मटका महाराज बाल कहानी – बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा से भरपूर कथा

Dr. Mulla Adam Ali
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"Matka Maharaj" is a charming children’s story that teaches the importance of clean drinking water and responsibility. Through a school play rehearsal, a simple act of honesty by a child delivers a meaningful lesson, combining fun with valuable life teachings for young readers. Fun and Educational Story for Kids.

Matka Maharaj - Bal Kahani

मटका महाराज स्वच्छता और संवेदनशीलता की कहानी

यह कहानी “मटका महाराज” स्वच्छ पानी के महत्व और जिम्मेदारी की सीख देती है। स्कूल के नाटक की रिहर्सल के दौरान एक बच्चे की सरल बात सभी बड़ों को सोचने पर मजबूर कर देती है कि पीने के लिए हमेशा साफ पानी ही देना चाहिए। मनोरंजन के साथ-साथ यह कथा बच्चों में संवेदनशीलता, जागरूकता और सही निर्णय लेने की प्रेरणा भी जागृत करती है।

स्वच्छता और संवेदनशीलता का संदेश

मटका महाराज

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी स्कूल में खेल और सांस्कृतिक सप्ताह का आयोजन होना था। उसी की तैयारी चल रही थी। आज स्कूल के बच्चों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले नाटक की फाइनल रिहर्सल थी। नाटक स्कूल के गुप्ता जी सर ने लिखा था और वे ही निर्देशक की भूमिका में थे।

गांव में स्थित एक प्याऊ का नजारा था। गोलू अर्थात अभिनव पानी पिलाने वाले बाबा की भूमिका में था। उसके हाथ में पानी पिलाने के लिए पीतल का लोटा था और उसके पास बड़ा सा मटका था। मटके में पानी था। फाइनल रिहर्सल देखने के लिए कुछ बच्चे, स्टाफ सदस्य और स्वयं प्रधानाचार्य जी आए हुए थे।

मंच पर नाटक शुरू हुआ। पानी पिलाने के लिए बैठे अभिनव के पास देहाती बना एक बच्चा आता है और कहता है-बाबा बड़ी प्यास लगी है, जल्दी से पानी पिला दो।

अभिनव ने जवाब में कहा- नहीं, मैं तुम्हें पानी नहीं पिला सकता। क्योंकि इस मटका में जो पानी है, वह साफ नहीं है। तुम कहीं और जाकर साफ पानी पी लो।

यह सुनकर नाटक के लेखक गुप्ता जी सर हैरान रह गए। क्योंकि उनकी लिखी पटकथा में यह संवाद कहीं नहीं था। उनके लिखे अनुसार तो पानी पिलाना चाहिए था और यह कहना था कि खूब पानी पियो, रोज पियो.... पर यहां दूसरा संवाद सुनकर उनको गुस्सा आ गया।

भाग कर मंच पर आए गोलू उर्फ अभिनव को डांटने लगे-यह तुमने क्या बोल दिया? क्या मैंने ऐसा संवाद लिखकर दिया था? इतने दिन से तुम क्या बोलते रहे हो?

सर, इतने दिन यह मटका खाली होता था। आज इसमें कुछ पानी है। वह पानी मैंने देखा है। वह पिलाने लायक नहीं है, सर।

अरे, पानी पिलाना नहीं, पानी पिलाने का अभिनय करना था। यह नाटक है, नाटक मटका महाराज।

गुप्ता सर आगे भी कुछ बोलते, पर उससे पहले प्रधानाचार्य जी की आवाज सुनाई दी - हां, यह नाटक है, नाटक... जिधर से आवाज आई थी गुप्ता सर ने उधर देखा। प्रधानाचार्य जी मंच पर आ रहे हैं। उन्हें आते देखकर गुप्ता जी कुछ बोल नहीं सके।

प्रधानाचार्य जी ने कहा-गुप्ता जी, हम भी मानते हैं कि यह नाटक है। नाटक में वह सब कुछ नहीं होता जो हम देखते हैं, उसमें अभिनय ही होता है। बताइए एक नाटक में क्या-क्या होना जरूरी है? गुप्ता जी कुछ बोले इससे पहले ही प्रधानाचार्य जी बोले- मैं ही बता देता हूं कि किसी स्कूल में दिखाए जाने वाले नाटक में क्या-क्या होना जरूरी है। उसमें जानकारी, सीख और मनोरंजन होने चाहिए। नाटक में ये होंगे तभी दर्शक बच्चे रुचि लेंगे और नाटक देखकर लाभ उठाएंगे। किसी को पानी पिलाओ तो हमेशा साफ पानी पिलाना चाहिए। इससे बड़ी सीख और क्या होगी? बताओ, अभिनव तुमने यह सीख कहां से ली? किसी नाटक से?

नहीं सर, हमारा घर खेतों की तरफ जाने वाले रास्ते पर है। हमारे घर के पास से गुजरने वाले लोग हमारे घर के आगे की चौकी पर बैठे मेरे दादाजी से कई बार पीने का पानी मांगते हैं। तब दादा जी उनके लिए पीने का पानी लेने के लिए घर के भीतर जाते हैं। कुछ कह देते हैं कि आपके पास यह जो टंकी रखी है, उसका पानी दे दीजिए।

तब दादा जी कहते हैं- यह पानी पेड़ पौधों की सिंचाई करने के लिए है। पीने का साफ पानी घर के भीतर है, वही पिलाऊंगा। सर, मैं भी कभी-कभी उन लोगों को पानी पिलाता हूं। उस टंकी का नहीं, घर के भीतर रखे घड़ों का पानी पिलाता हूं। अब तक बात गुप्ता जी की समझ में आ गई थी। जल्दी से बोले- सॉरी सर, मैं नाटक में जरूरी बदलाव करता हूं... इससे आगे उन्हें कुछ कहना नहीं पड़ा। सब ने देखा एक दो अन्य अध्यापकों की मदद से कुछ बच्चों ने उस बड़े से मटके को अच्छी तरह से साफ कर दिया है। दो बच्चे दो बाल्टियों में पानी लेकर आते हैं और कहते हैं-सर, यह पीने का साफ पानी है। वह पानी मटके में डाल दिया जाता है। तब अभिनव कहता है-अब कोई मेरे पास पानी पीने आएगा तो मैं उसे खुशी से पानी पिलाऊंगा और वही संवाद बोलूंगा जो गुप्ता जी सर ने लिखा है।

यह सुनकर प्रधानाचार्य जी और दूसरों को हंसी आ गई। प्रधानाचार्य जी ने कहा-गुप्ता जी, यह नाटक बढ़िया रहा। इसने रिहर्सल के समय इतनी अच्छी सीख दी है और मनोरंजन किया है, प्रदर्शन के समय और भी अच्छी सीख मिलेगी।

इसके बाद गोल मटोल गोलू यानी पानी वाला बाबा बने अभिनव की ओर देखकर बोले- क्यों ठीक कह रहा हूं मैं, मटका महाराज। चलो मुझे तो पानी पिला ही दो। प्रधानाचार्य जी को पानी पीते देखकर अब सब हंस रहे थे। एक ने तो कह भी दिया- अब हम तो इस पानी पिलाने वाले को बाबा कहने की बजाय 'मटका महाराज' ही कहेंगे।

- गोविंद शर्मा

निष्कर्ष; “मटका महाराज” कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ निभाना और साफ-सफाई का ध्यान रखना कितना महत्वपूर्ण है। बच्चों के लिए यह न केवल मनोरंजन है, बल्कि सही व्यवहार और संवेदनशीलता की एक प्यारी शिक्षा भी है।

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