लल्ला और बिट्टी | पढ़िए शिव मोहन यादव की लोकप्रिय हिंदी बाल कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
0

"Lalla Aur Bitti" is a heartwarming children's story by Shiv Mohan Yadav. It beautifully highlights the importance of equal education, sibling love, family support, and the right of every child to learn, inspiring young readers with a meaningful social message.

Lalla Aur Bitti by Shiv Mohan Yadav | Hindi Children's Story

शिक्षा और भाई-बहन के प्रेम की प्रेरक हिंदी कहानी लल्ला और बिट्टी

"लल्ला और बिट्टी" संवेदनशील बाल कथाकार शिव मोहन यादव की एक प्रेरक बाल कहानी है, जो भाई-बहन के स्नेह, शिक्षा के अधिकार और बेटी की पढ़ने की इच्छा को सरल एवं मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह कहानी बच्चों में समानता, सहयोग, पारिवारिक प्रेम और शिक्षा के महत्व का सुंदर संदेश देती है तथा पाठकों को बेटियों की शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

शिक्षा और भाई-बहन के प्रेम की प्रेरक हिंदी कहानी

लल्ला और बिट्टी

बिट्टी अभी दरवाजे पर खड़ी अपनी कुछ सहेलियों को स्कूल जाते देख रही थी। तभी दादी माँ ने बुलाया— “बिट्टी, जरा देखो तो, दाल बन गई होगी, चूल्हे से उतार लो।”

बिट्टी दौड़़कर आई और उसने चमचे में लेकर दाल देखी, फिर चूल्हे से पतीले को उतार कर नीचे रख दिया। फिर आवाज लगाई— “भैया, आओ जल्दी! नाश्ता और खाना तैयार है, लो खा लो।”

जब तक लल्ला आया, तब तक बिट्टी ने नाश्ता लगा दिया था।

“थैंकू बिट्टी!” कह कर वह नाश्ता करने लगा। थैंकू सुन कर वह मुस्करा दी और बोली— “जल्दी खाकर स्कूल जाओ। देखो चुर्री और कट्टर दोनों चले गए। राधा भी चली गई। तुम क्या छुट्टी के टाइम जाओगे?”

“अरे नहीं बिट्टी, देखना मैं साइकिल से उनसे पहले स्कूल पहुँच जाऊँगा।” लल्ला ने कहा।

“अरे वाह भैया! तुम्हारी साइकिल न हुई, हेलीकाप्टर हो गया।” बिट्टी ने गर्दन मटकाते हुए कहा।

“हाँ बिट्टी! मेरी तो साइकिल ही मेरा हेलीकाप्टर है।” लल्ला ने मुस्कराते हुए जवाब दिया तो उसकी दादी झूठा-मूठा गुस्सा करते हुए बोलीं— “ज्यादा हेलीकाप्टर मत बनाया करो साइकिल को। आराम से चलाया करो। कहीं फिसल गए तो बत्तीसी झर जाएगी, समझे।”

लल्ला की डाँट पड़ते देख बिट्टी खिलखिला कर हँस पड़ी। लल्ला भी नाश्ता खाते हुए नीचे मुँह करके मुस्कराता रहा। बिट्टी को हँसता देख दादी को गुस्सा आ गया, बोलीं— “तू ज्यादा खिलखिल-खिलखिल करती है। चल उधर, कपड़े रखे हैं, धो दे जाकर।”

“ठीक है दादी। अभी धोए देती हूँ।” कहकर बिट्टी कपड़े धोने चल दी। बिट्टी को यों डाँटा जाना लल्ला को खराब लगा, लेकिन वह क्या करता। नाश्ता करके, बस्ता लेकर चल दिया विद्यालय। रास्ते भर सोचता रहा— “बिट्टी दिनभर काम करती रहती है, पूरे घर में झाड़ू लगाना, बरतन माँजना, कपड़े धोना, गोबर डालना, फिर भी बेचारी डाँटी जाती है। अब मैं ऐसा नहीं होने दूँगा।”

शाम को जब वह विद्यालय से घर पहुँचा तो देखा बिट्टी पानी भर रही थी। वह दौड़़कर आई और मुंडी हिलाते हुए बोली— “पता है भैया, आज मैंने आपके लिए हलवा बनाया है।”

लल्ला मुस्कुरा दिया, तभी मम्मी की आवाज सुनाई दी— “बिट्टी, उससे क्या गपशप करने लगी, पहले उसे कुछ खाने को तो दो।”

“जी मम्मी, अभी लाई!” कहकर वह लल्ला के लिए हलवा लाने चली गई।

इतने में लल्ला ने दो-तीन कॉपी और दो-तीन किताबें बस्ते से निकालकर खटिया पर रखीं और एक थैला ढूँढ़ने लगा। तब तक बिट्टी ने हलवा लाकर उसी खटिया पर रख दिया और बोली— “अरे भैया, आज मैंने आपकी पसंद का हलवा बनाया है और आपने अभी तक हाथ भी नहीं धोए।”

“अभी आया।” कहकर वह अपने काम में लगा रहा और फिर बिट्टी का बनाया हुआ एक सुंदर-सा झोला लेकर आया, उसमें बाहर रखी हुईं सब कॉपी-किताबें रखने लगा। बिट्टी ने पूछा— “ये क्या कर रहे हो भैया?”

बिट्टी अभी पूछ ही रही थी, इतने में उनकी मम्मी और दादी भी आ गईं। लल्ला बोला— “बिट्टी, इन किताबों से तुम पढ़़ने चलोगी स्कूल में!”

“क्या! क्या कह रहे हो लल्ला!” दादी जी आश्चर्य से इतना ही बोल पाईं। बिट्टी का भी मुँह खुला रह गया। मम्मी तो सुनती ही रहीं।

“हाँ दादी माँ, मैंने अध्यापक जी से बात कर ली है। उन्होंने बिट्टी का नाम लिखने की इजाज़त दे दी है। स्कूल में बिट्टी की भी कोई फीस नहीं लगेगी। मेरी तरह इसे भी किताबें, स्कूली कपड़े, सब मुफ्त में मिलेंगे। ये देखो, तीन किताबें तो अध्यापक जी ने पहले से ही दे दीं।” कहते हुए वह झोले से किताबें निकाल कर दिखाता हुआ बोला।

यह सुन कर मम्मी तो कुछ नहीं बोलीं, पर दादी गुस्साईं— “ये भी पढ़ने चली जाएगी तो घर के काम कौन करेगा?”

“दादीजी, हम-दोनों मिलकर सुबह घर के काम कर लिया करेंगे, बचे हुए काम शाम को एकसाथ कर लेंगे।” लल्ला ने कहा तो दादी चुप हो गईं। मम्मी मुस्करा दीं। बिट्टी को भैया की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था, वह बड़े ध्यान से उसकी बातें पढ़ने की कोशिश कर रही थी। जब वह आश्वस्त हो गई तो दादीजी से बोली— “दादीजी, हम सबेरे-सबेरे ही आपके सब काम कर दिया करेंगे, क्या भैया के साथ हम भी स्कूल जा सकते हैं?”

दादी को बिट्टी की मासूमियत और उसकी पढ़ने की लगन देखकर उन्हें अच्छा लगा। वे उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं— “तू पढ़ना चाहती है, तो कल से ही विद्यालय जाएगी।”

दादीजी के इतना कहते ही वह उछलकर उनके गले लग गई। मम्मी ने भी मुस्कुराते हुए प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। सबका प्यार पाकर वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी। इतने में वह लल्ला के पास आई और उससे गले लगकर बोली— “थैंकू भैया!” यह सुनकर सब खिलखिला कर हँस पड़े।

- शिव मोहन यादव

सहायक संपादक, कमरा नंबर 10,
प्रकाशन प्रभाग, एनसीईआरटी,
नई दिल्ली-110016

निष्कर्ष; "लल्ला और बिट्टी" एक प्रेरणादायक बाल कहानी है, जो यह संदेश देती है कि शिक्षा पर हर बच्चे का समान अधिकार है। परिवार का सहयोग, प्रेम और सकारात्मक सोच किसी भी बच्चे के सपनों को साकार कर सकती है। यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है।

ये भी पढ़ें; त्रिलोक सिंह ठकुरेला की 3 प्रेरक बाल कहानियाँ | राजा का आदेश, एकता की ताकत और देवता की सीख

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top