“Biskitwali Bua” by Dr. Mohammad Arshad Khan is a touching short story that highlights human emotions, poverty, and compassion. It beautifully portrays how circumstances can lead people to make mistakes, while also emphasizing the power of kindness, forgiveness, and understanding.
Inspirational Story Biskitwali Bua: Lessons on Humanity and Forgiveness
डॉ. मोहम्मद अरशद खान की कहानी “बिस्किटवाली बुआ” मानवीय संवेदनाओं, गरीबी की विवशता और रिश्तों की सच्ची गर्माहट को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि इंसान की गलतियों के पीछे अक्सर उसकी मजबूरियाँ छिपी होती हैं, और सच्ची महानता क्षमा, करुणा और अपनत्व में निहित होती है।
मानवता, मजबूरी और माफी की मार्मिक दास्तान
बिस्किटवाली बुआ
जुमे का दिन हमारे घर में बहुत व्यस्त बीतता है। सुबह से ही शोर मचने लगता है। बाल्टियाँ खनकने लगतीं हैं। ग़ुसलख़ाने में घुसने की होड़ लग जाती है। और दिनों में चाहे शाम हो जाए किसी को फिक्र नहीं रहती, पर आज के दिन हर कोई अज़ान से पहले नहा लेना चाहता है। छोटे बच्चे शोर मचाने लगते हैं। पूरे घर में एक हंगामा मच जाता है। बाक़ी दिनों में बड़े अब्बा और चाचा सुबह-सुबह नहा-धोकर दूकान निकल जाते हैं। पर जुमे को छुट्टी होने के वजह से वे भी आराम से उठते हैं और अपना नंबर आने के इंतज़ार में अलसाते रहते हैं।
और यही दिन बुआ के आने का भी होता है। सिलवटोंवाला रंग उतरा हुआ पुराना नक़ाब ओढ़े और हाथ में दो बड़े-बड़े थैले लिए हुए। उन थैलों में स्थानीय बेकरी में बने साधारण बिस्किट, चाय के साथ खाए जाने वाले पापे, बच्चों की मीठी गोलियाँ, कभी घर का बना अचार, कभी खटाई, इमली या कमरख जैसे मौसमी फल होते हैं। वह घर-घर जाकर सामान बेचती हैं।
घर में अम्मी को छोड़कर कोई भी उनका आना पसंद नहीं करता है। बड़ी अम्मा तो ख़ासतौर पर उनसे चिढ़ती हैं। बुआ को देखते ही उनके चेहरे का रंग बदल जाता है।
आज भी बुआ ने ड्योढ़ी पर क़दम रखते ही सबको एक साथ सलाम बजाया। वह काफी दूर से आती थीं। हमेशा की तरह उनके पास दो बड़े-बड़े थैले थे। वह आकर सहन में बैठ गईं। कुछ देर बिना बोले बैठी हाँफती रहीं और सहन में आते-जाते लोगों की ठोकर से बचाने के लिए अपना थैला इधर-उधर खिसकाती रहीं। पास से गुज़रनेवालों के चेहरे देखकर वह अपनी बात शुरू करने का मौका ढूँढ रही थीं। तभी उनके थैले से टकराकर बड़ी अम्मा चिल्लाईं, ‘‘ए बुआ, तुमको भी आज ही आना रह जाता है। बीच में आकर पसर गई हो। अभी लड़के ठोकर मार जाएँ या पानी गिरा जाएँ तो बुरा लगेगा।’’
बुआ खिसियाई-सी हँसी और पीछे खिसकने की कोशिश में उकस-पुकस करके वहीं बैठी रह गईं। मोटापा ऐसा था कि एक बार बैठ जाएँ तो उठना पहाड़ था।
काम में जुटी अम्मी का मन बुआ के पास आने के लिए बेचैन था। रसोई घर में आने-जाने या गुसलख़ाने में पानी पहुँचाने के बीच ऐसी बातें भी करती जातीं, जिसमें बुआ भी शामिल हो सकें। मसलन--‘आज तो बहुत तपिश है’, ‘आज कोई सब्ज़ीवाला आवाज़ लगाने नहीं आया’, ‘आँगन में धूप बहुत जल्दी आ जाती है’, वग़ैरह-वग़ैरह।
बुआ कभी तो ज़ोर से सबको सुनाते हुए अपनी राय ज़ाहिर करतीं और कभी होठों में ही बदबुदाकर रह जातीं।
बुआ के घर में एक नातिन के अलावा और कोई न था। पति की मृत्यु जवानी में ही हो चुकी थी। एक दुर्घटना में बेटी और दामाद भी ख़त्म हो गए। अब अपनी नातिन के लिए वही सब कुछ थीं। कमाने वाला बाप भीं और दुलारने वाली माँ भी। पेट पालने के लिए उन्हें दरवाज़े-दरवाज़े चक्कर लगाना पड़ता था। हर जुमे को वह दो बड़े-बड़े थैले लेकर आतीं और घर-घर घूमती फिरतीं। इस तरह उनकी थोड़ी-बहुत कमाई हो जाती थी, उसी से घर का ख़र्च चलता था।
चिलचिलाती गरमी में वह आटो-स्टैंड से पैदल चलकर आई थीं। धूप के कारण चेहरा स्याह पड़ गया था। काफी देर तक चुपचाप बैठी हाथ में पकड़ी एक पुरानी साफी से अपना चेहरा पोछती रहीं। प्यास से गला सूख रहा था, पर जल्दी-जल्दी आ-जा रहे हड़बड़ाए लोगों से पानी माँगने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। कुछ देर बाद बुआ दोनों घुटनों पर ज़ोर देकर उठीं और कमर-दर्द के कारण झुके-झुके नल तक गईं। आस-पास नल चलाने वाला न दिखा तो ख़ुद चलाकर पानी पी लिया।
अब्बू यों तो अम्मी के कामों पर बहुत कम टोकते थे। पर आज वह अम्मी को बुलाकर कहने लगे, ‘‘इन्हें इस दिन क्यों बुला लेती हो? जानती हो हर किसी को जल्दी रहती है। अब इनकी बातें कौन सुने?’’
अम्मी ख़ामोश रहीं। कुछ पलों के बाद धीरे से बोलीं, ‘‘इस दिन छुट्टी होती है। आप घर पर रहते हैं। इसलिए बुला लेती हूँ।’’
अब्बू चौंककर उनकी ओर देखने लगे, ‘‘मतलब..?’’
अम्मी ने हिचकते हुए कहा, ‘‘दरअसल, कुछ ख़रीदने के लिए आप से पैसे मिल जाते हैं।’’
अब्बू हँस पड़े, ‘‘तुम भी कमाल करती हो। हमारे-तुम्हारे बीच कोई बटवारा है? जो मेरा है, वह तुम्हारा है। मुझे पता है कि तुम कभी फिजूलखर्ची नहीं करतीं। जब मन हो अलमारी से निकाल लिया करो। क़सम है जो मैं कभी तुमसे हिसाब माँगू।’’
अम्मी का चेहरा खिल उठा। बोलीं, ‘‘क़सम-वसम मत खाइए। ठीक है, अब आगे से जुमे को नहीं बुलाऊँगी। पर...आपसे पूछे बिना कुछ ख़रीदना अच्छा नहीं लगता।’’
अब्बू हँस पड़े।
सहन में बैठी बुआ को जब यह यक़ीन हो गया कि लोगों ने उनकी उपस्थिति को स्वीकार लिया है तो वह थैले से सामान निकाल-निकालकर रखने लगीं। बड़ी अम्मा गुलाब के पौधों में चाय की उबली पत्ती डाल रही थीं। बुआ कहने लगीं, ‘‘बड़ी बी, आपके लिए आज मेहंदी लेकर आई हूँ। चूड़ियों का काम भी शुरू किया है। एक नज़र देख लीजिए।’’
अम्मी तब तक कमरे से बाहर आ गई थीं। बड़ी अम्मा उनकी ओर इशारा करती हुई बोलीं, ‘‘छोटी बी को ही दिखाओ। मुझे ज़रूरत नहीं है।’’
पर बुआ ने कोशिश नहीं छोड़ी। उठकर थोड़ा नज़दीक जाते हुए बोलीं, ‘‘असली फिरोज़ाबादी चूड़ियाँ हैं। पक्के काँच की। बहुत हल्की और पतली हैं। रंग और डिज़ायन भी कई हैं मेरे पास।’’
बड़ी अम्मा ने उचटती हुई निगाह डालना भी गवारा नहीं किया। बुआ थोड़ी देर इंतज़ार में खड़ी रहीं। मगर जब बड़ी अम्मा वहाँ से हटकर बावर्चीखाने में चली गईं तो वह भी वापस आकर बैठ गईं।
घर के मर्द नमाज़ के लिए निकल चुके थे। छोटे बच्चे भी कलफ किए हुए लकदक कुर्ते-पाजामे में उनकी अँगुली पकड़े मस्जिद निकल गए थे। अम्मी फुर्सत पाकर बुआ के पास आ बैठीं।
बुआ एक-एक सामान निकालकर अम्मी को दिखाने लगीं। दूर से टैम्पो का सफर करके आने से बहुत सारी चीज़ें टूट-फूट जाती थीं। बिस्किट का एक पैकेट चूर हो गया था। अम्मी ने जानबूझकर उसे उठाया तो बुआ दबी ज़ुबान में कहने लगीं, ‘‘यह पैकेट रहने दो, बिस्किट चूरा हो गए हैं। दूसरा ले लो। इतना नुकसान तो सहना ही पड़ता है।’’
अम्मी हँसकर बोलीं, ‘‘अरे बुआ, मुँह के अंदर जाकर तो सब चूरा ही हो जाते हैं।’’ यह कहते हुए उन्होंने टूटे बिस्किटों का दूसरा पैकेट भी उठा लिया। उन्हें पता था कि ये पैकेट कोई और नहीं ख़रीदेगा।
बड़ी अम्मा उधर से निकलीं तो अम्मी को बुआ के पास उकड़ूँ बैठे देख बिफर उठीं, ‘‘ए, छोटी, क्या जाहिलों की तरह ज़मीन पर बैठी हो। मोढ़ा खींच लो या किसी से पीढ़ा डलवा लो। इस तरह बैठना अच्छा लगता है क्या?’’
अम्मी एकाएक हड़बड़ाकर उठ गईं। बुआ ने एक बार बड़ी अम्मा का चेहरा देखा और एक बार अम्मी का। पर बोलीं कुछ नहीं।
अम्मी ने कुछ सामान लेकर बुआ को पैसे पकड़ाए। बुआ बचे पैसे वापस करने लगीं तो अम्मी बोलीं, ‘‘रहने दो, अभी जाओ, बाद में हिसाब कर लेना।’’
बुआ अम्मी की बात का मतलब समझ गईं और फौरन थैले उठाकर डग भरती हुई ड्योढ़ी पार कर गईं।
हफ्ते भर बाद की बात है। एक दिन बड़ी अम्मा पड़ोस से लौटकर आईं तो उनका चेहरा तमतमाया हुआ था। अम्मी ने हैरत से पूछा, ‘‘क्या हुआ आपा?’’
‘‘मुझे क्या होगा?’’ बड़ी अम्मा लगभग चीख़ती हुई बोलीं, ‘‘मना किया था कि छोटे लोगों को सिर पर न चढ़ाओ। पर तुम्हें अक़ल आए तब न?’’
‘‘मगर हुआ क्या?’’
‘‘ये जो तुम्हारी लाडली बुआ हैं न? इन्होंने मुहल्ले में ऐसी बातें लगाई हैं कि पूछो मत।’’
बुआ का नाम आते ही अम्मी सन्न रह गईं। धीरे से बोली, ‘‘क्या कह दिया बुआ ने?’’
बड़ी अम्मा अपने मोटे-मोटे हाथ नचाती हुई कहने लगीं, ‘‘रइसा चच्ची के घर जाकर ख़ूब बातें जड़ी हैं हम लोगों के बारे में। एक तो रइसा चच्ची पहले से हम लोगों की ख़ामियाँ ढूँढने में लगी रहती हैं। अब पूरे मुहल्ले में जाकर गाएँगी।’’
अम्मी चुप खड़ी रहीं। उन्हें पता था कि अब उनका एक लफ्ज़ भी आग में घी का काम करेगा। बड़ी अम्मा बोलती जा रही थीं, ‘‘नासिरा की कामवाली बता रही थी कि बुआ ने हम लोगों की ख़ूब हँसी उड़वाई है। तुम्हारा नाम लेकर कह रही थीं कि मर्द को जोरू का ग़ुलाम बना रखा है। इशारों पर नचाती हैं। न तो उठने-बैठने की तमीज़ है, न बोलने-बात करने का सलीका। और न जाने क्या-क्या। सच कहती हूँ, एक बार आ जाए कलमुँही तो धक्के देकर निकाल दूँ।’’
अम्मी ने सिर झुका लिया। उन्हें पता था कि बड़ी अम्मा झूठ नहीं बोल रही हैं। नासिरा उन्हें पहले ही सारी बात बता चुकी थी।
शायद घरवालों की नाराज़गी की ख़बर बुआ को भी लग गई थी। वह बहत दिनों तक न तो घर आईं और न ही मुहल्ले में दिखीं।
एक दिन दोपहर को जब सब अपने-अपने कमरे में आराम कर रहे थे, अचानक ड्योढ़ी का दरवाज़ा चरचराया। सहन में लगे टाट के पर्दों पर पानी डाल रही अम्मी एकाएक ठिठक गईं। दरवाज़े से बुआ ने पहले एक फिर दूसरा थैला अंदर करते हुए क़दम रखा। अम्मी ने एकाएक घबराकर बड़ी अम्मा के कमरे की ओर नज़र डाली। उनका दरवाज़ा उढ़का हुआ था और अंदर से हल्के खर्राटों की आवाज़ आ रही थी। अम्मी लपकती हुई आईं और बुआ को चुप रहने का इशारा करते हुए बोलीं, ‘‘धीरे-धीरे बोलिएगा। सब सोए हुए हैं?’’
बुआ ने दुनिया देख रखी थी। वह अम्मी की बात का मतलब समझ गईं।
अम्मी ने एक थैला हाथ में ले लिया और सहन के कोने में पहुँचाती हुई बोलीं, ‘‘आज काफी दिनों बाद दिखीं?’’
‘‘छोटी बी, हमसे नाराज़ तो नहीं हो न?’’ बुआ का चेहरा स्याह था।
‘‘हाँ, बिल्कुल हूँ। इतने दिनों बाद क्यों आई?’’
बुआ अम्मी का चेहरा पढ़ने की कोशिश कर रही थीं। उन्हें पता था कि अम्मी के व्यवहार में स्वाभविकता नहीं है। बात सही भी थी। कहीं न कहीं अम्मी को अंदर से कचोट थी। पर इसका मतलब यह नहीं था कि वह बुआ से सामान नहीं ख़रीदेंगी। कोई उनका दिल भले ही दुखा दे, वह किसी को तकलीफ नहीं पहुँचाती थीं। अपना ग़ुस्सा, अपनी नाराज़गी, अपनी शिकायत सब अपने अंदर ज़ब्त कर जातीं। बुआ को भी इस बात का एहसास था। वह बोलीं, ‘‘छोटी बी, अब क्या कहें। हम तो माफ करने भी क़ाबिल नहीं हैं।’’
‘‘बुआ तुम भी क्या राग छेड़कर बैठ गई? लाओ, सामान दिखाओ?’’ अम्मी अपना दुख छलकने नहीं देना चाहती थीं।
पर बुआ ने थैले का मुँह जकड़ लिया। बोलीं, ‘‘बिटिया, पिछले पंद्रह दिनों से मेरी सईदा की तबीयत ख़राब चल रही है। रोज़ इलाज में सौ-पचास ख़र्च हो जाते हैं। उस यतीम का बेरौनक चेहरा देखकर कलेजा फट जाता है। अब वह सयानी हो रही है। मेरी जिंदगी भी कितने दिन है? मेरे बाद उसका क्या होगा? सच कहती हूँ, जब उसका चेहरा ध्यान में आता है तो सही-गलत सब भूल जाती हूँ। बस लगता है कि कैसे चार पैसे कमाकर जल्दी-जल्दी शादी कर दूँ। मुझे पता है कि रइसा चच्ची की तुम लोगों से नहीं बनती। वे अच्छे लोग नहीं है। पर ये भी मालूम है कि तुम लोगों की बुराई करूँगी और झूठी-सच्ची बातें बताऊँगी तो वे कुछ न कुछ ज़रूर ख़रीद लेंगे। मगर दो पैसों की लालच में मैंने कितना बड़ा गुनाह कर दिया। शायद अल्लाह भी मुझे माफ न करे। जितना तुम मेरा ख़्याल करती हो उतना सगी बेटी भी क्या करेगी। मेरी बेटी ज़िंदा होती तो आज तुम्हारी ही उमर की होती।’’
‘‘तुम भी क्या लेकर बैठ गईं बुआ? लाओ, हमारा अचार लाई हो कि नहीं।’’ अम्मी रुँधे गले से बोलीं। उनका मन भीगने लगा था।
बुआ ने थैले पर से हाथ नहीं उठाया। सिर झुकाए बैठी रहीं। वह रो रही थीं।
अम्मी ने ठोड़ी में हाथ लगाकर उनका चेहरा उठाया और सहज होने की कोशिश करते हुए बोली, ‘‘ये क्या बुआ, तुम तो बच्चा हो गईं। रुको, मैं पानी लाती हूँ।’’
पर बुआ एकाएक उठ खड़ी हुई, ‘‘नहीं बिटिया, मैं जा रही हूँ। अब दोबारा लौटकर अपना मुँह नहीं दिखाऊँगी। मेरे गुनाह का यही प्रायश्चित होगा। बड़ी बी से भी मेरी तरफ से माफी माँग लेना। उनका सामना करने की मुझमें हिम्मत नहीं है। ’’
अम्मी हड़बड़ाकर उन्हें रोकने लगीं। तभी अंदर से बड़ी अम्मा की आवाज़ गूँजी, ‘‘छोटी, बाहर गरमी में क्या कर रही हो?’’
अम्मी सन्न रह गईं। बुआ के चेहरे का रंग उड़ गया।
अम्मी कुछ कहतीं कि बड़ी अम्मा की आवाज़ फिर गूँजी, ‘‘बिस्किट के दो पैकेट मेरे लिए भी ख़रीद लेना और मेहंदी भी। और बुआ से कहना अगली बार आएँ तो मेरे लिए चूड़ियाँ भी लेती आएँ।’’
- डॉ. मोहम्मद अरशद खान
निष्कर्ष; “बिस्किटवाली बुआ” हमें यह संदेश देती है कि परिस्थितियाँ इंसान से गलतियाँ करवा सकती हैं, लेकिन सच्चा इंसान वही है जो पश्चाताप करे और दूसरों की भावनाओं को समझे। साथ ही, यह कहानी हमें क्षमा, सहानुभूति और मानवता के महत्व का एहसास कराती है।
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