डॉ. शकुंतला कालरा की बाल कविताएँ: दीपावली और रक्षा-बंधन | भारतीय पर्वों का बाल संसार

Dr. Mulla Adam Ali
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Deepawali and Raksha Bandhan are two beautiful children's poems by Dr. Shakuntala Kalra that celebrate India's rich cultural traditions and family values. Written in simple, rhythmic language, these poems inspire children to embrace love, unity, kindness, and the true spirit of Indian festivals.

Deepawali and Raksha Bandhan Poems for Children by Dr. Shakuntala Kalra

डॉ. शकुंतला कालरा की बाल कविताएँ दीपावली और रक्षा-बंधन

भारतीय त्योहारों पर बाल कविताएँ

डॉ. शकुंतला कालरा की बाल कविताएँ "दीपावली" और "रक्षा-बंधन" भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर परिचय कराती हैं। सरल, सहज और लयात्मक भाषा में लिखी गई ये कविताएँ बच्चों को प्रेम, भाईचारे, समानता, ज्ञान और आपसी विश्वास का संदेश देती हैं। आइए, इन प्रेरक बाल कविताओं का आनंद लें और इनके माध्यम से भारतीय त्योहारों की सांस्कृतिक गरिमा को समझें।

Deepawali Poem for Children by Dr. Shakuntala Kalra | Festival of Lights

डॉ. शकुंतला कालरा की "दीपावली" बाल कविता प्रकाश, ज्ञान, प्रेम और समानता का सुंदर संदेश देती है। सरल एवं लयात्मक भाषा में रचित यह कविता बच्चों को दीपावली के वास्तविक महत्व से परिचित कराती है।

दीपावली


घर-घर दीप जलेंगे जगमग,

अंधकार से सभी लड़ेंगे।

तम का डटकर करें सामना,

बाधाओं से नहीं डरेंगे।


दूर करेंगे दीपक मिलकर,

बाहर का सारा अँधियारा।

मन में जले ज्ञान का दीपक,

आलोकित हो देश हमारा।


सचमुच में दीवाली होगी,

सुख-समता के दीप जलेंगे।

छोटा-बड़ा न होगा कोई,

प्रेम-भाव से गले मिलेंगे।


Raksha Bandhan Poem for Children by Dr. Shakuntala Kalra | Brother-Sister Bond

डॉ. शकुंतला कालरा की "रक्षा-बंधन" बाल कविता भाई-बहन के पवित्र प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के भाव को सहज ढंग से प्रस्तुत करती है। यह कविता बच्चों को भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ने वाली।

रक्षा-बंधन


सावन की पूरन- मासी को,

पर्व सदा ही यह आता है।

भाई बहन का पर्व प्रिय यह,

रक्षा बंधन कहलाता है।


रेशम की डोरी बहना की,

रक्षा की याद दिलाती है।

भाई दौड़ा आता है जब, 

 विपदा बहना पर आती है।


बहना के सारे कष्टों को, 

वह हँसकर गले लगाता है।

देता है शीतल छाँव उसे,

दु:खों से उसे बचाता है।


इतिहास गवाही देता है,

प्रण कैसे गया निभाया था।

जब राखी देख हुमायूँ तक,

लश्कर लेकर चढ़ आया था।


मेवाड़ बचाया था उसने,

थी बँधी कलाई पर राखी।

भाई के लिए हो गई थी,

कर्मा की प्रण-बंधन राखी।


- डॉ. शकुंतला कालरा

निष्कर्ष; डॉ. शकुंतला कालरा की ये दोनों बाल कविताएँ बच्चों को भारतीय त्योहारों के वास्तविक अर्थ, पारिवारिक स्नेह, प्रेम, समानता और मानवीय मूल्यों का संदेश देती हैं। सरल भाषा और प्रभावी भावों से युक्त ये रचनाएँ बाल साहित्य की प्रेरक एवं पठनीय धरोहर हैं।

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