मेहनत का सम्मान – कौआ और हंस की शिक्षाप्रद कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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This story beautifully reminds us that true respect is earned through hard work, not appearance or privilege. While pride and luxury may shine for a moment, dedication and meaningful contribution create lasting value. Through the characters of the crow and the swan, we learn that effort and sincerity are what truly make someone worthy of honor. Respect for Hard Work Moral Story in Hindi by Govind Sharma.

A Short Moral Story

mehnat ka samman bal kahani

जीवन में सम्मान हमेशा रंग, रूप या पद के कारण नहीं मिलता, बल्कि मेहनत, ईमानदारी और कर्म के कारण मिलता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि दिखावा और घमंड चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, सच्चा सम्मान उसी को मिलता है जो परिश्रम करता है और अपनी जिम्मेदारियों को निभाता है। हंस और कौए की यह प्रेरक कथा हमें बताती है कि मेहनत करने वाला व्यक्ति हमेशा समाज में आदर पाता है, जबकि आलसी और घमंडी का महत्व धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

The Crow and the Swan

मेहनत का सम्मान

एक बार एक काला कौआ उड़ता-उड़ता राजमहल के बाग में पहुँच गया। वहाँ एक राजहंस था। एकदम सफेद । । बाग के बीच में बने छोटे से सुंदर तालाब के किनारे राजा के नौकर उस हंस की सेवा में जुटे थे। उसे मोतियों जैसे दाने खिला रहे थे। काला कौआ उसे देखते रह गया। हंस ने भी कौए को देखा। उसने पहली बार कौआ देखा था। हंस ने कौए को गौर से देखते हुए कहा "तुम इतने काले क्यों हो? क्या तुम काजल के ढेर पर लोटपोट करके आए हो?"

कौआ बोला "मैं तो ऐसा ही हूँ। पर तुम्हें देख कर हैरान हो रहा हूँ। तुम इतने सफेद क्यों हो? क्या चूने के ढेर पर रहते हो या पीलिया की तरह तुम्हें भी 'सफेदिया' रोग हो गया है?"

अपने सफेद रंग की मजाक हंस को अच्छी नहीं लगी। वह चिढ़कर बोला "जानते हो मैं कौन हूँ। मैं राजहंस हूँ। राजकुमारी, रानी और खुद राजा मुझे स्नेह रखते हैं। हर वक्त नौकर-चाकर मेरी सेवा में रहते हैं। दूर-दूर से लोग मुझे देखने आते हैं। हर कोई यह चाहता है कि वह अपने हाथ से मुझे दाना खिलाए। मुझे राजा की सारी प्रजा चाहती है।"

कौए को हंस का यह घमंड पसंद नहीं आया। उसने कहा "अपने मुँह मियाँ मिट्टू क्यों बनते हो? राजा से कहो कि एक दिन अपनी सारी प्रजा को महल के सामने मैदान में बुलाए। वहाँ एक तरफ तुम बैठो और दूसरी तरफ मैं। राजा किसी अनजान आदमी को बुलाए और उसे कहे कि हंस या कौए में किसी एक को दाना खिलाए। अनजान आदमी जिसे पहले दाना खिलाएगा, उसे विजयी माना जाएगा।"

ऐसा ही हुआ। एक दिन महल के सामने गरीब-अमीर, बच्चे-बूढ़े बहुत लोग इकट्ठे हुए। हंस और कौआ भी आए। राजा ने गाँव के एक गरीब से आदमी को अपने पास बुलाया। उसे कुछ दाने दिए और कहा, जो तुम्हें अच्छा लगता है, उसे खिला दो।

उस ग्रामीण ने दाने लिए और वह हंस की तरफ बढ़ा। उसे हंस की तरफ जाता देख कौए की काँव-काँव बंद हो गई। राजा और हंस दोनों के चेहरे खुशी से खिल गए। वह आदमी कुछ देर हंस को देखता रहा। फिर बिना दाने खिलाए ही वापस आ गया। वह कौए के पास गया और सारे दाने खाने के लिए उसे दे दिए। हंस और राजा दोनों हैरान रह गए। राजा ने उस आदमी से पूछा "तुमने हंस को दाने क्यों नहीं खिलाए? सबको हंस अच्छा लगता है। तुम्हें कौआ अच्छा क्यों लगा?"

ग्रामीण ने विनम्रता से कहा "मैंने पहले कभी हंस नहीं देखा था। उसके बारे में सुना ही था। उसे देखने की इच्छा से में उसके पास चला गया। कौए से हमारा पुराना परिचय हैं। वह हमारा मेहनती भाई है। सुबह हमारे साथ ही उठता। शाम को जब हम खेतों से वापस घर जाते हैं, तभी कौए अपने घोंसलों की तरफ लौटते हैं। हमारी तरह दिन-भर मेहनत करता है और अपने भोजन का इंतजाम करता है। निठल्ले बैठकर या दूसरों के सहारे जीने की उसे आदत नहीं है। गाँव में जब भी कोई अपरिचित व्यक्ति आता है तो वह काँव-काँव कर सबको सावधान कर देता है। साँप और गोह जैसे जहरीले प्राणियों को देखने पर भी शोर मचाता है। हंस आराम की जिंदगी बिताता है। मैंने कौए की मेहनत करने की आदत का सम्मान करने के लिए उसे दाने खाने को दिए हैं।

ग्रामीण की बात सुनकर राजा और दूसरे उपस्थित लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। लोगों ने देखा कौआ वहाँ रुका नहीं। काँव-काँव करता, चारों तरफ सतर्क दृष्टि से देखते हुए उड़ गया।

- गोविंद शर्मा

इस कहानी से यह सीख मिलती है कि असली सम्मान दिखावे से नहीं, बल्कि मेहनत, कर्म और उपयोगिता से मिलता है। जो व्यक्ति निरंतर परिश्रम करता है और दूसरों के काम आता है, वही समाज में आदर पाता है। घमंड क्षणिक होता है, लेकिन मेहनत की पहचान स्थायी होती है।

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