बाड़ के उस पार | दिल छू लेने वाली देशभक्ति और दोस्ती की बाल कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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“Across the Fence,” written by Dr. Mohammad Arshad Khan, is a touching children’s story that beautifully portrays innocence, friendship, and the invisible lines that divide people. Through the bond between Veer and Sikandar, the story highlights how pure hearts see no borders, offering a powerful message of humanity and peace.

Across the Fence: A Story of True Friendship

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सीमाओं के आर-पार बँटी दुनिया में भी दिलों की सरहदें नहीं होतीं—यही संवेदनशील सच्चाई प्रस्तुत करती है बाल कहानी “बाड़ के उस पार”। डॉ. मोहम्मद अरशद खान की यह मार्मिक रचना बाल मन की मासूमियत, दोस्ती की गहराई और युद्ध की विडंबना को बेहद प्रभावशाली ढंग से उभारती है। वीर और सिकंदर की निष्कलुष मित्रता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इंसानों के बीच खड़ी दीवारें कब और क्यों बन जाती हैं। यह कहानी न केवल बच्चों के लिए, बल्कि हर संवेदनशील पाठक के हृदय को छू लेने वाली है।

बच्चों के लिए भावनात्मक और प्रेरणादायक कहानी

बाड़ के उस पार

वीर सिंह सीमा की कँटीली बाड़ों के पास खड़ा था। उसकी निगाहें बाड़ के पार दूर तक फैले रेगिस्तान के धोरों में जाने क्या तलाश रही थीं। आँखों में अजब-सा सूनापन चिलक रहा था। सरसराती हवा मानो कानों में कुछ फुसफसा रही थी। तेजपुर छावनी से छुट्टी लेकर वह आज ही गाँव लौटा था। माँ और बापूसा से मिलकर वह तनोट माता के मंदिर जाने को कहकर चला आया था। पर वह पहले बीएसएफ की चौकी पर गया। कमांडिग अफसर से मिन्नतें कर बड़ी मुश्किल से अपने बचपन की उस जगह को कुछ क्षण निहारने का अनौपचारिक अवसर मिला था। दूर-दूर तक फैले रेगिस्तान में उसका बचपन झिलमिला रहा था। सामने के धोर से उठती रेत के धुँधलके में मानो सिकंदर बैठा उससे पूछ रहा था-‘यार! किंवे है तू? घणे दिन्हान बाद नज़र आया ए!’’

 सिकंदर की याद आते ही उसके दिल में हूक-सी उठी। बीते दिनों की स्मृतियाँ आँखों के सामने रील-दर-रील चलचित्र-सी घूमने लगीं।

...........

1965 का साल। फरवरी के आखिरी दिनों की भोर। जैसलमेर का सीमावर्ती तनोट गाँव। रात की ठंड अभी बाकी थी। मंद हवा नींद में डूबे धोरों को थपकाकर जगाने की कोशिश कर रही थी। फीके-फीके-से दिख रहे आसमान पर रेगिस्तान की सफेद साँस छाई हुई थी, मानो सोने के संसार को किसी ने झीनी चादर डालकर छिपा रखा हो। रात की नमी ने रेत की ऊपरी परत को गीला कर दिया था, इसलिए हवा रेत से चुहल न कर पाने के कारण बेचैन थी।

ढाणियों में जीवन की हलचल धीरे-धीरे शुरू होने लगी थी। भेड़ों की ‘म्म्माँ...आँ’ की आवाजें भोर का स्वागत करने लगी थीं। ऊँट लंबी-गहरी साँस लेकर, अपनी गर्दनें झटककर लंबी-लंबी टाँगें फैलाते हुए उठने लगे थे। गले में बँधी घंटियों की रुनझुन हवा की किलकारी जैसी गूँज रही थीं। दूर कहीं फौजी कैंप की ओर से आती जीप घरघरा रही थी।

रेगिस्तान को छूने के लिए धूप बस दस्तक देने ही वाली थी। आसमान के रंग बदल रहे थे- पहले राख जैसा, फिर नीला, फिर सुनहरा और अब केसरिया। धूप की किरणें जैसे-जैसे धोरों पर गिर रही थी, रेत चमकने लगी थी, मानो सोने की चादर पर हवा अँगुलियाँ फेर रही हो।

वीर बिस्तर छोड़कर आँखें मलता हुआ ऊँटों के बाड़े की ओर भागा। रेत से बर्तन मल रही माँ ने पीछे से पुकार दी, ‘‘पैली मू धोय ले अर कुळ कर ले। पछै ऊँट्याँ रै बाड़ै कानी जा।’’

पर अपने प्यारे टपोसा के बिना वीर ने रात कैसे काटी, यह वही जानता था। यह ऊँट उसे नानीसा ने दिया था। वैसे तो रेवड़-चरावण के लिए काकासा जाते थे, पर अपने टपोसा को वीर खुद ले जाता था। काकासा इस बात पर खीझते थे। उन्हें लगता था वीर अभी बच्चा है, वह टपोसा के चरावण का ध्यान नहीं रख पाता होगा। इसलिए लौटने पर वे टपोसा के आगे सुखाकर रखी गई सेवण घास अलग से डालते। पर शायद काकासा को नहीं पता था कि जब प्रेम से हृदय भर जाए तो पेट के खाली होने, न होने का अर्थ नहीं रह जाता। इसलिए टपोसा उनका मन रखने के लिए दो-चार मुँह मारकर बैठ जाता और जुगाली करने लगता।

वीर ने जल्दी-जल्दी कुल्ला करके बाजरी की गर्मागर्म राब खाई और अपने टपोसा को लेकर निकल पड़ा। ढाणी से बाहर निकलते ही टपोसा ने खेजड़ी की लूँग में दो-चार मुँह मारे और और आगे निकल गए वीर के पीछे ‘उम्म...उम्म...!’ करता हुआ भाग चला।

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आज वीर के कदम अनजाने में ही सीमा की ओर बढ़ चले। वैसे तो उधर जाने की कोई मनाही नहीं थी, पर गाँव-ढाणी के लोग उधर कम ही जाते थे। वीर लकड़ी की बल्लियों में उलझी कँटीली बाड़ से कुछ दूर पर रूक गया। बाड़ जगह-जगह से टूटी-लटकी हुई थी। कुछ बल्लियाँ जमीन में लुढ़क गई थीं। कई जगह पर बाड़ रेत में इस तरह लेटी हुई थी कि उसे आसानी से पार किया जा सके। वीर हैरानी से उसे तब तक देखता रहा जब तक टपोसा के कुछ खाने की आवाज ने उसका ध्यान भंग नहीं किया। टपोसा कैर की झाड़ी में मुँह मार रहा था। जाड़े के कारण कैर का हरापन फीका पड़ गया था, पर उसकी कठोर टहनियों को चबाने में टपोसा को कोई समस्या नहीं थी। वह बेफिक्री से मुँह चला रहा था। टहनियों की आँखों में उग रहे टूसे उसे भला-सा स्वाद दे रहे थे। कुछ दिनों बाद कैर गुलाल की टोकरी की तरह लाल बाटियों से भर जानेवाला था। उसे वह कहावत याद आने लगी जो बापूसा अक्सर कहा करते थे-

बैठणो छाया मैं, हुओ भलाँ कैर ही।

रहणो भायाँ मैं, हुओ भलाँ बैर ही।

वीर एक धोर पर चढ़कर बैठ गया। धूप में अब हल्की गर्मी आ गई थी। मंद हवा में सूख चुकी रेत हल्की-हल्की खिसक रही थी। वीर कुछ देर यूँ ही रेत को मुट्ठियों में उठा-उठाकर इधर-उधर उछालता रहा, फिर उस पर आड़ी-तिरछी लकीरें बनाने लगा। उसने टपोसा का चित्र बनाया, फिर अपनी झोपड़ी का, फिर बापूसा का, जिनकी लंबी-लंबी मूँछें दोनों गालों पर फैली थीं और बड़ी पाग से पूरा सिर ढका हुआ था। अपने बनाए चित्रें पर वह खुद ही हँसता रहा, बनाता और मिटाता रहा, फिर अचानक टपोसा को देखे हुए एक गीत गाने लगा-

लड़ली लूमा झूमा ऐ! लड़ली लूमा झुमा ऐ!

ओ म्हारो गोरबन्द नखराळो।

आली जा म्हारो गोरबन्द नखराळो।

ओ लड़ली लूमा झूमा...

वह मस्ती में तब तक गाता रहा जब तक एक अजनबी आवाज़ ने उसका ध्यान भंग नहीं कर दिया-

‘‘वा भई! सुथो घणो! सोहणो गाइयो!’’

वीर चौंक पड़ा। इधर-उधर नज़र दौड़ाई। धूप में चमकती रेत के सिवा कहीं कोई नहीं था। पर यह कानों का भ्रम नहीं था, उसने सचमुच एक आवाज सुनी थी। कुछ देर इधर-उधर देखने के बाद उसने चिल्लाकर पूछा, ‘‘कौन बोल्यो भाय? काक रो हाँकड़ो लागे है?’’

‘‘इधर देखो, इधर...’’ बाड़ के पार से आवाज आई।

वीर ने पलटकर देखा तो बाड़ के पार कुछ दूरी पर उसी की उम्र का एक लड़का धोर पर लेटा हुआ हँस रहा था।

‘‘गाते तो अच्छा हो, पर ये गीत तो औरतें गाती हैं!’’ उसने हँसते हुए कहा।

वीर को बुरा लगा। उसने चिढ़कर कहा, ‘‘माणस-जनाणी में भेद होता है क्या? क्या उनके आँख-नाक-कान नहीं होते? क्या वे हम लोगों की तरह नहीं बोलतीं?’’

‘‘बुरा लगा? मैं तो मजाक कर रहा था।’’ कहकर वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।

वीर ने मुँह फेर लिया। पर उस लड़के में कुछ ऐसा था कि वह ज्यादा देर उसकी तरफ पीठ नहीं किए रह सका।

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ उसने पूछा।

‘‘सिकंदर!’’ उसने भली-सी मुस्कराहट के साथ कहा, ‘‘और तुम्हारा?’’

‘‘मैं वीर, वीर सिंह!’’ वीर ने थोड़ा तनकर कहा, ‘‘कहाँ रहते हो?’’

‘‘थरपारकर की ढाणी में।’’

जल्दी ही दोनों सहज हो गए।

‘‘मेरी फूयी टपोसा के लिए गोरबंद बना रही हैं।’’ वीर ने बात बढ़ाई।

‘‘टपोसा...?’’

‘‘मेरा ऊँट...! टप-टप चलता है न, इसलिए।’’

सिंकदर हँस दिया। उसकी हँसी सफेद पंखोंवाली परी की तरह हवा में तैर गई। बदले में वीर ने भी कई परियाँ उड़ाईं।

‘‘अच्छा, तो लो फिर अपने टपोसा के लिए, मेरी तरफ से।’’ कहकर सिंकदर ने हाथ में ली हुई कोई वस्तु उसकी ओर उछाल दी।

‘टन्न’ की आवाज़ करती हुई वह धोर की ढलान में धँस गई। वीर ने लपककर रेत हटाई तो चौंक पड़ा, ‘‘अरे, ये तो ऊँट की घंटी है!’’

‘‘हाँ, तू रख ले।’’ सिंकदर की चेहरे पर हल्की-सी उदासी छा गई, जिसका रंग, दूर होते हुए भी, वीर ने पढ़ लिया।

‘‘तेरे ऊँट की है?’’

‘‘हाँ, थी, पर अब मेरे लिए बेकार है।’’

‘‘मतलब...!’’

‘‘अब्बू ने बेच दिया...!’’ सिकंदर के चेहरे की उदासी और गाढ़ी हो गई, जिसे सरकती हवा, सूने पड़े धोरों, कैर की झाड़ियों और टपोसा ने भी पढ़ा।

वीर कुछ देर चुप रहा फिर बोला, ‘‘लेकिन क्यों..?’’

‘‘अब्बू को पैसों की जरूरत थी...’’ कहते-कहते संकदर ने उदासी को झटककर फेंक दिया और चहककर बोला, ‘‘पर अब ये तुम्हारा टपोसा पहनेगा। इसके गले में ‘टन्न-टन्न’ करेगी तो बहुत अच्छी लगेगी।’’

‘‘हाँ...हमारा टपोसा...’’ वीर जैसे अपने आप से बुदबुदाया, फिर घंटी को बग्गड़ी के कोने में बाँधते हुए बोला, ‘‘अम्मा से डोरी लेकर आज ही इसके गले में बाँध दूँगा।’’

दोनों थोड़ी देर चुप रहे और टपोसा को कैर में मुँह मारते निहारते रहे।

‘‘हम लोगों के बीच में यह कँटीली बाड़ क्यों है?’’ सिंकदर ने रेत को हवा में उड़ाया, जो उड़कर वीर की तरफ आने लगी।

‘‘पता नहीं!’’

‘‘सब लोग इसके पार जाने से डरते क्यों हैं?’’

‘‘पता नहीं!’’

यह रहस्य न वीर को पता था और न सिकंदर को। लेकिन बाड़ को देखते ही उनके मन में एक भय-सा उमड़ता था। दोनों जंग खाई बाड़ के कँटीले तारों को कुछ देर तक भय भरी जिज्ञासा से देखते रहे।

‘‘किसने लगाई होगी?’’ सिंकदर ने मौन तोड़ा।

वीर चुप रहा।

‘‘क्या हम इसे हटा नहीं सकते?’’

यही सवाल वीर के भी मन में था। पर वह बुदबुदाया, ‘‘बड़ों ने लगाई होगी, तो कुछ सोचकर ही लगाई होगी।’’

‘‘क्या बड़े हमेशा सही करते हैं?’’ सिंकदर के पास ढेरों सवाल थे। पर उनके जवाब न तो उसके पास थे और न ही वीर के पास।

‘‘क्या यह हवा को रोक सकती है? पंछी को? रेत को? उजास को?’’ सिंकदर ने पूछा।

‘‘और हमारी मित्तराई को...?’’ वीर ने भी गहरी साँस में सवाल किया।

सिंकदर कुछ नहीं बोला। पर हवाओं ने मानो चीखकर कहा-‘‘नहीं...नहीं..! कभी नहीं...!’’

टपोसा अब कैर के पास ही बैठ गया था और जुगाली कर रहा था। बीच-बीच में उसकी आँख झपक जाती थी। धूप की तेज़ी बढ़ गई थी, इसके बावजूद गुनगुनी लग रही थी। ओस अब पूरी तरह सूख चुकी थी, जिससे रेत हल्की होकर हवा में धूल के बगूले उठाने लगी थी।

‘‘दुपहर थई गई। हण भूख लगण लगी है। घर ते अम्मी उंदी वेंदी होसी।’’ सिंकदर की उदासी ऊब में बदल गई थी।

‘‘हूँ...’’ वीर ने बिना उसकी तरफ देखे धीरे से कहा।

सिंकदर धोर पर सरकता हुआ उस पार उतर गया। वीर ने चिल्लाकर कहा, ‘‘काले ई आवजो! म्हूँ थारो बाटो जोवूँला!’’

‘‘हा, हा, जरूर! थारे टपोसा ने घंटी घाळके लावजो।’’ सिंकदर ने धोरों की ओट होते-होते कहा।

‘‘मारो टपोसा...’’ वीर बुदबुदाया, जिसे हवाओं ने लपककर रेगिस्तान के सूनेपन पर बिखेर दिया।

वीर लौट चला। पीछे-पीछे टपोसा भी। रेगिस्तान की सुनसान और अकेली दुनिया में आज एक नया साथी मिला था। ऐसा साथी, जिसने मन के गहरे कोने को छू लिया था। ढाणी में उसके कई दोस्त थे। वह उनके साथ गोटियाँ, चुल-मुल, कंचा कूद, ऊँचा-नीचा टीला खेला करता था। लेकिन घर में कदम रखते ही उन्हें भूल जाता था। पर आज सिंकदर से मिलने के बाद उसकी चहकती बोली, उसकी बेफिक्र मुस्कराहट जैसे उसके दिल पर छप गई थी। मन खुशी से भरा-भरा लग रहा था। कदम ऐसे हल्के हो गए थे, जैसे खुशी के पंख लग गए हों।

लेकिन थार की खामोशी के पीछे बेचैन-सी हलचल शुरू हो चुकी थी, जिससे वीर अंजान था। हवाओं में धीरे-धीरे एक आशंका-सी गहराती जा रही थी। भय का साया घने बादल की तरह पूरे रेगिस्तान को अपने कब्जे में लेता जा रहा था।

उस रात फौज के कदमों की हलचल और गाड़ियों की घरघराहट पूरे थार में गूँजती रही।

अगली सुबह वीर ने अपने हाथों से टपोसा के गले में घंटी बाँधी और सीमा की ओर भाग चला। वह जल्दी से जल्दी सिकंदर के पास पहुँच जाना चाहता था। वह खुलकर कहना चाहता था कि अब टपोसा सिर्फ उसका नहीं, बल्कि दोनों का है। दुलकी चाल में दौड़ते टपोसा की घंटी हवा में टनटना रही थी। पर उसकी गूँज को जैसे कोई अदृश्य जाल कैद कर लेना चाहता था।

‘‘ए लड़के...! कहाँ जा रहा है? रुक!’’

अचानक एक कड़कदार आवाज ने उसके कदम थाम दिए।

वीर ने देखा फौजियों की एक पलटन खड़ी थी। आस-पास तंबू लगाकर अस्थाई चौकी बना दी गई थी। सारे फौजी उसकी ओर वर्जना भरी निगाहों से घूर रहे थे।

‘‘मैं...उस धोर तक जा रहा हूँ..अपने सिंकदर से मिलने।’’ वीर ने अटकते-अटकते कहा।

‘‘क्यों अपनी जाने देने पर तुला है। दुश्मन तुझे मार देंगे।’’

‘‘दुश्मन, कहाँ है दुश्मन?’’ वीर चौंक पड़ा। इस शब्द से वह अपरिचित था।

‘‘वो है...उस पार! उसने हमारे खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है।’’ फौजी ने बाड़ के उस पार इशारा करते हुए कहा।

‘‘लेकिन उस पार तो मेरा सिंकदर है।’’ वीर ने कहा पर शब्द उसके गले में घुट गए।

एक दिन की दोस्ती, जो जन्मों की मित्तराई में बँध गई थी, पल भर में बाड़ के कँटीले तारों में फँसे निर्जीव कागज के टुकड़े-सी फड़फड़ाने लगी। दोस्ती का धोर जाने कौन-सी हवा आकर उड़ा ले गई थी। सोने जैसा चमकता रेगिस्तान जैसे लावे की तरह धधकने लगा था।

...............

‘‘आ जा, फौजी! वेला मुक्क गया।’’ पंजाबी कमांडिंग अफसर की आवाज ने अचानक उसकी स्मृतियों का तार तोड़ दिया। ‘‘हम इससे ज्यादा समय नहीं दे सकते। मजबूरी है, सुरक्षा का मामला है।’’

‘‘यस सर, मैं समझता हूँ।’’ वीर आँखें पोछता हुआ पीछे हट आया।

वीर ऑफीसर को सैल्यूट मारकर चल पड़ा। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसकी आँखों से दो बूँदें लुढ़ककर रेत में गिर पड़ीं। दूर-दूर तक धूप में तपता रेगिस्तान मानो हरी-भरी छाया से घिर गया।

- डॉ. मोहम्मद अरशद खान

निष्कर्ष; “बाड़ के उस पार” हमें सिखाती है कि सच्ची दोस्ती किसी सरहद की मोहताज नहीं होती। यह कहानी बाल मन की सहज संवेदनाओं के माध्यम से यह संदेश देती है कि नफरत की दीवारें चाहे जितनी ऊँची हों, इंसानियत और अपनापन उन्हें पार कर ही लेते हैं।

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