शहर की सच्चाई और गाँव का अपनापन – वापसी बाल कहानी पूरी पढ़ें

Dr. Mulla Adam Ali
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“Vapasi” is a touching children’s story by Mohammad Arshad Khan that beautifully highlights the contrast between city life and village simplicity. Through the journey of Jackie and Peelu, the story conveys a meaningful message about safety, dignity, and the true essence of happiness.

City vs Village Life Story for Kids – Vapasi (Full Hindi Story)

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डॉ. मोहम्मद अरशद खान की मार्मिक बाल कहानी “वापसी” गाँव और शहर के जीवन के बीच गहरे अंतर को सरल और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। जैकी और पीलू जैसे दो कुत्तों के माध्यम से यह कहानी बच्चों को सुरक्षा, आत्मसम्मान और सच्चे सुख के महत्व का संदेश देती है। चमक-दमक से भरे शहर की कठोर सच्चाई और गाँव के अपनत्व भरे जीवन का यह सुंदर चित्रण पाठकों के मन को छू जाता है।

बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा से भरपूर सुंदर हिंदी कहानी

वापसी

‘‘देखो पीलू, इस जगह को छोड़कर और कहीं मत जाना वर्ना मुश्किल में पड़ जाओगे।’’

जैकी कुत्ता गाँव से आए अपने दोस्त पीलू को समझा रहा था। पीलू के कान तो जैकी को सुन रहे थे पर आँखें हैरानी से चारों तरफ ताक रही थीं। ऊँची-ऊँची इमारतें, सर्राटे से आती-जाती गाड़ियाँ, लोगों की भीड़भाड़। वह दुम समेटे घबराया हुआ-सा खड़ा था।

‘‘हमारा इलाक़ा कॉलोनी के इसी हिस्से तक है। इसके आगे जग्गू का क़ब्ज़ा है। वह बड़ा ख़तरनाक है। उससे पंगा न लेने में ही अपना भला है।’’

जैकी उसे समझा ही रहा था कि इसी बीच एक लड़का मोटर साइकिल का हॉर्न बजाते हुए तेज़ी से गुज़रा। पीलू घबरा गया। भ्रमित होकर भागने में वह दीवार से जा टकराया। चोट तो नहीं आई, पर घबराहट के कारण वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा। उसे चिल्लाता देख आस-पास घूम रहे शरारती बच्चों ने पत्थर मारने शुरू कर दिए। जैकी ने भूँक-भूँककर किसी तरह बच्चों को भगाया।

 ‘‘इस तरह भागने की क्या ज़रूरत थी?’’ वह पीलू को डाँटता हुआ बोला।

सहानुभूति की जगह उलाहना पाकर पीलू भर आया, ‘‘तो फिर क्या करता? तुमने देखा नहीं वह मोटर साइकिलवाला कितनी तेज़ आ रहा था? कहीं चढ़ा देता तो?’’

जैकी हँस पड़ा, ‘‘यहाँ ज़िंदगी इसी रफ़्तार से चलती है, मेरे भाई। देखो, वहाँ नन्हा गोलू बीच सड़क पर किस बेफिक्री से सोया है।’’

‘‘पर उसे रास्ते में इस तरह सोना चाहिए क्या?’’

‘‘रास्ता?’’ जैकी हँस पड़ा, ‘‘यही तो हमारा घर-आँगन है। यहीं हम पले-बढ़े हैं। दो-चार दिन रहोगे तो तुम भी आदी हो जाओगे। आओ, चलो, मैं तुम्हारे आराम करने की जगह दिखा दूँ।’’

जैकी उसे एक घर के सामने ले गया जिसके गेट पर ताला लगा हुआ था।

‘‘देखो, यहाँ न शोर-शराबा है न मोटर साइकिलों का आना-जाना। यहाँ तुम आराम से सो सकते हो।’’

‘‘लेकिन इस घर में तो ताला बंद है। हमें खाना कैसे मिलेगा?’’ पीलू ने मासूमियत से पूछा।

जैकी हँस पड़ा, ‘‘तुम क्या समझते हो हमारे लिए इन घरों से थाल सजकर आती है?’’

‘‘लेकिन हमारे गाँव में मालिन चाची खाते समय हमेशा दो कौर बचा लेती हैं। एक गैया के लिए और दूसरा मेरे लिए।’’

‘‘गाँव की छोड़ो। यहाँ हमें अपना खाना ख़ुद तलाशना पड़ता है,’’ जैकी ने लंबी साँस खींची, ‘‘अच्छा, अब जल्दी से सो जाओ। रात में हम लोग पार्टी करेंगे। यहीं बग़ल में एक रेस्टोरेंट हैं। वहाँ ख़ूब जूठन मिलती है। थोड़ा ख़तरा तो रहता है। पर खाने को ऐसी लज़ीज़ चीज़ें मिलती हैं कि तबीयत ख़ुश हो जाती है।’’

कहते-कहते जैकी थोड़ा ठहरा और राज़ फुसफुसाने के अंदाज़ में बोला, ‘‘मगर ध्यान रहे। शाम पाँच बजे से पहले यह जगह ख़ाली कर देनी है। घर के मालिक-मालकिन लौट आए तो ख़ैर नहीं।’’

‘‘क्या मतलब?’’ पीलू हैरानी से बोला।

‘‘इस घर के मालिक-मालकिन दोनों नौकरी करते हैं। लौटने पर अगर गेट के सामने कोई सोता मिल जाए तो मार-मारकर कर कमर दोहरी कर देते हैं। लेकिन घबराओ नहीं। अभी तो ठीक से दोपहर भी नहीं हुई। तुम यहाँ इत्मीनान से आराम कर सकते हो। मैं तुम्हें आकर जगा लूँगा।’’

जैकी उसे समझा-बुझाकर चला गया।

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गर्मी के दिन थे। सूरज आसमान में चढ़ रहा था। गर्म हवा के झोंकों से वातावरण धधकने लगा था। जैकी एक घर के चबूतरे पर चढ़कर बैठ गया। आस-पास सन्नाटा छाया हुआ था। जैकी ने उबासी लेकर पंजों में मुँह छिपा लिया। उसकी पलकें बोझिल होने लगीं। अचानक किसी की आहट पाकर वह चौंक गया। पीछे पलटकर देखा तो पीलू खड़ा था। उसके चेहरे पर परेशानी थी।

‘‘क्या हो गया?’’ जैकी हड़बड़ाकर उठ बैठा।

‘‘बहुत गर्मी लग रही है। लेटते नहीं बन रहा। चलो किसी तालाब में चलकर नहा आते हैं।’’ पीलू हाँफता हुआ बोला।

‘‘तालाब में!’’ जैकी हँस पड़ा, ‘‘यहाँ तालाब कहाँ मिलेगा? यहाँ तो सीवर लाइन के कारण नालियाँ भी नहीं हैं।’’

‘‘तो किसी नल के नीचे चलकर बैठते हैं। वहाँ कुछ नमी होगी।’’

‘‘नल...? तुम किस ज़माने की बातें कर रहे हो?’’

‘‘यहाँ नल नहीं हैं?’’ पीलू के माथे पर बल पड़ गए, ‘‘तो फिर मुसाफिर अपनी प्यास कैसे बुझाते होंगे?’’

‘‘यहाँ पानी बोतलों में बिकता है। पैसे हों तो ख़रीदो, नहीं तो प्यासे मरो।’’

‘‘उफ, यहाँ जीना कितना मुश्किल है। मैं नहीं रह पाऊँगा। मुझे मेरे गाँव छोड़ आओ।’’ पीलू परेशान हो उठा।

उसे बेचैन देखकर जैकी ने कंधे सहलाते हुए कहा, ‘‘जाकर सोने की कोशिश करो। आज पहला दिन है इसलिए परेशानी हो रही है। दो-एक दिन में सब ठीक हो जाएगा।’’

पीलू बेमन से सिर झुकाकर वहाँ से चला गया।

दोपहर हो गई थी। सूरज सिर पर आ गया था। तेज़ गर्मी के कारण लोग अपने-अपने कमरों में बंद थे। कॉलोनी में सन्नाटा छाया हुआ था। सब्ज़ी बेचनेवाले या आइसक्रीम के ठेले भी अब नहीं दिख रहे थे। जैकी गहरी नींद में सोया हुआ था। अचानक अनजानी-सी ‘खट-खट’ सुनकर जैकी की नींद उचट गई।

जैकी को आवाज़ों की ख़ूब पहचान थी। कॉलोनीवालों को वह क़दमों की आहट से पहचानता था। आवाज़ ही क्या, आदमी का मन भी वह ख़ूब पहचानता था। कॉलोनी की सड़क से होकर रोज़ सैकड़ों लोग गुज़रते थे। कौन भला है, किसके मन में खोट है, उसे पहचानते देर नहीं लगती थी। एक बार तो उसने ऐसे एक आदमी को धर दबोचा था जो सूट-बूट पहने साहब जैसा लग रहा था। कॉलोनीवाले भी उसे पहचानने में धोखा खा गए। पर जब जैकी को लगातार पीछे पड़कर भौंकता देखा तो उन्हें शक हुआ। तलाशी ली तो पता चला वह बहुत बड़ा चोर था।

रुक-रुककर ‘खट-खट’ होती आवाज़ ने जैकी के कान खड़े कर दिए। वह आवाज़ की दिशा में लपककर पहुँचा तो हैरान रह गया। पीलू चुपचाप दम साधे लेटा हुआ था और एक आदमी मकान का ताला तोड़ने की कोशिश कर रहा था। जैकी खूँखार शेर की तरह उस पर टूट पड़ा। उसके तेवर देखते ही वह आदमी सिर पर पैर रखकर भाग छूटा। जैकी उसे कॉलोनी के बाहर जग्गू के इलाक़े तक खदेड़ आया। आगे का काम जग्गू और उसके साथियों ने संभाल लिया। ऐसे उनमें भले कितनी दुश्मनी रहती थी, पर इस मामले में वे एक थे।

जैकी वापस लौटकर पीलू पर बरस पड़ा, ‘‘वह चोर तुम्हारी आँखों के सामने घर का ताला तोड़ रहा था और तुम चुपचाप लेटे रहे?’’

‘‘मैं क्या करता? मुझे लगा वह कोई काम कर रहा होगा। भला इस तरह दिन-दहाड़े चोरी करता है कोई।’’ पीलू ने मासूमियत से कहा।

‘‘उफ, तुम्हें कैसे समझाए कोई!’’ जैकी खीझकर बोला, ‘‘अच्छा, अब थोड़ा खिसको, मैं भी यहीं लेटता हूँ।’’ जैकी भी उसकी बग़ल में लेट गया।

दिन ढलते और अंधेरा घिरते ही कॉलोनी जगमगा उठी। पीलू की आँखें चुँधियाने लगीं। ऐसी रोशनी उसने बस एक ही बार देखी थी, जब प्रधान जी के लड़के की शादी हुई थी। वह हैरानी से चारों ओर देखने लगा। पार्क के आस-पास चहल-पहल कुछ ज़्यादा ही थी। कुर्सी-मेज़ें लग रही थीं। टेंट सजाया जा रहा था। बिजली की झालरें लग रही थीं। सुंदर-से गेट पर गुब्बारों के बंच लगा दिए गए। डीजे पर ज़ोर-ज़ोर गाने बज रहे थे।

यह सब देखते ही जैकी उछल पड़ा, ‘‘वाह, अब कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। आज तो यहीं अपनी पार्टी जमेगी।’’

‘‘यह सब हमारे लिए है?’’ पीलू ने हैरानी से पूछा।

‘‘ऐसा ही समझो,’’ जैकी झूमता हुआ बोला, ‘‘आज सहाय अंकल के बेटे की बर्थ डे पार्टी है। यह तैयारी उसी की है। अब तो ख़ूब तर माल उड़ाने का मौका मिलेगा।’’

थोड़ी ही देर में पार्टी शुरू हो गई। चमचमाती गाड़ियों की कतारें लगने लगीं। सूट-बूट पहने लोग आने-जाने लगे। तेज़ आवाज़ में बजते डीजे में बच्चे-बड़े सब थिरकने लगे। हँसी-ठहाके और शोरगुल से सारी कॉलोनी गूँज उठी।

खाने-पीने का दौर शुरू होते ही जैकी पीलू को लेकर टेंट के पिछवाड़े आ गया। वहाँ पहले से छुट्टा गायों और गली के कुत्तों का जमावड़ा लगा हुआ था। कभी-कभी जब उनमें झगड़ा मचता तो चौकीदार डंडे बरसाकर सबको कुछ दूर तक खदेड़ आता। पर उसके जाते ही जमावड़ा फिर लग जाता।

अभी सब जूठन फेंके जाने के इंतज़ार में ही खड़े थे कि अचानक जग्गू उधर दौड़ता हुआ आया। उसे देखते ही सबकी जान सूख गई। जग्गू के झगड़ालू स्वभाव से सभी परिचित थे। रंग में भंग होने से जैकी को बड़ी खीझ हुई। लेकिन आज जग्गू के चेहरे का रंग बदला हुआ था। वह बुरी तरह हाँफ रहा था। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं। जैकी ने हिम्मत की और आगे बढ़कर पूछा, ‘‘दादा, क्या हुआ? कोई बात हो गई क्या?’’

जग्गू ऐसा हाँफ रहा था कि उससे बोला नहीं जा रहा था।

‘‘हम सब परेशानी में घिर गए हैं...जितना जल्दी हो सके यहाँ से भाग लो।’’ बड़ी मुश्किल से वह बोला।

‘‘पर हुआ क्या...?’’

‘‘सब पकड़े जा रहे हैं। एक गाड़ी शहर के आवारा कुत्तों को पकड़ती हुई घूम रही हैं। सुनते हैं विदेश से कोई बड़ा आदमी आनेवाला है। इसीलिए हमें पकड़कर बस्ती के बाहर छोड़ा जा रहा है। जल्दी करो कहीं छिपकर अपनी जान बचाओ।’’

जग्गू की बात सुनते ही सब तितर-बितर होकर भाग लिए। जैकी ने पीलू को साथ लिया और एक तरफ भाग चला। भागते-भागते जब वे लस्त-पस्त होकर रुके तो शहर से बाहर आ चुके थे। अब वहाँ से सिर्फ चमकते हुए विज्ञापन और ऊँची-ऊँची बिल्डिंगों की लाइटें नज़र आ रही थीं।

दोनों के बीच थोड़ी देर तक तक सन्नाटा छाया रहा। कोई कुछ न बोला। अचानक पीलू उठ खड़ा हुआ और कहने लगा, ‘‘जैकी, मेरे दोस्त, मैं जा रहा हूँ, वापस अपने घर। शहरवालों की निगाह में हम लोग पिछड़े, अनपढ़ और गँवार भले हों, हमें जीने का ढंग न पता हो। लेकिन हम अपनी जगह खुश हैं। जहाँ पग-पग पर असुरक्षा और भय हो वहाँ जी पाना मेरे लिए मुश्किल है। भूखे पेट रहना भला है, पर अपमान की रोटी मेरे गले नहीं उतर सकती। ऐसे स्वार्थी और अपमान भरे वातावरण में मेरा गुज़ारा नहीं हो सकता। मुझे पता है तुम मेरे साथ नहीं आओगे। तुम फिर उसी रंग-बिरंगी दुनिया में वापस जाने की सोच रहे हो। शहर की चकाचौंध के आगे तुम्हें हमारी दुनिया अंधेरी लगती होगी। पर तुम्हें नही पता कि उस अंधेरे में अपनापन है, इंसानियत है, एक-दूसरे का सहारा बनने का जज़्बा है। मैं जा रहा हूँ। मन हो तो आ जाना। हमारी दुनिया में सबके लिए जगह है।’’

...और पीलू गाँव की ओर जाने वाली अंधेरी गली में उतर गया।

- डॉ. मोहम्मद अरशद ख़ान

निष्कर्ष; “वापसी” हमें यह सिखाती है कि सच्चा सुख बाहरी चमक-दमक में नहीं, बल्कि सुरक्षा, अपनापन और आत्मसम्मान में होता है। गाँव की सादगी भले साधारण लगे, लेकिन वहीं जीवन का असली सुकून और मानवीयता बसती है।

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