Nirmala Putul is a significant contemporary Hindi poet whose works powerfully portray the lived realities of Adivasi communities. Through her poetry, she gives voice to issues such as displacement, exploitation, loss of land and forests, cultural erosion, and the crisis of identity. Her poems not only reflect pain and struggle but also highlight resistance and the deep emotional bond between Adivasis and nature.
Problems of Adivasi Society as Depicted in the Poetry of Nirmala Putul
निर्मला पुतुल का आदिवासी काव्य
निर्मला पुतुल समकालीन हिंदी कविता की महत्वपूर्ण आदिवासी कवयित्री हैं, जिन्होंने अपने काव्य में आदिवासी जीवन के यथार्थ, पीड़ा, शोषण, विस्थापन और अस्मिता के संकट को स्वर दिया है। उनकी कविताओं में जल-जंगल-ज़मीन से जुड़ी संवेदना, प्रकृति के प्रति गहरा रिश्ता और बदलते समय में आदिवासी समाज के संघर्ष स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होते हैं। उनके काव्य के माध्यम से आदिवासी समाज की अनदेखी समस्याएँ मुख्यधारा के साहित्य और समाज के केंद्र में आती हैं।
"निर्मला पुतुल के काव्य में चित्रित आदिवासी समाज की समस्याएँ"
सम्पूर्ण देशों में आदिवासी निवास करते है। आदिवासियों से अभिप्राय देश के मूल एवं प्राचीन निवासियों से है। सृष्टि की उत्पत्ति से ही यह दूर वनों में निवास करते हैं जिसके फलस्वरूप ये शहरी जीवन और विकास से कटे रहे और अभावों में जीते रहे हैं। इनकी अपनी सभ्यता, संस्कृति है जिससे इनकी पहचान बनी है। आज भी दूरस्थ स्थानों पर आदिवासियों को हजारों वर्ष पूर्व सभ्यता, संस्कृति में जीवनयापन करते हुए देखा जा सकता है। जंगलों में बसे होने के कारण ही ये शहरी जीवन से कटे हुए है। सरकार भी इनके विकास को लेकर विशेष ध्यान नहीं देती है। जिसकी वजह से आज भी यह समाज पिछड़ा ही है।
हमारे देश में आदिवासियों की सबसे बड़ी समस्या विस्थापन की रही है, पहले भी उनसे उनकी जमीने छीनकर उन्हे भगाया जाता था, आज भी भगाया जा रहा है। आदिवासी जल, जंगल, जमीन इन अपने महत्वपूर्ण अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। उन्हे विकास के नाम पर उन्हीं की सम्पति से बेदखल किया जा रहा है। निर्मला पुतुल की कविताओं में आदिवासी समाज का दुःख- दर्द, पीड़ा, शोषण उन पर होने वाले अत्याचार को प्रस्तुत किया गया है। उन्होने आदिवासियों की आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक समस्या, स्त्री शोषण, शैक्षिक, सामाजिक समस्या तथा जंगलों के विनाश की समस्या आदि को समाज के सामने प्रस्तुत किया है।निर्मला जी ने जो देखा है उसे ही चित्रित किया है। आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की समस्या के साथ उनके मिटते अस्तित्व को भी निर्मला पुतुल जी ने कविताओं के माध्यम से समाज के सामने व्यक्त किया है।
जंगल की समस्या आदिवासियों की सर्वप्रमुख समस्या है।आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की समस्या को निर्मला पुतुल अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करती हैं कि जंगल में शहरी आदमी घुस आया है। वह आदिवासियों की जमीन छीनकर उन्हें बेदखल कर रहा है। पेड़ों की कटाई कर रहा है। पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है। आदिवासियों से उनकी रोजी रोटी छीन रहा है। उनकी बस्तियों को उजाड़ रहा है। उनसे उनका हक छीनकर शोषण कर रहा है। कवयित्री 'बूढ़ी पृथ्वी का दु:ख ' नामक कविता के माध्यम से इस दर्द को बयां करती हैं-
क्या तुमने कभी सुना है
सपनों में चमकती कुल्हाड़ियों के भय से
पेड़ों की चीत्कार?
कुल्हाड़ियों के वार सहते
किसी पेड़ की हिलती टहनियों में
दिखाई पड़े है तुम्हें
बचाव के लिए पुकारते हजारों हजार हाथ?
क्या होती है , तुम्हारे भीतर धमस
कटकर गिरता है जब कोई पेड़ धरती पर?"¹
जंगलों की लगातार हो रही कटाई की वजह से आदिवासियों की जमीनों पर उद्योगपतियों का कब्जा हो गया है, जिसके कारण आदिवासियों को जमीन की समस्या उत्पन्न हुई है और वे पलायन को मजबूर हुए हैं।
आदिवासी सदियों से हीं जंगल में निवास करते आए हैं, और जंगल के उत्पादन से ही अपना भरण पोषण करते रहे हैं। शिकार करना, शहद निकालना, महुए बीनना, मछली पकड़ना, लकड़ी बीनना, वनीय उत्पाद इकट्ठा करना इत्यादि आदिवासियों का मुख्य व्यवसाय रहा है। इस जंगल पर उन्हीं का हक रहा है। जल, जंगल, जमीन हमारा है। यह पेड़ हमारा है, यह पहाड़ हमारा है, यह धरती माता हमारी है। अपने दमन के खिलाफ अंग्रेजों से भी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए भी संघर्ष करना पड़ा है। आज भी कर रहे हैं।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय शासकों ने जंगल को अपने मुनाफे की वस्तु बनाकर सरकारी अधिकारियों, उद्योगपतियों, नेताओं ने मिलकर उसे बर्बाद किया है। उद्योगपतियों ने जबरजस्ती जंगलों की कटाई शुरु है जहाँ जंगल समाप्त हो रहे हैं और आदिवासियों का रोजगार छीना जा रहा ।उन्हे मजबूरन विस्थापित होना पड़ रहा है। जिसके कारण उन्हे बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
आदिवासी जनजातियों के सामाजिक, संगठनों एवं जंगलों के साथ उनके अटूट रिश्तों के संबध में डॉ० बर्मन रॉय जी लिखते हैं कि -" साम्राज्यवादी शासन काल में इस प्रतीकात्मक सम्बध को तब गहरा धक्का लगा, जब जंगलों की अधिकृत मुनाफे का स्रोत मात्र समझा जाने लगा और मानव निवास तथा विस्तृत जीवन परिसर के बीच की जीवंत कड़ी के रूप से इसे अनदेखा कर दिया गया।"²
जंगलों की कटाई, विस्थापन की त्रासदी जैसी समस्याओं के कारण आदिवासी परेशान हैं। उनके घरों को उजाड़ा जा रहा है। उनसे उनका रोजगार छीना जा रहा है। उनका प्रकृति के साथ अटूट संबंध को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है।उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। उजड़े जंगल के परित्राण हेतु जागृत विरोध की चेतना दिखाने वाली निर्मला पुतुल की कविता 'आओ काली अंधेरी रात में गाएँ सादा गीत' की पंक्तियाँ विकराल दशा को व्यक्त करती हैं-
घर उजड़ा
जंगल के जंगल, उजड़ गए
हम लुटते रहे, हारते रहे।"³
आदिवासियों का किस तरह शोषण किया जा रहा है निर्मला प्रतुल ने अपनी कविताओं के माध्यम से उद्घाटित किया है।
आदिवासी समाज को सामाजिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है।जिसे निर्मला पुतुल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के सामने रखने का प्रयत्न किया है। समाज मे आदिवासियों को जंगली, काला, अनपढ़, गँवार कहकर पुकारा जाता है। जिसकी वजह से इन्हें न जाने कितने समस्याओं से गुजरना पड़ता है। सभ्य समाज न जाने इन्हें कितने विशेषणों से नवाजता है क्योंकि नीति और नियम यहाँ किसी एक विशेष वर्ग के पास है। उसे समाज से बाहर रखा जाता है। उसे सामाजिकता से कटे रखने की साजिश की जाती है। आदिवासी यदि सभ्य समाज द्वारा दिये गये अनपढ़, गँवार, जंगली जैसे विशेषणों को तोड़ने की कोशिश करता है तो उसकी कोशिश को लाठी से चमड़ी उधेड़कर और सलाखों से आँखे फोड़कर नाकामयाब बनाया जाता है।उन्हें अछूत समझा जाता है-
जंगली, असभ्य पिछड़ा कह
हिकारत से देखते हैं हमे
और अपने को सभ्य श्रेष्ठ समझ
नकारते हैं हमारी चीजों को
वे नहीं चाहते
हमारे हाथों का छुआ पानी पीना
हमारे हाथों का बना भोजन
सहज ग्राह्य नहीं होता उन्हें।"⁴
आदिवासी समाज का सदैव उच्च समाज द्वारा माखौल उड़ाया जाता है। आदिवासी के रीति-रिवाजों, रहन-सहन को नगण्य मानने वाले लोग भी समाज में उसकी मौजूदगी उपभोक्तावादी नाजरिए से आँकते रहे हैं। सच्चाई यही है कि उसकी मौजूदगी हमेशा सुसभ्य, परिष्कृत नागरिक के पैरों तले दबी है। यदि उसने ऊपर उठने की कोशिश की तो सभ्य लोग बर्दाश्त नहीं पाएंगे।
जंगलों में रहने वाले ईंट, पत्थर तोड़ने वाले आदिवासियों को सभ्य समाज हमेशा अपनी उपभोग की संस्कृति मे ही रखना चाहती है। आज इनके इशारों पर ही नियम का पहिया घूमता रहता है। जो सत्ता पर आसीन है। कवयित्री निर्मला पुतुल जी अपनी कविता के माध्यम से कहती हैं-
तुम्हारे पास शब्द है, तर्क है, बुद्धी है
पूरी की पूरी व्यवस्था है तुम्हारे हाथों
तुम सच को झुठला सकते हो बार-बार बोलकर
कर सकते हो खारिज एक वाक्य में सब कुछ मेरा
आँखों देखी को
गलत साबित कर सकते हो
तुम जानती हूँ मैं।"⁵
इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने आदिवासी समाज पर किए जाने वाले शोषण को उजागर किया है। किस तरह से चालाक तर्क बुद्धि वाले आदिवासियों से उनका अधिकार छीन रहे हैं। सच को झूठ साबित कर रहे हैं।विकास के नाम पर अत्याचार कर रहे हैं।
शहरी लोग आदिवासी बस्ती में आदिवासी बस्ती में आकर उनकी स्त्रियों, बेटियों को वासना की दृष्टि से देखते हैं। उनके साथ छेड़खानी, बलात्कार जैसे कृत्य भी करते हैं। उनके अस्मिता को मिटाने का भरकस प्रयास करते हैं। सभ्य समाज अपनी वासना मिटाने के लिए आदिवासी स्त्रियों का प्रयोग करता है और सभ्य शहरी बनकर घूमते हैं-
"ये वे लोग हैं
जो हमारे बिस्तर पर करते हैं
हमारी बस्ती का बलात्कार
और हमारी ही जमीन पर खड़े हो
पूछते हैं हमसे हमारी औकात।"⁶ सभ्य समाज द्वारा आदिवासियों के स्त्रियों का बलात्कार कर उनकी अवकात पूछने पर उतर आते हैं। उनके कालेपन से घिन आती है।उनके साथ हमबिस्तर होने पर नहीं। उनके द्वारा विरोध करने पर आदिवासी स्त्रियों को बदनाम, बदचलन की संज्ञा से नवाजा जाता है। यह कैसी विडम्बना है इस वैश्वीकरण के युग में भी इस तरह आदिवासियों पर अत्याचार, अन्याय, शोषण हो रहा है।
इस ढोंगी सभ्यता के ठेकेदारों के बाजार में आदिवासी स्त्रियों के शरीर की बड़ी माँग है। नाजायज, नाबालिग आदिवासी औरतों, लड़कियों को सरेराह पकड़कर इनका बलात्कार किया जाता है। इन्हें उपभोग की वस्तु माना जाता है। उनका सुनने वाला कोई नहीं है। वे चाहे जितना चीखें, चिल्लाएँ। कुछ को तो बाहर भेज दिया जाता है। कुछ तो भूख और गरीबी की वजह से सभ्य के जाल में फँस जाती हैं। झारखंड इलाके में बाल शोषण सबसे अधिक होता है। झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसी जगहों से मासूम बच्चियाँ लापता हो जाती हैं। नाबालिग, बेजुबान लड़कियों को मांस, व्यापार, देह व्यापार के लिए सभ्य समाज ढकेल देता है।जिस पर कवयित्री अपनी कविता के माध्यम से उनके दुःख दर्द को 'चुड़का सोरेन से' कविता में उजागर करती हैं-
वह कौन सा जंगली जानवर था चुड़का सोरेन
जो जंगल लकड़ी बीनने गयी तुम्हारी बहन मुगली को
उठाकर ले भागा?
तुम्हारी भाषा में बोलता वह कौन है
जो तुम्हारे भीतर बैठा कुतर रहा है
तुम्हारे विश्वास की जड़ें।"⁷ अपनी हवस मिटाने के लिए इंसान कितने नीचे गिर सकता है उसका उदाहरण यह कविता है।आदिवासियों के साथ उनका विश्वास जीतकर फिर उनके साथ विश्वासघात करना यह इंसानों के सभ्य होने की निशानी नहीं बल्कि असभ्य होने की निशानी है।
निर्मला पुतुल ने आदिवासियों की सांस्कृतिक समस्या को भी समाज के सामने उद्घारित किया है। आदिवासियों के संस्कार,परम्परा, रीति-रिवाज संस्कृति का शहरी लोग मजाक बनाते हैं, वहीं उनके खेल, नृत्य और मनोरंजन का मजा लेते है। भूख ही है जो आदिवासियों को कमजोर करती है उन्हे शहर के बीच बन्दरिया नाच नाचने को मजबूर करती है।सच में भूख बहुत बड़ी चीज होती है जो इंसान से कुछ भी करवा सकती है।निर्मला पुतुल लिखती हैं कि-"
वे तुम्हारी बहादुरी पर नहीं
जंगलीपन पर हँस रहे है ढेपचा सोरेन !
हँस रहे हैं तुम्हारी नादानी और मूर्खता पर
जैसे बन्दरों की जमात में रोटी का टुकड़ा फेंक
तमाशा देख हँसते हैं लोग
अरे! और तो और, वो देखो तुम्हारा दिशोम गुरु
बूशी सोरेन भी बैठा हँस रहा है मदारियों की जमात में।"⁸ आदिवासी संस्कृति का तमाशा शहरी लोग बनाते हैं। उन्हें जंगलों से भगाया जा रहा है उसकी संस्कृति को मिटाया जा रहा है। उनके भोलेपन, सादगी पर हँसते हैं। बन्दरों की तरह रोटी फेंकी जाती है।वे उस रोटी को उछल उछलकर लूटने को मजबूर हैं।
आदिवासी मजदूरी करने शहर जाता वहाँ भी उनका मजाक बनता है। जंगलों पर आश्रित रहने वाলা आदिवासी आज रोटी के लिए दर-दर भटक रहा है। आदिवासी संस्कृति और उनके नृत्य, कला की प्रशंसा करके सब सौदागर हैं। ये सभी जंगल की लकड़ी तथा आदिवासी कला, संस्कृति नृत्य का कारोबार चलाते हैं। कवयित्री कहती हैं-
वे दबे पाँव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य की बड़ाई करते हैं
वे तुम्हारी आँखों की प्रशंसा मे कसीदे पढ़ते हैं
वे कौन हैं ?
सौदागर है वे समझो
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू पहचानो!"⁹ आदिवासियों की परम्परा को खत्म होने के साथ ही उन्हे जंगलों के अभाव के कारण सांस्कृतिक समस्याएँ पैदा हो गयी हैं। आदिवासियों की संस्कृति को खत्म करने की साजिश चल रही है।
आदिवासी समाज को भाषा की समस्या का सामना करना पड़ता है। उनके भाषा को लेकर भी उनका मजाक बनाया जाता है। इनकी भाषा जंगल, पहाड़, वन, नदियाँ झरनों से जुड़ी होती हैं। इनसे अलग होने पर इनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। आदिवासियों के नस- नस में यही भाषा बसी है। निर्मला पुतुल पहाड़ और आदिवासी के बीच बातचीत पर प्रकाश डालती हैं-
वह पहाड़ी भाषा में बोलता पहाड़ से
बतियाता है अपना सुख -दुःख
गाता है पहाड़ पर बैठ पहाड़ो के गीत
पहाड़ी लिपि में, पहाड़ पर लिखता है
'प' से पहाड़
पहाड़ पर अपनी कुल्हाड़ी की धार पिजाता
पिजा रहा है वह
अपने भीतर का भोथरापन।"¹⁰ 'पहाड़ी पुरुष' कविता के माध्यम से निर्मला जी ने आदिवासियों की भाषा को हमारे समक्ष रखा। आदिवासियों की पहाड़ी भाषा, पहाड़ी लिपि को उन्होंने चित्रित किया । इसी भाषा का वे अपने जीवन में निरन्तर प्रयोग करते आ रहे हैं।
आदिवासी की एक प्रमुख समस्या राजनीतिक समस्याएँ भी है। उन्हें राजनीति का मोहरा बनाया जाता है। निर्मला पुतुल ने अपनी कविताओं के माध्यम से नेताओं को कठघरे में खड़ा किया है। ठेकेदारों ने गरीब आदिवासियों का शोषण किया है। सरकार की योजनाओं को गरीबों तक पहुँचने ही नहीं देते हैं। सताधारी लोग ही गटक जाते हैं। चुनाव के मैदान में आदिवासियों के विकास की बड़ी-बड़ी बातें की जाती है जबकि धरातल पर उसके उलट होता है। कोई आदिवासी अपनी माँगों को सरकार के सामने रखता है तो उसकी माँगों को ठुकरा दिया जाता है। आदिवासी एक तमाशा बनकर रह जाता है।
आदिवासियों को न तो समाज में कोई स्थान दिया जाता है न संसद में। अब तो संसद में चुनकर जाने भी लगे हैं।वह अपनी बातों को संसद में रखते भी हैं पर उनकी बातों को कोई सुनता नहीं।हर बार आदिवासियों के दुःख दर्द को उकेरा जाता है। समस्त भारत के राज्यों के सामने टी.वी, मिडिया चैनलों द्वारा इनकी चर्चा की जाती है। उनके लिए आवास, पानी, चिकित्सा, शिक्षा से लेकर सत्ता में अधिकार दिलाने तक झूठे वादे तिरंगे झण्डे के साथ फहराए जाते हैं। हकीकत क्या है सभी को मालूम है। संविधान मैं जहाँ सवा सौ करोड़ भारतीयों को समान अधिकार प्रदान करता है, तो वहीं आदिवासियों के पिछड़ेपन का क्या कारण है ? आखिर उनके हिस्से की रोटी कौन खा रहा है ? निर्मला पुतुल अपनी कविता के माध्यम से सवाल करती हैं-
दिल्ली की गणतंत्र झाँकियों में
अपनी टोली के साथ नुमाइश बनकर कई -कई बार
पेश किये गये तुम
पर गणतंत्र नाम की कोई चिड़िया
कभी आकर बैठी तुम्हारे घर की मुँडेर पर?"¹¹ आदिवासी अनपढ़ होने के कारण ही उन्हे उनका हक, अधिकार नहीं मिलता।साथ ही उनका उच्च वर्ग द्वारा शोषण भी किया जाता है।
आदिवासी स्त्रियों की समस्या भी एक मुख्य समस्या है। स्त्रियों का शोषण हर स्तर पर, हर क्षेत्र में किया जाता है। स्त्री किसी भी वर्ग की हो उसका शोषण होगा ही। उसे उपभोग की वस्तु समझा जाता है। निर्मला पुतुल जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से आदिवासी स्त्रियों का शोषण, अन्धविश्वास का शिकार, सांस्कृतिक-सामाजिक मर्यादा की समस्या को दर्शाया है। आदिवासी स्त्री को हर जगह वासना की दृष्टि से ही देखा जाता है। उच्च वर्ग उन्हें अछूत मानता है लेकिन उनके साथ अपनी हवस मिटाता है। निर्मला पुतुल लिखती हैं कि-
मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नजर में
प्रिय है तो बस
मेरे पसीने से पुष्ट हुए अनाज के दाने
जंगल के फूल, फल, लकड़ियाँ
खेतों में उगी सब्जियाँ
घर की मुर्गियाँ
उन्हे प्रिय है
मेरी गदराई देह
मेरा मौस प्रिय है उन्हें।"¹² आदिवासी स्त्रियों के देह पर ही समाज की नजर टिकी रहती है।उनके भाव -भाषा, चाल-चलन, खान-पान पर सब मजाक उड़ाते हैं। उन्हे असभ्य कहते हैं। लेकिन उच्च वर्ग में उनकी स्त्रियों की देह व्यापार के लिए बड़ी माँग रहती है।
पुरुष द्वारा समाज में आदिवासी स्त्रियों की मेहनत और ईमानदारी को नजरअंदाज कर केवल उन्हें देह वासना की वस्तु समझा जाता है। समाज उनकी देह पर गिद्ध की तरह नजर गडाए बैठा रहता है।बस वह इस फिराक में रहता है कि स्त्री कब मिले उस पर बाज की तरह झपट्टा मारें। कवयित्री ने पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर किये जाने वाले शोषण को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है-
बोतलों में नशा है
नशे में तैरती
गदराई देहवाली कई-कई आदिवासी लड़कियी है
आदिवासी लड़कियों के पास सपने हैं
सपने में अधूरी इच्छाएँ हैं
भूख है
भूख में दूर तक पसरी उबड़- खाबड़ धरती है।"¹³
पुतुल जी ने आदिवासी लड़कियों की बढ़ती देह की माँग को व्यक्त किया है।समाज में शराब के साथ ही स्त्रियों को भी हवस का शिकार बनाया जाता है। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण इन्हें पैसे का लालच देकर देह व्यापार के लिए ढकेला जाता है। कभी इन्हें ऊँचे-ऊँचे सपने दिखाकर व्यापारों शहरों में बेच देते है।भूख ऐसी चीज है जिसके लिए इन्हें मजबूरी में वह सब भी करना पड़ता है जो यह नहीं करना चाहती।
कवयित्री निर्मला पुतुल का समकालीन रचनाकारो में अद्वितीय स्थान है। उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से आदिवासी समाज की समस्या को वाणी दी है। उन्होंने कविता के माध्यम से आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की समस्या को समाज के सामने प्रस्तुत किया है। उन्होंने उसकी वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन- भाषा- नृत्य, प्रकृति के साथ सम्बंध को भी दर्शाया है। निर्मला पुतुल ने राजनीतिक शोषण, सांस्कृतिक शोषण, सामाजिक- शैक्षणिक शोषण, स्त्री शोषण को समाज के सामने काव्य के माध्यम से रखा है। उन्होंने आदिवासी समाज की हर छोटी- बड़ी समस्या को प्रमुखता से हमारे सामने रखा है।
- डॉ. पूनम सिंह
संदर्भ सूची;
- नगाड़े की तरह बजते शब्द (बूढ़ी पृथ्वी का दुःख)- निर्मला पुतुल पृ० सं० 31 भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली तीसरा संस्करण 2012
- आदिवासी विकास में विस्थापन-सं. रमणिका गुप्ता- पृ० सं०12 राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली
- अपने घर की तलाश में- निर्मला पुतुल पृ० सं० 74
- नगाड़े की तरह बजते शब्द-(मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नजर में) निर्मला पुतुल पृ०सं० 72
- वही (जो कुछ देखा-सुना,समझा,लिख दिया) पृ०सं० 95
- वही (ये वे लोग हैं जो) -पृ० सं०54
- वही (चुड़का सोरेन से) पृ० सं०20
- वही ( घड़ा-उतार तमाशा के विरुद्ध) पृ० सं० 64
- वही (बिटिया मुर्मू के लिए) पृ० सं०15
- वही (पहाड़ी पुरुष) पृ० सं० 38
- वही (चुड़का सोरेन से) पृ० सं० 20
- वही (मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नजर में) पृ० सं०72
- वही (संथाल परगना) पृ० सं०27
निष्कर्ष; निर्मला पुतुल के काव्य में आदिवासी समाज का यथार्थ सजीव रूप में उभरकर सामने आता है। उनकी कविताएँ आदिवासियों के जल-जंगल-ज़मीन, विस्थापन, शोषण, स्त्री-समस्याओं और सांस्कृतिक अस्मिता के संकट को गहरी संवेदना और तीखे प्रश्नों के साथ अभिव्यक्त करती हैं। वे केवल दर्द का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि प्रतिरोध की चेतना भी जगाती हैं। इस प्रकार निर्मला पुतुल का काव्य आदिवासी समाज की आवाज़ बनकर समकालीन हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है।
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