रचना और आलोचना के रिश्ते : बी. एल. आच्छा

Dr. Mulla Adam Ali
0

This insightful introduction by B.L. Achha explores the dynamic relationship between literary creation and criticism. It highlights how evolving forms, ideas, and expressions in literature continuously reshape critical perspectives, making both interdependent and ever-evolving in the modern literary landscape. The Evolving Relationship Between Creation and Criticism: Literature, Theory, and Innovation in B.L. Achha’s Perspective. Rachana Aur Aalochana Ke Riste Book by B.L. Aachha, Publisher India Netbooks Private Limited.

Rachana Aur Aalochana Ke Riste : B.L. Aachha

rachna aur alochana ke rishte

यह भूमिका प्रख्यात साहित्यकार बी.एल. आच्छा की आलोचनात्मक दृष्टि का एक सशक्त उदाहरण है, जिसमें वे रचना और आलोचना के गहरे, परस्पर निर्भर संबंध को अत्यंत सूक्ष्मता से स्पष्ट करते हैं। बदलते समय, नई संवेदनाओं और शिल्पगत प्रयोगों के बीच साहित्य किस प्रकार अपनी पहचान गढ़ता है और आलोचना कैसे उसके साथ कदम मिलाती है—इस विचारोत्तेजक विमर्श में यही प्रमुख प्रश्न केंद्र में हैं। यह भूमिका न केवल साहित्यिक समझ को व्यापक बनाती है, बल्कि पाठक को रचना के भीतर छिपे अर्थ-संसार तक पहुँचने की नई दृष्टि भी प्रदान करती है।

रचना और आलोचना का बदलता संबंध

बी.एल. आच्छा की दृष्टि में साहित्य, शास्त्र और नवाचार

   साहित्य एक व्यापक संज्ञा है और विधाएँ उसकी अभिव्यक्ति का सहज प्रतिबिंबन। विधाओं की विषयगत या भावगत अनुरूपता होती है। मसलन गीत के लिए जो अंतरंग भावसघनता  की लय चाहिए, तो कथा -कुल के लिए गद्य का पठार। पर ऐसा भी नहीं कि कविता में लय ही लय  होती है और गद्य- कुल की विधाओं में भावसघनता से रिश्ता- नाता न होता हो । आज की कविता में गद्य अभिव्यक्ति ने भी ताल ठोक कर पहचान बनाई है और कथा- साहित्य  या  ललित निबंधों भी गद्य -गीत की लय  संक्रमित हुई है।विधागत संक्रमण तो  आज के सृजन की विशिष्टता बन गयी है।

     यह परिवर्तन जब रचनाओं में घटित होता है ,तो आलोचक की दृष्टि इस बदलाव को परखती है। और जब युग-सापेक्ष संवेदन या वैचारिक संबोध में भावांतर आता है तो वह भी पड़ताल का विषय बनता है, तो क्या इस बदलाव को किसी निर्धारित शास्त्र से, विधा के फॉर्मेट से सुनिश्चित  मानकों से तौलना या मापना चाहिए? स्पष्ट है कि रचना में बदलाव आया है और वह प्रवाह यदि कंटेंट  और फॉर्म में भी उभरा है, तो मूल्यांकन के मापदंड स्थायी नहीं हो सकते। रचना का तापमान अलग तरह का है ,तो बेरोमीटर भी बदलाव के लिए प्रतिश्रुत है ।पर इसका अर्थ यह नहीं कि पुराना शास्त्र खारिज हो जाता है और नये को परखने की दृष्टि ही पुराने शास्त्र के हिसाब से बेमानी हो जाती है। कालिदास जब' पुराणमित्येव न साधु सर्वम्..... 'की बात करते हुए नये की प्रतिष्ठा भी करते हैं, तो तय है कि रचनाधर्मिता में बदलाव आया है। फिर तो कसौटी में भी बदलाव आएगा। आखिरकार बासी उत्तरों से भी नये सवाल खड़े होते हैं ।और साहित्य तो उस रमणीयता का उपासक रहा है, जो कहता है-' क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदैव रूपं रमणीयतायाः'। कालिदास साहित्य में इसी प्रयोगविज्ञान के उपासक थे और लघुकथा हो, कविता हो  या साहित्य की कोई अन्य विधा, यह सभी नवोन्मेषी  प्रयोगशीलता की माँग करते हैं। क्योंकि यह युग बहुत गतिशील है, तकनीक और विचार में भी, इसलिए साहित्य में यह गतिशीलता और बदलाव दशक और पंचक में उतर आए हैं।

       समीक्षा या आलोचना रचनापेक्षी है। शास्त्र तो एक तरह से नवशिक्षुओं के लिए सधी हुई सीढ़ियाँ है ।पर वे भी इतनी सुगठित हैं कि न छठी शताब्दी के आचार्य भामह की सर्वथा अनदेखी की जा सकती है, नआचार्य भरत के नाट्य- शास्त्र की। हिंदी में यह बात आचार्य शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि अनेक आलोचकों की परंपरा में पुनराविष्कृत हुई है।  वामपंथ में भी और रसवादी आनंद धारणा में भी। पर बदलाव बहुत आए हैं। मार्क्सवाद, फ्रायडवाद, पूँजीवाद, आधुनिकता, उत्तरआधुनिकता और ग्लोबल से गुजरते हुए, और नई विधाओं के रूपांकन के साथ उनके निरंतर बदलाव में भी। ऐसी किसी फॉर्मेट या चौखट में बँधकर लिखना संभव नहीं है ।यों भी साहित्य हर काल में परंपरा का अतिक्रमण करता है। यदि घनानंद लिखते हैं- "लोग हैं लागि कवित्त बनावत मोहि तो मोरे कवित्त बनावत।" लक्षणों के आधार पर निर्मित काव्य व्यक्तित्व एक बात है और स्वानुभूत प्रयोगविज्ञान से निर्मित व्यक्तित्व नितांत अलहदा। इसीलिए शास्त्र को रचनात्मक व्यक्तित्व के विकास की सीढ़ियाँ कहा गया है, व्यक्तित्व का मूर्ति स्थापन नहीं। श्रेष्ठ रचनाकार पुरानी मूर्तियों को गला देता है, नयेआविष्करण के लिए। इलियट इसे ट्रेडिशन एंड इंडिविजुअल कहते हैं। हम भी जानते हैं कि जब कोई विधा ऑटोमेटिक सी हो जाती है ,यहाँ तक कि रचना का इकहरा प्रवाह या वाद भी, तो  नयेपन के लिए उस पर आघात होता है। नई रचनाधर्मिता अतिक्रमण करती है।छायावाद के पतन का  इसे एक बड़ा कारक कहा गया है। पर आलोचक के लिए इन्हीं सोपानों  का यानी शास्त्र का ज्ञान जरूरी है और रचना धर्मिता में आ रहे बदलावों को चीर कर देखने की नई दृष्टि भी ।साथ ही इन बदलावों के पैटर्न को समझ कर शास्त्रीय दृष्टि को नवनवीन बनाने की। व रचना भी बदलती है और शास्त्र भी बदलता है। रचना को समझने के लिए शास्त्र भी जरूरी है और रचना के बदलाव को समझने के लिए लोचदार शास्त्रीय दृष्टि की भी।

hindi new book rachna aur alochana

      रचना का अस्तित्व भाषा की सत्ता में होता है। भाव-संवेदन की दृष्टि से और बनावट की दृष्टि से भी। रचनाकार भाषा की अनेक कोटियों का संदर्भित विषय के अनुसार चयन करता है और यह संगठित रूपांकन ही रचना के भीतर  उसकी अंतर्वस्तु तक ले जाता है। अलबत्ता संस्कृत काव्यशास्त्र में भाषा को आधारभूत मानते हुए भी रस और ध्वनि की वकालत की है।  आत्मवादी तथा देहवादी संप्रदायों के तात्विक भेद से अलगाए रखा है।पर रचना की अखंड सत्ता कथ्य और रूप के अद्वैत में है ।इसीलिए भाषा में बसी अंतर्वस्तु  तक भाषा के सिंहद्वार  से ही जाया जा सकता है।  समूची रचना एक महावाक्य है और त्वचा को फोड़कर निकलने वाला शक्तिमान चूजा  या धवन्यार्थ उसी संरचना से फूटता है। रचना की बनावट और बुनावट के भीतर जो ध्वनि है, संदेश है, संवेदना है, वह भाषा की ही अंतर्जात है। उसका मीनिंग एरिया बहुत दूर दूरतर हो सकता है, शब्दों के कोशीय या लाक्षणिक अर्थों को छिटका कर हो सकता है, पर वह फूटता तो रचनात्मक भाषा से ही है।

      पुनः शास्त्र पर लौटना चाहूँगा। समीक्षा के दौरान रचना जितना प्रभाव छोड़ती है, उतना ही समीक्षा शास्त्र या आलोचना के मापदंड बिनकहे सहयात्री हो जाते हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे उन्हीं शास्त्रीय पायदानों से गुजर कर सफल होते हैं। बल्कि रचना में नये बदलाव दिखते हैं तो पुराने हूक नहीं मचाते, बल्कि बदलाव को रेखांकित करते हैं। उस बदलाव से रचना में आए  नए आस्वाद को तौलते हैं और यदि वह युगीन या व्यक्ति वैशिष्ट्य (idiosyncrasies) से अनुप्राणित हैं तो शास्त्र को भी परिमार्जित या संशोधित करते हैं। यह रचना की ताकत है। इसीलिए तो रामचरितमानस आचार्य शुक्ल को लोकमंगलवादी उन्मेष देती है  और उनकी समीक्षा दृष्टि का आधार बन जाती है। वे संचारी भावों में नये संचारियों को जोड़ते हैं।छायावाद की लाक्षणिक शैली को रेखांकित करते हैं। नंददुलारे वाजपेयी छायावाद की शक्तिमानता उसकी सांस्कृतिक ऊर्जा में पहचानते हैं। यही नयी दृष्टि प्रेमचंद को प्रगतिशीलता से जोड़ती है। इसीलिए तो हिन्दी आलोचना संस्कृत की तत्त्ववादी विश्लेषणा से अलग वैचारिक अभिमुखीकरण से न केवल आधुनिक बनती है बल्कि पश्चिम के मनोविश्लेषण, न्यू क्रिटिसिज्म, मिथकीय आलोचना, शैलीविज्ञान से जोड़ती है।। भाषिक तौर पर नवप्रवृत्तियों को पुराने में योजक बनाकर शास्त्र को भी नवनवीन बनाती रहती है। तात्पर्य यही कि शास्त्र और विचारधाराएँ, युगीन परिप्रेक्ष्य और प्रयोगविज्ञान के शैलीगत नवाचार समीक्षक के अंतरंग पार्श्व में सक्रिय रहते हैं ।पर वे रचना के संवेदनात्मक प्रवाह में बाधक नहीं बल्कि संप्रेषणीयता के सतर्क साधक या प्रश्नशील संवेदी के रूप में बने रहते हैं।

      अब सभी विधाओं की अपनी विशिष्टताएँ हैं और साहित्य मनीषी किसी एक विधा का ही पारखी बनकर नहीं रह जाता ।यों भी कलाएँ अंतर- अनुशासी होती है। संवेदन भी अनेक ज्ञानधाराओं से अंतर्भूत होता है। और प्रयोगशील रचनाकार समय के संवेदन से अपने भीतर के साहित्यिक तर्क को जितना पुष्ट करता है, उतना ही अभिव्यक्ति के नये शिल्पों की तलाश करता है। और करते करते अन्य विधाओं की विशेषताओं से अपने रचनाविन्यास  या विधाविन्यास को नया रूप देने के नयेपन तक जाता है। तो विधाओं में  अंतःसंक्रमण से विधाओं में जो विशिष्टता आती है, उसे भी पहचानना ही होगा ।मसलन लघुकथा का उपदेशात्मक  या बोधात्मक रूप अपने नरेटिव में ही होता था, कथाकथन की पद्धति में ।जब उसे  नाट्य और विज्युअल से रचा गया तो शिल्प के साथ संवेदन की प्रेषणीयता का नया प्रतिमान बना ।और लघु कथा जीवंत हो गई ।अभिनय के योग्य भी। और अब तो विज्यअल माध्यमों में भी प्रभावी। इसलिए रचना को शास्त्र के अनुरूप तौलने के बजाय रचना को चीर कर नये शिल्प संवेदन की पड़ताल करते हुए शास्त्र को भी, नजरिए को भी संशोधित और नवनवीन बनाना होगा ।पढ़ते समय रचना कहाँ-कहाँ झटका देती है, कहाँ-कहाँ शब्द अलग ही अर्थ ध्वनित करते हैं, कहाँ मोड़ और यति- गति चौंका कर नये अर्थ तक ले जाती है। एक संवेदनशील सहयात्री और अर्थविज्ञानी के तौर पर आलोचक हर घुमाव और बदलाव को पकड़ता है। वह जितना सहृदय है, उतना ही तत्वान्वेषी भी।इसीलिए अवधानतापूर्वक पाठ को भारतीय काव्यशास्त्र में केंद्रीय माना गया है और कविता के नये प्रतिमान में डॉ. नामवरसिंह ने इसे कसौटी बनाया है।

- बी एल आच्छा

नॉर्थटाऊन अपार्टमेंट
फ्लैटनं-701टॉवर-27
स्टीफेंशन रोड (बिन्नी मिल्स)
पेरंबूर, चेन्नई (तमिलनाडु)
पिन- 600012
मो-9425083335

ये भी पढ़ें; समीक्षा-आलोचना की जरूरत क्यों? महत्वपूर्ण विचार और विश्लेषण

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top