प्रभुदयाल श्रीवास्तव की मनोरंजक एवं प्रेरणादायी बालकहानियाँ : एक समीक्षात्मक अध्ययन

Dr. Mulla Adam Ali
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Prabhudayal Shrivastava is a distinguished Hindi children's writer whose stories beautifully combine entertainment, imagination, and moral values. This review explores his acclaimed children's story collection Dadaji Ka Piddu, highlighting its engaging narratives, child psychology, simple language, and meaningful life lessons that make it a valuable contribution to Hindi children's literature.

Prabhudayal Shrivastava's Children's Stories: A Critical Review

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बालकहानियों पर समीक्षात्मक आलेख

हिंदी बालसाहित्य में प्रभुदयाल श्रीवास्तव का नाम उन रचनाकारों में लिया जाता है जिन्होंने बालमन की सहज जिज्ञासाओं, संवेदनाओं और कल्पनाशीलता को अपनी रचनाओं में अत्यंत आत्मीयता से अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत समीक्षात्मक आलेख में उनके चर्चित बालकहानी-संग्रह 'दादाजी का पिद्दू' की कहानियों का कथ्य, शिल्प, भाषा, बालमनोविज्ञान, मनोरंजन तथा जीवन-मूल्यों की दृष्टि से विवेचन किया गया है। डॉ. शकुंतला कालरा जी का यह आलेख न केवल संग्रह की रचनात्मक विशेषताओं को रेखांकित करता है, बल्कि प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बालसाहित्यिक अवदान को भी सार्थक रूप में प्रस्तुत करता है।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बालकहानियाँ

मनोरंजन, संवेदना और जीवन-मूल्यों का समन्वय

पिछले चार दशकों से लेखन में सतत् सक्रिय प्रभुदयाल श्रीवास्तव जी बालसाहित्य में विशेष रूप से बालकविता में अपने विशिष्ट अवदान के लिए चर्चित और प्रशंसित हैं। राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय विविध सम्मानों से सम्मानित बालसाहित्यकार प्रभुदयाल श्रीवास्तव का विपुल रचना-संसार हैरान और मुग्ध करता है, विशेष रूप से आपका काव्य-जगत्। प्रभुदयाल जी की प्रिय विधाएँ- व्यंग्य, कहानी, बुंदेलीगीत, बालकविता, बालगीत, एकांकी आदि हैं। राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा भारतीय रत्न, हम साथ-साथ पत्रिका द्वारा लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान, अन्तर्राष्ट्रीय विश्व हिंदी सम्मेलन बैंकाॅक में सृजन सम्मान, हिंदी प्रचारिणी संस्था छिंदवाड़ा द्वारा हिंदी सेवी सम्मान सहित राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित हैं। प्रभुदयाल जी देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपते आ रहे हैं। उनकी कई रचनाएँ पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं। इनका बालसाहित्य इंटरनेट/वेब पत्रिकाओं में उपलब्ध है। जिनमें से प्रमुख हैं- वेब दुनिया, साहित्य शिल्पी, रचनाकार, अनुभूति, लेखनी, भारत दर्शन, हिंदी समय आदि। देश के लगभग सभी बाल पत्रिकाओं में यह निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं। बच्चों के हृदय में उतरकर, उनके मस्तिष्क में पहुँचकर, उनकी ही बोलचाल की भाषा में जो आप रचते हैं उन्हें बच्चे बहुत पसंद करते हैं और चाव से पढ़ते हैं। प्रभुदयाल मूलतः कवि हैं और उन्होंने बच्चों के लिए ढेरों कविताएँ, शिशुगीत और बालगीत रचे हैं। बच्चों के मनोविज्ञान को जानने और समझने वाले प्रभुदयाल जी ने उनकी रूचि को देखते हुए उनके लिए कई खूबसूरत कहानियाँ भी लिखी हैं। बालमनोविज्ञान के चितेरे प्रभुदयाल जी जानते हैं कि कविता और कहानी दोनों ही बालसाहित्य की आधारशिला हैं। संभवतः इसीलिए उन्होंने बालमन को रिझाने वाली, उनके मनोविज्ञान को प्रतिबिंबित करने वाली, उनके मनोराज्य की हर अनुभूति को शब्द देने वाली मनभावन कहानियाँ भी लिखी हैं। कविता कोष में भी 450 के लगभग कविताएँ प्रकाशित हुई हैं।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का वर्ष 2023 में प्रकाशित बालकहानी- संग्रह ‘दादाजी का पिद्दू’ आया है जिसमें 22 बालकहानियाँ- दादाजी का पिद्दू, लम्पू और गुलाबी, टीना ने चोरी पकड़वाई, दसवाँ प्रयास, बिन्नैयाँ, अम्बुज का छक्का, अपशकुन, घर के नन्हें जासूस, मुट्टा, अब पछताये होत का, पौधों का करिश्मा, रोटी बोली सब्जी बोली, चन्नी डर छूट गया, झिंग्गू-डिन्ग्गू, उछलू की चित्रकारी, इच्छा शक्ति से पाई सफलता, आपरेशन बाल्टी, गुलशन, मुकरा, होर्डिंग वाले जूते, बस थोड़ी सी समझदारी और नाक में चूहा आदि कहानियाँ संकलित हैं। इनका विषय-वैविध्य बच्चों को आकर्षण की डोरी में बाँधकर पढ़ने के लिए लालायित करता है। कुतुहल और जिज्ञासा से भरपूर इनकी कहानियाँ बच्चों को आखिर तक बाँधे रखती हैं। आइए चर्चा करते हैं संग्रह की कुछ इंद्रधनुषी कहानियों की-

शीर्षक कहानी ‘दादाजी का पिद्दू’ हास्य के छींटे लिए अत्यंत भावप्रधान कहानी है। रचनाएँ बच्चों का दादाजी के प्रति प्रेम, उनकी चिंता संवेदना की पराकाष्ठा है। दादाजी का पिद्दू यानी उनका छोटा सा तकिया है जिसके बिना उन्हें बहुत कष्ट होता है और उन्हें नींद नहीं आती, जिसे बिस्तर में रखना अनिवार्य है। एक दिन नीचे बच्चे तकिया-तकिया खेल रहे थे। वह अचानक कही गुम हो जाता है। बच्चोें सहित सारा परिवार उसे ढूंढने में लग जाता है, पर पिद्दू नही मिलता। दादाजी ऊपर अपने कमरे में सोने के लिए चले जाते हैं। आधी रात को दो बजे जब लूसी की नींद खुलती है तो देखती है कि पिद्दू तो उसके पलंग के एक कोने में पड़ा था। वह धीरे से उठी। ओह उन्हें नींद नहीं आ रही होगी। दादाजी के कमरे में उन्हें तकिया देने जाती है। उन्होंने दरवाजा खोला देखा बाहर तकिया हाथ में लिए लूसी ठंड से काँप रही थी। उसकी बालसुलभ मासूमियत किसी का भी द्रवित कर देगी। अपने प्रति नन्ही बच्ची का प्यार और संवेदना देखकर वह अभिभूत हो उठे। यही संवेदना इस कहानी का प्राण तत्त्व है।

किस्सागोई में ढली इनकी कहानियों का जादुई प्रभाव बच्चों को अपने इंद्रजाल में बाँध लेता है। कुतुहल और उत्सुकता से ओतप्रोत उनकी कहानी ‘टीना ने चोरी पकड़वाई’ बच्चों को खूब पसंद आती है। टीना की सूझबूझ बड़ों को भी चमत्कृत कर देती है। कोई सोच भी नहीं सकता था कि फेरीवाले सामान बेचने के बहाने गली-गली में उन घरों में नजर रखते हैं जिन पर ताले लगे होते हैं। छोटी टीना अपने दादाजी को यह बताती है कि जब भी दरी वाला आता है उसी रात को जिस घर में ताला लगा होता उसमें चोरी हो जाती है।

‘दसवाँ प्रयास’ इस बात की समझ देती है कि व्यक्ति को जब तक मंजिल नहीं मिले तब तक कभी प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए। इसमें लेखक ने छिपकली और पतंगे मानवेतर पात्रों के द्वारा बच्चों को समझाया है। एक छिपकली पतंगे को पकड़ने का प्रयास करती है। पतंगा दूर छिटक जाता है। वह अनेक प्रयास करती है लेकिन पतंगा उसे चकमा देकर निकल जाता है। छिपकली आशा नहीं छोड़ती। यह सारा दृश्य कनु देखती है जो हर बार एक दो नंबर से जया से पीछे छूट जाती है। वह सोचती है कैसे वह प्रथम स्थान प्राप्त करे? इतने में फिर उसकी निगाह दीवार पर छिपकली के पतंगे पर किए हमले को देखती है जो नौ बार बच चुका था लेकिन दसवें प्रयास में छिपकली जीत जाती है और पतंगा उसके मुँह में आ जाता है। यह दृश्य कनु की प्रेरणा बनता है। वह अपने विषय जीवशास्त्र में सर्वश्रेष्ठ घोषित हुई और अपने शहर ही नहीं सारे प्रांत में प्रथम आई।

संग्रह की एक कहानी ‘बिन्नैयाँ’ है जो अनुभूति और संवेदना के ताने-बाने से बुनी गई है। बिट्टू का स्कूल में दाखिला हो गया। वह नई कक्षा में आया। वहाँ वह एक सीट पर बैठने लगा तो एक आवाज आई कि ‘अरे बिट्टू यहाँ मेरे पास आकर बैठो।’ बिट्टू ने देखा तो यह उसके पड़ोस में रहने वाली बिन्नैयाँ थी जो कभी-कभी अपनी माँ के साथ उनके घर आती थी। इस तरह दोनों की मित्रता बढ़ती गई। स्कूल में दोनों मन लगाकर पढ़ते और हाशियार बच्चों में उनकी गिनती होती। मासाब बहुत सख्त थे। बेंत हर समय उनके हाथ में रहता। पर दोनों की मार नहीं पिटी। अचानक बिट्टू के हाथों में खाज-खुजली होने लग गई। बच्चे उसे देखते ही चिढ़ाते। कोई उसे अपने पास नहीं बिठाता था। पर बिन्नैयाँ उसे अपने साथ बिठाती। एक दिन गृहकार्य में स्लेट पर एक पाठ लिखकर लाना था। मासाब सबकी स्लेट देख रहे थे। बिन्नैयाँ ने देखा कि बिट्टू की स्लेट कोरी है। उसने सोचा हे भगवान अब उसे मार पड़ेगी। यहाँ लेखक ने मानवीय संवेदना को उभारा है। बिन्नैयाँ सोचती है कि उसे मार पड़ेगी। खाज-खुजली वाले हाथ पर बेंत का प्रहार वह कैसे सहेगा? शायद खाज के दर्द से वह गृहकार्य नहीं कर पाया होगा। उसने झट से अपनी स्लेट बिट्टू को पकड़ा दी। मासाब ने बिट्टू की स्लेट देखी और शाबाशी दी। तुम तो बहुत सुंदर लिखते हो। बिट्टू भीतर तक काँप गया। वह स्लेट बिन्नैयाँ की थी। वह बिट्टू की कोरी स्लेट लेकर मासाब के पास पहुँच गई और अपना हाथ आगे कर दिया। जैसे ही हथेली पर मारने के लिए मासाब ने छड़ी उठाई तो बिट्टू चीख पड़ा- उसे मत मारो मासाब। यह स्लेट मेरी है। मैंने काम नहीं किया खाज-खुजली के कारण। बड़े मासाब का गुस्सा पल में हवा हो गया। उन्होंने बेंत एक तरफ फेंक दिया। उनकी आँखें छलक पड़ी। उन्होंने बिन्नैयाँ को गले लगा लिया। बिन्नैयाँ को लगा मासाब पिता बनकर उसकी पीठ सहला रहे हैं। कहानी में लेखक ने बच्चों को आपसी प्रेम, सहानुभूति का पाठ नहीं पढ़ाया। घटना के माध्यम से बच्चे स्वयं ही इसे समझ लेते हैं। कहानीकार का उद्देश्य बच्चों में मनोरंजन के साथ परोक्ष रूपमें नैतिक गुणों की प्रतिष्ठा करना है। यही कहानी और कहानीकार की सफलता है।

‘घर के नन्हें जासूस’ कहानी का संदेश बहुत ही प्रेरक है। यह कहानी मनोरंजक ही नहीं आद्यान्त कुतुहल बनाए रखने वाली है। रोहन और हेमा रोज की तरह स्कूल से घर आते हैं और दादाजी को एक चटाई पर बैठे देखकर ठिठक जाते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि दादाजी क्यों पुरानी चीजों को इकट्ठा कर रहे हैं। उनके पास आलपिन रखे हुए हैं। पुरानी कापियाँ पड़ी हैं। साथ में उनमें से फाड़े गए कुछ पृष्ठ पड़े हैं। कुछ चाक, कुछ छोटी पेंसिलें भी हैं। बच्चों को देखकर दादाजी कमरे में चले गए और फटे-पुराने पन्नों की आलपिन से कुछ कापियाँ बना ली। बच्चे खिड़की से सब देखते हैं। अब दादाजी उन कापियों को छोटे से झोले में रखकर झोपड़-पट्टियों की तरफ मुड़ जाते हैं और एक झोपड़ी के सामने रुक गए। बच्चों ने उन्हें घेर लिया और उन्होंने वह सारा सामान बच्चों में बाँट दिया। बच्चे बहुत खुश हुए। अचानक रोहन और हेमा उनका पीछा करते-करते उनके सामने प्रकट हो गए। तो तुम मेरी जासूसी कर रहे थे कि मैं इस सामान का क्या करूँगा। बच्चो हर चीज की कीमत होती है क्योंकि जो चीज तुम्हारे काम की नहीं है वह दूसरों के काम आ सकती है। इसीलिए उसे हमें जरूरतमंद लोगों में बाँट देनी चाहिए। दादाजी द्वारा जीवन-व्यवहार की सीख भी बड़े सूक्ष्म रूप से दी गई है।

दादाजी का पिद्दू बालकहानी-संग्रह और प्रभुदयाल श्रीवास्तव पर समीक्षात्मक आलेख

संग्रह की झिंग्गू और डिंग्गू दो चूहों की ऐसी कहानी है जो बच्चों को परोक्ष रूप से आलस्य न करने की सीख देती है। आलस्य व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन है। कभी-कभी आलसी व्यक्ति को अपने आलस्य के कारण प्राण भी गँवाने पड़ते हैं। झिंग्गू ओर डिंग्गू दो चूहे एक बहुत बड़े घर में शाही मेहमानों की तरह रहते हैं। लेखक ने इस कहानी में चूहों की प्रकृति का बहुत सुंदर और सजीव वर्णन किया है-‘‘झिंग्गू ओर डिंग्गू इस कमरे से उस कमरे और उस कमरे से इस कमरे तक धमा-चौकड़ी करते रहते। कभी-कभी बरामदे की सैर कर आते तो कभी आँगन में जाकर दंड पेलते। किचन में जाकर एकाध रोटी का टुकड़ा ले आते और अलमारी के पीछे अथवा पलंग के नीचे बैठकर लंच का आनंद लेते। रात को गेहूँ या चावल पर हाथ मारते तो रात भर डिनर चलता रहता।’’ उसी घर में एक बिल्ली भी रहती है जो हर समय ताक लगाए रहती है कि कैसे इनका शिकार किया जाए। पर यह हर बार बच जाते हैं। झिंग्गू कहता है कि कब तक हम बिल्ली से बचते रहेंगे हमें कोई अपना बिल बनाना चाहिए लेखक ने इसे कविता के माध्यम से कहा है-

जैसे भी हो, छोटा मोटा, बिल्ल बना लो डिंग्गूराम,

अगर पड़ी आफत तो डिंग्गू, आएगा तेरे ही काम।

डिंग्गू कहता बिल्ल बनाना है, मूरख लोगों का काम,

मैं तो अलमारी की पीछे, छुपकर करता हूँ आराम।

बिल्ली तो क्या बिल्ली की, अम्मा भी क्या कर पायेगी

लाख पटक ले सिर धरती पर, मुझको पकड़ न पायेगी।

लेकिन एक दिन मालिक जब सफेदी कराते हैं तो अल्मारी वगैरह सब सामान बाहर आँगन में रखवा दिए जाते हैं। अब बिल्ली का खतरा बढ़ गया था। अचानक एक दिन बिल्ली आ धमकी। दोनों घबरा गए। झिंग्गू तो अपने बनाए बिल में जा समाया परंतु डिंग्गू बेचारा पलंग के नीचे जा घुसा। बिल्ली वहाँ पहले से ही घात लगाए बैठी थी। बिल्ली के मुँह में जाते-जाते उसके कानों में झिंग्गू दादा के शब्द गूँज रहे थे कि आलस ठीक नहीं है भाई। अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत।

‘मुट्टा’ कहानी एक मोटे बच्चे की कहानी है जो खूब चाकलेट खाता है और भी चीजें डटकर खाता है। उसका दोस्त जब उसके घर में आकर उसे खाता देखता है कि वह उनमें कितना नमक डालकर खा रहा है। अच्छू ने कहा कि इतना नमक सेहत के लिए अच्छा नहीं है। दिनभर में पाँच-छह ग्राम नमक शरीर के लिए काफी है। इससे ज्यादा खाने से हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। रक्तचाप बढ़ जाता है। नमक अधिक खाने से कैल्सियम मूत्रमार्ग से बाहर निकल जाता है और उसकी कमी से शरीर की हड्डियाँ कमजोर हो जाती है। दाँत गिरने लगते हैं। त्वचा पर झुर्रियां पड़ने लगती है। आँखों की रोशनी कम होने लगती है और मोटापा, मधुमेह उसे घेर लेते हैं। मुट्टा घबरा गया और कहा कि मैं अब और नहीं सुन सकता। मित्र की बात मानकर उसने नमक खाना बहुत कम कर दिया। हालांकि यह कहानी किसी प्रकार का कथारस प्रदान नहीं करती लेकिन ज्ञानप्रद है और बच्चों को अपने सेहत के प्रति जागरूक करती है कि क्या उनके लिए खाद्य है और क्या अखाद्य।

‘दृढ इच्छाशक्ति से पाई सफलता’ कहानी भी बच्चों को एक संदेश देती है कि अगर परिश्रम करें तो सब कुछ हासिल हो सकता है और हम मंजिल तक पहुँच सकते हैं। यह कहानी आज की ज्वलंत समस्या स्कूलों में दाखिले की प्रणाली पर केन्द्रित है। दाखिले को लेकर किस तरह के घोटाले होते हैं। मोटी डोनेशन, बड़े पद और प्रभाव से मिलती सीट की पोल खोली है। पशुओं को केन्द्र में रखकर उनका मानवीकरण करते हुए यह कहानी लिखी गई है। चन्दन वन में भालू की पाठशाला है जो इन्द्रलोक का आभास कराती है। जिसमें दाखिला लेने के लिए जंगल के सभी जानवर लालायित रहते हैं। एक गधे का बच्चा गिद्धू इसी स्कूल में दाखिला लेने के लिए कई दिनों से सपने बुन रहा था। उसने रात-दिन परिश्रम कर तैयारी की और इंटरव्यू में सभी पूछे गए प्रश्नों का सही और सटीक जवाब दिया किंतु प्राचार्य ने जब अनुदान देने की बात कही तो गधे ने साफ इंकार कर दिया। प्राचार्य ने पलटी मारी और कहा कि तुम्हारा बेटा कमजोर है। हम उसे दाखिला नहीं दे सकते। यहाँ लेखक ने स्कूलों में हो रही इस धांधली की समस्या को इन पात्रों के माध्मय से केवल उभारा ही नहीं है साथ ही इस चुनौती का सामना करना भी सिखाया है। गिद्धू और गधा मिलकर सभी जानवरों को इस धांधली से अवगत कराते हैं और सब मिलकर अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं। दाखिले में असफल हुए सभी जानवर मिलकर प्राचार्य को घेर लेते हैं। प्राचार्य क्षमा माँगते हैं और सभी को बिना अनुदान के दाखिला दे देते हैं। समस्या क साथ उसका उसका व्यावहारिक समाधान भी दिया है।

अक्सर किसी भी मूर्ख के लिए लोग गधे शब्द का प्रयोग करते हैं। गधे को सामान्यतः जड़ बुद्धि कहा जाता है। यहाँ लेखक ने गधे के विषय में जो मिथक है उसे तोड़ा है। अभ्यास से और अपने दृढ़ संकल्प से कोई भी अपना प्राप्य अपना इच्छित पा जाता है। अपना निर्धारित लक्ष्य हासिल कर लेता है।

‘मुकरा’ कहानी बच्चे की जिद और उसके हृदय-परिवर्तन की कहानी है। मुकरा ने जिद पकड़ी कि मैं इस दीवाली पर पाँच सौ रुपये के पटाखे लूँगा। माँ परेशान थी और इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी क्योंकि उसका पति जी-तोड़ मेहनत करने के बावजूद भी बड़ी मुश्किल से गुजारे के पैसे जुटा पाता। उसकी जिद के आगे न चाहते हुए भी रामरती ने गुस्से मे पाँच सौ रुपये का नोट उसकी तरफ फेंक दिया और वह उसके पटाखे लेने चला गया। लेखक ने यहाँ माँ की ममतालु प्रकृति को उभारा है। बच्चे की ज़िद से दुःखी होने के बावजूद एक माँ के वात्सल्स से छलछलाते हृदय की तरलता को दिखाया है कि उसकी ममता बेटे की ज़िद के आगे अक्सर हथियार डाल देती है। पटाखे लेने गया मुकरा बहुत रात होने पर भी जब घर नहीं आया तो माँ चिंता से व्याकुल हो उठी। उसके पिता उमेसा उसे ढूँढने गए तो पता चला कि वह रामबाबू कक्का के साथ अस्पताल गया है। पिता अस्पताल पहुँचे। रामबाबू ने उन्हें बताया कि तुम्हारा बेटा तो साक्षात कृष्ण का अवतार है। यह न होता तो मैं सड़क पर मर गया होता। इसने अपने पैसों से मेरे लिए दवाई ली और मुझे अस्पताल भी पहुँचाया। पिता को बहुत अच्छा लगा। उन्होंने बेटे को गले से लगा लिया कि हमारा बेटा उम्र से बहुत ज्यादा बड़़ा हो गया है। बच्चे बाल हठ तो है करते हैं किंतु, हृदय से कोमल और संवेदनशील होते हैं।

‘उछलू की चित्रकारी’ कहानी में लेखक ने उछलू बंदर को प्रतीक रूप में लिया है। उसका मानवीकरण किया है। उछलू का नामकरण लेखक ने उसकी उछलकूद की प्रकृतिें के कारण किया है। वन के जिन जानवरों के वह जो सुंदर चित्र बनाता है उन्हें वह उन्हीं को बेच देता है। उस धन को वह सँभालकर रखता जाता है। उसका कोई सद्उपयोग नहीं करता। जब वह मालामाल हो जाता है तो उसको अपनी धन की रखवाली करनी पड़ती है। जहाँ दूसरे बंदर कहीं भी घूमते रहते हैं, वह अपने धन की रक्षा के लिए वह बंधुआ होकर रह जाता है। वह सोचता है कि क्यों न वह शादी कर ले। अब तो वह धनवान है। कोई भी बंदरिया उससे खुशी-खुशी विवाह कर लेगी। वह बहुत सुंदर मिलनसार बंदरिया बिंदो के पास जाता है और शादी का प्रस्ताव रखता है। मैं तुम्हें रानी बनाकर रखूँगा। देश-विदेश की सैर कराऊँगा। बिंदों ने मुँह फेर लिया और कहा कि तुम जैसे धनजोडूं से कौन शादी करेगा? इसी तरह वह बुक्की बंदरिया के पास भी जाता है और कहता है कि मैं तुम्हारे लिए बहुत सारे गहने बनवा दूँगा। तो वह कहती है कि आदमी के गुण-स्वभाव वाले तुझ जैसे बंदर से शादी कौन करेगा? इस तरह हर बंदरिया उसे मना कर देती है। एक बंदरिया बकली उसके साथ चल पड़ती है। वह उसके घर पहुँच कर कहती है कि तू आदमी बन गया है। पैसे तो इंसान जोड़ते है और जोड़ते-जोड़ते मर जाते हैं। इस तरह यहाँ लेखक ने व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग किया है। हम तो बंदर मस्त-कलंदर हैं। सारे जंगल में बिचरते हैं। जहाँ फल मिल गए खा लिए। जो शाख मिली सो लिए। तुमने बंदर-धर्म छोड़कर आदमियत अपना ली है। फेंक दो ये रुपये, मैं अभी तुमसे शादी कर लेती हूँ। इतने में दूसरी बंदरिया भी वहाँ आ गई। उन्होंने बंदर के गले में हार डाल दिया। उछलू घबरा गया। वह अपने खोह में घुसा और सारा धन निकालकर बाहर फेंकने लगा। अब उछलू से विवाह करने के लिए तीनों बंदरिया तैयार थीं। यहाँ लेखक ने आदमी जात पर व्यंग्य किया है कि उसका सारा जीवन धन-संग्रह में ही व्यतीत हो जाता है और अचानक एक दिन मृत्यु का ग्रास बन जाता है। धन का उद्देश्य उसका सदुपयोग है। किसी भी जरूरतमंद की सहायता करने में है। लेखक ने यह सीख जानवरों के माध्यम से दी है। वैसे इस कहानी का विषय बच्चों की प्रकृति के अनुकूल कम बड़ो की प्रकृति के अनुकूल अधिक है।

‘होर्डिंग वाले जूते’ कहानी में लेखक ने जूतों का मानवीकरण किया है। यहाँ लेखक ने केवल पशुओं का ही मानवीकरण नहीं किया जड़-वस्तुओं का भी मानवीकरण किया है। जड़-वस्तुओं का न केवल मानवीकरण किया है वरन् उनमें मानवीय-संवेदना के गुण को भी उभारा है। बाहर होर्डिंग में जूते रखे हैं। जूते हर आने-जाने वाले व्यक्ति के जूतों को गौर से देखते हैं। किसी के पैर में अपनी कंपनी के जूते देखकर प्रसन्न हो उठते हैं। एक दिन एक बड़ा कमज़ोर, दुबला-पतला सा व्यक्ति इनको अपने शोरूम के बाहर घूमता दिखाई देता है जिसके पैर में जूते नहीं हैं। वे उस दर्द की कल्पना करके विचलित हो जाते हैं। वे सोचने लगे- ‘‘पैर में कांटे चुभते होंगे, कंकड़-पत्थर भी चोट पहुँचाते होंगे, क्या कर सकते हैं हम?’’ दूसरे दिन भी जब वह आदमी उन्हें नंगे पैर दिखा तो होर्डिंग से निकलकर दोनों जूते उसके पैरों में जा समाए। होर्डिंग पर जूतों की जगह खाली हो गई। मालिक की जब उस पर दृष्टि पड़ी तो वह हैरान हुआ कि होर्डिंग से जूते कौन काटकर ले गया है। वह रोज़ सच की खोज में सुबह आता। एक दिन उसे वह कमजोर सा व्यक्ति दिखाई दिया जिसके पैर में वही जूते थे। वह ठीक तरह से चल भी नहीं पा रहा था दुकान मालिक उससे पूछता है तो वह सारी बात बता देता है। दुकान मालिक ने उससे कहा कि ये जूते तुम्हारे पैर में दर्द कर रहे हैं। ये लो मेरा कार्ड और कल मेरी दुकान पर आना, मैं तुम्हें तुम्हारे नाप के जूते पहना दूँगा। आदमी लंगड़ाता हुआ चला गया। अगले दिन दुकान मालिक फिर उसी चौराहे से निकला। उसने देखा कि होर्डिंग में जूते वाली जगह पूरी तरह से भरी हुई थी। वहाँ से गायब हुए जूते फिर से अपने स्थान पर बैठ गए थे। दुकान मालिक भी सोच में पड़ गया कि यह क्या हो रहा है। उसका दिमाग घूम गया। ठीक उसी समय वह आदमी वहाँ से गुजरा तो अबकी बार वह नंगे पैर गुजरा। यह क्या माजरा है। वह जोर से चिल्लाया। चिल्लाते ही उसकी नींद खुल गई। अरे यह तो सपना था लेकिन इस सपने ने उसे एक सीख दी। अब वह हर नंगे पैर चलने वाले को ढूँढ-ढूढकर जूते पहनाता वह भी बिल्कुल मुफ्त। इस कहानी के माध्यम से भी लेखक ने परोक्ष रूप से यह संदेश दिया है कि जो आर्थिक रूप से समर्थ है जिसका व्यापार बहुत अच्छा चलता है उसे उदार बनना चाहिए तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता अवश्य करनी चाहिए। निश्चय ही ऐसी कहानियाँ बच्चों के व्यक्तित्व-चरित्र में बचपन से ही चुपके- चुपके सद्गुणों का विकास करती हैं।

‘नाक में चूहा’ संग्रह की अंतिम कहानी है जिसका शीर्षक ही चैंका देता है। नाक का मालिक बहुत मोटा है। जब वह सोता है तो उसकी नाक विचित्र सी आवाज़ करती है। नाक में दो छेद हैं जो मालिक के मोटापे के अनुसार बड़े-बड़े हैं। बड़े रोचक ढंग से लेखक ने उन दो छेदों की भूमिका बताई है। छेदों में से साँस आती-जाती है। जब एक छेद साँस चलाता है तो दूसरा छेद चुपचाप आराम करता है। वह न किसी को भीतर जाने देता और न किसी को भीतर से बाहर आने देता। दोनों छेद एक-दूसरे से शिकायत करते कि उन्हें घूर-घूर की आवाज परेशान करती है। वहाँ एक चूहा रहता था दुबला-पतला। वह एक दिन पलंग पर चढ़ गया जहाँ नाक सो रही थी। वह नाक को बड़े ध्यान से देखने लगा जिसमें दो बड़े-बड़े छेद थे। वह नाक के मुहाने तक जा पहुँचा और एक छेद से प्रवेश कर गया। उसे नाक की वह अंधेरी सी गुफा बड़ी मुलायम और गुदगुदी लगी। वह मस्ती में आ गया और अपनी पूछ हिलाता तो कभी मूछ। वह आगे जाने का रास्ता तलाशने लगा लेकिन आगे का रास्ता अनजाना था इसलिए वह वापस आ गया। उसने सोचा कि अगर नाक जग गई तो क्या होगा? वह मुझ बहुत मारेगी।लेकिन दुबारा फिर नाक में घुस गया और आगे की तरफ बढ़ गया |वहां घुप्प अन्धेरा था। वह बुरी तरह से डर गया। तभी घुर्र की बहुत तेज आवाज हुई और वह बंदूक की गोली की तरह बाहर फेंक दिया गया। वह सामने दीवार से जा टकराया। वह रोने लगा। रोना सुनकर माँ पास आई। तू भीतर क्यों घुसा अच्छा हुआ तू बचकर आ गया। कभी मत जाना नाक के आसपास। उसने माँ को बचन दिया कि कभी नाक के पास नहीं जाऊँगा और यह बात अपने दोस्तों को भी बता दी। यह वायदा लिया कि कभी आदमी की नाक में न घुसें। सारे मित्र मस्ती में भरकर नारा लगाकर नाचने लगे कि नहीं घुसेंगे, नहीं घुसेंगे। तब से कोई चूहा आदमी की नाक में नहीं घुसता। यह मजेदार कहानी पढ़कर बच्चे बहुत खुश होते हैं।

इसी प्रकार अन्य कहानियाँ लम्पू और गुलाबी, अम्बुज का छक्का, अपशकुन, अब पछताये होत का, पौधों का करिश्मा, चन्नी डर छूट गया, आपरेशन बाल्टी, गुलशन, बस थोड़ी सी समझदारी, रोटी बोली सब्जी बोली आदि भी रोचक और मनोरंजक कहानियाँ हैं। कहानीकार का उद्देश्य मनोरंजन के साथ परोक्ष रूपमें बच्चों में नैतिक गुणों की प्रतिष्ठा करना है।

कथ्य की भाँति कहानियों का शिल्प भी सुंदर है। भाषा मुहावरेदार है जो उसकी प्रभविषुणता बढ़ाती है। संकलन की हर कहानी में या यूँ कहें कि हर पृष्ठ में यथास्थान अनेक मुहावरों का प्रयोग हुआ है जैसे- छठी का दूध याद दिलाना, अब पछताए होत का जब चिड़िया चुग गई खेत, आसमान से तारे तोड़कर लाना, वही ढाक के तीन पात, मन शैतान तो गधा पहलवान, छप्पर फाड़ के आया, दूर के अंगूर खट्टे, नौ दो ग्यारह होना आदि। बालसाहित्य का एक उद्देश्य बच्चों की भाषा का परिष्कार करना भी है। उनकी शब्द-संपदा बढ़ाना भी है। बालोपयोगी भाषा-शैली में बँधी कहानियाँ बच्चों को नऐ शब्दों, मुहावरों, लोकोक्तियों से भी परिचित कराती हैं। लेखक ने एक बालसाहित्यकार के रूप में अपने दायित्व को हर जगह निभाया है। मुहावरे लोकभाषा का महत्त्वपूर्ण अंग है। लेखक ने लोकभाषा में प्रयोग होने वाले मुहावरों द्वारा बच्चों के भाषा-ज्ञान में अभिवृद्धि की है। भाषा पात्रानुकूल है। अनेक कहानियों में पात्रों को अपनी लोकभाषा का प्रयोग करते दिखाया है। जैसे- बिन्नैयाँ कहानी में बिन्नैयाँ द्वारा प्रयोग किए गए वाक्य बुंदेली भाषा का सौंदर्य लिए है- ‘‘हमारे भैया खों जीने परेसान करो तो हम ऊखों सुधार देंहें।" ‘‘हाथ पाँव में दम नैयाँ हम कौनौं से कम नैयाँ।’’यथास्थान लेखक ने अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग किया है जैसे- सेटेलाइट, बोल्ड, मूड, रश्यिन जीन्स, स्टेट्स सिंबल, केजी, नर्सरी, आपरेशन, कालोनी, आंटी, बोर्ड आदि। यथा अवसर कुछ पात्रों के द्वारा उर्दू शब्दों का प्रयोग भी हुआ है जैसे- मशविरा, दुकान, दुकानदार, रजाई, छोकरे, तहस-नहस, बेहूदगी, माफ, गुलशन, अल्लाह आदि। संस्कृत के तत्सम शब्द भी अनेक स्थानों पर आए हैं जैसे - दृढ़, प्राचार्य, निपुण, कुशाग्र, क्षमा आदि। कहानियों मे प्रयुक्त लेखक का शब्द-भंडार अत्यंत समृद्ध है। निश्चय ही इससे बच्चों की शब्द-संपदा की भी अभिवृद्धि होगी। सहज भाषाशैली में लिखी ये कहानियाँ पाठकों को अपने साथ बहा ले जाती हैं।

सभी कहानियाँ अपने मौलिक विषय के कारण बच्चों को आकृष्ट करेंगी। कुछ कहानियाँ बच्चों को सुन्दर जीवन जीने के सूत्र प्रदान करती हैं। खेल-खेल में बड़ी सीख दे जाती हैं, जो बालमन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। बीच में कई कहानियाँ संदेश देने वाली और सुधारवादी कहानियाँ हैं पर उनका कथारस बच्चों को उपदेश से बोझिल नहीं होने देता। कुछ कहानियाँ अपनी मार्मिकता से पाठकों के मन को छू लेती हैं। कुछ कहानियाँ हास्य प्रधान कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़कर बच्चे हँसकर लोटपोट हो जाते हैं। ‘नाक में चूहा’ जैसी मजेदार कहानियाँ बच्चों का अच्छा मनोरंजन करती हैं, जिन्हें वे मुग्ध होकर पढ़ते हैं। कुछ कहानियों की संवेदना बच्चों के हृदय की कोमलता को उभारती हैं, जिन्हें पाठक भावमग्न होकर पढ़ते हैं। लेखक ने पात्रों के चरित्रों को बड़ी खूबसूरती से उभारा है। दादाजी की बातें खेल-खेल में बच्चों को अच्छे-बुरे में अंतर सिखाते हुए जीवन-मूल्यों को आत्मसात् कराती हैं।

एक वाक्य में कहा जा सकता है कि प्रभुदयाल श्रीवास्तव जी की मनोरंजक एवं प्रेरणादायी बालकहानियों को बच्चे पसंद करेंगे और उन्हें रुचि से पढ़ेंगे।

- डॉ. शकुंतला कालरा, डी.लिट्

सेवानिवृत्त एसोसियेट प्रोफेसर,
मैत्रेयी काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
एन.डी.-57, पीतमपुरा, दिल्ली-110034

निष्कर्ष; प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बालकहानियाँ मनोरंजन, संवेदना, कल्पना और जीवन-मूल्यों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती हैं। उनकी कहानियाँ बालमनोविज्ञान के अनुरूप होने के साथ-साथ बच्चों में नैतिकता, सहानुभूति, परिश्रम, साहस और सामाजिक चेतना का भी विकास करती हैं। सरल, सहज एवं रोचक भाषा में लिखी गई ये कहानियाँ हिंदी बालसाहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर हैं और निस्संदेह बालपाठकों के साथ-साथ अभिभावकों एवं शिक्षकों के लिए भी समान रूप से उपयोगी सिद्ध होंगी।

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