“Magru Monkey” by Manoj Jain 'Madhur' is a short and engaging moral story that highlights the importance of true friendship, alertness, and intelligence. Through an interesting jungle tale, it teaches children that not everyone who speaks sweetly is a true friend, and wisdom can help overcome even the most dangerous situations.
Magru Monkey Story: A Moral Tale of True Friendship and Intelligence
मनोज जैन 'मधुर' की कहानी “मगरू बंदर” एक रोचक और शिक्षाप्रद बाल कथा है, जो मित्रता, चतुराई और सतर्कता का संदेश देती है। यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि हर मीठी बात करने वाला सच्चा मित्र नहीं होता और कठिन समय में बुद्धिमानी ही सबसे बड़ी ताकत होती है।
बच्चों के लिए सीख देने वाली रोचक जंगल कहानी
मगरू बंदर
दिन भर की उछल-कूद और शरारत के बाद मगरू बंदर अपने मन-पसंद, आम के पेड़ पर जा चढ़ा। इससे पहले कि मगरू डाल पकड़ता, उसका संतुलन बिगड़ा और वह धप्प से नीचे आ गिरा, जहाँ समी शेर पहले ही, चीनू चीतल के आने के इंतज़ार में घात लगाए बैठा था। पता नहीं, समी का मूड अचानक क्यों बदल गया। उसने मगरू को सहारा देते हुए कहा “मिया, डाल से चूके हो! तुम्हारे कुल-वंश में कभी कोई बंदर डाल से चूकता नहीं है। यह तुम्हारी प्रजाति में अशुभ माना जाता है। अब इस बात को यहीं छोड़ो।“ इतना कहकर समी ने मगरू को गले से लगा लिया। मगरू डर के मारे थर-थर काँप रहा था। उसे समी की बातों पर यक़ीन नहीं हो रहा था।
समी ने कहा- “डर मत यार, मेरे साथ खेला-कूदा कर। मैं खुद दिन भर अकेला बैठा-बैठा बोर हो जाता हूँ। डर के मारे सारे जंगल के सारे जानवर इधर-उधर भाग जाते हैं। कोई आस पास नहीं आता।
मुझे तेरा सुनहरा लाल मुँह बहुत अच्छा लगता है। सुन! मुझे संगीत सुनना बहुत पसंद है। मैंने कुछ धुनें बनाई हैं, तू बस इन्हें जल्दी से गुनगुनाना सीख ले। मैं जब शिकार से लौटूँ तब तू मुझे इन धुनों को गुनगुनाकर सुनाया कर। तेरे मुँह से मुझे अपनी धुनों को सुनना अच्छा लगेगा। चल, आज से मैं तुझे अपना प्रतिनिधि नियुक्त करता हूँ।”
समी की बात सुनकर मगरू खुश हो गया। दिन, महीने, साल-कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। मगरू ने समी की बनाई धुनें सीख ली थीं। समी शिकार करता और मगरू धुनें सुनाता। अब मगरू को किसी बात की कोई फ़िक्र नहीं थी। बस मगरू दिन-प्रतिदिन अकेला पड़ने लगा। डाल से चूकने पर बंदरों ने भी उसका साथ छोड़ दिया था।
एक दिन मगरू अपनी पुरानी दोस्त लोपा लोमड़ी से मिलने झाड़ियों में जा पहुँचा। उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई। “ओ लोपा, तू कहाँ है?” मैं मगरू!
पुराने दोस्त मगरू की आवाज़ सुनकर लोपा झाड़ियों में से भागती हुई मगरू से मिलने चली आई। उसे गले लगाकर बोली “मगरू, आज मैं बहुत थक चुकी हूँ।“ चार शिकार हाथ लगे, लेकिन चारों हाथ से निकल गए। और बताओ, कैसे हो तुम?
सुना है आजकल तुम समी के लिए काम करते हो। ठीक है पर मैं तुम्हें अब भी आगाह कर रही हूँ।” समी से तुम्हारी दोस्ती बिल्कुल ठीक नही।
तुम, अपना ख्याल रखना ।
इतना कहकर थकी हारी लोपा झाड़ियों में वापस चली गई। तभी समी, मगरू का पीछा करते हुए अचानक आ धमका। मगरू की गर्दन मुँह में भरकर अपने जबड़ों से नापते हुए बोला, “बता लोपा मेरे बारे में क्या कह रही थी?”
मगरू बहुत डर गया और गिड़गिड़ाकर कहने लगा “लगता है आज तुम्हें जरूर कोई गलत फहमी हुई है?” समी ने गुर्राकर कहा गलत फहमी वह भी मुझे! “अरे गफलत में तो मैं उस दिन भी नहीं था, जिस दिन तू मेरे सामने पेड़ से टपका था। मैंने तो तुझे मीठी धुन सुनाने के लिए छोड़ दिया था। समझे! आज भी मैं पूरे होश में हूँ। मैं तुझे वही ट्रीटमेंट दे रहा हूँ, जो डाल से चूकने पर एक बंदर को दिया जाता है।
अरे बंदर! कहीं का! समी के जबड़ों में दवी गर्दन, इससे पहले कि चटकती मगरू ने दवे स्वर में कहा, “बेशक मुझे मन चाहा ट्रीटमेंट दे दो।“ मगर मुझे अपनी बात कहने का कमसे कम एक मौका तो दो, जिसका राज मैंने आज तक छुपा रखा था।
समी गुर्राया, “कैसा राज?” समी, मुझे मारने से पहले अपनी एक धुन बाँसुरी पर सुन लो, जो अभी तक मैंने किसी को नही सुनाई।
समी ने गुस्से में पूछा “कौन सी धुन की बात कर रहा है तू,
जल्दी से सुना, अब मैं उस मधुर धुन को सुनकर ही तेरा काम तमाम करूँगा।“
भाई पहिले मुझे छोडो तो सही, मैंने अभी अभी अपनी दोस्त लोपा को एक बाँसुरी दी है। वह खास धुन, उसी बाँसुरी पर बजती है। लोपा बाबड़ी तक पहुँची ही होगी। बस तुम मुझे लोपा के पास तक ले चलो और मुझे बाँसुरी दिला दो।
“समी शेर उस मधुर धुन को सुनने के लिए बेचैन हो उठा। उसने अपनी पीठ पर मगरू को बैठाया जल्द वहाँ जा पहुँचा, जहाँ लोपा लोमड़ी रहती थी। समी की दहाड़ सुनकर सारा जंगल थर्रा उठा। लोपा को समझने में देर नहीं लगी कि उसका दोस्त मगरू किसी गहरे संकट में है।
मगरू ने झाड़ी में छुपी लोपा को देख कर हवा में एक प्रश्न उछाला, लोपा ओ लोपा जो बाँसुरी मैंने तुम्हें अभी-अभी दी है वह मुझे जल्दी से लौटा दो। आज मैं अंतिम बार समी की सुरीली मूलधुन बाँसुरी के साथ सुनाऊँगा। लोपा ने तत्काल अपना डेढ़ दिमाग लगाकर मगरू से कहा मगरू तुम्हीं ने तो कहा था कि इस बाँसुरी को उसे नीली बावड़ी में छुपा देना। इधर समी के सिर पर धुन सवार थी। दोनों झाड़ियों के पार नीली बावड़ी पर जा पहुँचे। दवे पाँव लोपा भी वहाँ पीछे पीछे आ गई। समी गुस्से से अपनी पीठ झटक कर मगरू से बोला, “उतर मेरी पीठ से… क्या जीवन भर मेरे ऊपर ही लदा रहेगा।
यह रही बावड़ी।“
अब जल्दी से मुझे मधुर धुन सुना।“
समी, “भाई, मुझे पहले बाँसुरी निकाल कर तो तुम्हीं दोगे, तुमने अभी-अभी अपने जबड़े में मेरी गर्दन फँसा कर उसे चोटिल कर दिया। अकड़ी हुई गर्दन से में बाँसुरी निकालकर बावड़ी से वापस नहीं निकल पाउँगा। तुम्हें प्यारी धुन सुनने के लिए थोड़ी सी तकलीफ तो करनी ही पड़ेगी।“
मैं भी तब तक, रिहर्सल कर लेता हूँ।“ इतना सुनते ही समी गहरी बावड़ी में छपाक से कूद गया। समी बावड़ी में डूबता फिर बाहर आता अनेक प्रयास करने पर जब बाँसुरी नहीं मिली तब गरज कर पूछने लगा। मगरू, “कहाँ हैं बाँसुरी?” तभी लोपा लोमड़ी ने झाँककर तपाक से कहा, “ढूंढ़ता रह गहरे पानी और पड़ा रह वहीं।“
लोपा ने मगरू के गुलाबी गालों को सहलाया और दोनों हँसते हुए जंगल की ओर चले गए।
- मनोज जैन 'मधुर'
निष्कर्ष; “मगरू बंदर” कहानी हमें सिखाती है कि झूठी मित्रता से सावधान रहना चाहिए और सच्चे मित्र की सलाह को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बुद्धिमानी और सही समय पर लिया गया निर्णय ही हमें बड़े से बड़े संकट से बचा सकता है।
ये भी पढ़ें; शहर की सच्चाई और गाँव का अपनापन – वापसी बाल कहानी पूरी पढ़ें



