This heartwarming children’s story by Dr. Mohammad Arshad Khan beautifully captures the innocent bond between a grandson and his grandfather. Through Hassu’s struggle to write a letter instead of making a call, the story highlights pure emotions, love, and the charm of simple communication.
Hassu’s Letter to Grandfather: A Heartwarming Children’s Story About Love, Emotions, and Family Bond
डॉ. मोहम्मद अरशद खान की यह भावनात्मक बाल कहानी “हस्सू की चिट्ठी दादू के नाम” एक मासूम बच्चे और उसके दादू के बीच के स्नेहिल रिश्ते को खूबसूरती से प्रस्तुत करती है। आधुनिक तकनीक के बीच पत्र लिखने की पुरानी परंपरा से जूझते हस्सू की उलझन और मासूमियत पाठकों के दिल को छू लेती है। यह कहानी बच्चों की सरल भावनाओं और पारिवारिक जुड़ाव की अनमोल झलक दिखाती है।
दादू के लिए मासूम प्यार और भावनाओं से भरी प्रेरणादायक बाल कहानी
हस्सू की चिट्ठी दादू के नाम
स्कूल से लौटते हुए हस्सू फूला नहीं समा रहा था। आज उसे डांसिंग में फर्स्ट प्राइज मिला था। वह जल्दी से जल्दी घर पहुँचकर दादू से अपनी ख़ुशी बाँटना चाहता था।
दादू भले ही 250 किमी दूर रहते थे। पर हस्सू के लिए वह सबसे क़रीब थे। वह रोज़ उनसे मोबाइल पर चैट करता था। बहुत सारी बातें पूछता था। होमवर्क में वह जहाँ भी अटकता, मोबाइल लगा देता। उसने दादू को भी वीडियो कॉलिंग करना सिखा दिया था।
घर पहुँचते ही हस्सू ने बस्ता एक ओर फेंका और चिल्लाया, ‘‘मम्मा, देखो मुझे क्या मिला है?’’
मम्मी उसके हाथ में पुरस्कार देखकर ख़ुश हो गईं, ‘‘अरे, वाह, मेरा हस्सान तो फर्स्ट आया है!’’
हस्सू का असली नाम हस्सान है। मम्मी-पापा उसे हस्सान ही पुकारते हैं ताकि उसका नाम न बिगड़े। पर उसे हस्सू कहलाना ज़्यादा अच्छा लगता है क्योंकि दादू उसे इसी नाम से पुकारते हैं।
‘‘मम्मा, अपना मोबाइल दीजिए। दादू से बात करनी है।’’ हस्सू बोला।
‘‘लेकिन मेरा मोबाइल तो ख़राब हो गया है।’’
‘‘ओह, तो मैं दादू से बात कैसे करूँ?’’
‘‘रोशन के मोबाइल से कर लो।’’
हस्सू अपने चाचू के कमरे में पहुँचा। दरवाज़ा खुलने की आहट पाकर चाचू ने किताब से नज़र हटाई।
‘‘चाचू, मुझे आपका मोबाइल चाहिए, दादू से बात करनी है।’’
चाचू ने मेज़ पर रखे मोबाइल की ओर इशारा कर दिया और फिर से किताब में डूब गए।
हस्सू ने मोबाइल उठाया और बाहर आ गया। उसने नंबर डायल किया पर फोन लगा ही नहीं। स्क्रीन पर नज़र डाली तो पता चला सारे सिग्नल ग़ायब।
हस्सू खीझकर चाचू के कमरे में फिर पहुँचा। इस बार चाचू ने नज़र भी नहीं उठाई। कहा, ‘‘वहीं मेज़ पर रख दो।’’
‘‘नेटवर्क तो है ही नहीं।’’ हस्सू रूआँसा होकर बोला।
‘‘सिग्नल सुबह से नहीं हैं।’’ कहकर चाचू ने उबासी ली।
हस्सू उदास होकर अपने कमरे में आ गया। पापा के आने में देर थी। चार बजे से पहले वह घर नहीं आते थे। हस्सू बेचैन हो रहा था कि वह दादा से कैसे बात करे।
तभी हस्सू को ध्यान आया कि वह दादू को लेटर तो लिख ही सकता है। पर उसे लेटर तो लिखना आता नहीं था। न कभी किसी को लिखा था। दादू से हमेशा फोन पर ही बातें हुआ करती थीं। पापा एक बार कह रहे थे कि पहले जब मोबाइल नहीं हुआ करते थे तो लोग एक-दूसरे को लेटर भेजा करते थे। एक बार उन्होंने एक बहुत पुराना लेटर दिखाया भी था, जो दादू ने उन्हें पहली बार तब लिखा था जब वे पढ़ने के लिए अलीगढ़ गए थे।
हस्सू ने तय कर लिया कि वह भी दादू को लेटर लिखेगा। वह कॉपी और पेन लेकर बैठ गया। बड़ी देर तक उसे समझ में नहीं आया कि शुरुआत कहाँ से की जाए। काफी देर सोचने-विचारने के बाद उसने लिखना शुरू किया—
‘हेलो, दादू, गुड ऑफ्टरनून! आप मुझे ठीक से सुन पा रहे हैं न?’’
उफ! उसने ज़ुबान काटी। यह कोई फोन थोड़े ही है, जो उन तक आवाज़ पहुँच रही होगी। ऊँचा सुनने वाले को पढ़ने में कोई परेशानी थोड़े होती है।
हस्सू ने वह पंक्ति काट दी। पर अब काग़ज़ गंदा दिखने लगा था। उसने डायरी से पन्ना फाड़ा, गोला बनाया, फेंक दिया और फिर से लिखने लगा।
‘दादू, गुड ऑफ्टरनून! आप कैसे हैं?’
पर उसकी क़लम फिर रुक गई। अब आगे दादू कुछ कहें, तभी तो बात बढ़ेगी। पर दादू बोलेंगे कैसे? उसे ध्यान आया कि कल बात हुई थी तो वह घुटनों में दर्द की शिकायत कर रहे थे। उसने आगे लिखा, ‘आपके घुटनों का दर्द कैसा है? दवा ली कि नहीं?’ क़लम फिर रुक गई। अब यह कैसे पता चलेगा कि उन्होंने दवा ली कि नहीं। अगर दवा नहीं ली हो तो वह ग़ुस्सा करने का नाटक करे। पर दवा ले ली होगी तो रूठने से उनका दिल दुखेगा। हस्सू का दिमाग़ उलझ गया। जब क़लम आगे नहीं बढ़ी तो काग़ज़ फाड़ा, गोला बनाया और उछाल दिया।
इस बार उसने दादी के हालचाल से बात शुरू की—‘दादी कैसी हैं? अब खाँसी तो नहीं आती?’ पर इसमें भी वही मसला। काग़ज़ फिर से गोला बन गया।
चलो छोड़ो। हाल-चाल न पूछकर अब वह सीधे अपनी बात करेगा। उसने लिखना शुरू किया—‘‘दादू, पता है? आज मुझे डांसिंग कम्पीटीशन में फर्स्ट प्राइज़ मिला। ये देखिए सार्टिफिकेट और ट्रॉफी। कितनी सुंदर है न?’
उफ! हस्सू ने माथे पर हाथ मारा। यह वीडियो कॉलिंग थोड़ी है जो उन्हें दिख रहा होगा। पर बिना देखे उन्हें कैसे पता चलेगा कि उसे कितनी बड़ी और सुंदर-सी ट्राफी मिली है।
हस्सू लिखता रहा, काटता रहा। काग़ज़ों के गोले बनते रहे और कमरे में फैलते रहे।
‘पता है दादू आपने मुझे आखिर में यह स्टेप जिस तरह करने को बोला था? मैंने वैसे ही किया। ख़ूब तालियाँ बजीं।’ हस्सू ने स्टेप करके ऐसे दिखाया कि जैसे दादू उसे देख रहे हों। पर देखने के लिए दादू वहाँ कहाँ थे? उसे समझ में नहीं आ रहा था कि दादू को इस स्टेप के बारे में कैसे बताए। न तो करके दिखाया नहीं जा सकता था, और न ही लिखकर बताया जा सकता था। हस्सू उलझ गया।
पर हस्सू हार मानने वालों में से कब था? उसने लिखा—‘दादू पहली बार प्राइज़ पाकर मुझे तो बहुत अच्छा लगा। आपको कैसा लगा? ज़रा दादी का चेहरा दिखाइए वह मुस्करा रही हैं कि नहीं? वह जब मुस्कारती हैं तो उनकी आँखें छोटी-छोटी हो जाती हैं। है न?’
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला। मम्मी ने अंदर झाँका। अंदर की हालत देखकर वह हैरान रह गईं। पूरा कमरा काग़ज़ के गोलों से भरा हुआ था और हस्सू माथे पर बल डाले लिखने में मगन था। उसके घुँघराले बाल जैसे और भी उलझ गए थे।
एक पल को हस्सू को लगा कि मम्मी उसे टोकेंगी। पर मम्मी ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि उन्हें पता था कि हस्सू जब दादू से बात करता है तो किसी की टोका-टाकी बिल्कुल नहीं पसंद करता।
मम्मी ने दरवाज़ा बंद किया और वापस चली गईं।
- डॉ. मोहम्मद अरशद खान
निष्कर्ष; इस कहानी का निष्कर्ष यह है कि सच्चा प्यार और अपनापन किसी माध्यम का मोहताज नहीं होता। चाहे मोबाइल हो या चिट्ठी, भावनाएँ दिल से जुड़ी हों तो हर दूरी छोटी लगती है।
ये भी पढ़ें; अंगूर हानिकारक हैं: लालच और झूठ की सीख देने वाली प्रेरणादायक बाल कहानी


