'शेष'
FAQ (People Also Ask)
1: कुण्डलिया छंद क्या है?
उत्तर: कुण्डलिया छंद दो छंदों—दोहा और रोला—का सम्मिलित रूप है। इसमें कुल 6 चरण होते हैं: पहले दो चरण दोहा के और अगले चार रोला के। इसकी विशेषता यह है कि जिस शब्द/समूह से कविता की शुरुआत होती है, कविता का समापन भी उसी शब्द/समूह से किया जाता है।
2: कुण्डलिया दिवस कब मनाया जाता है?
उत्तर: कुण्डलिया छंद को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से प्रति वर्ष 19 नवंबर को कुण्डलिया दिवस मनाया जाता है। इसका पहला आयोजन साहित्यकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला की पहल पर वर्ष 2024 में मनाया गया था।
3: कुण्डलिया छंद की संरचना कैसी होती है?
उत्तर: कुण्डलिया छंद की संरचना निम्न प्रकार होती है:
- कुल 6 चरण
- प्रारंभिक 2 पंक्तियाँ दोहा
- अंतिम 4 पंक्तियाँ रोला
- आरंभ और अंत में एक ही शब्द/समूह का प्रयोग
यह संरचना छंद को एक सुंदर, लयात्मक और परिपूर्ण रूप देती है।
4: कुण्डलिया दिवस क्यों मनाया जाता है?
उत्तर: कुण्डलिया छंद भारतीय काव्य परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है, पर नई पीढ़ी में इसकी पहचान कम हो रही थी। इस छंद को पुनः लोकप्रिय बनाने, साहित्यकारों को जोड़ने और रचनात्मक लेखन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 19 नवंबर को कुण्डलिया दिवस मनाया जाता है।
5: कुण्डलिया छंद कैसे लिखा जाता है?
उत्तर: कुण्डलिया छंद लिखने के लिए:
- एक शब्द या शब्द-समूह चुनें (यही शुरुआत और अंत होगा)।
- पहली दो पंक्तियाँ दोहे के नियमों के अनुसार लिखें (13-11 मात्रा)।
- अगली चार पंक्तियाँ रोला छंद के अनुसार लिखें (24 मात्राएँ)।
- अंतिम चरण में वही शब्द दोहराएं, जिससे शुरुआत की गई थी।
इस प्रकार एक पूर्ण कुण्डलिया छंद तैयार होता है।
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